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महँगाई बढ़ी, रुपया दबाव में: आम आदमी की जेब पर कितना असर?

बढ़ती खाद्य महँगाई और रुपये पर दबाव के बीच घरेलू खर्च, आयात लागत और रिजर्व बैंक के उपाय आर्थिक चिंता के प्रमुख विषय बने हुए हैं। (प्रतीकात्मक चित्र: खुली किताब)
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—खुली किताब | रिसर्च टीम

Ahmedabad | October 18, 2026

सितंबर में खुदरा महँगाई 5.54 प्रतिशत और खाद्य महँगाई 7.74 प्रतिशत पहुँची। रुपये को संभालने के लिए रिजर्व बैंक ने कड़े कदम उठाए। चार सितंबर से नौ अक्टूबर के बीच विदेशी मुद्रा भंडार 59.68 अरब डॉलर घटा। रुपये में हालिया सुधार के बावजूद महँगे आयात और बढ़ती ब्याज दरों का असर घरेलू खर्च पर पड़ने की आशंका है। सवाल यह भी है कि रिजर्व बैंक के उपाय कितने टिकाऊ हैं और उनकी लागत किसे चुकानी पड़ेगी?

भारत में महँगाई का दबाव फिर बढ़ रहा है। सितंबर में खुदरा और खाद्य महँगाई दोनों में तेजी दर्ज हुई। इसी बीच डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने आयातित सामान और कच्चे माल की लागत बढ़ने की आशंका पैदा की है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विदेशी मुद्रा बाजार में कई सख्त कदम उठाए हैं। इन उपायों की घोषणा के बाद डॉलर के मुकाबले रुपये में सुधार दर्ज हुआ है। इसमें बाजार की अन्य परिस्थितियों का भी योगदान हो सकता है। हालाँकि, रुपये में इस सुधार से आम परिवारों के खर्च पर महँगाई का जोखिम समाप्त नहीं हुआ है।

महँगाई के सरकारी आँकड़े आम परिवार के लिए क्या बताते हैं?

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के 12 अक्टूबर को जारी आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार सितंबर 2026 में खुदरा महँगाई दर 5.54 प्रतिशत रही, जबकि अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी। ये आँकड़े वर्ष 2024 को आधार मानकर तैयार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित हैं। सितंबर के आँकड़े अभी प्रारंभिक हैं और इनमें बाद में संशोधन हो सकता है। आसान भाषा में समझें तो जिन वस्तुओं और सेवाओं की निर्धारित टोकरी पर पिछले साल सितंबर में 1,000 रुपये खर्च होते थे, उसकी औसत कीमत इस सितंबर में लगभग 1,055 रुपये हो गई।

खाने-पीने की चीजों पर दबाव इससे अधिक रहा। सितंबर में खाद्य महँगाई अगस्त के 5.97 प्रतिशत से बढ़कर 7.74 प्रतिशत पहुँची। यानी पिछले साल सितंबर में जिन खाद्य वस्तुओं की निर्धारित टोकरी की कीमत 1,000 रुपये थी, उसकी औसत कीमत इस सितंबर में लगभग 1,077 रुपये हो गई। यह राष्ट्रीय औसत है और अलग-अलग परिवारों के वास्तविक खर्च में अंतर हो सकता है।

सितंबर में महँगाई की दर शहरों की तुलना में गाँवों में अधिक रही। सांख्यिकी मंत्रालय के प्रारंभिक आँकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महँगाई 6.08 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 4.88 प्रतिशत थी। खाद्य महँगाई में भी यही अंतर दिखाई दिया। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महँगाई 8.06 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 7.18 प्रतिशत दर्ज की गई। इसका अर्थ यह है कि पिछले वर्ष के इसी महीने की तुलना में ग्रामीण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अधिक तेजी से बढ़ा।

इन प्रतिशतों का अर्थ यह नहीं कि सितंबर के एक महीने में हर वस्तु इतनी महँगी हो गई। ये पिछले साल के उसी महीने की तुलना में औसत मूल्य वृद्धि बताते हैं। कुछ वस्तुओं की कीमतें अधिक बढ़ीं, जबकि कुछ की कम हुईं या घटीं। अलग-अलग परिवारों पर असर उनकी खरीदारी के अनुसार बदलता है। कम आय वाले परिवार अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा भोजन और आवश्यक वस्तुओं पर खर्च करते हैं। इसलिए खाद्य महँगाई उनके घरेलू बजट पर विशेष दबाव डाल सकती है।

रुपया कमजोर होने से महँगाई का खतरा क्यों बढ़ता है?

