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गुजरात में जिला न्यायाधीशों के 113 पदों की भर्ती प्रक्रिया में किसी का चयन नहीं: सुप्रीम कोर्ट में परीक्षा व्यवस्था पर सवाल

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—खुली किताब | रिसर्च टीम

New Delhi | October 1, 2026

गुजरात में जिला न्यायाधीशों की भर्ती की लिखित परीक्षा में सफल दो अभ्यर्थी साक्षात्कार की न्यूनतम अंक-सीमा पार नहीं कर सके। उन्होंने आरोप लगाया है कि संक्षिप्त साक्षात्कार में उनकी योग्यता का पर्याप्त आकलन नहीं हुआ। अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट में अंतिम परिणाम को चुनौती देकर नए सिरे से निष्पक्ष और पारदर्शी मूल्यांकन की माँग की है।

गुजरात में जिला न्यायाधीशों की सीधी भर्ती में किसी अभ्यर्थी का चयन नहीं हुआ। इस परिणाम पर विवाद सुप्रीम कोर्ट के सामने न्यायिक परीक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रश्न तक पहुँच गया है। गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने मौखिक टिप्पणी की। उन्होंने पूरी न्यायिक परीक्षा प्रक्रिया में सुधार की पहल तैयार करने में अदालत की रुचि व्यक्त की। इस टिप्पणी को सुधार का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।

लाइव लॉ के अनुसार, मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पीठ को बताया कि भर्ती के रिकॉर्ड प्रस्तुत किए गए हैं। अभ्यर्थियों के अंक सीलबंद लिफाफे में रखे गए हैं। अदालत ने सीलबंद रिपोर्ट रिकॉर्ड पर ली। खंडपीठ ने मामला ऐसी पीठ के सामने लगाने को कहा, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हों।

भूषण ने अभ्यर्थियों के चरित्र के आकलन से जुड़े नियम का भी उल्लेख किया। इसके तहत संबंधित हाई कोर्ट से रिपोर्ट प्राप्त की जानी है। उन्होंने अदालत से यह जाँचने का आग्रह किया कि इन अभ्यर्थियों के मामले में ऐसी रिपोर्ट प्राप्त की गई थी या नहीं।

दो अभ्यर्थियों ने गुजरात हाई कोर्ट की भर्ती प्रक्रिया के अंतिम परिणाम को चुनौती दी है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता मानसी जैन और विशाल बलजीत सिंह लिखित परीक्षा के बाद साक्षात्कार तक पहुँचे थे। उनका आरोप है कि संक्षिप्त साक्षात्कार में उनकी योग्यता का पर्याप्त आकलन नहीं हुआ। उन्होंने मूल्यांकन की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए हैं। स्वयं को असफल घोषित करने वाले परिणाम को निरस्त करने की माँग की है। साथ ही, नए सिरे से निष्पक्ष और पारदर्शी मूल्यांकन का अनुरोध किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, मानसी जैन को मुख्य लिखित परीक्षा में 200 में से 100.5 अंक मिले। साक्षात्कार में उन्हें 50 में से 9.6 अंक मिले। विशाल बलजीत सिंह को लिखित परीक्षा में 200 में से 110.5 अंक मिले। साक्षात्कार में उन्हें 50 में से 10 अंक मिले। दोनों साक्षात्कार में आवश्यक 20 अंकों की सीमा तक नहीं पहुँच सके।

मामला वर्ष 2024-25 की जिला न्यायाधीश भर्ती से जुड़ा है। यह 25 प्रतिशत सीधी भर्ती कोटे की प्रक्रिया थी। गुजरात हाई कोर्ट के 25 जुलाई 2025 के भर्ती विज्ञापन में लगभग 113 मौजूदा और भावी रिक्तियाँ दर्ज थीं। प्रक्रिया के अंत में 9 जुलाई 2026 को जारी चयन सूची में परिणाम ‘निल’ घोषित किया गया। अर्थात किसी अभ्यर्थी का चयन नहीं हुआ। विज्ञापित रिक्तियों में भविष्य में उत्पन्न होने वाले पद भी शामिल थे। इसलिए इस संख्या को वर्तमान में खाली पड़े पदों की संख्या मानना उचित नहीं होगा।

भर्ती विज्ञापन में मुख्य लिखित परीक्षा के लिए 200 अंक निर्धारित थे। साक्षात्कार के लिए 50 अंक तय थे। चयन दोनों के कुल अंकों के आधार पर होना था। लेकिन साक्षात्कार में अलग न्यूनतम सीमा पार करना भी अनिवार्य था। बेंचमार्क दिव्यांगता वाले अभ्यर्थियों (PwBD) के लिए यह सीमा 35 प्रतिशत थी। अन्य अभ्यर्थियों के लिए 40 प्रतिशत थी।

इस व्यवस्था में साक्षात्कार कुल अंकों का पाँचवाँ हिस्सा है। फिर भी, वह चयन का निर्णायक चरण है। लिखित परीक्षा में अधिक अंक साक्षात्कार की न्यूनतम सीमा में कमी की भरपाई नहीं कर सकते। इसलिए विवाद केवल लिखित और मौखिक परीक्षा के अंकों के अनुपात का नहीं है। साक्षात्कार में अपनाए गए मूल्यांकन की विश्वसनीयता भी प्रश्न के दायरे में है।

विज्ञापन के अनुसार, साक्षात्कार में कानूनी ज्ञान, तार्किक अभिव्यक्ति और निर्णय का संतुलन परखा जाना था। नैतिकता, संवाद क्षमता, चरित्र और बौद्धिक गहराई का भी आकलन होना था। ये गुण न्यायिक पद के लिए महत्वपूर्ण हैं। प्रश्न यह है कि उनका मूल्यांकन किन आधारों पर किया गया। उपलब्ध रिकॉर्ड उस आकलन को कितना स्पष्ट करता है, यह भी महत्वपूर्ण है।

लिखित परीक्षा में सफलता नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं देती। फिर भी, पूरी प्रक्रिया के बाद चयन सूची शून्य रही। ऐसे में भर्ती के मानकों और उनके प्रयोग, दोनों की समीक्षा का महत्व बढ़ जाता है। न्यायिक योग्यता के कठोर मानक और मूल्यांकन की पारदर्शिता एक-दूसरे के पूरक हैं।

आगे की सुनवाई में अदालत के विचार का दायरा स्पष्ट होगा। वह इस भर्ती के मूल्यांकन तक सीमित रहता है या व्यापक परीक्षा सुधार तक जाता है, यह देखना होगा। उपलब्ध सुनवाई विवरण में याचिकाकर्ताओं के आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष दर्ज नहीं है। भर्ती रद्द करने या नियुक्ति देने का निर्णय भी दर्ज नहीं है।

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