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लिखित आधार के बिना गिरफ्तारी असंवैधानिक, दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की मंजूरी जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

भारत का सर्वोच्च न्यायालय, जिसने गिरफ्तारी की प्रक्रिया में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा को विशेष महत्व दिया है। (फाइल फोटो)
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—खुली किताब | रिसर्च टीम

New Delhi | September 26, 2026

गिरफ्तारी का कारण आरोपी को उसकी समझ की भाषा में लिखित रूप से बताना अनिवार्य। संवैधानिक उल्लंघन पर तत्काल रिहाई, दोबारा हिरासत के लिए न्यायिक मंजूरी और पुलिस अधिकारी की जवाबदेही की प्रक्रिया भी तय।

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में और उसकी समझ की भाषा में देना संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत अनिवार्य है। इसका उल्लंघन गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड को अवैध बना देगा और गिरफ्तार व्यक्ति तत्काल रिहाई का हकदार होगा।

अदालत ने कहा कि ऐसी रिहाई के बाद पुलिस अपने स्तर पर सीधे उसी व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती। जांच के लिए उसकी हिरासत जरूरी होने पर पहले लिखित आधार देने होंगे और फिर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन कर अनुमति लेनी होगी। इस प्रक्रिया में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की निगरानी, जांच दूसरे अधिकारी को सौंपने और संवैधानिक चूक करने वाले अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच की व्यवस्था भी तय की गई है।

जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने 21 सितंबर को जसकरण जीत सिंह देओल बनाम पंजाब राज्य मामले में यह फैसला दिया। अदालत ने कहा कि संवैधानिक सुरक्षा अपराध की प्रकृति या उसकी गंभीरता पर निर्भर नहीं करती और किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान तथा कानून में तय प्रक्रिया के अनुसार ही छीनी जा सकती है।

निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला

मामला पंजाब के एसएएस नगर (मोहाली) स्थित मटौर पुलिस स्टेशन में 13 मई को दर्ज एफआईआर से शुरू हुआ। इसमें जसकरण जीत सिंह देओल के खिलाफ एक नाबालिग लड़की के कथित यौन शोषण को लेकर भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

पुलिस ने देओल को 17 मई की सुबह करीब 7:54 बजे गिरफ्तार किया और अगले दिन दोपहर करीब 12 बजे पुलिस रिमांड के लिए ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।

मजिस्ट्रेट ने पाया कि पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं दिए थे। इसे अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन मानते हुए गिरफ्तारी को अवैध ठहराया और देओल को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी कानून और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए आगे की कार्रवाई कर सकती है।

इसके बाद पुलिस ने उसी दिन देओल की कस्टडी और रिमांड के लिए नया आवेदन किया। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 22 मई को यह आवेदन भी खारिज कर दिया, क्योंकि तब तक आरोपी को गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराए गए थे।

इसके बाद देओल पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचे। उन्होंने मजिस्ट्रेट के आदेश की कुछ टिप्पणियों को रद्द करने के साथ पुलिस को दोबारा गिरफ्तार करने, गिरफ्तारी वारंट लेने और उनकी कस्टडी या रिमांड मांगने से रोकने की मांग की।

हाईकोर्ट ने 29 मई को उनकी याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने कहा कि पहली गिरफ्तारी अवैध घोषित होने से आरोपी को भविष्य की गिरफ्तारी से पूर्ण सुरक्षा नहीं मिल जाती और जांच एजेंसी कानून के मुताबिक दोबारा गिरफ्तारी कर सकती है।

हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने पर देओल ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की, जो बाद में क्रिमिनल अपील नंबर 4234/2026 बनी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का 29 मई का आदेश और मजिस्ट्रेट के 18 मई के आदेश की विवादित टिप्पणियां रद्द कर दीं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या तय किया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देना केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है। आधार ऐसी भाषा में दिए जाने चाहिए जिसे गिरफ्तार व्यक्ति समझता हो।

