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लंदन में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग, ध्रुव राठी ने सभा को किया संबोधित; चुनावी विवाद की गूँज कई देशों तक

लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में ब्रिटिश संसद के सामने भारतीय तिरंगों के साथ उमड़ा प्रदर्शनकारियों का हुजूम। 17 अक्टूबर 2026 को यहाँ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और भारत की चुनावी प्रक्रिया में जवाबदेही की माँग उठी। फोटो साभार: ध्रुव राठी / एक्स (@dhruv_rathee)
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—खुली किताब | रिसर्च टीम

Ahmedabad | October 20, 2026

अंतरराष्ट्रीय पड़ताल

भारत में मतदाता सूची पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं और चुनाव आयोग की जवाबदेही को लेकर विदेशों में विरोध प्रदर्शन हुए। लंदन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग उठी और ध्रुव राठी ने सभा को संबोधित किया। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में भी प्रदर्शन हुआ। अमेरिका के छह सांसदों ने विदेश मंत्री मार्को रुबियो को लिखे पत्र में भारत में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस कार्रवाई पर चिंता जताई। उन्होंने इसकी स्वतंत्र जाँच का मुद्दा भारत सरकार के सामने उठाने का आग्रह किया। उन्होंने अमेरिका में प्रदर्शनकारियों की कथित निगरानी की जाँच कराने की भी माँग की। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने प्रदर्शनकारियों की हिरासत पर चिंता जताई, जिस पर भारत ने आपत्ति दर्ज कराई। विदेशी सरकारों के उपलब्ध रिकॉर्ड में प्रदर्शनों से जुड़ी सुरक्षा चेतावनियाँ मिली हैं, लेकिन चुनाव आयोग के विरुद्ध किसी औपचारिक कूटनीतिक कदम की पुष्टि नहीं हुई है।

भारत में चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर उठे सवाल अब देश की सीमाओं से बाहर भी गूँज रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर विदेशों में भी विरोध प्रदर्शन हुए हैं। शनिवार, 17 अक्टूबर को लंदन और रविवार, 18 अक्टूबर को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में भारतीय प्रवासियों और अन्य प्रदर्शनकारियों ने विरोध दर्ज कराया। इससे पहले यूरोप और उत्तरी अमेरिका के विभिन्न शहरों में भी प्रदर्शन की खबरें सामने आई थीं। इन आयोजनों में मतदाता सूचियों में कथित अनियमितताओं और चुनाव आयोग की जवाबदेही के सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के पद छोड़ने से यह विवाद समाप्त हो सकेगा?

लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में शनिवार, 17 अक्टूबर को महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने भारतीय छात्रों, प्रवासी संगठनों और अन्य प्रदर्शनकारियों ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग उठाई। उन्होंने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं तथा भारत में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई का विरोध किया। सभा को यूट्यूबर और राजनीतिक टिप्पणीकार ध्रुव राठी ने संबोधित किया। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों ने जवाबी नारे लगाए। दोनों समूहों के आमने-सामने आने पर ब्रिटिश पुलिस ने हस्तक्षेप कर टकराव रोका।

इसके अगले दिन, रविवार 18 अक्टूबर को ऑस्ट्रेलिया में भी विरोध प्रदर्शन हुए। मेलबर्न में विक्टोरिया की संसद के पास भारतीय प्रवासियों और उनके समर्थकों ने चुनावी अनियमितताओं के आरोपों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की माँग को लेकर आवाज उठाई। स्थानीय समाचार संस्थान ‘साउथ एशिया टाइम्स’ की रिपोर्ट में ब्रिस्बेन, एडिलेड और सिडनी में भी इसी तरह की सभाएँ होने का उल्लेख है।

