Responsive Menu

Download App from

Download App

Follow us on

Donate Us

दिल्ली पुलिस ने घेरा जंतर-मंतर, हजारों को हिरासत में लिया: पत्रकार और वकील भी रोके गए, जवाबदेही पर सवाल

जंतर-मंतर के आसपास पुलिस बैरिकेड और बड़ी संख्या में तैनात सुरक्षाकर्मी। सामने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत लागू निषेधात्मक आदेश की सूचना वाला बोर्ड दिखाई दे रहा है।
Author Image
Written by
—खुली किताब | रिसर्च टीम

New Delhi | October 11, 2026

पैनी दृष्टि

10 अक्टूबर को जंतर-मंतर की घेराबंदी के बाद दिल्ली में कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए। हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया, लेकिन कुल संख्या पर पुलिस के हवाले से अलग-अलग आँकड़े सामने आए। पत्रकारों के फोन छीने जाने, वकीलों के साथ कथित बल प्रयोग और आम नागरिकों को रोके जाने की शिकायतें आईं। रविवार को सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिका में प्रथम दृष्टया मामला पाया, अधिकारियों को नोटिस जारी किया और नागरिक अधिकारों से जुड़े अंतरिम निर्देश दिए।

शनिवार, 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था लागू की। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी निर्धारित स्थल तक नहीं पहुँच सके, लेकिन विरोध दिल्ली के दूसरे इलाकों में फैल गया। दिनभर हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया। इनमें छात्र, राजनीतिक कार्यकर्ता, वकील और प्रदर्शन की कवरेज कर रहे पत्रकार भी शामिल थे। कुछ ऐसे नागरिकों ने भी हिरासत में लिए जाने की शिकायत की, जिनका कहना था कि वे प्रदर्शन में शामिल होने नहीं आए थे।

इस कार्रवाई के बाद सवाल केवल यह नहीं है कि प्रदर्शन की अनुमति क्यों नहीं दी गई। अब यह भी देखना होगा कि लोगों को किस कानूनी आधार पर हिरासत में लिया गया, उन्हें कहाँ रखा गया, कब छोड़ा गया और किस अधिकारी के आदेश पर कार्रवाई हुई। पत्रकारों के रिपोर्टिंग उपकरण अपने कब्जे में लेने तथा वकीलों के साथ कथित बल प्रयोग ने इन प्रश्नों को और गंभीर बना दिया है।

‘खुली किताब’ ने 9 अक्टूबर की अपनी विस्तृत रिपोर्ट में प्रदर्शन से पहले लगाए गए प्रतिबंधों, रेल और मेट्रो सेवाओं पर नियंत्रण, मोबाइल इंटरनेट निलंबन तथा सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की पड़ताल की थी। अगले दिन सामने आई घटनाएँ बताती हैं कि प्रशासनिक निर्णयों का असर केवल प्रदर्शनकारियों तक सीमित नहीं रहा। आवाजाही, परिवहन और संचार संबंधी प्रतिबंधों से दूसरे नागरिकों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

इस बीच रविवार, 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने दिल्ली में हुई कार्रवाई से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई की। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मेट्रो और रेल सेवाओं का सामान्य संचालन बनाए रखने, लोगों की आवाजाही पर अनावश्यक प्रतिबंधों की समीक्षा करने तथा कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के बिना किसी को हिरासत में नहीं लेने के निर्देश दिए। अदालत ने 9 अक्टूबर के आदेश की कथित अवहेलना को लेकर अधिकारियों से जवाब भी माँगा। हालाँकि, अवमानना का आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है।

जंतर-मंतर की घेराबंदी, दिल्ली के दूसरे इलाकों में प्रदर्शन

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और सहयोगी संगठनों ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की घोषणा की थी। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा उनकी प्रमुख माँग थी। दिल्ली पुलिस ने सार्वजनिक सुरक्षा, पूर्व प्रदर्शनों में शर्तों के कथित उल्लंघन और आवेदन संबंधी नियमों का हवाला देकर अनुमति नहीं दी।

