
New Delhi | September 29, 2026
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने 92 गवाहों के मुकरने को गंभीर चिंता का विषय बताया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील से 4–5 अहम गवाहों के बयान पेश करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और 22 बरी किए गए आरोपियों को नोटिस जारी किया। अमित शाह को आरोपमुक्त करने के आदेश को चुनौती देने की अनुमति मांगने वाली मनियार की हस्तक्षेप अर्जी भी खारिज कर दी गई।
सोहराबुद्दीन शेख़ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह तय नहीं किया है कि 2005 और 2006 में हुई मौतों के लिए कौन जिम्मेदार था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 28 सितंबर की सुनवाई में यह सवाल उठा कि विशेष सीबीआई अदालत से बरी किए गए 22 लोगों का मुकदमा निष्पक्ष और न्यायपूर्ण ढंग से चला था या नहीं। बरी किए गए 22 आरोपियों में 21 पुलिसकर्मी थे।
28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दाखिल करने और खामियां दूर कर दोबारा दाखिल करने में हुई देरी माफ की। इसके बाद अदालत ने सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन शेख़ की याचिका पर सीबीआई और 22 निजी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया। प्रतिवादी क्रमांक 1 सीबीआई है, जबकि क्रमांक 2 से 23 तक 22 निजी प्रतिवादी हैं।
याचिका में बॉम्बे हाईकोर्ट के 7 मई 2026 के फैसले को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने विशेष सीबीआई अदालत के 2018 के बरी के फैसले के खिलाफ रुबाबुद्दीन और उनके भाई नायबुद्दीन की अपीलें खारिज की थीं। मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर 2026 को तय की गई है।
अदालत ने रुबाबुद्दीन और निजी प्रतिवादियों को संबंधित गवाहों के बयानों और उन अन्य जरूरी दस्तावेजों की अनुवादित प्रतियां रिकॉर्ड पर रखने की छूट दी है, जिनका वे अपनी दलीलों के समर्थन में सहारा लेना चाहें।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सुनवाई में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने 92 गवाहों के मुकरने को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि मुकदमा निष्पक्ष और न्यायपूर्ण था या नहीं, इस पर विचार करना होगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पीठ की ओर से कुछ गवाहों के बयान देखने की इच्छा जताई। उन्होंने याचिकाकर्ता के वकील से 4–5 अहम बयान पेश करने का अनुरोध किया, ताकि पीठ उनकी जांच कर सके।
92 गवाहों का मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
विशेष सीबीआई अदालत में अभियोजन ने 210 गवाहों के बयान दर्ज कराए थे। इनमें से 92 गवाह मुकर गए और अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया। अभियोजन का आरोप था कि सोहराबुद्दीन शेख़, उनकी पत्नी कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति का अपहरण किया गया था। अभियोजन के मुताबिक, बाद में सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति की अलग-अलग फर्जी मुठभेड़ों में हत्या की गई, जबकि कौसर बी की हत्या के बाद उनका शव जलाकर अवशेष नर्मदा नदी में फेंक दिए गए।
विशेष अदालत ने 21 दिसंबर 2018 को आरोपियों को बरी कर दिया था। सोहराबुद्दीन के भाइयों ने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में अलग-अलग अपीलों के जरिए चुनौती दी।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 7 मई 2026 को दोनों अपीलें खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन अपहरण, अवैध हिरासत, कथित हत्याओं और साजिश के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।
फैसले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ियों और हथियारों तथा कारतूसों को घटनाओं से जोड़ने वाले सबूतों में कमियां दर्ज की गईं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि 92 गवाहों का मुकरना अपने आप में यह निष्कर्ष निकालने का आधार नहीं है कि मुकदमा ठीक ढंग से नहीं चला।
रुबाबुद्दीन ने हाईकोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस चुनौती पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
अमित शाह से जुड़ी हस्तक्षेप अर्जी खारिज
रुबाबुद्दीन की विशेष अनुमति याचिका में मनियार कल्पेश कुमार ने अलग हस्तक्षेप अर्जी दाखिल की थी। उन्होंने मामले में पक्षकार बनने, हाईकोर्ट के फैसले के अनुच्छेद 43 में अपने खिलाफ दर्ज टिप्पणियां हटाने और अमित शाह को आरोपमुक्त करने वाले 30 दिसंबर 2014 के आदेश को चुनौती देने की अनुमति मांगी थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दर्ज किया था कि मनियार इस मामले के गवाह नहीं थे और उन्होंने लंबित अपीलों से अपना सरोकार स्पष्ट नहीं किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने मनियार की अर्जी खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि मामले में पक्षकार बनने का उनका आधार क्या है और उनकी दलीलें मौजूदा आपराधिक कार्यवाही से कैसे जुड़ती हैं। अदालत ने यह भी कहा कि अमित शाह को आरोपमुक्त करने वाले आदेश को न सीबीआई ने और न मृतकों के परिवार ने चुनौती दी थी, इसलिए वह अंतिम हो चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के अनुच्छेद 43 में दर्ज निष्कर्षों में दखल देने से भी इनकार किया। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि इसी तरह की मांग पर हर्ष मंदर की अर्जी विशेष सीबीआई अदालत ने खारिज की थी और उस फैसले को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त 2016 को खारिज कर दी थी।
रुबाबुद्दीन की मुख्य याचिका पर सुनवाई जारी रहेगी, जबकि मनियार की हस्तक्षेप अर्जी खारिज कर दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी बरी का फैसला नहीं पलटा और मौतों की जिम्मेदारी पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया।









