
Ahmedabad | November 4, 2026
संपादकीय विश्लेषण
रैलियों की भीड़ से बड़ा सवाल मताधिकार और चुनाव आयोग की जवाबदेही है। सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई को बिहार के विशेष गहन पुनरीक्षण को वैध ठहराया। आयोग की निर्णय प्रक्रिया संबंधी अलग याचिकाएँ अभी विचाराधीन हैं। दो आयुक्तों की कथित आपत्तियाँ, आयोग का सर्वसम्मति संबंधी दावा और गोवा के 97 मामले मूल रिकॉर्ड की स्वतंत्र जाँच माँगते हैं।
लोकतंत्र की परीक्षा केवल मतदान के दिन नहीं होती और चुनाव परिणाम घोषित होने पर समाप्त भी नहीं होती। उसकी शुरुआत उस नागरिक के भरोसे से होती है, जो मतदाता सूची में अपना नाम खोजता है। किसी पात्र व्यक्ति का नाम गलत तरीके से हटना या अयोग्य प्रविष्टि का बिना जाँच बने रहना, दोनों चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
एक नवंबर को रामलीला मैदान की रैली ने मतदाता सूची और चुनाव आयोग पर बहस तेज की। विपक्ष ने गड़बड़ियों के आरोप लगाए, भाजपा ने प्रतिवाद किया। नाम हटाने की प्रक्रिया, फॉर्म-6 और ईसीआईनेट के कामकाज पर उठे सवाल विवाद की पृष्ठभूमि में हैं। इनमें क्या सिद्ध है और क्या जाँच बाकी है, यह भीड़ के आकार या राजनीतिक भाषणों से नहीं, संबंधित रिकॉर्ड की पड़ताल से तय होगा।
रामलीला मैदान में उठे सवालों की असली परीक्षा अब राजनीतिक मंचों से बाहर होनी चाहिए। मतदाता सूची से नाम क्यों हटे, किन अधिकारियों ने निर्णय लिए, आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई और गलतियाँ सामने आने पर उन्हें कैसे सुधारा गया? इन सवालों के जवाब चुनाव आयोग की मूल फाइलों, न्यायिक आदेशों, तकनीकी रिकॉर्ड और प्रभावित नागरिकों के अनुभवों में तलाशने होंगे।
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 चुनाव आयोग को निर्वाचन संबंधी अधिकार देते हैं। आयोग के अनुसार, पुनरीक्षण का उद्देश्य मृत, दोहरे और अपात्र नाम हटाना तथा हर पात्र नागरिक का नाम सूची में सुनिश्चित करना है। लेकिन असली कसौटी यह है कि किसी पात्र नागरिक का नाम हटाने से पहले उसे उचित नोटिस और सुनवाई का अवसर मिले तथा गलत तरीके से नाम हटने पर समय रहते सुधार और प्रभावी कानूनी राहत उपलब्ध हो।
सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार के विशेष गहन पुनरीक्षण पर फैसले में आयोग की वैधानिक शक्ति स्वीकार की। अदालत ने माना कि मतदाता सूची की शुद्धता के लिए अपनाए गए उपाय उद्देश्य के अनुरूप और जरूरत से ज्यादा कठोर नहीं थे। अदालत के अनुसार, मनमाने ढंग से नाम हटने से बचाने के पर्याप्त प्रक्रियागत उपाय भी मौजूद थे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आयोग की नागरिकता संबंधी जाँच मतदाता सूची के प्रयोजन तक सीमित है। किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण अलग कानूनी प्रक्रिया से होता है। गलत तरीके से नाम हटाए जाने पर न्यायिक समीक्षा का रास्ता भी बना रहता है। इस फैसले का महत्व चुनावी सूची की शुद्धता और नागरिक के अधिकार, दोनों को साथ लेकर चलने में है।
विशेष गहन पुनरीक्षण कराने का कानूनी अधिकार होना और उस अधिकार का प्रत्येक मामले में कानूनसम्मत इस्तेमाल होना अलग बातें हैं। बिहार की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय गोवा की कथित सॉफ्टवेयर बाधा, आयोग के भीतर कार्य आवंटन या पश्चिम बंगाल की प्रत्येक अपील को स्वतः वैध नहीं ठहराता। इन विवादों का परीक्षण उनके अपने प्रशासनिक रिकॉर्ड और परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए।