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, जिसका भुगतान मुख्यतः डॉलर में होता है। जब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो समान मात्रा में तेल खरीदने के लिए अधिक रुपये देने पड़ सकते हैं। इससे तेल कंपनियों और आयात पर निर्भर उद्योगों की लागत बढ़ने का जोखिम रहता है। यह खर्च परिवहन, माल ढुलाई और उत्पादन के रास्ते दूसरी वस्तुओं तक पहुँच सकता है। हालाँकि उपभोक्ता कीमतों पर इसका वास्तविक असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, करों और कंपनियों के निर्णयों पर भी निर्भर करता है।

उदाहरण के लिए, विदेश से मँगाई जाने वाली किसी वस्तु की कीमत 100 डॉलर है। एक डॉलर का भाव 85 रुपये होने पर उसकी कीमत 8,500 रुपये होगी। डॉलर 95 रुपये का हो जाए तो उसी वस्तु की लागत 9,500 रुपये हो जाएगी। यानी अंतरराष्ट्रीय कीमत बदले बिना भी आयात की लागत 1,000 रुपये बढ़ सकती है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि बढ़ी हुई पूरी लागत ग्राहकों से वसूली जाए। कुछ कारोबारी इसका एक हिस्सा स्वयं वहन भी कर सकते हैं।

विदेश में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के परिवारों पर इसका असर अधिक सीधा हो सकता है। उदाहरण के लिए, 10,000 डॉलर की फीस के लिए डॉलर का भाव 85 रुपये होने पर 8.50 लाख रुपये चाहिए, जबकि 95 रुपये होने पर 9.50 लाख रुपये लगेंगे। आयातित मशीनों और कच्चे माल पर निर्भर छोटे कारोबार भी प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, डॉलर में कमाई करने वाले कुछ निर्यातकों को कमजोर रुपये से लाभ मिल सकता है। इसलिए रुपये की गिरावट का असर सभी पर एक समान नहीं पड़ता।

रुपये को संभालने के लिए रिजर्व बैंक ने क्या कदम उठाए?

अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में आरबीआई ने विदेशी मुद्रा बाजार के लिए कई नए नियम घोषित किए। उसके 10 अक्टूबर के आधिकारिक घोषणा-पत्र के अनुसार रुपये से जुड़े कुछ विदेशी मुद्रा अनुबंधों को रद्द करने के बाद दोबारा बुक करने पर रोक लगाई गई। यह रोक नए निर्देश जारी होने के बाद रद्द किए गए अनुबंधों पर लागू है। ऐसे अनुबंधों के जरिए कारोबारी डॉलर या दूसरी विदेशी मुद्राओं की कीमत बदलने से होने वाले नुकसान का जोखिम कम करते हैं। आरबीआई ने वास्तविक कारोबारी विदेशी मुद्रा जोखिम का प्रमाण पहले स्थापित किए बिना उससे बचाव के लिए संबंधित अनुबंध करने की सीमा 10 करोड़ डॉलर से घटाकर 50 लाख डॉलर कर दी। यह सीमा सभी संबंधित बैंकों में ऐसे कुल बकाया अनुबंधों पर लागू है, न कि प्रत्येक बैंक के लिए अलग-अलग। इससे अधिक राशि के सभी विदेशी मुद्रा सौदों पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

एक ही कारोबारी जोखिम से बचाव के लिए अलग-अलग बैंकों से अनुबंध किए जा सकते हैं। लेकिन एक ही कारोबारी जोखिम के लिए सभी बैंकों से किए गए अनुबंधों की कुल राशि उस वास्तविक जोखिम की राशि से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि ग्राहक ने उसी जोखिम का कुछ हिस्सा पहले ही दूसरे बैंक से कवर किया है, तो उसे पहले से किए गए अनुबंधों की राशि लिखित रूप में बतानी होगी। बैंकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि अनुबंध वास्तविक कारोबारी जोखिम के अनुरूप हों। आरबीआई के अनुसार इन उपायों का उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में अनुशासन, उचित जोखिम प्रबंधन और पारदर्शिता बढ़ाना है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कदम विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व की व्यवस्था है। आरबीआई के 10 अक्टूबर के आधिकारिक परिपत्र के अनुसार यह नियम रुपये से जुड़े कुछ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों पर लागू होगा। विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव ऐसे वित्तीय अनुबंध होते हैं, जिनका मूल्य डॉलर या दूसरी विदेशी मुद्राओं की विनिमय दर जैसे कारकों पर निर्भर करता है। कारोबारी इनका इस्तेमाल विदेशी मुद्रा की कीमत बदलने से होने वाले नुकसान का जोखिम कम करने के लिए कर सकते हैं। नया नियम उन संबंधित अनुबंधों पर लागू है, जिनमें ग्राहक आयात जैसे चालू खाते के लेनदेन से जुड़े जोखिम से बचने के लिए रुपये के बदले विदेशी मुद्रा खरीदते हैं।