भारत के चुनावी विवाद को लेकर अमेरिका, जर्मनी, आयरलैंड, नीदरलैंड और कनाडा में भी विरोध प्रदर्शन तथा एकजुटता कार्यक्रम सामने आए हैं। जर्मनी की राजधानी बर्लिन में हुए प्रदर्शन की मैदानी रिपोर्ट और तस्वीरें उपलब्ध हैं। डबलिन, द हेग और टोरंटो सहित अन्य शहरों में हुए प्रदर्शनों का उल्लेख भी प्रकाशित समाचार रिपोर्टों में मिलता है। अमेरिका के फ्रेमॉन्ट में हुए प्रदर्शन का वीडियो भी सामने आया है। वहीं, छह अमेरिकी सांसदों के आधिकारिक पत्र में वॉशिंगटन डीसी, शिकागो और सैन फ्रांसिस्को में प्रदर्शनकारियों की कथित निगरानी का उल्लेख है।

इस बीच अमेरिका के छह सांसदों ने 16 अक्टूबर को विदेश मंत्री मार्को रुबियो को पत्र लिखकर भारत में प्रदर्शनकारियों की कथित गैरकानूनी हिरासत और अत्यधिक बल प्रयोग पर चिंता जताई। उन्होंने इन मामलों की स्वतंत्र जाँच का मुद्दा भारत सरकार के समक्ष उठाने तथा अमेरिकी धरती पर भारतीय राजनयिक मिशनों से जुड़े व्यक्तियों द्वारा प्रदर्शनकारियों की कथित निगरानी और उन्हें डराने-धमकाने के आरोपों की जाँच कराने का आग्रह किया। पत्र में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों की पूर्व चिंताओं का भी उल्लेख है, जो मतदाता सूची पुनरीक्षण की पारदर्शिता और अल्पसंख्यक समुदायों के मतदान अधिकारों पर संभावित प्रतिकूल प्रभाव से संबंधित थीं।

इन घटनाक्रमों के कारण भारत के चुनावी विवाद पर विदेशों में भी सवाल उठ रहे हैं। हालाँकि, विदेशों में नागरिकों के विरोध प्रदर्शन और किसी विदेशी सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया दो अलग बातें हैं। क्या विदेशी सरकारों या राष्ट्राध्यक्षों ने इस विवाद पर कोई औपचारिक रुख अपनाया है? क्या प्रतिक्रियाएँ नागरिक प्रदर्शनों और सांसदों की पहल तक सीमित हैं, या सरकारी स्तर पर भी कोई कदम उठाया गया है? चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, मतदाता अधिकारों और संस्थागत जवाबदेही से जुड़े सवालों पर अब तक क्या जवाब सामने आए हैं? ‘खुली किताब’ की यह विशेष पड़ताल उपलब्ध दस्तावेजों, सार्वजनिक बयानों और आधिकारिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर इन सवालों की जाँच करती है।

लंदन में गांधी प्रतिमा के सामने प्रदर्शन, ध्रुव राठी ने चुनाव आयोग की जवाबदेही पर उठाए सवाल

लंदन में 17 अक्टूबर के प्रदर्शन का आयोजन प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार इंडियन ओवरसीज कांग्रेस की युवा शाखा ने किया था। इसे सेव डेमोक्रेसी, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) यूके और साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप सहित कई संगठनों का समर्थन मिला। प्रदर्शनकारियों ने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाए तथा भारतीय संविधान की प्रस्तावना का पाठ किया। वरिष्ठ पत्रकार नवनीता सरकार ने ‘द रेड माइक’ के लिए तैयार अपनी वीडियो रिपोर्ट में प्रदर्शन को दर्ज किया।

नवनीता सरकार ने अपनी मैदानी रिपोर्ट में बताया कि सुबह करीब 11 बजे से ही प्रदर्शन स्थल पर भीड़ बढ़ने लगी थी। वहाँ भारतीय छात्रों, नागरिक संगठनों और विभिन्न राजनीतिक समूहों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी थी। उनके अनुसार, प्रदर्शन कई घंटे चला और निर्धारित स्थान पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए। वीडियो रिपोर्ट के शीर्षक में सैकड़ों लोगों की भागीदारी का उल्लेख है। हालाँकि, उपलब्ध फुटेज से प्रदर्शनकारियों की सटीक संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती।

