
Ahmedabad | June 17, 2026
यह रिपोर्ट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अस्तित्व की नहीं, उसके जवाबदेही ढांचे की पड़ताल है। सवाल यह है कि जब कोई संगठन अपना व्यापक विस्तार सार्वजनिक करता है, तो उसकी कानूनी स्थिति, धन के स्रोत और बड़े सार्वजनिक आयोजनों की जिम्मेदारी कितनी स्पष्ट होनी चाहिए।
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने 15 जून 2026 को अपने सत्यापित एक्स खाते से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत को संबोधित एक पत्र सार्वजनिक किया। पत्र की तारीख 13 जून 2026 है। इसमें संघ की कानूनी स्थिति, पंजीकरण, पदाधिकारियों, धन के स्रोत, खर्च, कर अनुपालन और सार्वजनिक कार्यक्रमों की अनुमति व्यवस्था पर सवाल पूछे गए हैं।
पत्र में कर्नाटक में संघ की गतिविधियों के आंकड़ों का भी उल्लेख है। दैनिक शाखाओं, साप्ताहिक मिलनों, मासिक मंडलियों, समाजोत्सवों और पथ संचलनों का हवाला दिया गया है। यह सवाल किसी अज्ञात संगठन से नहीं, बल्कि अपने विस्तार और प्रभाव को स्वयं सार्वजनिक करने वाले संगठन से जुड़ा है।
इसके बाद सार्वजनिक बहस में मोहन भागवत का 14 जून 2026 को त्रिशूर में दिया गया जवाब सामने आया। उस प्रश्नोत्तर सत्र में उनसे संघ के पंजीकरण और कर्नाटक सरकार के रुख पर सवाल पूछा गया था।
भागवत ने इसे राजनीति बताया और कहा कि संघ गुप्त संगठन नहीं है। उनका तर्क था कि सरकार संघ के अस्तित्व को जानती है और पंजीकरण न होना अपने आप अवैधता का प्रमाण नहीं है।
यहीं से इस विवाद की असली परत खुलती है। सरकार का किसी संगठन को जानना और उस संगठन की मौजूदा कानूनी स्थिति स्पष्ट होना, दोनों एक बात नहीं हैं। उसी तरह सरकार का सवाल पूछना और उस सवाल का विधिवत प्रशासनिक आधार होना भी अलग बात है।
इस विवाद का महत्व केवल संघ या कांग्रेस तक सीमित नहीं है। यह सवाल इस बात से जुड़ा है कि बड़े सामाजिक संगठनों, सरकारों और सार्वजनिक संस्थाओं को जवाबदेही के किस समान मानदंड पर परखा जाना चाहिए। इसलिए सवाल और जवाब, दोनों को दस्तावेजों के आधार पर पढ़ना जरूरी है।
Dear Shri Mohan Bhagwat ji,
My letter will reach you shortly. However, I thought it was important to draw your attention to this matter early.
——————————-Firstly, congratulations to the RSS on completing 100 years.
An organisation that claims over 60,000 shakhas and crores of… pic.twitter.com/IZy4oeKdMp
— Priyank Kharge / ಪ್ರಿಯಾಂಕ್ ಖರ್ಗೆ (@PriyankKharge) June 15, 2026
पत्र में पूछे गए सवाल
प्रियांक खरगे का पत्र मोहन भागवत को संबोधित है। पत्र की शुरुआत संघ के सौ वर्ष पूरे होने की बधाई से होती है। इसके बाद पत्र जवाबदेही के सवाल पर आता है।
पत्र में कहा गया है कि संघ देश के सार्वजनिक जीवन में बड़ा प्रभाव रखता है। इसलिए उसकी कानूनी और प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। संघ से पूछा गया है कि वह किस विधिक ढांचे के तहत काम करता है। क्या वह किसी समाज, न्यास, कंपनी या किसी अन्य रूप में पंजीकृत है। यदि नहीं, तो उसके संचालन का कानूनी आधार क्या है।
पत्र में संघ के पदाधिकारियों और अधिकृत प्रतिनिधियों का विवरण भी मांगा गया है। यह पूछा गया है कि संगठन की ओर से किसे जवाब देने या निर्णय लेने का अधिकार है। यह सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि कोई भी बड़ा संगठन केवल प्रभाव से नहीं, अपने अधिकृत ढांचे से भी पहचाना जाता है।