शनिवार सुबह जंतर-मंतर के आसपास कई स्तरों पर अवरोधक लगाए गए थे। बड़ी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात थे। प्रदर्शनकारियों को वहाँ पहुँचने से रोका गया। दोपहर होते-होते दिल्ली हाट, आईएनए, सफदरजंग फ्लाईओवर, कनॉट प्लेस, राजघाट और दूसरे स्थानों पर छोटे समूहों ने विरोध शुरू कर दिया।

इंडियन एक्सप्रेस की जमीनी रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारी अलग-अलग स्थानों पर एकत्र हुए, नारे लगाए और कुछ समय बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा सहित अनेक लोगों को रोके जाने की खबरें सामने आईं।

इस घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्न दिखाई देता है। बड़ी भीड़ को नियंत्रित करने के उद्देश्य से जंतर-मंतर तक पहुँच सीमित की गई, लेकिन इसके बाद विरोध दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर फैल गया। क्या उचित शर्तों और निगरानी के अंतर्गत किसी निर्धारित स्थल पर शांतिपूर्ण सभा की व्यवस्था सार्वजनिक व्यवस्था के लिए अधिक व्यावहारिक विकल्प हो सकती थी?

शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सवाल यह है कि प्रशासन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखता है।

हजारों लोगों की हिरासत पर अलग-अलग आँकड़े, पुलिस के बयानों में भी अंतर

10 अक्टूबर को दिल्ली में हिरासत में लिए गए लोगों की कुल संख्या को लेकर समाचार संस्थानों ने अलग-अलग आँकड़े प्रकाशित किए। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के हवाले से दो हजार से अधिक लोगों की हिरासत की सूचना दी थी। दिन आगे बढ़ने के साथ संख्या बढ़ने की खबरें सामने आईं।

11 अक्टूबर की सुबह इंडियन एक्सप्रेस ने पुलिस अधिकारियों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट में लगभग सात हजार लोगों को हिरासत में लिए जाने का उल्लेख किया। दूसरी ओर, सीजेपी ने पंद्रह हजार से अधिक लोगों के हिरासत में लिए जाने या पुलिस कार्रवाई से प्रभावित होने का दावा किया। संगठन के इस बड़े आँकड़े की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

हालाँकि, रॉयटर्स की 11 अक्टूबर की ताजा रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता ने शनिवार को 2,400 लोगों को हिरासत में लेने की जानकारी दी। पुलिस अधिकारियों के हवाले से प्रकाशित लगभग सात हजार के आँकड़े और प्रवक्ता द्वारा बताई गई संख्या में बड़ा अंतर है। दोनों आँकड़ों में किन लोगों और किन कार्रवाइयों को शामिल किया गया, यह स्पष्ट नहीं है।

आँकड़ों के इस अंतर के बीच सवाल है कि दिल्ली पुलिस का अंतिम हिसाब क्या है। कितने लोगों को निवारक कार्रवाई के तहत हिरासत में लिया गया? कितनों को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया? कितने लोग रिहा हुए और कितनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी है?

यह केवल संख्या का विवाद नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति की हिरासत की अवधि, उसका कानूनी आधार, संबंधित पुलिस अधिकारी और रिहाई की प्रक्रिया दर्ज होना जवाबदेही का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

रविवार की विशेष सुनवाई में वरिष्ठ एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने लगभग सात हजार लोगों को गैरकानूनी रूप से हिरासत में लिए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका केवल उसमें नामित कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक हिरासत के आरोपों से संबंधित है। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अवैध हिरासत के आरोप से इनकार किया। उन्होंने कहा कि याचिका में जिन लोगों की हिरासत का उल्लेख है, वे रिहा हो चुके हैं। इस आधार पर उन्होंने याचिका का उद्देश्य समाप्त हो जाने का तर्क दिया।