ध्रुव राठी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव आयोग के नेतृत्व में बदलाव की माँग की। उन्होंने कहा कि नए मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की सहमति से होनी चाहिए। भारत में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर कथित प्रतिबंधों की आलोचना करते हुए उन्होंने लंदन में प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता से इसकी तुलना की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी विदेशी सरकार का हस्तक्षेप नहीं चाहते, बल्कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों तक चुनावी विवाद से जुड़े मुद्दे पहुँचाना चाहते हैं।

अपने संबोधन में राठी ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची पुनरीक्षण और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर कई आरोप लगाए। उन्होंने दिल्ली में बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती तथा अपने साथ कथित गैरकानूनी पुलिस कार्रवाई का भी उल्लेख किया। ये उनके सार्वजनिक आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की गई है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से अपने परिवारों और परिचितों के बीच मतदान अधिकारों तथा चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाने की अपील की।

प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के समर्थकों का एक छोटा समूह भी वहाँ पहुँचा। दोनों पक्षों के बीच जवाबी नारेबाजी तेज होने पर ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें आमने-सामने आने से रोका। नवनीता सरकार की मैदानी रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस के हस्तक्षेप के बाद भारत सरकार समर्थक प्रदर्शनकारी वहाँ से चले गए। उन्होंने बताया कि प्रदर्शन के दौरान धक्का-मुक्की नहीं हुई और किसी को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया गया। प्रदर्शन में शामिल कुछ युवाओं ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, मताधिकार और सरकार से सवाल पूछने के अधिकार को लेकर चिंता जताई।

प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची पुनरीक्षण से पात्र नागरिकों के मतदान अधिकार प्रभावित होने के आरोप लगाए। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का घोषित उद्देश्य मतदाता सूचियों की गलतियाँ सुधारना, अपात्र नाम हटाना और पात्र मतदाताओं के नाम बनाए रखना है। लंदन में प्रदर्शन और जवाबी नारेबाजी से प्रवासी भारतीय समुदाय के अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण सामने आए। हालाँकि, इस आयोजन या ब्रिटिश पुलिस की कार्रवाई को ब्रिटिश सरकार के किसी आधिकारिक राजनीतिक रुख के रूप में नहीं देखा जा सकता।


खुली किताब का लोगो

खुली किताब | ऐतिहासिक संदर्भ

लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में 17 अक्टूबर का दृश्य इतिहास की एक असहज विडंबना सामने लाता है। कभी भारतीयों ने ब्रिटिश शासन से आजादी के लिए संघर्ष किया था। वे अपने देश पर शासन करने और अपना भविष्य स्वयं तय करने का अधिकार चाहते थे। अब उसी ब्रिटेन की संसद के सामने भारतीय प्रवासी और छात्र प्रदर्शन कर रहे थे। वे स्वतंत्र भारत की चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही पर सवाल उठा रहे थे।

तब संघर्ष विदेशी शासन से मुक्ति का था। आज सवाल स्वतंत्र भारत की अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था से हैं। यह वही व्यवस्था है, जिसकी बुनियाद जनता के मताधिकार और संप्रभुता पर रखी गई थी। दोनों परिस्थितियाँ अलग हैं। लेकिन इतिहास और वर्तमान के बीच यह विरोधाभास एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।

जिस देश ने अपनी आजादी और स्वशासन के लिए लंबा संघर्ष किया, उसकी चुनावी व्यवस्था पर उठे सवाल ब्रिटिश संसद के सामने तक क्यों पहुँच रहे हैं?

ऑस्ट्रेलिया में भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग, मेलबर्न में पुलिस ने टकराव रोका

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में रविवार, 18 अक्टूबर को विक्टोरिया की संसद के पास भारतीय प्रवासियों और उनके समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने भारत में कथित चुनावी अनियमितताओं, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और लोकतांत्रिक अधिकारों का मुद्दा उठाया। सभा में भारतीय, ऑस्ट्रेलियाई और ऑस्ट्रेलिया के मूलनिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले झंडे दिखाई दिए। प्रदर्शनकारियों ने मतदान अधिकारों और संविधान की रक्षा से जुड़े पोस्टर उठाए। एक व्यक्ति भारतीय संविधान की प्रति भी लेकर पहुँचा था।