पत्र में धन के स्रोत, दान, योगदान, आय, खर्च और संपत्तियों पर जानकारी मांगी गई है। कर अनुपालन को लेकर पूछा गया है कि लागू कानूनों के तहत संघ अपनी देनदारियां किस रूप में पूरी करता है। इसके साथ ही सार्वजनिक सभाओं, पथ संचलनों और बड़े आयोजनों की अनुमति व्यवस्था का विवरण भी मांगा गया है।
पत्र आधिकारिक लेटरहेड पर है। उसमें तारीख, विषय, संबोधन और हस्ताक्षर मौजूद हैं। लेकिन उपलब्ध प्रति में जावक क्रमांक या फाइल संदर्भ दिखाई नहीं देता।
इसलिए इसे मंत्री स्तर का आधिकारिक पत्र कहा जा सकता है। गृह विभाग का विधिवत प्रशासनिक नोटिस मानने के लिए अभी दस्तावेजी पुष्टि जरूरी है।
17 जून को सामने आई रिपोर्टों में खरगे ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्र निजी हैसियत में नहीं, बल्कि राज्य सरकार की ओर से लिखा गया था।
उन्होंने कहा कि संघ पर प्रतिबंध लगाने का कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया है। उनके अनुसार संघ के जवाब के बाद सरकार कानून के तहत आगे की कार्रवाई पर विचार करेगी।
17 जून की अपराह्न एएनआई को दिए बयान में खरगे ने कहा कि उनका पत्र स्पष्ट है। उन्होंने कर्नाटक में यूनिफॉर्म पहनकर हुए मार्चों और रोजाना लगने वाली शाखाओं का हवाला देते हुए पूछा कि यदि संघ पंजीकृत संगठन नहीं है, तो वह किस कानून के तहत काम कर रहा है।
खरगे ने कहा कि उन्होंने पत्र में संघ पर प्रतिबंध लगाने या कर्नाटक सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाने की बात नहीं लिखी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सवाल हिंदू धर्म के पंजीकरण का नहीं, बल्कि एक संगठन के रूप में संघ की कानूनी स्थिति और संवैधानिक दायरे में काम करने का है।
संघ के घोषित विस्तार पर उठा सवाल
खरगे का पत्र केवल राजनीतिक टिप्पणी पर आधारित नहीं है। उसमें संघ के घोषित विस्तार और सार्वजनिक गतिविधियों को आधार बनाया गया है। संघ स्वयं अपनी गतिविधियों और विस्तार का विवरण अपने वार्षिक प्रतिवेदनों में देता है।
आरएसएस के आधिकारिक वार्षिक प्रतिवेदन 2025-26 में मार्च 2026 तक के संगठनात्मक आंकड़े दिए गए हैं। प्रतिवेदन के अनुसार मार्च 2026 तक 55,683 स्थान, 88,949 शाखाएं, 32,606 मिलन और 13,211 मंडलियां बताई गई हैं। इसमें यह भी लिखा है कि ये आंकड़े 12 मार्च 2026 तक प्राप्त जानकारी पर आधारित हैं।
दूसरी ओर कर्नाटक के गृह मंत्री खरगे के पत्र में राज्य से जुड़े अलग आंकड़े दिए गए हैं। इनमें 4,127 दैनिक शाखाएं, 1,389 साप्ताहिक मिलन, 60 मासिक मंडलियां, 2,194 समाजोत्सव और 562 पथ संचलन बताए गए हैं।
अखिल भारतीय आंकड़े संघ के समग्र विस्तार को दिखाते हैं, जबकि पत्र में दिए गए कर्नाटक के आंकड़े राज्य में उसकी स्थानीय उपस्थिति बताते हैं। दोनों को मिलाकर नहीं पढ़ा जाना चाहिए, लेकिन दोनों मिलकर सवाल की पृष्ठभूमि बनाते हैं।
यह प्रश्न उस संगठन से पूछा गया है, जो स्वयं अपना विस्तार सार्वजनिक करता है। बड़ा होना अपराध नहीं है। लेकिन बड़ा सामाजिक प्रभाव सार्वजनिक स्पष्टता की अपेक्षा बढ़ा देता है। खासकर तब, जब गतिविधियां सार्वजनिक स्थानों, पथ संचलनों, सभाओं और बड़े आयोजनों से जुड़ी हों।
भागवत का जवाब और अनुत्तरित प्रश्न

इस विवाद की समय-रेखा अपने-आप में महत्वपूर्ण है। खरगे के पत्र पर तारीख 13 जून 2026 दर्ज है। खरगे ने अपने एक्स पोस्ट में कहा कि उन्होंने यह पत्र 15 जून को भेजा और उसी दिन सोशल मीडिया पर सार्वजनिक किया। दूसरी ओर विश्व संवाद केंद्र, कर्नाटक के अनुसार मोहन भागवत ने 14 जून 2026 को त्रिशूर में प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान संघ के पंजीकरण से जुड़े सवाल पर जवाब दिया। उस सवाल में कर्नाटक सरकार का संदर्भ था।