ऐसे में हिरासत में लिए गए और छोड़े गए व्यक्तियों का अंतिम समेकित रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाता है। सात हजार की संख्या को अदालत द्वारा प्रमाणित अंतिम आँकड़ा नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार सरकार का यह कहना कि याचिका में उल्लिखित लोग रिहा हो चुके हैं, दिल्ली में हिरासत में लिए गए सभी लोगों की रिहाई की पुष्टि नहीं है।

विमान में रोके गए सीजेपी नेता, निवारक गिरफ्तारी के बाद रिहाई

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और उनके सहयोगियों सौरव दास तथा आशुतोष रांका को 10 अक्टूबर की सुबह मुंबई से दिल्ली पहुँचने पर विमान के भीतर ही पुलिस ने रोक लिया। इस कार्रवाई का वीडियो सामने आया। उसमें दीपके गिरफ्तारी देने की बात कहते हैं, जबकि एक अधिकारी इसे गिरफ्तारी नहीं बताते हुए सहयोग करने को कहता सुनाई देता है।

11 अक्टूबर की सुबह दिल्ली पुलिस अधिकारियों के हवाले से प्रकाशित जानकारी के अनुसार, तीनों के विरुद्ध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धाराओं 126 और 170 के अंतर्गत निवारक कार्रवाई की गई थी। धारा 126 शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र की प्रक्रिया से संबंधित है, जबकि धारा 170 संभावित संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए निर्धारित परिस्थितियों में निवारक गिरफ्तारी की शक्ति देती है।

पुलिस के अनुसार, तीनों को अलग-अलग थानों में रखा गया था और कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने की प्रक्रिया निर्धारित थी।

रविवार सुबह एक नया घटनाक्रम सामने आया। अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली कैंट पुलिस थाने में विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया। द न्यूज़ मिनट के अनुसार, मजिस्ट्रेट ने तीनों की रिहाई का आदेश दिया। सीजेपी के विधि मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने भी उनकी रिहाई की पुष्टि की।

दिल्ली पुलिस के अनुसार, तीनों नेताओं की रिहाई के लिए 50 हजार रुपये का जमानती बंधपत्र भरवाया गया। उन्हें एक वर्ष तक शांति और अच्छा आचरण बनाए रखने की शर्त पर छोड़ा गया। हालाँकि, अभिजीत दीपके ने कहा कि उन्होंने प्रदर्शन नहीं करने की कोई शर्त स्वीकार नहीं की है। शर्त का सटीक कानूनी दायरा विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के लिखित आदेश से स्पष्ट होगा।

इस मामले में कार्रवाई की समयरेखा विशेष महत्व रखती है। शनिवार सुबह विमान में रोकने को गिरफ्तारी नहीं बताया गया था, जबकि रविवार सुबह निवारक गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई। तीनों को पुलिस नियंत्रण में लेने का सटीक समय क्या था? गिरफ्तारी कब दर्ज हुई? और हिरासत शुरू होने से मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी तक किन वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया गया?

इन सवालों के जवाब पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड और मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई कार्यवाही के दस्तावेजों से मिल सकते हैं।

ध्रुव राठी शनिवार रात रिहा, हिरासत का लिखित आधार क्या था?

यूट्यूबर ध्रुव राठी को भी 10 अक्टूबर की सुबह गुरुग्राम के सेक्टर-56 स्थित आवास से हिरासत में लिया गया था। पुलिस सूत्रों के अनुसार, अपराध शाखा की तीन टीमों ने सुबह लगभग छह बजे कार्रवाई की थी।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, राठी को अपराध शाखा के कार्यालय ले जाया गया और उनसे लगभग एक घंटे तक पूछताछ की गई। एक पुलिस अधिकारी ने रविवार को बताया कि उन्हें शनिवार रात हिरासत से छोड़ दिया गया था।

हालाँकि, उपलब्ध समाचार रिपोर्टों में पुलिस की ओर से राठी को हिरासत में लेने का विस्तृत लिखित आधार और रिहाई की प्रक्रिया का आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है।