यदि ऐसे किसी अनुबंध की निर्धारित राशि 20 लाख डॉलर से अधिक है, तो अधिकृत बैंक को नकद रिजर्व रखना होगा। यह रिजर्व अनुबंध की निर्धारित राशि के रुपये में मूल्य का 20 प्रतिशत होगा। बैंक को यह राशि संबंधित अनुबंध किए जाने के अगले कार्यदिवस से रिजर्व बैंक के पास नकद रूप में रखनी होगी और अनुबंध समाप्त होने के अगले दिन तक प्रतिदिन बनाए रखनी होगी। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि इस शर्त से बचने के उद्देश्य से एक या अधिक बैंकों के साथ कई अलग-अलग अनुबंध करना नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। यह व्यवस्था 10 अक्टूबर के निर्देश जारी होने के बाद किए गए संबंधित अनुबंधों पर लागू है। यह ग्राहकों पर लगाया गया कोई नया कर नहीं है, बल्कि चुनिंदा विदेशी मुद्रा अनुबंधों के लिए बैंकों पर लागू रिजर्व रखने की शर्त है।

इसके बाद आरबीआई ने 12 अक्टूबर के एक अन्य परिपत्र में बैंकों के अपने विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव के लिए किए जाने वाले संबंधित अनुबंधों पर भी 20 प्रतिशत नकद रिजर्व रखने का निर्देश दिया। इन अनुबंधों के लिए 20 लाख डॉलर की न्यूनतम सीमा निर्धारित नहीं की गई है। हालाँकि, 15 अक्टूबर को जारी स्पष्टीकरण के अनुसार बाजार में ग्राहकों को सौदे उपलब्ध कराने और बैंकों के अपने कुछ व्यापारिक सौदों पर यह शर्त लागू नहीं होगी। इस प्रकार रिजर्व की व्यवस्था सभी विदेशी मुद्रा अनुबंधों पर समान रूप से लागू नहीं है।

इस व्यवस्था से कुछ विदेशी मुद्रा सौदों की लागत बढ़ सकती है। रुपये की और गिरावट से बचाव के लिए अनुबंध करने वाले वास्तविक आयातकों को भी इसका अप्रत्यक्ष असर झेलना पड़ सकता है। इसके अलावा आरबीआई ने विशेष डॉलर व्यवस्था के तहत इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम की पूरी दैनिक डॉलर जरूरतों के लिए निर्धारित बैंकों के माध्यम से डॉलर उपलब्ध कराने का फैसला किया। यह व्यवस्था 12 अक्टूबर से लागू हुई, ताकि इन कंपनियों की डॉलर माँग का तत्काल दबाव खुले बाजार पर कम किया जा सके।

बैंकों की नकदी संबंधी व्यवस्था में भी बदलाव हुआ। आरबीआई ने नौ अक्टूबर के आदेश से नकद आरक्षित अनुपात की निर्धारित राशि का दैनिक न्यूनतम रखरखाव 90 प्रतिशत से बढ़ाकर 99 प्रतिशत कर दिया। यह बदलाव 16 अक्टूबर से प्रभावी हुआ। इसका अर्थ यह नहीं कि मूल नकद आरक्षित अनुपात की दर बढ़ाई गई है। बल्कि बैंकों को प्रतिदिन निर्धारित आरक्षित राशि के अधिक निकट रहना होगा, जिससे उनकी नकदी प्रबंधन की गुंजाइश घट सकती है।

आरबीआई के इन उपायों के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये में सुधार दर्ज हुआ, हालाँकि बाजार की अन्य परिस्थितियों का भी इसमें योगदान हो सकता है। अक्टूबर में डॉलर के मुकाबले लगभग 96.96 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुँचने वाला रुपया 16 अक्टूबर को 94.96 पर बंद हुआ। 16 अक्टूबर की बाजार रिपोर्ट के अनुसार यह सात महीनों में रुपये का सबसे मजबूत साप्ताहिक प्रदर्शन था। हालाँकि लंबे समय की स्थिरता अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, विदेशी निवेश और भारत के बाहरी व्यापार की स्थिति पर भी निर्भर करेगी।

विदेशी मुद्रा भंडार घटा, आगे कितनी चिंता?