यहीं एक अलग दस्तावेजी सवाल खड़ा होता है। यदि पत्र 15 जून को सार्वजनिक हुआ, तो 14 जून के प्रश्नोत्तर सत्र में कर्नाटक सरकार के पंजीकरण संबंधी रुख का संदर्भ कैसे पहुंचा। क्या पत्र या उसके मुख्य बिंदु आधिकारिक पत्राचार के जरिए पहले ही संबंधित पक्षों तक पहुंच गए थे।
क्या यह जानकारी राजनीतिक या मीडिया हलकों में पहले से घूम रही थी। या फिर यह किसी अनौपचारिक पूर्व-साझाकरण का परिणाम था। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड से इसका उत्तर अभी स्पष्ट नहीं है।
इस समय-रेखा के कारण भागवत के बयान की प्रकृति सावधानी से समझनी होगी। इसे संघ के पंजीकरण और गुप्तता के आरोपों पर दिया गया सार्वजनिक उत्तर माना जा सकता है। लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इसे खरगे के पत्र का विधिवत या औपचारिक जवाब नहीं कहा जा सकता।
भागवत के 13 और 14 जून के संबोधनों से संघ की अपनी आत्म-व्याख्या भी सामने आती है। तिरुवनंतपुरम में ‘संघ की 100 वर्षों की यात्रा – नए क्षितिज’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि संघ किसी विशेष परिस्थिति की प्रतिक्रिया नहीं है और समाज के किसी वर्ग का विरोधी भी नहीं है। उनके अनुसार संघ का उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित और मजबूत करना है।
अगले दिन त्रिशूर में शताब्दी संपर्क कार्यक्रम में भागवत ने संघ की भूमिका को राजनीतिक सत्ता और लोकप्रियता से अलग बताया। उन्होंने कहा कि संघ का मूल काम राष्ट्रीय पुनर्जागरण के लिए समाज को संगठित करना, व्यक्तियों का निर्माण करना और समाज को जागरूक बनाना है। यही पृष्ठभूमि पंजीकरण वाले प्रश्नोत्तर में दिए गए उनके जवाब को समझने में मदद करती है।
प्रश्नोत्तर में भागवत ने इसे राजनीति बताया। उन्होंने कहा कि संघ कोई गुप्त संगठन नहीं है और खुले मैदानों में काम करता है। उनका तर्क था कि पंजीकरण उन लोगों को चाहिए, जो सरकार से धन लेना चाहते हैं।
उन्होंने हिंदू धर्म का उदाहरण देते हुए कहा कि कई चीजें पंजीकृत नहीं हैं। उन्होंने पुराने प्रतिबंधों और उनके हटने का हवाला देते हुए कहा कि सरकार संघ के अस्तित्व को जानती है और संघ का लिखित संविधान सरकार के पास है।
लेकिन यही जवाब पत्र के मूल प्रश्नों को पूरा नहीं करता। कर्नाटक सरकार का पत्र संघ के अस्तित्व पर नहीं था। वह उसकी कानूनी स्थिति, वित्तीय पारदर्शिता, पदाधिकारियों, कर अनुपालन और सार्वजनिक कार्यक्रमों की अनुमति व्यवस्था पर था।
इसलिए भागवत का सार्वजनिक उत्तर संघ की आत्म-छवि और पंजीकरण पर उसका रुख तो बताता है, लेकिन पत्र में उठाए गए बिंदुवार दस्तावेजी सवालों का औपचारिक जवाब नहीं बनता।
इसी एक्स पोस्ट में खरगे ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें संघ की सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक या अन्य वैध गतिविधियों से आपत्ति नहीं है।
खरगे का कहना था कि अपेक्षा केवल इतनी है कि संघ अन्य संगठित संस्थाओं की तरह पारदर्शी ढंग से और कानून के ढांचे के भीतर काम करे। इस दावे को राजनीतिक बयानबाजी से अलग, सार्वजनिक जवाबदेही की बहस के हिस्से के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
कानूनी दायरा और प्रक्रिया
इस विवाद में कानून का सवाल केवल पंजीकरण तक सीमित नहीं है। इसमें संगठन बनाने का अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, कर कानून, विदेशी धन और स्थानीय अनुमति व्यवस्था, सभी अलग-अलग क्षेत्र हैं। इन्हें एक ही धारा में समेटकर नहीं पढ़ा जा सकता।