गोवा के 97 मतदाताओं से जुड़ा विवाद कानूनी अधिकार और तकनीकी व्यवस्था के बीच अंतर दिखाता है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ से जुड़े 649 मतदाताओं ने दस्तावेज या आपत्तियाँ दीं। सुनवाई के बाद अधिकारियों ने 97 मामलों में पुराने फैसले बदलना जरूरी पाया। लेकिन तकनीकी बाधा से उनके निर्णय अंतिम सूची में लागू नहीं हुए।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पुराने और नए मतदाता रिकॉर्ड के मिलान में मिली असंगति है। ऐसी असंगति अपने आप किसी नागरिक की अपात्रता सिद्ध नहीं करती। प्रभावित लोगों को दस्तावेज और सुनवाई का अवसर मिला। दिल्ली के पुनरीक्षण की 28 अक्टूबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि इस श्रेणी की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के अनुसार, गोवा इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने 11 फरवरी को पुराने निर्णय पलटने और दस्तावेज दोबारा अपलोड करने की सुविधा न मिलने की सूचना दी। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने 11 से 17 फरवरी के बीच आयोग को आठ ईमेल भेजे। इन अनुरोधों में ‘रोलबैक’ सुविधा देने की माँग बार-बार दोहराई गई।
रिपोर्ट के अनुसार, 17 फरवरी के संदेश के साथ 97 मामलों की सूची थी, जिनमें पहले का निर्णय पलटना जरूरी पाया गया। अगले दिन उप निर्वाचन आयुक्त संजय कुमार ने आईटी महानिदेशक डॉ. सीमा खन्ना को लिखा कि तकनीकी व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन में बाधा नहीं बन सकती। फिर भी 21 फरवरी की अंतिम मतदाता सूची में संबंधित नाम दर्ज नहीं हुए।
सितंबर में आयोग ने इंडिया टुडे को बताया कि ईसीआईनेट पर फॉर्म-7 के जरिए नाम हटाने का निर्णय दर्ज हो जाने के बाद उसे पलटने की सुविधा नहीं थी। इस स्पष्टीकरण से तकनीकी सीमा सामने आती है। लेकिन फरवरी के आठ ईमेल के बावजूद वह सुविधा समय पर क्यों नहीं मिली, इसका पूरा प्रशासनिक जवाब उपलब्ध नहीं है।
26 सितंबर के आधिकारिक प्रेस नोट में आयोग ने बताया कि बूथ स्तर के अधिकारी छूटे लोगों से फॉर्म भरवाने घर-घर जा रहे हैं। तब तक 97 में से 81 व्यक्तियों ने फॉर्म-6 भर दिया था। आयोग ने ईसीआईनेट की समीक्षा और जरूरत पड़ने पर तकनीकी सुविधाएँ बढ़ाने की बात भी कही। यह फरवरी के बाद की कार्रवाई थी।
एक अक्टूबर को गोवा निर्वाचन कार्यालय के हवाले से 88 आवेदन स्वीकार होने और नाम जुड़ने की खबरें आईं। लेकिन आयोग के 26 अक्टूबर के जवाबी हलफनामे के संलग्नक आर-12 में 13 अक्टूबर की स्टेटस रिपोर्ट का शब्दांकन अलग है। इसमें 88 फॉर्म-6 आवेदन ‘स्वीकृत या प्रक्रियाधीन’ हैं। अंतिम बहाली का व्यक्ति-वार रिकॉर्ड संलग्नक में नहीं दिया गया है।
संलग्नक आर-12 में शेष नौ में से छह मामले आवेदन न भरने, विदेश में रहने, स्थानांतरण या विदेशी नागरिकता की संयुक्त श्रेणी में दर्ज हैं। आयोग ने बाकी तीन व्यक्तियों को पुर्तगाली पासपोर्ट धारक बताया है। केवल विदेश में रहने से भारतीय नागरिकता समाप्त नहीं होती। मतदाता पंजीकरण की शर्तें अलग हैं। इसलिए व्यक्ति-वार जाँच जरूरी है।