आरबीआई के 16 अक्टूबर को जारी आँकड़ों के अनुसार नौ अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 726.03 अरब डॉलर रह गया। चार सितंबर को यह 785.71 अरब डॉलर था। इस प्रकार पाँच सप्ताह में लगभग 59.68 अरब डॉलर, यानी करीब 7.6 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। विदेशी मुद्रा भंडार के आँकड़े रिजर्व बैंक के साप्ताहिक सांख्यिकी विवरण में प्रकाशित किए जाते हैं। यह भंडार विदेशी भुगतान की जरूरतों और वित्तीय अस्थिरता के समय महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।

हालाँकि, विदेशी मुद्रा भंडार में आई पूरी कमी को रुपये की रक्षा के लिए बेचे गए डॉलर का परिणाम मानना गलत होगा। विदेशी मुद्राओं और सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव भी कुल विदेशी मुद्रा भंडार को प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त आरबीआई के वायदा अनुबंध और मुद्रा अदला-बदली के सौदे उसकी विदेशी मुद्रा संबंधी स्थिति समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। रॉयटर्स की 15 अक्टूबर की रिपोर्ट में बैंकिंग विशेषज्ञों ने आठ जून से डॉलर बिक्री और अदला-बदली के जरिए लगभग 75 से 80 अरब डॉलर के हस्तक्षेप का अनुमान लगाया था। यह आरबीआई का आधिकारिक पुष्ट आँकड़ा नहीं है और इसकी अवधि भी पाँच सप्ताह से अलग है।

आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने सात अक्टूबर को रेपो दर 0.25 प्रतिशत अंक बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दी। यह फैसला ऐसे समय लिया गया, जब महँगाई बढ़ने की आशंका और रुपये पर दबाव दोनों बने हुए थे। रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर रिजर्व बैंक बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। इसमें वृद्धि से कुछ ऋण महँगे हो सकते हैं। जिन परिवारों के गृह ऋण परिवर्तनीय ब्याज दर से जुड़े हैं, उनकी किस्त या ऋण चुकाने की अवधि प्रभावित हो सकती है। हालाँकि प्रत्येक बैंक और प्रत्येक ऋण पर इसका असर तुरंत या समान अनुपात में नहीं पड़ता।

आने वाले महीनों में महँगाई की दिशा केवल रुपये का भाव तय नहीं करेगा। खाद्य आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें, उत्पादन लागत और विदेशी निवेश की स्थिति भी महत्वपूर्ण रहेंगी। सितंबर में महँगाई पहले ही बढ़ चुकी थी, इसलिए उसे रुपये की अक्टूबर वाली गिरावट का परिणाम नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि रुपया फिर कमजोर होता है और आयात महँगा बना रहता है, तो भविष्य में घरेलू कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसके विपरीत तेल की कीमतें घटने और खाद्य आपूर्ति सुधरने से राहत मिल सकती है।

अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि रुपये को संभालने के लिए आरबीआई के कड़े उपाय कितने समय तक आवश्यक रहेंगे और इनकी लागत बैंकों, कारोबारों तथा ग्राहकों तक कितनी पहुँचेगी। विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और बैंकों की नकदी पर लगी नई शर्तों के परिणामों का आकलन भी जरूरी है। फिलहाल उपलब्ध आँकड़े आर्थिक दबाव और उससे निपटने के लिए रिजर्व बैंक के विशेष उपायों को दर्शाते हैं, लेकिन अपने आप में मुद्रा संकट सिद्ध नहीं करते। रुपये की स्थिरता और घरेलू महँगाई पर नियंत्रण की वास्तविक तस्वीर आने वाले महीनों के आँकड़ों से अधिक स्पष्ट होगी।

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