राठी के मामले में हिरासत की पुष्टि को औपचारिक गिरफ्तारी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए रोकना, निवारक कार्रवाई के अंतर्गत हिरासत में लेना और विधिवत गिरफ्तार करना अलग-अलग कानूनी स्थितियाँ हैं।

ज्यां द्रेज और साथी हिरासत में, राहगीरों को भी रोके जाने के आरोप

10 अक्टूबर की पुलिस कार्रवाई में दो अलग तरह के मामले सामने आए। एक ओर प्रदर्शन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने पहुँचे लोगों को हिरासत में लिया गया, तो दूसरी ओर कुछ ऐसे नागरिकों ने भी हिरासत में लिए जाने की शिकायत की, जिनका कहना था कि वे अपने निजी काम से निकले थे और प्रदर्शन में शामिल होने नहीं आए थे।

अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज को जंतर-मंतर के निकट केरल हाउस के पास हिरासत में लिया गया। उनके साथ फिल्मकार अबान रजा, शोधकर्ता परान अमितावा और शोधकर्ता एवं कलाकार अंजलि एस. भी मौजूद थे। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ये लोग प्रस्तावित प्रदर्शन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते थे। द्रेज ने बताया कि वे पोस्टर लेकर खड़े थे और पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे, तभी पुलिस बिना कोई कारण बताए उन्हें हिरासत में ले गई।

इसी रिपोर्ट में बिहार के शाहिद हुसैन, हापुड़ के गुलफाम और दिल्ली के सौरभ के बयान भी दर्ज हैं। शाहिद ने बताया कि वे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर भोजन तलाश रहे थे। गुलफाम के अनुसार, वे गुरुद्वारा बंगला साहिब में सेवा करने जा रहे थे, जबकि सौरभ का कहना था कि वे एक मित्र से मिलकर रेलवे स्टेशन पहुँचने की कोशिश कर रहे थे। तीनों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें रोककर बसों में बैठा लिया।

इन घटनाओं में एक महत्वपूर्ण अंतर है। ज्यां द्रेज और उनके साथी प्रदर्शन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आए थे, जबकि दूसरे नागरिकों ने प्रदर्शन से कोई संबंध नहीं होने का दावा किया। हालाँकि, इन नागरिकों को हिरासत में लिए जाने की परिस्थितियों और उसके कानूनी आधार पर पुलिस का विस्तृत आधिकारिक विवरण अभी सामने नहीं आया है।

ऐसे में सवाल उठता है कि पुलिस ने संबंधित व्यक्तियों को हिरासत में लेने से पहले उनके वहाँ मौजूद होने की परिस्थितियों की क्या जाँच की थी? प्रत्येक व्यक्ति को रोकने का कानूनी आधार क्या था और क्या उनकी हिरासत का अलग-अलग रिकॉर्ड तैयार किया गया?

स्टेडियम बने हिरासत केंद्र, पानी और परिजनों से संपर्क की शिकायतें

दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के मद्देनजर विभिन्न जिलों में अस्थायी हिरासत केंद्र बनाए थे। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, छत्रसाल स्टेडियम और बवाना के राजीव गांधी स्टेडियम में बड़ी संख्या में लोगों को बसों से लाया गया। इनमें छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और दूसरे नागरिक शामिल थे।

हिरासत केंद्रों पर प्रकाशित रिपोर्ट में कुछ लोगों ने पानी और भोजन की व्यवस्था को लेकर शिकायत की। परिजनों को हिरासत में रखे गए लोगों की स्थिति जानने और उनसे संपर्क करने में कठिनाई होने के मामले भी सामने आए।

इन शिकायतों पर संबंधित हिरासत केंद्रों के प्रशासन का पक्ष अभी स्पष्ट नहीं है। अस्थायी हिरासत केंद्र बनाए जाने से वहाँ रखे गए व्यक्तियों के प्रति पुलिस और प्रशासन की कानूनी जिम्मेदारियाँ समाप्त नहीं होतीं।

सवाल यह है कि क्या प्रत्येक व्यक्ति का नाम, हिरासत का समय, कानूनी आधार, स्वास्थ्य संबंधी जरूरत, परिजनों को सूचना, कानूनी सहायता तथा रिहाई का विवरण विधिवत दर्ज किया गया था?