गोवा में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामले में परेश सालगांवकर ने नए मतदाता की तरह फॉर्म-6 भरने पर सवाल उठाया। न्यूज़लॉन्ड्री ने उनका बयान प्रकाशित किया। पहले से पंजीकृत व्यक्ति का नाम नए आवेदन के आधार पर जोड़ना और पुराने फैसले में सुधार करके नाम बहाल करना अलग प्रशासनिक प्रक्रियाएँ हो सकती हैं। इनके कानूनी प्रभाव की जाँच की जानी चाहिए।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 सूची सुधारने, धारा 23 नाम जोड़ने और धारा 24 अपील से संबंधित है। आयोग के अनुसार, वैधानिक निर्णय निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी का होता है। ईसीआईनेट केवल तकनीकी माध्यम है। गोवा में अधिकारियों के निर्णय समय पर क्यों लागू नहीं हुए? इस देरी के कारण और जिम्मेदारी की जाँच की जानी चाहिए।
गोवा की तकनीकी बाधा के साथ चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया भी न्यायिक विवाद बनी। राकेश कुमार सिंह उर्फ राकेश सिंह ने सितंबर 2026 के अंत में सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका (सिविल) 1246/2026 दायर की। आरोप था कि आयोग के नाम पर कुछ कार्रवाइयाँ जरूरी सामूहिक मंजूरी के बिना हुईं।
इसके बाद राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अन्य विपक्षी नेताओं ने 12 अक्टूबर को अलग रिट याचिका (सिविल) 1351/2026 दाखिल की। इसमें विवादित निर्णयों के मूल रिकॉर्ड, मतदाता सूची से नाम हटाने की जाँच और पात्र मतदाताओं को नोटिस, सुनवाई तथा बहाली की प्रभावी व्यवस्था की माँग की गई। दोनों याचिकाएँ अलग हैं, लेकिन संबंधित मामलों के साथ सुनी गईं।
सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर को राकेश सिंह और 15 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं की याचिका पर नोटिस जारी किए। चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को राकेश सिंह के मामले में जवाबी हलफनामा दाखिल किया। यह नोटिस के बाद दिया गया जवाब था। अदालत ने 5 अक्टूबर के लिखित आदेश में हलफनामा जमा करने की निश्चित समय-सीमा तय नहीं की थी।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 निर्णय प्रक्रिया की कसौटी है। उपधारा (1) कामकाज की प्रक्रिया और आयुक्तों के बीच कार्य आवंटन के विनियमन में सर्वसम्मति का प्रावधान करती है। उपधारा (2) अन्य कामकाज में यथासंभव सर्वसम्मति और मतभेद होने पर बहुमत से निर्णय की व्यवस्था करती है।
इंडियन एक्सप्रेस ने दो निर्वाचन आयुक्तों की चौदह कथित आपत्तियों की पड़ताल प्रकाशित की। राकेश सिंह की याचिका में अखबारी रिपोर्ट संलग्न है, मूल नोटिंग्स नहीं। आयोग के अनुसार, आयुक्तों की राय और सुझावों पर विचार होता है, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणियाँ आयोग का निर्णय नहीं होतीं। हलफनामे में आपत्तियों के निस्तारण का बिंदुवार रिकॉर्ड संलग्न नहीं है। इसकी स्वतंत्र जाँच जरूरी है।
आयोग के 26 अक्टूबर के जवाबी हलफनामे के अनुसार, 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 के पुनरीक्षण आदेश सर्वसम्मति से स्वीकृत हुए। हलफनामा भी तीनों आयुक्तों की सहमति से दाखिल हुआ। यह महत्वपूर्ण प्रतिवाद है, लेकिन इन आदेशों की सर्वसम्मति से हर अलग तकनीकी निर्देश या कार्य आवंटन की मंजूरी अपने आप सिद्ध नहीं होती। संबंधित फाइलों से ही वास्तविक अनुमोदन प्रक्रिया का स्वतंत्र परीक्षण संभव होगा।