भारत के संविधान में नागरिकों को संगठन बनाने का अधिकार है। इसलिए किसी संगठन का पंजीकृत न होना अपने आप अपराध नहीं माना जा सकता। पहले यह देखना होगा कि उस संगठन पर कोई विशेष कानून पंजीकरण को अनिवार्य बनाता है या नहीं।
यदि कोई संगठन समाज, न्यास या कंपनी के रूप में पंजीकृत है, तो उसके लिए अलग नियम लागू होते हैं। लेकिन यदि कोई संगठन अपंजीकृत समूह के रूप में काम कर रहा है, तो उसकी कानूनी स्थिति अलग तरीके से जांची जाएगी। यही मुख्य प्रश्न है कि संघ स्वयं को किस कानूनी श्रेणी में रखता है।
कर्नाटक सरकार के गृह विभाग का दायरा कानून व्यवस्था, पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा है। इसलिए बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों, पथ संचलनों, सभाओं और अनुमति व्यवस्था पर जानकारी मांगना उसके प्रशासनिक क्षेत्र से जुड़ सकता है।
कर्नाटक पुलिस अधिनियम, 1963 सार्वजनिक व्यवस्था, यातायात, सभाओं, जुलूसों, समारोहों और परेड जैसे आयोजनों के नियमन में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका का कानूनी ढांचा देता है।
इसलिए यदि राज्य सरकार संघ की सार्वजनिक गतिविधियों, पथ-संचलनों या अनुमति व्यवस्था पर प्रशासनिक कार्रवाई करना चाहती थी, तो सामान्यतः मामला सक्षम पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी की विधिवत प्रक्रिया से आगे बढ़ता।
ऐसे संवाद में संबंधित कानून, धारा, तथ्य, जवाब की समयसीमा और अनुपालन का तरीका साफ दर्ज रहता। उपलब्ध पत्र में यह ढांचा दिखाई नहीं देता। इस कारण यह पत्र विधिवत प्रशासनिक कार्रवाई से अधिक सार्वजनिक जवाबदेही का राजनीतिक-आधिकारिक आग्रह प्रतीत होता है।
इससे पत्र में उठाए गए सवाल अपने-आप कमजोर नहीं हो जाते, लेकिन सरकार की प्रक्रिया जरूर जांच के दायरे में आ जाती है। सवाल जितने गंभीर हैं, उन्हें पूछने की प्रशासनिक पद्धति भी उतनी ही स्पष्ट होनी चाहिए।
लेकिन पत्र में धन के स्रोत, कर अनुपालन, संपत्तियों और विदेशी धन जैसे व्यापक प्रश्न भी हैं। कर और विदेशी योगदान जैसे विषय राज्य गृह विभाग के सीधे अधिकार क्षेत्र से बाहर भी जा सकते हैं। इनके लिए संबंधित केंद्रीय कानूनों और प्राधिकरणों की भूमिका अलग से देखनी होगी।
यदि कोई अपंजीकृत संगठन भी विदेशी योगदान लेता है, तो संबंधित केंद्रीय कानून लागू हो सकता है। इसलिए इस विषय पर कोई निष्कर्ष केवल दावों से नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और धन प्रवाह के दस्तावेजों से निकलेगा।
संघ से जुड़े या उसके विचार से प्रेरित कई संगठन अलग-अलग नामों और अलग कानूनी ढांचों में काम कर सकते हैं। इसलिए किसी संस्था के धन, कर अनुपालन या विदेशी योगदान को सीधे संघ से जोड़ने से पहले यह देखना जरूरी होगा कि वह संस्था किस नाम से पंजीकृत है, पैसा किस खाते में आया और उसका हिसाब किस कानून के तहत दिया गया।
धारा न लिखे जाने से सवाल गैरकानूनी नहीं हो जाता। लेकिन जवाब देने की कानूनी बाध्यता तभी साफ होगी, जब सरकार संबंधित कानून, सक्षम अधिकारी और प्रक्रिया बताए।
प्रतिबंधों का इतिहास और मौजूदा सवाल
भागवत ने अपने जवाब में कहा कि सरकार संघ के अस्तित्व को जानती है। इस तर्क को समझने के लिए प्रतिबंधों का इतिहास देखना जरूरी है। स्वतंत्र भारत में संघ पर तीन बार प्रतिबंध लग चुका है।
पहला प्रतिबंध 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगा। दूसरा प्रतिबंध 1975 में आपातकाल के दौरान लगा। तीसरा प्रतिबंध 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद लगाया गया।