स्थानीय समाचार संस्थान ‘साउथ एशिया टाइम्स’ की 18 अक्टूबर की मैदानी रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल वर्कर्स अलायंस नामक संगठन के सदस्यों ने सभा में व्यवधान डालने की कोशिश की। इस दौरान एक अनामंत्रित व्यक्ति सभा में आकर भाषण देने लगा, जिसे पुलिस ने हटा दिया। इसके बाद अतिरिक्त पुलिसकर्मी पहुँचे और दोनों समूहों को अलग करते हुए नेशनल वर्कर्स अलायंस के सदस्यों को प्रदर्शन स्थल के एक ओर कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, इस हस्तक्षेप के दौरान भारतीय समुदाय की सभा शांतिपूर्ण रही।

नेशनल वर्कर्स अलायंस के सदस्यों ने प्रवासियों को वापस भेजने की माँग वाला बैनर लगाया। उन्होंने लाउडस्पीकर से भाषण दिए और तेज संगीत बजाया। रिपोर्ट के अनुसार, उनके कुछ सदस्यों ने प्रवासियों को वापस जाने के नारे लगाए। जवाब में भारतीय प्रदर्शन का समर्थन कर रहे कुछ ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों ने प्रवासियों के स्वागत में नारे लगाए।

इसी रिपोर्ट में ब्रिस्बेन, एडिलेड और सिडनी में भी इसी तरह की सभाएँ होने का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, इन आयोजनों को द ह्यूमनिज्म प्रोजेक्ट, हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स और अन्य भारतीय प्रवासी संगठनों का समर्थन मिला। हालाँकि, इन तीनों शहरों के आयोजनों की अलग-अलग स्वतंत्र दृश्य पुष्टि इस पड़ताल में नहीं हो सकी है।

अमेरिका के कई शहरों में प्रदर्शन, छह सांसदों ने रुबियो को लिखा पत्र

अमेरिका में 9 से 11 अक्टूबर के बीच न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन डीसी, अटलांटा और कैलिफोर्निया के फ्रेमॉन्ट में विरोध सभाएँ आयोजित होने की जानकारी सामने आई। बोस्टन, न्यू जर्सी के आइसेलिन और डलास क्षेत्र के वेस्ट प्लानो में भी प्रदर्शनों का उल्लेख है। इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल की 13 अक्टूबर की विज्ञप्ति के अनुसार, इन आयोजनों में हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स, दलित अधिकारों से जुड़े समूहों और दक्षिण एशियाई संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने चुनाव आयोग की जवाबदेही, कथित चुनावी अनियमितताओं की जाँच और हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई की माँग की।

इसके बाद हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स ने 14 अक्टूबर को शिकागो, सैन फ्रांसिस्को, लॉस एंजिलिस, फिलाडेल्फिया, ऑस्टिन और न्यूयॉर्क में नए कार्यक्रमों की घोषणा की। शिकागो और सैन फ्रांसिस्को में भारतीय वाणिज्य दूतावासों के बाहर प्रदर्शन निर्धारित थे। फिलाडेल्फिया में 17 अक्टूबर को लगभग 25 लोग म्यूजियम ऑफ आर्ट के पास एकत्र हुए। स्थानीय मैदानी रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने भारतीय छात्रों के समर्थन और मतदान अधिकारों की रक्षा से जुड़े पोस्टर उठाए।

अमेरिका में इन विरोध प्रदर्शनों के बीच प्रतिनिधि सभा के छह सदस्यों ने 16 अक्टूबर को विदेश मंत्री मार्को रुबियो को तीन पृष्ठों का संयुक्त पत्र भेजा। इस पर जेम्स पी. मैकगवर्न, जीसस ‘चुई’ गार्सिया, रशीदा तलीब, प्रमिला जयपाल, एलेनोर होम्स नॉर्टन और इल्हान उमर के हस्ताक्षर हैं। सांसदों ने जून से चले छात्र आंदोलनों, सितंबर के बाद चुनावी विवाद पर हुए प्रदर्शनों और विभिन्न मौकों पर पुलिस कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कथित गैरकानूनी हिरासत, अत्यधिक बल प्रयोग तथा प्रदर्शन स्थलों पर प्रतिबंधों पर चिंता जताई। पत्र में मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बंद किए जाने का भी आरोप है, जिसके समर्थन में 23 जुलाई की एक समाचार रिपोर्ट का हवाला दिया गया है।