28 जुलाई 2026 को कार्य आवंटन बदलने का आदेश जारी हुआ। दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव को अलग-अलग आपत्ति-पत्र भेजे। हलफनामे के अनुच्छेद 32 के अनुसार, 30 जुलाई को दोनों निर्वाचन आयुक्तों के संयुक्त निर्देश के बाद 28 जुलाई का आदेश लागू नहीं हुआ। आदेश किसकी मंजूरी से जारी हुआ और आपत्तियों का निस्तारण कहाँ दर्ज है? इसकी जाँच जरूरी है।
आयोग की निर्णय प्रक्रिया के साथ ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण पर भी सवाल उठे हैं। आयोग का कहना है कि फॉर्म-6 का कानूनी प्रारूप नहीं बदला गया। विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए अलग घोषणा पत्र जोड़ा गया, ताकि पुरानी मतदाता सूची से विवरण मिल सकें। लेकिन पोर्टल पर दोनों दस्तावेज कैसे दिखाए गए और घोषणा पत्र के बिना आवेदन जमा हो सकता था या नहीं, इस पर विवाद है।
आयोग ने स्वीकार किया कि पोर्टल पर फॉर्म-6 और घोषणा पत्र दिखाने का तरीका ऐसा था, जिससे मूल प्रपत्र बदले जाने का भ्रम पैदा हो सकता था। उसने 21 अक्टूबर को दोनों की प्रस्तुति अलग करने का निर्णय बताया। लेकिन यह स्वीकारोक्ति इस बात का प्रमाण नहीं है कि अतिरिक्त विवरण दिए बिना आवेदन जमा करना तकनीकी रूप से असंभव था। यही वह अंतर है जिसकी स्वतंत्र जाँच जरूरी है।
वैधानिक फॉर्म में बदलाव नहीं होना और ऑनलाइन पोर्टल पर अतिरिक्त जानकारी व्यवहार में अनिवार्य होना दो अलग प्रश्न हैं। तत्कालीन पोर्टल रिकॉर्ड, आवेदन जमा करने की शर्तें, असफल आवेदनों के विवरण और तकनीकी बदलावों का इतिहास ही स्पष्ट कर सकता है कि नागरिकों के सामने वास्तविक बाधा थी या केवल प्रस्तुति संबंधी भ्रम।
आयोग ने 14 अक्टूबर को ईसीआईनेट की कानूनी अनुपालना और निर्वाचन अधिकारियों की स्वतंत्रता की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की। इसमें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई और भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के विशेषज्ञ शामिल बताए गए। समिति का गठन किसी तकनीकी दोष की स्वीकारोक्ति नहीं है। उसके कार्यक्षेत्र, निष्कर्ष और लागू किए गए सुधारों की जानकारी सार्वजनिक विश्वास के लिए महत्वपूर्ण होगी।
दिल्ली के विशेष गहन पुनरीक्षण में पहले से पंजीकृत मतदाताओं से फॉर्म-6 भरवाने का विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। आयोग ने 3 नवंबर को कहा कि पहले से पंजीकृत मतदाता का फॉर्म-6 भरना स्वतः झूठी घोषणा नहीं है, बशर्ते उसका नाम किसी दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में दर्ज न हो। लेकिन पुराने मतदाताओं से नया आवेदन भरवाने पर विवाद बना रहा।
चार नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आयोग के इस स्पष्टीकरण पर आपत्ति जताई। अदालत ने उन्हें आयोग के स्पष्टीकरण पर अपनी आपत्तियाँ औपचारिक आवेदन के माध्यम से न्यायिक रिकॉर्ड पर लाने को कहा। मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026 को निर्धारित हुई।
तकनीकी व्यवस्था के अतिरिक्त राज्य स्तर पर दायर अपीलों का अधिकार और उनकी मंजूरी भी विवाद का हिस्सा है। पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम शामिल करने के फैसलों के खिलाफ लगभग 16.10 लाख अपीलें दायर हुईं। निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाया था कि आयोग के नाम पर ये अपीलें किसने और किसकी मंजूरी से दाखिल कीं। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने अपनी याचिका में यही मुद्दा उठाया। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के 1 और 6 अप्रैल के आदेशों तथा राज्य निर्वाचन अधिकारियों के वैधानिक अधिकारों का हवाला दिया।
