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विपक्ष का सुप्रीम कोर्ट मार्च पुलिस ने रोका, चुनाव आयोग के फैसलों से जुड़ा रिकॉर्ड मँगाने की याचिका दाखिल

नई दिल्ली में 12 अक्टूबर 2026 को एसआईआर और चुनाव आयोग के कामकाज के विरोध में सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करते इंडिया गठबंधन के नेता और कार्यकर्ता। तस्वीरों में मार्च के अलग-अलग दृश्य।
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—खुली किताब | रिसर्च टीम

New Delhi | October 13, 2026

भगवान दास रोड पर पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट की ओर बढ़ रहे विपक्षी मार्च को बैरिकेड लगाकर रोक दिया। लेकिन चुनाव आयोग के फैसलों पर उठे सवाल अब सर्वोच्च अदालत तक पहुँच गए हैं। राहुल गांधी सहित 11 विपक्षी नेताओं की याचिका में आयोग की बैठकों के रिकॉर्ड अदालत में पेश कराने, मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया की स्वतंत्र जाँच और जारी एसआईआर पर अंतरिम रोक की माँग की गई है। उधर, दिल्ली में विरोध प्रदर्शन और आवाजाही पर प्रतिबंधों तथा पुलिस कार्रवाई से जुड़े अलग मामलों में मंगलवार, 13 अक्टूबर को सुनवाई प्रस्तावित है। अब सवाल उठता है कि चुनाव आयोग के निर्णय किस प्रक्रिया से लिए गए और विरोध प्रदर्शन तथा आवाजाही पर प्रतिबंधों का कानूनी आधार क्या था?

नई दिल्ली में सोमवार, 12 अक्टूबर को विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनाव आयोग के कामकाज के विरोध में मार्च निकाला। इसमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, संजय राउत और अन्य विपक्षी नेता शामिल हुए। विभिन्न राज्यों से आए पार्टी कार्यकर्ताओं और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी प्रदर्शन में भाग लिया।

विपक्षी नेता पहले संविधान क्लब में एकत्र हुए। इसके बाद वे बसों से बाराखंभा रोड पहुँचे और वहाँ से सुप्रीम कोर्ट की ओर पैदल मार्च शुरू किया। भगवान दास रोड पर दिल्ली पुलिस ने बैरिकेड लगाकर उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों के बैरिकेड पर चढ़ने और उन्हें पार करने का प्रयास करने के दृश्य भी सामने आए।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल, शाम को पहुँचे विपक्षी नेता

दिल्ली पुलिस की बैरिकेडिंग के बीच राहुल गांधी सहित 11 विपक्षी नेताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में भारत निर्वाचन आयोग के खिलाफ याचिका दाखिल की गई। उपलब्ध फाइलिंग विवरण के अनुसार, ‘राहुल गांधी बनाम भारत निर्वाचन आयोग’ शीर्षक वाली इस याचिका की डायरी संख्या 64196/2026 है। राहुल गांधी की ओर से एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एस. प्रसन्ना ने याचिका दाखिल की।

याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर के संचालन में कथित अनियमितताओं और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। इनमें मतदाता सूचियों से नाम हटाने, आयोग के आंतरिक निर्णयों तथा डिजिटल प्रणालियों के संचालन से जुड़े आरोप शामिल हैं। इन आरोपों का न्यायिक परीक्षण और अदालत का निर्णय अभी बाकी है।

याचिका दाखिल होने के बाद शाम करीब साढ़े छह बजे राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे सहित अन्य विपक्षी नेता सुप्रीम कोर्ट परिसर पहुँचे। परिसर में वरिष्ठ एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी सहित कानूनी टीम से याचिका के संबंध में चर्चा किए जाने की जानकारी है। इसके बाद विपक्षी नेता रवाना हो गए। हालाँकि, मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत से उनकी व्यक्तिगत मुलाकात होने की पुष्टि नहीं हुई है।

याचिका में चुनाव आयोग की फाइलें और स्वतंत्र जाँच की माँग

याचिका के संबंध में उपलब्ध विवरणों के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अदालत से एसआईआर संबंधी विवादित फैसलों की पूरी फाइलें, बैठकों के एजेंडे, कार्यवृत्त, आंतरिक टिप्पणियाँ और चुनाव आयुक्तों की दर्ज आपत्तियाँ मँगाने का अनुरोध किया है।