सांसदों ने अपने पत्र में दावा किया कि 2025 से मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों की पूर्व चिंताओं का भी हवाला दिया। हालाँकि, 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का दावा स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम आँकड़ा नहीं है। प्रारंभिक मतदाता सूची से नाम बाहर रहने, अंतिम सूची से नाम हटाए जाने और बाद में नाम बहाल होने में अंतर है। इस रिपोर्ट में चुनाव आयोग के राज्यवार और चरणवार अंतिम आँकड़ों के आधार पर इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। पत्र में वॉशिंगटन डीसी, शिकागो और सैन फ्रांसिस्को में प्रदर्शनकारियों की कथित निगरानी का आरोप भी दर्ज है। सांसदों के अनुसार, कुछ लोगों ने शिकायत की कि उनकी तस्वीरें लेने वाले व्यक्तियों ने स्वयं को भारतीय राजनयिक मिशनों द्वारा नियुक्त बताया था। पत्र में इन व्यक्तियों की पहचान या किसी अमेरिकी जाँच एजेंसी के निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं किए गए हैं।

पत्र में सांसदों ने विदेश मंत्री से भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की स्वतंत्र जाँच का मुद्दा उठाने, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के कारण गैरकानूनी ढंग से हिरासत में रखे गए लोगों की रिहाई का आग्रह करने और अमेरिका में भारतीय राजनयिक मिशनों द्वारा कथित निगरानी तथा धमकाने की शिकायतों की जाँच कराने को कहा। चौथी माँग अमेरिकी हथियार निर्यात नियंत्रण कानून की धारा 6 के तहत आकलन से संबंधित है। सांसदों ने भारत को हथियारों की बिक्री की पात्रता पर अमेरिका में व्यक्तियों को डराने या परेशान करने के कथित व्यवहार के संभावित प्रभाव की जाँच करने को कहा। यह कानूनी आकलन की माँग है, हथियारों की बिक्री रोकने का कोई घोषित निर्णय नहीं।

छह अमेरिकी सांसदों के पत्र के चार दिन बाद, 20 अक्टूबर को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मुंबई में बैठक हुई। जयशंकर और रुबियो के आधिकारिक विवरणों में व्यापार, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, रक्षा सहयोग और क्षेत्रीय घटनाक्रम का उल्लेख है। इनमें सांसदों के पत्र में उठाई गई चिंताओं का जिक्र नहीं मिला। क्या रुबियो ने चुनाव आयोग के कामकाज पर भारतीय पक्ष से सवाल किए? क्या प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया गया? उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी इन सवालों का जवाब नहीं देती। अमेरिकी प्रशासन ने सांसदों की माँगों पर क्या निर्णय लिया, यह भी सार्वजनिक रिकॉर्ड से स्पष्ट नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने हिरासत पर जताई चिंता, भारत ने किया विरोध