अपील का कानूनी अधिकार और प्रत्येक अपील का नियमानुसार दाखिल होना अलग प्रश्न हैं। आयोग के अनुसार, ये मामले तीन सदस्यीय आयोग के सामने नहीं आए। आयोग ने यह भी कहा कि संबंधित नाम मतदाता सूची में थे और हाल के विधानसभा चुनाव में मतदान के पात्र थे। फिर भी प्रत्येक अपील की मंजूरी और संबंधित रिकॉर्ड की जाँच जरूरी है।
इतनी बड़ी संख्या में अपीलों के मसौदे किसने तैयार किए, हस्ताक्षर किसने किए और मंजूरी कहाँ दर्ज हुई, इसकी जाँच प्रासंगिक है। न्यायिक आदेशों से उपलब्ध अधिकारों और अधिकारियों द्वारा उनके वास्तविक इस्तेमाल के बीच अंतर स्पष्ट होना चाहिए। केवल अपीलों की संख्या से अनियमितता सिद्ध नहीं होती, लेकिन इतनी व्यापक कार्रवाई की प्रक्रिया का जाँच योग्य रिकॉर्ड होना आवश्यक है।
राकेश सिंह ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कामकाज पर अंतरिम रोक माँगी। आयोग ने याचिका की कानूनी स्वीकार्यता पर सवाल उठाया और पद के संवैधानिक संरक्षण का हवाला दिया। विपक्षी नेताओं की अलग याचिका में मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया की जाँच और प्रभावित मतदाताओं को राहत देने की माँग है। अदालत का अंतिम निर्णय शेष है।
27 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं ने आयोग की फाइलें और नोटिंग्स सुरक्षित रखने का निर्देश माँगा। अदालत ने दस्तावेज सुरक्षित रखने का आदेश नहीं दिया। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौखिक रूप से कहा, ‘हमें सब जानकारी है, हम इसकी जाँच करेंगे।’ लिखित आदेश में आयोग को प्रमुख मामले का हलफनामा अन्य मामलों में साझा करने या दस दिन में पूरक जवाब दाखिल करने की छूट मिली। अगली सुनवाई 17 नवंबर निर्धारित हुई।
चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से अलग, निर्वाचन आयुक्तों को मिले कानूनी संरक्षण पर भी सुप्रीम कोर्ट में विवाद है। वर्ष 2023 के अधिनियम की धारा 16 वर्तमान और पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्तों तथा अन्य आयुक्तों के विरुद्ध, आधिकारिक कर्तव्य निभाते या निभाने का दावा करते हुए किए कार्यों और कथनों पर, दीवानी एवं आपराधिक अदालती कार्यवाही रोकती है।
चार नवंबर को राज्यसभा सदस्य मनोज झा और अधिवक्ता अरुण कुमार अग्रवाल की याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किए। याचिकाकर्ताओं ने धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। अदालत ने इन्हें संबंधित लंबित याचिकाओं से जोड़ा। अगली सुनवाई 18 दिसंबर को होगी। प्रावधान पर रोक नहीं लगी है।
यदि मतदाता सूची में गंभीर अनियमितताओं की विश्वसनीय शिकायतें सामने आएँ और चुनाव आयोग की अपनी निर्णय प्रक्रिया भी विवाद के घेरे में हो, तो निष्पक्ष जाँच की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
क्या सरकार केवल आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता का हवाला देकर चुप रह सकती है, या कानून के भीतर उपलब्ध स्वतंत्र जाँच के रास्ते तलाशना भी उसकी जवाबदेही का हिस्सा है?
