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‘हमने चोर को चोर कहना बंद कर दिया है’: आशुतोष-राजदीप की तीखी बहस

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के साहित्य महोत्सव में 24 अक्टूबर 2026 को आयोजित मीडिया विमर्श का एक दृश्य। (स्रोत: यूट्यूब वीडियो से स्क्रीनशॉट)
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—खुली किताब | रिसर्च टीम

New Delhi | October 25, 2026

मीडिया विमर्श

भारतीय मीडिया के प्रति घटते भरोसे और पत्रकारिता की जवाबदेही को लेकर वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष और राजदीप सरदेसाई के बीच तीखी बहस हुई। आशुतोष ने सत्ता के सामने मीडिया के झुकने और मालिकों के व्यावसायिक हितों को संकट की प्रमुख वजह बताया। वहीं, राजदीप ने मीडिया की विफलताओं को स्वीकार करते हुए चेताया कि पूरी पत्रकार बिरादरी को एक ही नजर से देखना ईमानदार पत्रकारिता को भी कमजोर कर सकता है।

नई दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के तीन दिवसीय साहित्य महोत्सव एवं पुस्तक मेले के तहत 24 अक्टूबर 2026 को ‘मीडिया में विश्वास का संकट: आगे का रास्ता’ विषय पर चर्चा आयोजित हुई। दोपहर 12 से 1 बजे तक निर्धारित इस सत्र के वक्ताओं में वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष, राजदीप सरदेसाई, धन्या राजेंद्रन और रीता क्रोचा शामिल थे। चर्चा का संचालन प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की अध्यक्ष संगीता बरुआ पिशारोती ने किया। इसी दौरान आशुतोष ने भारतीय पत्रकारिता की तुलना ‘डॉ. जेकिल और मिस्टर हाइड’ से करते हुए सत्ता के दबाव में मीडिया के बदलते रवैये पर सवाल उठाए।

आशुतोष का तर्क था कि कमजोर सरकारों के दौर में निर्भीक दिखाई देने वाले पत्रकार और संस्थान शक्तिशाली सरकारों के सामने अक्सर घुटने टेक देते हैं। उन्होंने 1975 के आपातकाल और उस दौर में कुछ वरिष्ठ संपादकों के रवैये का उदाहरण देते हुए कहा कि सत्ता के दबाव में पत्रकारिता का यह व्यवहार कोई नई प्रवृत्ति नहीं है।

आशुतोष ने मीडिया मालिकों की भूमिका पर विशेष सवाल उठाए। उनका आरोप था कि कई संस्थानों में संपादकीय स्वतंत्रता से अधिक महत्व मुनाफे और सत्ता से संबंधों को दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार को असहज करने वाली खबरों पर दबाव आने की स्थिति में मालिक पत्रकारों का साथ देने के बजाय उन्हें हटाने तक को तैयार हो जाते हैं। अमेरिकी समाचारपत्र न्यूयॉर्क टाइम्स के प्रकाशक का उदाहरण देते हुए उन्होंने भारतीय मीडिया मालिकों की अपने संपादकों और रिपोर्टरों के प्रति जिम्मेदारी पर सवाल उठाया।

उन्होंने सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता, कॉरपोरेट दबाव और बड़े मीडिया कॉन्क्लेव के व्यावसायिक स्वरूप की भी आलोचना की। उनका आरोप था कि ऐसे आयोजनों में कई बार सार्वजनिक विमर्श से अधिक महत्व कमाई और सत्ता प्रतिष्ठान से संबंध बनाए रखने को दिया जाता है। अपने डिजिटल समाचार मंच ‘सत्य हिंदी’ का संदर्भ देते हुए उन्होंने स्वतंत्र मीडिया को विज्ञापन जुटाने में आने वाली कठिनाइयों का भी उल्लेख किया।

राजदीप सरदेसाई ने माना कि मीडिया में गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि टेलीविजन पत्रकारिता में समाचार और राय के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी है। प्राइम टाइम में एंकर की राय को खबर की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि जमीनी रिपोर्टर की भूमिका सीमित होती जा रही है। उन्होंने राजनीतिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया और मीडिया के आर्थिक मॉडल पर बढ़ते दबाव को भी अविश्वास के कारणों में गिनाया।