याचिका में यह जाँचने की माँग भी की गई है कि क्या चुनाव आयोग के फैसले संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित वर्ष 2023 के कानून की धारा 18 के अनुसार लिए गए थे।

इस कानून की धारा 18 के अनुसार, आयोग के कामकाज से जुड़े निर्णय यथासंभव सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए। मतभेद होने पर बहुमत का निर्णय लागू होता है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कुछ निर्णय अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति या जानकारी के बिना लिए गए। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का पक्ष है कि उसके निर्णय सर्वसम्मति से हुए हैं।

याचिकाकर्ताओं ने 24 जून 2025 के आदेश और उससे संबंधित निर्णय प्रक्रिया की पूरी फाइल अदालत में प्रस्तुत कराने की माँग भी की है। सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के फैसले के अनुसार, यह आदेश बिहार में एसआईआर कराने से संबंधित था। याचिका में देशव्यापी पुनरीक्षण की निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने सूचना के अधिकार के तहत मिले एक जवाब और चुनाव आयोग के सार्वजनिक आदेश तथा बाद के स्पष्टीकरण के बीच कथित असंगति का मुद्दा भी उठाया है।

इसके अलावा ऑनलाइन फॉर्म-6 में कथित बदलाव, ईसीआईनेट और ईआरओनेट के संचालन तथा मतदाता सूचियों से नाम हटाने की प्रक्रिया की स्वतंत्र तकनीकी जाँच की माँग की गई है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति गठित करने का अनुरोध किया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने मतदान केंद्रवार हटाए गए मतदाताओं के नाम और उन्हें हटाने के कारण सार्वजनिक करने की माँग भी की है। इसके साथ पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने की प्रभावी व्यवस्था तथा नाम हटाने से पहले कानूनी प्रक्रिया के अनुसार नोटिस और सुनवाई का उचित अवसर सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया है।

याचिका में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल से संबंधित तकनीकी नीतियों और प्रक्रियाओं की स्वतंत्र समीक्षा की माँग भी शामिल है। इसके अतिरिक्त, देश के राज्यों में जारी एसआईआर पर मामले के निपटारे तक अंतरिम रोक लगाने का अनुरोध किया गया है।

एसआईआर की वैधता पर पहले फैसला, अब उसके संचालन पर सवाल

इस मामले का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू सुप्रीम कोर्ट का 27 मई 2026 का फैसला है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग मामले में अदालत ने बिहार में एसआईआर कराने की चुनाव आयोग की शक्ति और उस प्रक्रिया की वैधता को बरकरार रखा था।

नई याचिका में स्पष्ट किया गया है कि याचिकाकर्ता उस फैसले में निर्धारित एसआईआर की मूल वैधता के प्रश्न को दोबारा नहीं खोलना चाहते। उनका कहना है कि वर्तमान विवाद एसआईआर लागू करने के दौरान कानूनी सुरक्षा उपायों के पालन और चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से संबंधित है।

इस बीच, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित फॉर्म-6 को लेकर एक अलग मामले में महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत ने संशोधित फॉर्म-6 को न तो मंजूरी दी है और न ही उसे अवैध ठहराया है। पीठ के अनुसार, मई 2026 में बिहार एसआईआर मामले का फैसला देते समय यह संशोधित फॉर्म मौजूद नहीं था। इसलिए उसकी वैधता का प्रश्न उस फैसले में निर्धारित नहीं हुआ था।

हालाँकि, विपक्षी नेताओं की नई याचिका में जारी एसआईआर पर अंतरिम रोक की माँग भी की गई है। ऐसे में अदालत के सामने यह प्रश्न उठ सकता है कि पहले के फैसले को बरकरार रखते हुए वर्तमान संचालन से संबंधित शिकायतों पर किस सीमा तक हस्तक्षेप किया जा सकता है।

मुख्य न्यायाधीश ने मुलाकात से क्यों किया इनकार?

राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने 10 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को पत्र लिखकर 12 अक्टूबर की शाम चार से पाँच बजे के बीच मुलाकात का समय माँगा था।

मुख्य न्यायाधीश ने 11 अक्टूबर को जवाब देकर अनुरोध अस्वीकार कर दिया। उनके प्रकाशित पत्र के अनुसार, प्रस्तावित ज्ञापन में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग के अलावा छात्रों की कथित मनमानी गिरफ्तारियों, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और रेल सेवाओं के रद्दीकरण जैसे मुद्दे शामिल थे।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संबंधित विषय पहले से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। ऐसे मामलों पर व्यक्तिगत मुलाकात करके चर्चा करना शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत और न्यायिक मर्यादा के अनुरूप नहीं होगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट प्रशासनिक स्तर पर इन शिकायतों का निपटारा नहीं कर सकता। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायिक प्रक्रिया उपलब्ध है। उन्होंने विपक्षी नेताओं को विधिवत याचिका दाखिल करने का रास्ता बताया।

मुख्य न्यायाधीश के पत्र में उल्लेख था कि समान विषयों से संबंधित कुछ पहले से लंबित मामलों की सुनवाई मंगलवार, 13 अक्टूबर को निर्धारित है। हालाँकि, इससे विपक्षी नेताओं की नई एसआईआर याचिका भी उसी दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने की पुष्टि नहीं होती। मुख्य न्यायाधीश ने कानून के अनुसार नई याचिका पर यथाशीघ्र सुनवाई का आश्वासन दिया था।

सिंघवी ने दबाव बनाने के आरोपों से इनकार किया

कांग्रेस के वरिष्ठ एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने मुख्य न्यायाधीश पर राजनीतिक दबाव बनाने के आरोपों से इनकार किया है।

सिंघवी ने कहा कि विपक्षी नेताओं ने केवल मुलाकात का समय माँगा था। इसके बाद न्यायिक प्रक्रिया अपनाने की सलाह मिलने पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने का निर्णय लिया गया।

दूसरी ओर, भाजपा नेताओं ने विपक्ष के मार्च पर आपत्ति जताई है। भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने विपक्ष पर न्यायपालिका को डराने और सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने का प्रयास करने का आरोप लगाया। भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने भी सुप्रीम कोर्ट के बाहर हुए विरोध प्रदर्शन की आलोचना की।

इन आरोपों से अलग, चुनाव आयोग ने अपने फैसलों में पक्षपात और अनियमितताओं के आरोपों से इनकार किया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण मृत, स्थानांतरित, दोहरी या अन्य अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करने के लिए आवश्यक है। पात्र मतदाताओं के लिए नाम शामिल कराने और गलत प्रविष्टियाँ ठीक कराने के कानूनी रास्ते भी उपलब्ध हैं।

छह मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदी, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन का प्रश्न

विपक्ष के प्रस्तावित मार्च के मद्देनजर दिल्ली में व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए गए। दिल्ली मेट्रो रेल निगम ने पटेल चौक, जनपथ, राजीव चौक, मंडी हाउस, केंद्रीय सचिवालय और बाराखंभा रोड स्टेशनों के प्रवेश तथा निकास द्वार सुबह छह बजे से शाम चार बजे तक बंद रखने की घोषणा की थी। इस अवधि में मेट्रो लाइन बदलने की सुविधा जारी रखी गई। शाम तक प्रभावित स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार दोबारा खोल दिए गए।

मार्च के दौरान बाराखंभा रोड और भगवान दास रोड सहित आसपास के इलाकों में पुलिस तथा अन्य सुरक्षा बलों की तैनाती रही। कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की गई और यातायात प्रभावित हुआ।

इससे एक दिन पहले, 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने दिल्ली में परिवहन प्रतिबंधों और कथित अवैध हिरासत से जुड़े मामलों में अंतरिम निर्देश जारी किए थे। अदालत ने मेट्रो और रेल सेवाओं का सामान्य संचालन सुनिश्चित करने, नागरिकों की आवाजाही में अनावश्यक बाधाएँ दूर करने और सड़कों पर लगाई गई बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा करने को कहा था। साथ ही, कानून-व्यवस्था और यातायात की आवश्यकताओं के अनुसार उचित नियमन की गुंजाइश भी रखी थी।

यह सुनवाई 9 अक्टूबर के न्यायिक आदेश के कथित उल्लंघन से संबंधित अवमानना याचिका और अवैध हिरासत के आरोपों वाली याचिका पर हुई थी। पहले आदेश में अदालत ने मेट्रो और रेल सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध तथा उनके उचित नियमन के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए प्रतिबंधों की समीक्षा करने और संशोधित निर्णय का व्यापक प्रचार करने को कहा था।