विपक्ष को मतदाता सूची की कथित गड़बड़ियों के आरोप प्रमाणों से पुष्ट करने होंगे। शांतिपूर्ण रैलियाँ लोकतंत्र में असहमति जताने, प्रभावित नागरिकों की आवाज उठाने और संस्थाओं से जवाब माँगने का माध्यम हैं। आयोजकों को अहिंसा और जनसुविधाओं का ध्यान रखना चाहिए। प्रशासन को राजनीतिक मतभेद से ऊपर उठकर नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा करनी चाहिए।
चुनावी व्यवस्था में सुधार के लिए प्रत्येक विवादित नाम से संबंधित नोटिस, सुनवाई, आदेश और अंतिम स्थिति का सुरक्षित रिकॉर्ड होना चाहिए। मतदाता को समय पर स्पष्ट जानकारी और प्रभावी अपील का अवसर मिलना चाहिए। सॉफ्टवेयर में बदलाव, तकनीकी अनुमति और शिकायत निस्तारण का इतिहास भी सुरक्षित रहे। पारदर्शिता का अर्थ नागरिकों की निजी जानकारी उजागर करना नहीं, निर्णय प्रक्रिया को जाँच योग्य बनाना है।
बाद में सुधार से संभावित प्रशासनिक विफलता की जवाबदेही खत्म नहीं होती। यदि पात्र मतदाता का नाम समय पर बहाल नहीं हुआ, तो उसे बाद में सूची में जोड़ना पर्याप्त जवाब कैसे हो सकता है? निर्णय लागू क्यों नहीं हुए, कितने लोग प्रभावित हुए और ऐसी बाधा रोकने के लिए क्या बदला गया? इन सवालों का दस्तावेजी जवाब सामने आना चाहिए।
एक नवंबर को रामलीला मैदान में विपक्ष ने चुनावी गड़बड़ियों के आरोप लगाए। भाजपा ने रोहतक सहित जगह-जगह ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ प्रदर्शन किए और विपक्ष पर अराजकता का आरोप लगाया। सत्तारूढ़ दल को प्रतिवाद का अधिकार है, लेकिन क्या विपक्ष की इस रैली में अराजकता के प्रमाण सामने आए? राजनीतिक असहमति और कानून-व्यवस्था के वास्तविक उल्लंघन के बीच अंतर स्पष्ट होना चाहिए।
रामलीला मैदान में कितने लोग जुटे, यह जाँचना पत्रकारिता का हिस्सा है। लेकिन जब टीवी बहसें भीड़ और विपक्ष पर कटाक्ष तक सिमट जाएँ, तो मतदाता सूची की शिकायतें पीछे छूट जाती हैं। क्या भीड़ के आकार से मताधिकार के सवाल छोटे पड़ जाते हैं? क्या सरकार और चुनाव आयोग से जवाब माँगने की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है?
मीडिया की जिम्मेदारी राजनीतिक भाषणों पर टिप्पणी करने और आधिकारिक बयान दोहराने तक सीमित नहीं है। उसे प्रभावित मतदाताओं की बात सुननी होगी, निर्वाचन अधिकारियों के निर्णय परखने होंगे और मूल आदेशों तथा तकनीकी रिकॉर्ड की पड़ताल करनी होगी। जहाँ प्रमाण पर्याप्त और विश्वसनीय हों, वहाँ निष्कर्ष भी स्पष्ट होने चाहिए। जहाँ दस्तावेज अधूरे हों, वहाँ अनुत्तरित सवालों को सामने लाना और संबंधित संस्थाओं से जवाब माँगना स्वतंत्र पत्रकारिता की पहचान है।
‘खुली किताब’ का उद्देश्य दलों के आरोप या बचाव को अंतिम सत्य मानना नहीं, उन्हें दस्तावेजों से परखना है। गोवा के 97 मामले हों या आयोग की निर्णय प्रक्रिया, सवाल है कि शिकायतें समय पर कैसे सुलझेंगी और गलत पाए गए फैसले कैसे सुधरेंगे। लोकतंत्र पर भरोसा भाषणों से नहीं, हर पात्र नागरिक के मताधिकार की सुरक्षा से बनता है। यह तभी कायम होगा, जब व्यवस्था की खामियों के कारण कोई पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न हो।









