
New Delhi | September 27, 2026
दो चुनाव आयुक्तों की कम से कम 14 लिखित आपत्तियाँ सामने आने के बाद आयोग ने ईसीआईनेट की समीक्षा और बैठकों का कार्यवृत्त जारी करने का फैसला किया। लेकिन ऑनलाइन फॉर्म, सॉफ्टवेयर तक पहुँच और अपीलों से जुड़े कदमों को किसने मंजूरी दी, प्रेस नोट इसका जवाब नहीं देता।
द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में चुनाव आयोग के दो सदस्यों की कम से कम 14 लिखित आपत्तियाँ सामने आने के बाद शनिवार, 26 सितंबर को आयोग ने नौ फैसले लिए। वह अब चुनावी सॉफ्टवेयर ईसीआईनेट की समीक्षा कराएगा। इसी सॉफ्टवेयर तक स्थानीय अधिकारियों की पहुँच पर दोनों आयुक्तों ने सवाल उठाए थे।
आयोग ने आगे बैठकों का एजेंडा पहले भेजने और कार्यवृत्त जारी करने का फैसला भी किया है। आयोग का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी एसआईआर, के प्रमुख निर्णय सर्वसम्मति से हुए थे।
इन फैसलों की ठोस परीक्षा गोवा के 97 लोगों का मामला है। अखबार की दस्तावेजी पड़ताल के अनुसार स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने गोवा के इन 97 लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने योग्य पाया था। लेकिन अधिकारियों का यह निर्णय सॉफ्टवेयर में लागू नहीं हो सका और उनके नाम फरवरी में प्रकाशित अंतिम सूची में नहीं आए।
आयोग ने अब बताया है कि इन 97 लोगों में से 81 ने फॉर्म-6 भरा है। इससे पहले गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने कहा था कि कई लोगों के नाम बाद में जुड़ चुके हैं और बाकी मामलों पर काम चल रहा है। कितने नाम जुड़े, शेष लोगों की मौजूदा स्थिति क्या है और ईआरओ के पहले फैसलों के बाद नए आवेदन क्यों लेने पड़े, प्रेस नोट यह नहीं बताता।
दो आयुक्तों ने किन फैसलों पर आपत्ति जताई?
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग दस महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियाँ दर्ज कीं। इनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, नाम हटाना और वापस जोड़ना, सॉफ्टवेयर तक अधिकारियों की पहुँच तथा पश्चिम बंगाल की अपीलें शामिल थीं।
अखबार की रिपोर्ट के अनुसार महत्वपूर्ण आपत्तियों की प्रतियाँ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं। आयोग ने अलग राय को सामान्य आंतरिक विचार-विमर्श बताया है।
आयोग के अनुसार 24 जून 2025 का एसआईआर आदेश और बाद के कार्यक्रम सर्वसम्मति से मंजूर हुए थे। लेकिन मूल एसआईआर आदेश की मंजूरी से यह स्पष्ट नहीं होता कि एसआईआर के दौरान ऑनलाइन फॉर्म, सॉफ्टवेयर और अपीलों से जुड़े अलग-अलग कदमों को किसने मंजूरी दी।
यह सवाल 2023 के कानून की धारा 18 के कारण भी महत्वपूर्ण है। कानून कहता है कि आयोग का काम जहाँ तक संभव हो सर्वसम्मति से होगा। मतभेद होने पर बहुमत की राय लागू होगी।
आयोग अपनी प्रक्रिया और आयुक्तों के बीच काम का बँटवारा सर्वसम्मत निर्णय से ही तय कर सकता है। ऑनलाइन फॉर्म, सॉफ्टवेयर या अपील से जुड़े किसी खास कदम को किस स्तर पर मंजूरी मिली, यह जानने के लिए उस कदम से संबंधित आदेश और मंजूरी का रिकॉर्ड देखना होगा।
गोवा से आठ ईमेल गए, फिर भी फरवरी की अंतिम सूची में 97 नाम नहीं आए
सुप्रीम कोर्ट ने ‘तार्किक विसंगति’ के कारण चिह्नित लोगों को दस्तावेज देने और सुनवाई का अवसर देने का निर्देश दिया था। द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक गोवा के निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों, यानी ईआरओ, ने इसी प्रक्रिया में 97 लोगों के दस्तावेज देखे और उनकी सुनवाई की। अधिकारियों ने उन 97 लोगों को सूची में शामिल करने योग्य पाया।