हालांकि, राजदीप ने पूरी मुख्यधारा मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ या बिका हुआ बताने की प्रवृत्ति पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि गलत पत्रकारिता की आलोचना जरूरी है, लेकिन इससे उन पत्रकारों के काम की अनदेखी नहीं होनी चाहिए जो कठिन परिस्थितियों में स्वतंत्र रिपोर्टिंग कर रहे हैं। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की खोजी खबरों का उदाहरण देते हुए अच्छी पत्रकारिता को पहचानने और उसका सार्वजनिक समर्थन करने पर जोर दिया।

चर्चा में पत्रकार धन्या राजेंद्रन ने मीडिया की जवाबदेही पर सवाल उठाया। उन्होंने यह मुद्दा सामने रखा कि जब मीडिया संस्थान अपनी गलतियों के लिए जवाबदेह नहीं होते, तो जनता अपना असंतोष किस तरह व्यक्त करे। इससे मीडिया की आलोचना और पूरे पत्रकार समुदाय को बदनाम करने के बीच अंतर को लेकर बहस और तीखी हो गई।

इसी क्रम में आशुतोष ने राजदीप से पूछा, “राजदीप, चोर को तो चोर कहना पड़ेगा ना?” राजदीप ने जवाब दिया कि चोर को चोर जरूर कहा जाए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सभी नेताओं या सभी पत्रकारों को चोर बता दिया जाए। उन्होंने ऐसे व्यापक आरोपों से सार्वजनिक विश्वास को होने वाले नुकसान की ओर ध्यान दिलाया।

आशुतोष ने अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा, “इशू ये नहीं है कि हम सब चोर हैं, ये कह रहे हैं। इशू ये है कि हमने चोर को चोर कहना बंद कर दिया है। ये प्रॉब्लम है जर्नलिज्म के अंदर।” उनका तर्क था कि गलत काम करने वालों की पहचान करके उनकी आलोचना की जानी चाहिए और सार्वजनिक आलोचना के डर से सच बोलना बंद नहीं करना चाहिए।

बहस में पत्रकारों की संस्थागत सुरक्षा का सवाल भी उठा। राजदीप ने न्यूज़क्लिक के संपादक प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी और हिरासत का उल्लेख करते हुए पत्रकार समुदाय से अपेक्षित सामूहिक समर्थन न मिलने पर चिंता जताई। उन्होंने न्यायपालिका और मीडिया संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनका तर्क था कि पत्रकारों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए व्यक्तिगत साहस के साथ संस्थागत संरक्षण भी जरूरी है।

न्यूज़क्लिक से जुड़े एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि जिन पत्रकारों और एंकरों ने संबंधित पक्ष को सुने बिना दोषी ठहराया, उनकी पहचान करके सार्वजनिक आलोचना की जानी चाहिए। इस तरह उन्होंने गलत पत्रकारिता के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने और पूरी पत्रकार बिरादरी पर व्यापक आरोप लगाने के बीच अंतर स्पष्ट किया।

राजदीप ने मीडिया मालिकों, संपादकों और राजनेताओं के साथ दर्शकों को भी आत्ममंथन की सलाह दी। उन्होंने सवाल उठाया कि लोग समाचार जानकारी प्राप्त करने के लिए पढ़ते और देखते हैं या अपने पहले से बने राजनीतिक विचारों की पुष्टि के लिए।

चर्चा में दोनों पत्रकार मीडिया की जवाबदेही और आत्ममंथन की आवश्यकता पर सहमत थे। मुख्य मतभेद आलोचना के तरीके को लेकर सामने आया। आशुतोष ने गलत पत्रकारिता की स्पष्ट पहचान और उसके विरुद्ध बोलने पर जोर दिया, जबकि राजदीप ने आगाह किया कि व्यापक आरोपों के बीच ईमानदार पत्रकारों और उनके काम की पहचान खोनी नहीं चाहिए।

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