अस्थायी हिरासत केंद्रों के आसपास भी मोबाइल इंटरनेट बंद

10 अक्टूबर की कार्रवाई में मोबाइल इंटरनेट पर प्रतिबंध का एक अतिरिक्त पहलू सामने आया है।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, जंतर-मंतर और मध्य दिल्ली के प्रतिबंधित इलाकों के अलावा कम से कम आठ अन्य स्थानों पर भी मोबाइल इंटरनेट निलंबित करने की स्वीकृति दी गई थी। ये स्थान प्रदर्शनकारियों के लिए बनाए गए अस्थायी हिरासत केंद्रों के आसपास स्थित थे।

रिपोर्ट में देखे गए सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन द्वारा स्वीकृत आदेश के तहत इन स्थानों के लगभग 500 मीटर के दायरे में 10 अक्टूबर को दोपहर बारह बजे से रात दस बजे तक मोबाइल इंटरनेट निलंबित किया गया।

यह जानकारी विशेष महत्व रखती है। यदि हिरासत में रखे गए लोगों के आसपास मोबाइल इंटरनेट बंद था, तो उसका प्रभाव केवल प्रदर्शन के समन्वय तक सीमित नहीं रहा होगा। परिजनों, वकीलों और पत्रकारों के साथ संपर्क भी प्रभावित हो सकता था। हालाँकि, प्रत्येक हिरासत केंद्र में मोबाइल इंटरनेट पर प्रतिबंध का वास्तविक असर कितना पड़ा, इसका केंद्रवार विवरण अभी सामने नहीं आया है।

प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि इन आठ स्थानों को प्रतिबंध के लिए किन कारणों से चुना गया, उनकी आवश्यकता का आकलन कैसे हुआ और क्या कम प्रतिबंधात्मक उपाय उपलब्ध थे।

रिपोर्टिंग करते पत्रकार हिरासत में, रॉयटर्स का पत्रकार भी प्रभावित

10 अक्टूबर की पुलिस कार्रवाई में पत्रकारों को हिरासत में लेने के अनेक मामले सामने आए।

न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के अनुसार, उसके पत्रकार अश्वनी कुमार सिंह, आस्था सव्यसाची और अनमोल प्रितम के साथ प्रशिक्षु पत्रकार अंशु को हिरासत में लिया गया। समाचार संस्थान के मुताबिक, पुलिस ने रिपोर्टिंग के लिए इस्तेमाल किए जा रहे उसके तीन मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिए। पत्रकारों के साथ कथित तौर पर धक्का-मुक्की भी की गई।

न्यूज़लॉन्ड्री ने अपने पत्रकारों के हवाले से इंस्पेक्टर धन सिंह मलिक की पहचान उस अधिकारी के रूप में की, जिसने कथित तौर पर फोन छीने। संस्थान के अनुसार, चारों सहयोगियों को बाद में छोड़ दिया गया। संबंधित अधिकारी का इस आरोप पर जवाब प्रकाशित रिपोर्ट में दर्ज नहीं है।

छत्रसाल स्टेडियम के अस्थायी हिरासत केंद्र में भी पत्रकारों को ले जाया गया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शन की खबर जुटा रहे लगभग 15 पत्रकारों को वहाँ लाया गया। पुलिस सूत्रों ने बताया कि इन पत्रकारों को बाद में छोड़ दिया गया।

स्क्रॉल ने अपने पत्रकार आयुष तिवारी, शोएब दानियाल और दिव्या असलेशा की हिरासत की जानकारी प्रकाशित की है। नवभारत टाइम्स और द क्विंट के पत्रकारों को भी पुलिस द्वारा रोके जाने की खबरें सामने आई हैं।

अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में स्वयं पुष्टि की कि उसका एक पत्रकार भी कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया था और बाद में छोड़ दिया गया। एजेंसी ने संबंधित पत्रकार का नाम या हिरासत का कानूनी आधार प्रकाशित नहीं किया।

इन घटनाओं में समाचार संकलन और प्रदर्शन में भागीदारी के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। पत्रकारों को भी वैध सुरक्षा नियमों का पालन करना होता है। लेकिन केवल प्रदर्शन की कवरेज करने के कारण उन्हें प्रदर्शनकारी मानकर कार्रवाई करना उचित नहीं होगा।

इस दौरान कुछ पत्रकारों से सरकारी मान्यता या पीआईबी कार्ड पूछे जाने की शिकायतें भी सामने आईं। सरकारी मान्यता कुछ विशेष सुविधाओं और नियंत्रित स्थानों तक पहुँच से संबंधित हो सकती है, लेकिन पत्रकारिता करने की वैधता का एकमात्र आधार नहीं है।

सवाल है कि जिन पत्रकारों को हिरासत में लिया गया, उनके प्रेस पहचान-पत्रों का सत्यापन किया गया था या नहीं? जिन पत्रकारों के मोबाइल फोन पुलिस ने अपने कब्जे में लिए, उसका कानूनी आधार क्या था? क्या फोन जब्त करने का लिखित दस्तावेज तैयार किया गया था? और क्या संबंधित पत्रकारों को उनके मोबाइल फोन वापस कर दिए गए?

11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई में पत्रकारों के काम में बाधा डालने का मुद्दा भी उठा। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वासन दिया कि पत्रकारों, वकीलों और अन्य पेशेवरों को अपना काम करने से नहीं रोका जाएगा।

हालाँकि, सरकार का यह आश्वासन 10 अक्टूबर को पत्रकारों के मोबाइल फोन अपने कब्जे में लेने और उन्हें हिरासत में रखने के आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं है। इन घटनाओं के कानूनी आधार और संबंधित पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।

पुलिसकर्मियों की पहचान और हिरासत की जवाबदेही

जंतर-मंतर पर तैनात कुछ पुलिसकर्मियों की वर्दी पर नेम प्लेट नहीं लगी होने का मुद्दा पहले भी सामने आ चुका है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर निशाना बनाए जाने और पुलिसकर्मियों तथा उनके परिवारों की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को इसका कारण बताया था।

गिरफ्तारी और हिरासत की कार्रवाई में पुलिसकर्मियों की पहचान का कानूनी महत्व भी है। सुप्रीम कोर्ट ने डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में गिरफ्तारी और पूछताछ से जुड़े पुलिस अधिकारियों की पहचान स्पष्ट रखने तथा गिरफ्तारी से संबंधित लिखित रिकॉर्ड तैयार करने के निर्देश दिए थे।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब किसी हिरासत या कथित बल प्रयोग में शामिल पुलिसकर्मी की पहचान वर्दी से स्पष्ट नहीं हो, तब संबंधित नागरिक शिकायत करते समय उसे कैसे पहचान सकेगा?

क्या 10 अक्टूबर को हिरासत की कार्रवाइयों में शामिल अधिकारियों के नाम, पद और ड्यूटी संबंधी विवरण विधिवत दर्ज किए गए थे? यदि पहचान संबंधी सामान्य व्यवस्था में कोई अपवाद लागू किया गया था, तो उसका प्राधिकार और लिखित आधार क्या था?