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने 10 अक्टूबर को जारी सूचना में दिल्ली के बड़े प्रदर्शनों से पहले और उनके दौरान प्रदर्शनकारियों, आंदोलन के नेताओं, नागरिक संगठनों के सदस्यों, वकीलों तथा पत्रकारों को बड़ी संख्या में हिरासत में लिए जाने की खबरों पर चिंता जताई। कार्यालय ने मनमाने ढंग से हिरासत में रखे गए प्रदर्शनकारियों की रिहाई का आग्रह किया। यह टिप्पणी प्रदर्शनकारियों की हिरासत संबंधी खबरों और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार से जुड़ी थी। इसे मतदाता सूची विवाद में अनियमितताओं की पुष्टि या किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की टिप्पणी पर भारत ने आपत्ति जताई। जिनेवा स्थित भारत के स्थायी मिशन ने 10 अक्टूबर को अपने आधिकारिक एक्स खाते पर प्रतिक्रिया जारी की। अगले दिन विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी को भारत के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप बताया। आकाशवाणी न्यूज़ पर प्रकाशित उनके बयान के अनुसार, भारत ने मानवाधिकार कार्यालय पर अन्य देशों की घटनाओं की तुलना में चुनिंदा प्रतिक्रिया देने का आरोप लगाया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत में शांतिपूर्ण सभा का अधिकार संवैधानिक रूप से सुरक्षित है, लेकिन इसका प्रयोग सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा संबंधी कानूनी प्रतिबंधों के अधीन है।

इससे पहले संयुक्त राष्ट्र के तीन स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने 1 मई 2026 को भारत सरकार को भेजे सात पृष्ठों के पत्र में मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े आरोपों पर विस्तृत जानकारी माँगी थी। दस्तावेज संख्या एएल आईएनडी 8/2026 में पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने, पहचान दस्तावेजों में मामूली अंतर के कारण मतदाताओं के प्रभावित होने और अपीलों के निपटारे की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए। विशेषज्ञों ने पुनरीक्षण की प्रक्रिया, पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा, हटाए गए नामों की संख्या और कारणों तथा दर्ज आपत्तियों एवं अपीलों के निपटारे का विवरण माँगा।

पत्र में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों पर पुनरीक्षण के संभावित असमान प्रभाव तथा राजनेताओं और वरिष्ठ सरकारी पदाधिकारियों की कथित भेदभावपूर्ण बयानबाजी पर भी चिंता जताई गई थी। विशेषज्ञों ने मतदाता आँकड़ों में कथित अनियमितताओं की पहचान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित प्रणाली के कथित इस्तेमाल से पारदर्शिता, संभावित गलतियों और पक्षपात का मुद्दा उठाया। उन्होंने इन आरोपों को सिद्ध तथ्य नहीं माना, बल्कि भारत सरकार से स्पष्टीकरण माँगा था। पत्र में नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा तथा नस्ली भेदभाव को समाप्त करने से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत भारत के दायित्वों का भी उल्लेख किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की अक्टूबर की टिप्पणी और तीन स्वतंत्र विशेषज्ञों का मई का पत्र अलग-अलग घटनाक्रम हैं। पहला प्रदर्शनकारियों की हिरासत और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार से संबंधित है, जबकि दूसरा मतदाता सूची पुनरीक्षण और मतदान अधिकारों पर केंद्रित है। दोनों दस्तावेजों को संयुक्त राष्ट्र की किसी एक संयुक्त कार्रवाई या विदेशी सरकारों की सामूहिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जा सकता।

विदेशी सरकारों का आधिकारिक रुख क्या है?

भारत में हालिया प्रदर्शनों का स्पष्ट उल्लेख जर्मनी के विदेश मंत्रालय की आधिकारिक यात्रा और सुरक्षा सलाह में मिलता है। इस सलाह में नई दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों, सुरक्षा बलों के साथ हिंसक टकराव की घटनाओं तथा मोबाइल इंटरनेट और यातायात पर अस्थायी प्रतिबंधों का उल्लेख है। इसमें 15 अक्टूबर से पंजाब में प्रस्तावित प्रदर्शनों की भी जानकारी दी गई है। जर्मन नागरिकों को बड़ी भीड़ से दूर रहने, सतर्कता बरतने और स्थानीय सुरक्षा अधिकारियों के निर्देशों का पालन करने को कहा गया है। हालाँकि, यह प्रदर्शन संबंधी सुरक्षा चेतावनी है, पूरे भारत की यात्रा न करने का निर्देश या चुनाव आयोग के विरुद्ध कोई राजनीतिक घोषणा नहीं।