तीनों प्रतिबंध बाद में हटे। 1949 में प्रतिबंध हटाने के समय संघ के संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और भारतीय संविधान के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता की बात सरकारी अभिलेखों में दर्ज बताई जाती है। 1993 में न्यायमूर्ति पी के बहरी अधिकरण ने बाबरी विध्वंस के बाद लगे प्रतिबंध को उचित नहीं माना।
यह इतिहास बताता है कि सरकारें संघ के अस्तित्व और गतिविधियों से पहले भी परिचित रही हैं। लेकिन आज का सवाल अलग है। प्रतिबंधों का इतिहास संघ के अस्तित्व को साबित कर सकता है। वह उसकी वर्तमान कानूनी श्रेणी, वित्तीय ढांचे और जवाबदेही व्यवस्था को स्वतः स्पष्ट नहीं करता।
समानता का प्रश्न और संघ का पक्ष
सवाल संघ से पूछना गलत नहीं माना जा सकता। लेकिन लोकतांत्रिक समानता यह भी पूछती है कि क्या यही प्रश्न समान प्रभाव और समान पैमाने वाले अन्य संगठनों से भी पूछे जाते हैं।
अब तक उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में ऐसा कोई स्पष्ट उदाहरण सामने नहीं आता कि कर्नाटक सरकार ने किसी अन्य बड़े धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, गैर सरकारी, छात्र या सांस्कृतिक संगठन से इसी तरह की व्यापक जानकारी मांगी हो। यह निष्कर्ष अंतिम नहीं है। इसके लिए गृह विभाग, पुलिस और संबंधित पंजीयन कार्यालयों के अभिलेखों की पुष्टि जरूरी होगी।
संघ के पक्ष में सार्वजनिक रूप से सामने आए तर्कों में एस. गुरुमूर्ति की एक्स पोस्ट का उल्लेख महत्वपूर्ण है। उन्होंने दावा किया कि संघ का लिखित संविधान सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद है और आयकर कानून के तहत संघ को व्यक्तियों के समूह के रूप में देखा गया है। उन्होंने गुरुदक्षिणा को पारस्परिकता के सिद्धांत से जोड़ते हुए कर संबंधी तर्क भी रखा।
इन दावों की पुष्टि संबंधित कर आदेश, न्यायिक निर्णय और सरकारी रिकॉर्ड से ही हो सकती है। एक्स पर रखी गई दलील दस्तावेज का विकल्प नहीं हो सकती।
जवाबदेही और प्रक्रिया का निष्कर्ष
इस विवाद में सरकार और संघ, दोनों की जवाबदेही साथ-साथ देखी जानी चाहिए। सरकार बड़े सार्वजनिक संगठनों से जवाबदेही से जुड़े सवाल पूछ सकती है, लेकिन उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि वह सवाल किस कानून, किस प्रक्रिया और किस समान नीति के तहत पूछ रही है।
पत्र में पूछे गए प्रश्न अस्तित्व से आगे जाते हैं। वे कानूनी स्थिति, धन के ढांचे, कर अनुपालन और अनुमति व्यवस्था से जुड़े हैं। ऐसे सवालों का जवाब सार्वजनिक धारणा से नहीं, बल्कि दस्तावेजी रिकॉर्ड और विधिवत स्पष्टीकरण से ही स्पष्ट हो सकता है।
इसलिए विवाद का केंद्र यह नहीं है कि संघ मौजूद है या नहीं। केंद्र यह है कि उसके घोषित विस्तार और सार्वजनिक प्रभाव के अनुपात में उसकी जवाबदेही किस रूप में दर्ज है। साथ ही यह भी कि सरकार जवाबदेही की मांग करते समय अपनी प्रक्रिया कितनी साफ रखती है।
17 जून दोपहर तक उपलब्ध प्रमुख रिपोर्टों में संघ की ओर से कोई बिंदुवार औपचारिक लिखित उत्तर सामने नहीं आया है।
संघ का औपचारिक लिखित उत्तर, सरकार का फाइल रिकॉर्ड, जावक विवरण, कानूनी आधार और तुलनात्मक उदाहरण सामने आए बिना तस्वीर अधूरी रहेगी। तब तक यह मामला राजनीति से अधिक दस्तावेजों की मांग करता है।
लोकतंत्र में जवाबदेही केवल सरकार की नहीं होती। बड़े प्रभाव वाले संगठनों की भी होती है। लेकिन जब सरकार ऐसे संगठनों से जवाब मांगती है, तो उसकी अपनी प्रक्रिया भी उतनी ही साफ और समान दिखनी चाहिए। इस विवाद का असली महत्व इसी संतुलन में है।