वकीलों की हिरासत पर दो प्रमुख बार एसोसिएशनों ने उठाए सवाल

पत्रकारों के साथ वकीलों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई के मामले भी सामने आए।

वरिष्ठ एडवोकेट शादान फरासत ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उनकी कमीज फाड़ दी और उन्हें चलती बस में धकेला। दूसरे वकीलों ने भी जबरन वाहनों में बैठाए जाने तथा कथित अत्यधिक बल प्रयोग की शिकायत की।

दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने 10 अक्टूबर को प्रस्ताव पारित कर वकीलों को हिरासत में लिए जाने और पुलिस के कथित अत्यधिक बल प्रयोग की निंदा की। एसोसिएशन ने विशेष रूप से महिला वकीलों के साथ हुए कथित व्यवहार पर भी चिंता जताई। कुछ वकीलों ने संविधान की प्रस्तावना की प्रतियाँ फाड़े जाने का आरोप भी लगाया।

इसी दिन सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से तत्काल हस्तक्षेप का अनुरोध किया। एसोसिएशन ने हिरासत में लिए गए वकीलों को कहाँ रखा गया है, इसकी जानकारी देने, उनकी सुरक्षा और कानूनी सहायता सुनिश्चित करने तथा बिना वैध कानूनी आधार के हिरासत में रखे गए वकीलों को रिहा करने की माँग की।

इन संस्थागत प्रतिक्रियाओं से मामला व्यक्तिगत शिकायतों तक सीमित नहीं रहा। दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की बार एसोसिएशनों ने पुलिस कार्रवाई की जरूरत, कानूनी आधार और अनुपातिकता पर सवाल उठाए हैं।

वकील होना किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं रखता। उसी तरह, वकील होने के कारण हिरासत से जुड़े उसके कानूनी अधिकार भी कम नहीं होते। वकीलों के साथ कथित दुर्व्यवहार और उन्हें हिरासत में लिए जाने की परिस्थितियों पर सवाल बने हुए हैं। इन विशिष्ट आरोपों पर संबंधित पुलिस अधिकारियों का विस्तृत पक्ष अभी सामने नहीं आया है।

रविवार को सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई में वरिष्ठ एडवोकेट शादान फरासत ने अपने साथ हुई कथित पुलिस कार्रवाई का विवरण पीठ के सामने रखा। अन्य वकीलों ने भी अपने सहयोगियों को हिरासत में लिए जाने, पुलिसकर्मियों के पहचान-पट्ट और अदालत तक पहुँचने में आई बाधाओं के मुद्दे उठाए।

गुरुद्वारा बंगला साहिब में पहुँचे प्रदर्शनकारी, प्रबंधन से बाहर भेजने को कहने का दावा

10 अक्टूबर की कार्रवाई के बीच अनेक प्रदर्शनकारी गुरुद्वारा बंगला साहिब पहुँचे। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी परिसर में रुके हुए थे। गुरुद्वारा प्रबंधन के एक कर्मचारी ने बताया कि पुलिस ने प्रबंधन से उन्हें बाहर भेजने को कहा, लेकिन प्रबंधन ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

इसके बाद 11 अक्टूबर को दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इस घटना को लेकर पुलिस से शिकायत की। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, कमेटी ने आम आदमी पार्टी से जुड़े कुछ लोगों पर गुरुद्वारे के भीतर राजनीतिक नारे लगाने और धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। कमेटी ने वीडियो के आधार पर संबंधित व्यक्तियों की पहचान और कार्रवाई की माँग की।

गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने कहा कि पुलिसकर्मी परिसर के एक रास्ते से गुजरे थे, लेकिन दरबार हॉल में नहीं गए। उन्होंने पुलिसकर्मियों के वर्दी में प्रवेश पर भी आपत्ति जताई। नई दिल्ली के पुलिस उपायुक्त सचिन शर्मा ने कहा कि पुलिसकर्मियों ने श्रद्धालुओं के लिए बने साझा रास्ते का इस्तेमाल किया था। ऐसे में सवाल बना हुआ है कि परिसर के बाहर लोगों को हिरासत में लेने की कार्रवाई किन कानूनी आदेशों के तहत हुई।

लाठीचार्ज के वीडियो, पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबर

10 अक्टूबर को पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनावपूर्ण घटनाओं के अनेक वीडियो सामने आए। कुछ वीडियो में पुलिसकर्मी भीड़ पर लाठीचार्ज करते दिखाई दिए।