आयरलैंड के विदेश मंत्रालय की भारत संबंधी आधिकारिक यात्रा सलाह में भी प्रदर्शनों का विशिष्ट उल्लेख है। इसमें 20 जुलाई से नई दिल्ली में शुरू हुए और मुंबई तथा बेंगलुरु सहित अन्य शहरों तक फैले प्रदर्शनों, हिंसक टकराव तथा कर्फ्यू, सड़क और मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने जैसे प्रतिबंधों की जानकारी दी गई है। हालाँकि, इस विवरण में 20 जुलाई के साथ वर्ष दर्ज नहीं है। आयरिश नागरिकों को सार्वजनिक प्रदर्शनों से दूर रहने और स्थानीय अधिकारियों की सलाह का पालन करने को कहा गया है। वेबसाइट पर सलाह में आखिरी संशोधन की तारीख 7 अक्टूबर 2026 दर्ज है। लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि प्रदर्शन संबंधी चेतावनी उसी दिन जोड़ी गई थी। इसे अक्टूबर के चुनावी विवाद पर आयरलैंड सरकार की राजनीतिक प्रतिक्रिया भी नहीं माना जा सकता।

ब्रिटेन की आधिकारिक यात्रा सलाह में राजनीतिक रैलियों, प्रदर्शनों और बड़ी सभाओं के दौरान संभावित हिंसा तथा प्रशासनिक प्रतिबंधों के सामान्य जोखिम बताए गए हैं। इसी तरह नीदरलैंड के विदेश मंत्रालय की भारत संबंधी यात्रा सलाह में प्रदर्शनों के दौरान संभावित हिंसा और सड़कें बंद होने की आशंका का उल्लेख है। दोनों देशों ने अपने नागरिकों को भीड़ और प्रदर्शनों से दूर रहने की सलाह दी है। हालाँकि, जाँचे गए इन दस्तावेजों में अक्टूबर के चुनाव आयोग संबंधी विवाद पर किसी विशिष्ट सरकारी प्रतिक्रिया की पुष्टि नहीं हुई है।

इन आधिकारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि जर्मनी और आयरलैंड की सलाह में भारत में हुए प्रदर्शनों का विशिष्ट उल्लेख है, जबकि ब्रिटेन और नीदरलैंड की सलाह मुख्यतः सामान्य सुरक्षा जोखिमों पर केंद्रित है। किसी देश की यात्रा सलाह को चुनाव आयोग के विरुद्ध राजनीतिक समर्थन या भारत सरकार के प्रति कूटनीतिक विरोध नहीं माना जा सकता। इसी तरह अमेरिका के छह सांसदों का पत्र अमेरिकी प्रशासन से कार्रवाई का आग्रह है, न कि अमेरिकी सरकार का घोषित निर्णय। 20 अक्टूबर तक जाँचे गए विदेशी सरकारी रिकॉर्ड में चुनाव आयोग संबंधी विवाद पर किसी औपचारिक कूटनीतिक विरोध, प्रतिबंध या संयुक्त सरकारी कार्रवाई की पुष्टि नहीं मिली। यह निष्कर्ष उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेजों तक सीमित है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया के बीच जवाबदेही का सवाल

विदेशों में उठे सवालों के बीच अब महत्वपूर्ण प्रश्न भारत की संस्थागत जवाबदेही का है। मतदाता सूचियों से नाम हटाने और बहाल करने के निर्णय किन आधारों पर हुए और क्या निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई? शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर लगाए गए प्रतिबंधों और पुलिस कार्रवाई के पीछे कौन-से लिखित आदेश थे? संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के मई में भेजे गए पत्र पर भारत सरकार ने क्या जवाब दिया?

इन सवालों का उत्तर राजनीतिक आरोपों और बयानों से नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड, चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, पुलिस के लिखित आदेशों और आधिकारिक पत्राचार से मिल सकता है। सवाल केवल यह नहीं है कि फैसले क्या लिए गए, बल्कि यह भी है कि वे किस आधार पर, किस प्रक्रिया से और किसकी जवाबदेही में लिए गए।

क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिलों पर समय-सीमा तय न करने का निर्णय राज्यों के लिए शासन को और कठिन बनाता है?

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