आयोग का व्यापक डिजिटल सॉफ्टवेयर मंच ईसीआईनेट है। मतदाता सूची का प्रबंधन करने के लिए चुनाव अधिकारी ईआरओनेट सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करते हैं। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार गोवा में स्थानीय अधिकारियों को ईआरओनेट पर पहले दर्ज नाम हटाने के फैसलों को पलटने की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई थी। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने यह सुविधा माँगते हुए 11 से 17 फरवरी 2026 के बीच आठ ईमेल भेजे।
18 फरवरी को आयोग के उप चुनाव आयुक्त ने भी आईटी विभाग से गोवा के ईआरओ के फैसले लागू करने की सुविधा देने को कहा। इसके बावजूद 21 फरवरी को प्रकाशित अंतिम सूची में वे 97 नाम नहीं आए। द इंडियन एक्सप्रेस ने कहा कि 20 सितंबर तक की अपनी जाँच में भी उसे वे नाम सूची में नहीं मिले। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने बाद में कई नाम जुड़ने की बात कही, लेकिन कितने नाम किस तारीख को जुड़े, इसका विवरण नहीं दिया।
ईआरओ की मतदाता सूची में नाम शामिल करने और हटाने की वैधानिक भूमिका है। एसआईआर के 24 जून 2025 के शुरुआती आदेश में भी पात्र नागरिक का नाम न छूटने की जिम्मेदारी ईआरओ को दी गई थी।
आयोग के अनुसार गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने छूटे लोगों से फॉर्म लेने के लिए बूथ स्तर के अधिकारियों को घर-घर जाने का निर्देश दिया है। लेकिन प्रेस नोट यह नहीं बताता कि गोवा के ईआरओ के पहले दिए गए फैसले क्यों लागू नहीं हुए। कितने लोगों के नाम अब मतदाता सूची में हैं, इसकी पुष्टि के लिए संबंधित आदेश, सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड और अद्यतन मतदाता सूची देखनी होगी।
ईसीआईनेट की समीक्षा होगी, फॉर्म-6 के बदलाव की मंजूरी पर जवाब नहीं
अखबार के अनुसार जोशी ने 29 मई को मतदाता डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण पर चिंता जताई थी। उन्होंने जाँच सुझाई कि सूची बदलने की तकनीकी पहुँच केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों को है या नहीं। संधू ने भी राज्य स्तर के अधिकारियों को पूरी पहुँच न मिलने की बात दर्ज की।
आयोग का पक्ष है कि अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारियों के अनुसार ईसीआईनेट तक पहुँच मिलती है। आयोग ने अब वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता में ईसीआईनेट की समीक्षा कराने का फैसला किया है। समिति में आईआईटी या आईआईआईटी का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ होगा।
समिति जाँचेगी कि ईसीआईनेट कानून और नियमों के अनुरूप है या नहीं। प्रेस नोट में यह नहीं बताया गया कि समीक्षा समिति गोवा के पुराने मामलों को भी देखेगी या अपनी रिपोर्ट कब तक देगी।
आयोग ने जरूरत पड़ने पर मैदानी अधिकारियों को अतिरिक्त तकनीकी सुविधा देने का फैसला भी किया है। आगे किसी नए आईटी मॉड्यूल या पोर्टल की पहल पर आयोग की मंजूरी से पहले अधिकारियों की समिति में चर्चा होगी।
नए मतदाताओं के ऑनलाइन फॉर्म-6 में किए गए बदलाव पर भी दोनों आयुक्तों ने आपत्ति की थी। आवेदक से पूछा गया था कि पिछले एसआईआर की सूची में उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम था या नहीं। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इस हिस्से में विकल्प चुने बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ता था।
जोशी ने 16 मई को नियम बदले बिना वैधानिक फॉर्म बदलने पर आपत्ति उठाई। संधू ने जोशी की आपत्ति से सहमति जताई। इसके बाद 13 अगस्त को संधू ने ऑनलाइन बदलाव को अनधिकृत तथा गैरकानूनी बताते हुए उसे हटाने को कहा।