सामान्य स्थिति में गिरफ्तारी के समय ही लिखित आधार दिए जाने चाहिए। असाधारण परिस्थितियों में तत्काल लिखित आधार देना व्यावहारिक रूप से संभव न हो तो गिरफ्तारी के समय कारण मौखिक रूप से बताए जा सकते हैं। लेकिन लिखित आधार आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने रिमांड के लिए पेश करने से कम से कम दो घंटे पहले देना जरूरी होगा।

इसका पालन नहीं होने पर गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ऐसी रिहाई सामान्य जमानत नहीं, बल्कि अवैध और असंवैधानिक हिरासत से रिहाई है।

दोबारा गिरफ्तारी सीधे पुलिस के विवेक पर नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक उल्लंघन के कारण रिहा व्यक्ति को यदि पुलिस उसी मामले में दोबारा हिरासत में लेना चाहती है तो उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन करना होगा।

पुलिस को पहले आरोपी को गिरफ्तारी के लिखित आधार देने होंगे। आवेदन में बताना होगा कि दोबारा हिरासत क्यों जरूरी है और पहली बार लिखित आधार क्यों नहीं दिए गए। इस आवेदन पर संबंधित अधिकारी के तत्काल वरिष्ठ अधिकारी का अनुमोदन भी जरूरी होगा।

मजिस्ट्रेट को यह देखना होगा कि पहली बार गिरफ्तारी के आधार नहीं देने के पीछे वास्तविक और सद्भावनापूर्ण कारण था या नहीं और दोबारा गिरफ्तारी वास्तव में जरूरी है या नहीं। संतुष्ट होने पर ही मजिस्ट्रेट दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति दे सकेगा।

जांच दूसरे अधिकारी को, विभागीय जांच भी

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस जवाबदेही की प्रक्रिया भी तय की है। जब संवैधानिक उल्लंघन के कारण रिहा व्यक्ति की दोबारा कस्टडी के लिए आवेदन वरिष्ठ अधिकारी के सामने अनुमोदन के लिए आएगा, तो वरिष्ठ अधिकारी को मामले की जांच दूसरे अधिकारी को सौंपनी होगी और संवैधानिक चूक करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश देना होगा।

यदि विभागीय जांच में संबंधित अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष आता है तो विभागीय कार्रवाई होगी और इसकी एंट्री उसकी सर्विस बुक में भी की जाएगी।

24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना भी संवैधानिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तारी के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने के अधिकार पर भी जोर दिया। इस अवधि की गणना में गिरफ्तारी के स्थान से अदालत तक पहुंचने में लगा आवश्यक यात्रा समय शामिल नहीं होता।

अदालत ने कहा कि इस संवैधानिक सुरक्षा के उल्लंघन के कारण रिहाई के बाद पुलिस दोबारा हिरासत चाहती है तो उसे भी वही प्रक्रिया अपनानी होगी जो अदालत ने अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के मामलों के लिए निर्धारित की है।

परिस्थितियों के आधार पर हाईकोर्ट अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन के मामले में सार्वजनिक कानून के उपचार के रूप में मुआवजा देने का निर्देश भी दे सकता है।

फैसले की प्रति देशभर के पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को प्रसारित की जा सकती है

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने देओल के खिलाफ लगे आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है। फैसला गिरफ्तारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों तथा दोबारा गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर केंद्रित है।

अदालत ने कहा कि फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को प्रसारित की जा सकती है।

इस तरह फैसले ने संवैधानिक उल्लंघन के कारण रिहाई के बाद दोबारा गिरफ्तारी की प्रक्रिया के साथ जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था जोड़ी है। इसमें लिखित आधार देना, वरिष्ठ अधिकारी का अनुमोदन, जांच दूसरे अधिकारी को सौंपना, विभागीय जांच और दोबारा गिरफ्तारी से पहले न्यायिक मंजूरी शामिल है।

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