11 अक्टूबर को अदालत ने अवमानना याचिका में प्रथमदृष्टया मामला बनता पाते हुए कथित अवमाननाकर्ताओं को नोटिस जारी किया और 13 अक्टूबर तक जवाब तथा अनुपालन रिपोर्ट माँगी। अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के लागू क्षेत्र के बाहर शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शन से जुड़े मामलों में अवैध हिरासत न होने देने तथा वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों के काम में बाधा नहीं डालने के भी निर्देश दिए।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट परिसर में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू होने की सूचना देने वाला बोर्ड भी तत्काल हटाने का निर्देश दिया था, यदि उसे पहले से नहीं हटाया गया हो। अदालत ने यह निर्देश न्यायालय में आने-जाने वाले लोगों के बीच किसी प्रकार की आशंका दूर करने के उद्देश्य से दिया था।

इन निर्देशों के बाद 12 अक्टूबर को छह मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद किए जाने तथा भगवान दास रोड पर विपक्षी मार्च रोकने के लिए की गई बैरिकेडिंग का कानूनी आधार महत्वपूर्ण हो जाता है। हालाँकि, इन प्रतिबंधों को अपने आप में अदालत के आदेश का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। यह देखना आवश्यक होगा कि प्रतिबंध किन लिखित आदेशों के तहत लगाए गए, उनकी आवश्यकता किस आधार पर निर्धारित की गई और क्या वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों तथा कानून के अनुरूप थे।

विशेष रूप से भगवान दास रोड पर मार्च रोकने के लिए लागू किसी विशिष्ट लिखित प्रतिबंधात्मक आदेश, उसके अंतर्गत प्रतिबंधित स्थानों और गतिविधियों तथा उसकी अवधि का स्पष्ट विवरण अभी उपलब्ध नहीं है।

जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया गया, मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुँचा

दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने 11 अक्टूबर 2026 को स्थायी आदेश जारी कर जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया। आदेश के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित समिति की सिफारिशों पर रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को नए प्रदर्शन स्थलों के रूप में निर्धारित किया गया है।

यह आदेश 28 अप्रैल 2022 के पुराने स्थायी आदेश में आंशिक संशोधन करता है। नए स्थलों पर प्रदर्शन आयोजित करने के लिए विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया अलग से जारी करने की बात कही गई है। हालाँकि, आदेश में गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिशों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।

इस बीच, जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन रोके जाने और वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों की उपलब्धता से जुड़ा विवाद दिल्ली हाईकोर्ट भी पहुँचा। सोमवार, 12 अक्टूबर को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस संजय शर्मा की पीठ के समक्ष संबंधित याचिका का उल्लेख कर तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया गया। याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए उपयुक्त स्थान उपलब्ध नहीं है और जंतर-मंतर पर भी प्रदर्शन नहीं होने दिया जा रहा है।

पीठ ने इस बात का उल्लेख किया कि विरोध प्रदर्शनों से जुड़े विषयों पर सुप्रीम कोर्ट भी विचार कर रहा है। अदालत ने सोमवार, 12 अक्टूबर को तत्काल सुनवाई का अनुरोध स्वीकार नहीं किया और मामले को मंगलवार, 13 अक्टूबर को सुनने की बात कही थी। इस सुनवाई में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े प्रतिबंध और वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों की उपलब्धता के सवाल उठ सकते हैं। अदालत ने अभी इन मुद्दों पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है।

इस बीच, भारतीय युवा कांग्रेस अध्यक्ष उदय भानु चिब की ओर से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दिए जाने के खिलाफ दायर अलग याचिका भी मंगलवार, 13 अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। सोमवार तक इस विवाद पर कोई अंतिम न्यायिक निर्णय नहीं हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट में वकीलों के प्रदर्शन के अधिकार का मुद्दा

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली के विरोध प्रदर्शनों के दौरान वकीलों के विरुद्ध कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा भी उठाया गया।

वरिष्ठ एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने पुलिस कार्रवाई पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत लागू कथित प्रतिबंधात्मक आदेश सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं था।