आयोग का कहना है कि एसआईआर के लिए फॉर्म-6 के साथ लगी घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया है। आयोग ने यह भी तय किया है कि एसआईआर के बाहर 1960 के नियमों वाले फॉर्म इस्तेमाल होंगे। लेकिन प्रेस नोट यह अलग से नहीं बताता कि ऑनलाइन आवेदन में विवादित सवाल जोड़ने का आदेश किसने दिया, उसे किसने मंजूरी दी और वह सवाल अभी आवेदन में मौजूद है या नहीं।
बंगाल की अपीलों को किसने मंजूरी दी? आयोग ने बैठकों का रिकॉर्ड जारी करने का फैसला किया
पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों द्वारा सूची में शामिल किए गए लोगों के खिलाफ अपीलों पर संधू ने सवाल उठाया था। उनका सवाल था कि आयोग की ओर से अपील करने की अनुमति किसने दी और ऐसी अपीलें किसने दाखिल कीं।
अखबार ने ऐसे 16.10 लाख अपील मामलों का उल्लेख किया है। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी अपीलें आयोग ने दाखिल की थीं। प्रेस नोट अपील करने वाले पक्षों और आयोग की ओर से मिली अनुमति का विवरण नहीं देता।
आयोग ने अब बैठकों का एजेंडा पहले भेजने और कार्यवृत्त जारी करने का फैसला किया है। दोनों आयुक्त पहले आयोग के नाम से जरूरी मंजूरी के बिना संचार जारी होने पर आपत्ति उठा चुके थे।
दोनों आयुक्तों ने कार्य बँटवारे के एक आदेश पर कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखे थे। अखबार के अनुसार उन्हें आईटी व्यवस्था पर निगरानी घटने की चिंता थी। आयोग का कहना है कि पत्र प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी के कामकाज से संबंधित थे, आयोग की नीति या आईटी विभाग से नहीं। आयोग के अनुसार कार्य बँटवारे का आदेश लागू नहीं हुआ और आईटी विभाग पर उप चुनाव आयुक्त की निगरानी कभी वास्तव में नहीं हटी।
नोटिस पाने वालों के दस्तावेज घर से लिए जाएंगे
जारी एसआईआर में पुरानी मतदाता सूची से विवरण का मिलान न होने या तार्किक विसंगति के कारण नोटिस पाने वालों के घर बूथ स्तर के अधिकारी जाएंगे। अधिकारी दस्तावेज लेकर उन दस्तावेजों को ईसीआईनेट पर अपलोड करेंगे। ईआरओ निर्णय करेगा। सामान्यतः लोगों को सुनवाई के लिए कार्यालय नहीं बुलाया जाएगा।
ईआरओ को असाधारण परिस्थिति में सुनवाई जरूरी लगे तो उसे प्राथमिकता से ऑनलाइन किया जाएगा। मतदाता अपनी ओर से परिवार के किसी वयस्क सदस्य को उपस्थित होने की अनुमति दे सकेगा। आयोग ने श्रमिकों, गरीबों, बेघर लोगों और रैन बसेरों में रहने वालों के लिए सहायता शिविर लगाने का भी फैसला किया है।
दिल्ली में दावे और आपत्तियाँ दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर है। नोटिसों, दावों और आपत्तियों के निस्तारण की तारीख 30 नवंबर 2026 है। महाराष्ट्र में दावे और आपत्तियाँ दाखिल करने की अंतिम तारीख 12 अक्टूबर तथा नोटिसों, दावों और आपत्तियों के निस्तारण की तारीख 10 नवंबर 2026 है।
एसआईआर पूरा हो चुके 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सूची से छूटे लोगों तथा नए मतदाताओं के लिए विशेष नामांकन अभियान चलेगा। आयोग के बाकी फैसले अधिकारियों की वार्षिक कार्य मूल्यांकन रिपोर्ट हर साल 31 दिसंबर तक पूरी करने, उनकी विदेश यात्राओं के लिए मंजूरी लेने और आयुक्तों के निर्देशों का पालन कराने से जुड़े हैं।
आयोग ने आगे के लिए उपाय घोषित किए हैं। गोवा के इन 97 लोगों में से कितनों के नाम अब मतदाता सूची में हैं और ईआरओ के पहले फैसले क्यों लागू नहीं हुए, इसका पुष्ट रिकॉर्ड सामने आना बाकी है। विवादित कदमों को किसने मंजूरी दी, यह स्पष्ट होने पर आयोग के जवाब की पूरी जाँच हो सकेगी।