इस दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि वकीलों को निर्धारित स्थानों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेने का अधिकार है। साथ ही, न्यायालय के कामकाज, वकीलों और मुकदमों से जुड़े लोगों की आवाजाही में बाधा नहीं आनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित मामले को मंगलवार को सुनने पर सहमति जताई। यह कार्यवाही विपक्षी नेताओं की नई एसआईआर याचिका से अलग है।

शांतिपूर्ण विरोध और कानून-व्यवस्था के बीच संवैधानिक सीमा

संविधान का अनुच्छेद 19(1)(बी) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। हालाँकि, अनुच्छेद 19(3) के अनुसार, सार्वजनिक व्यवस्था और भारत की संप्रभुता तथा अखंडता के हित में इस अधिकार पर कानून द्वारा उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

इसलिए किसी प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाए जाने की वैधता का प्रश्न केवल पुलिस द्वारा सुरक्षा संबंधी कारण बताए जाने से समाप्त नहीं होता। यह देखना भी आवश्यक है कि प्रतिबंध का कानूनी आधार क्या था, उसकी आवश्यकता किस प्रकार निर्धारित की गई और उसका दायरा परिस्थितियों के अनुपात में उचित था या नहीं।

उसी तरह विरोध प्रदर्शन का अधिकार न्यायालय के कामकाज में बाधा डालने का अधिकार नहीं देता। सार्वजनिक विरोध की स्वतंत्रता और न्यायालय तक वकीलों, कर्मचारियों तथा मुकदमों से जुड़े लोगों की निर्बाध पहुँच, दोनों का संरक्षण आवश्यक है।

मंगलवार को अदालतों में किन मामलों पर सुनवाई?

दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान मेट्रो और रेल सेवाओं पर प्रतिबंध, बैरिकेडिंग, कथित अवैध हिरासत तथा न्यायिक निर्देशों की अवमानना से संबंधित मामलों में मंगलवार, 13 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में आगे की सुनवाई प्रस्तावित है। अदालत ने 11 अक्टूबर के आदेश में संबंधित अधिकारियों से 13 अक्टूबर तक जवाब और अनुपालन रिपोर्ट माँगी थी। सुनवाई में प्रतिबंधों के कानूनी आधार और न्यायालय के पूर्व निर्देशों के पालन की स्थिति पर चर्चा हो सकती है।

दिल्ली हाईकोर्ट में भी जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन से जुड़े प्रतिबंध और वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों की उपलब्धता संबंधी विवाद पर मंगलवार को सुनवाई प्रस्तावित है। इस मामले में 12 अक्टूबर को तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया गया था। अदालत ने इसे अगले दिन सुनने की बात कही थी। इन मुद्दों पर न्यायिक निर्णय अभी आना बाकी है।

वहीं, राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं की ओर से सोमवार को दाखिल नई एसआईआर याचिका की सुनवाई कब होगी, यह उसकी आधिकारिक सूचीबद्धता से स्पष्ट होगा। अदालत इस याचिका को पहले से लंबित एसआईआर मामलों के साथ सुनती है या अलग कार्यवाही करती है, यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा।

इस पूरे घटनाक्रम से तीन संवैधानिक प्रश्न सामने आते हैं। पहला, चुनाव आयोग के निर्णय उसकी निर्धारित सामूहिक प्रक्रिया के अनुसार लिए गए या नहीं? दूसरा, एसआईआर के दौरान पात्र मतदाताओं को नोटिस, सुनवाई, अपील और नाम बहाली के प्रभावी अवसर मिले या नहीं? तीसरा, शांतिपूर्ण विरोध पर लगाए गए प्रतिबंधों का कानूनी आधार और उनकी आवश्यकता क्या थी?

निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची की शुद्धता आवश्यक है। उतना ही आवश्यक है कि किसी पात्र नागरिक का नाम बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के सूची से न हटे। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, उसके निर्णयों की पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण इसी संवैधानिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

अब यह देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट किन मुद्दों पर चुनाव आयोग से रिकॉर्ड और जवाब माँगता है तथा आगे की न्यायिक कार्यवाही में संबंधित आरोपों और माँगी गई राहतों पर क्या निर्णय होता है।

क्या बिना तय समय-सीमा के, राज्यपालों द्वारा बिलों पर देरी राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बढ़ाती है?

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