इन दृश्यों में पुलिस द्वारा बल प्रयोग दिखाई देता है। हालाँकि, कितने लोग घायल हुए, उन्हें किस प्रकार की चोटें आईं और पुलिस ने किन परिस्थितियों में लाठीचार्ज किया, यह केवल इन वीडियो से स्पष्ट नहीं होता।

अलग-अलग समाचार संस्थानों ने कुछ स्थानों पर लाठीचार्ज और धक्का-मुक्की की खबरें प्रकाशित कीं। दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस ने झंडेवालान के निकट हिरासत में लिए गए लोगों से भरी बस पर पत्थर फेंके जाने की घटना की जानकारी दी। पहले पुलिस के छह कर्मचारी घायल होने की खबर आई थी। बाद में पुलिस के हवाले से 15 से अधिक पुलिसकर्मियों के घायल होने की जानकारी सामने आई। घायलों में दक्षिण दिल्ली के पुलिस उपायुक्त अनंत मित्तल भी शामिल बताए गए।

इस बीच 10 अक्टूबर की मारपीट से जुड़े एक अलग वीडियो के मामले में दिल्ली पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार किया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, डीडीयू मार्ग पर छात्रों और महिलाओं के साथ कथित मारपीट के मामले में यह कार्रवाई हुई। पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार व्यक्तियों ने स्वयं को हिंदू रक्षा दल से संबंधित बताया। इस घटना में आरोपियों की भूमिका की जाँच जारी है।

इन घटनाओं की जाँच में मूल वीडियो, सीसीटीवी फुटेज, उपलब्ध होने पर पुलिसकर्मियों के बॉडी कैमरों की रिकॉर्डिंग, घायलों की मेडिकल रिपोर्ट और पुलिस कार्रवाई से संबंधित आदेश महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

सवाल यह है कि लाठीचार्ज से पहले परिस्थितियाँ क्या थीं? बल प्रयोग का आदेश किस अधिकारी ने दिया? क्या प्रदर्शनकारियों को चेतावनी दी गई थी? और क्या कम बल प्रयोग करके स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता था?

इसी तरह, पुलिसकर्मियों के घायल होने और पत्थरबाजी के आरोपों की वास्तविक स्थिति भी संबंधित वीडियो, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट हो सकती है।

जुलाई के प्रदर्शनों की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई थी समिति

जंतर-मंतर पर पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही का प्रश्न पहली बार सामने नहीं आया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2026 में जुलाई के छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों की कथित हिंसा की जाँच के लिए पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय उच्चस्तरीय जाँच समिति गठित की थी।

जाँच समिति के कार्यक्षेत्र में पुलिस तथा सुरक्षा बलों द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग, प्रदर्शनकारियों की ओर से हिंसा, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के आरोप और संबंधित रिकॉर्ड का परीक्षण शामिल है।

समिति को कैमरा रिकॉर्डिंग तथा अन्य साक्ष्यों की जाँच करने का अधिकार दिया गया। न्यायालय ने समिति से प्रारंभिक निष्कर्षों की रिपोर्ट यथाशीघ्र देने की अपेक्षा भी की थी।

हालाँकि, इस समिति का गठन जुलाई 2026 की घटनाओं की जाँच के लिए किया गया था। इसके कार्यक्षेत्र में 10 अक्टूबर की पुलिस कार्रवाई शामिल नहीं है। इससे पहले हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की भूमिका न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ चुकी है।

10 अक्टूबर की कार्रवाई से जुड़े मूल वीडियो, ड्यूटी रजिस्टर, पुलिस नियंत्रण कक्ष के संदेश और जब्ती दस्तावेज भविष्य में किसी न्यायिक या स्वतंत्र जाँच के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं।

प्रदर्शन से पहले निगरानी की योजना, राज्यों तक पहुँचे निर्देश

10 अक्टूबर से पहले प्रदर्शनकारियों की संभावित यात्रा और गतिविधियों की निगरानी को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई थी।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने सूत्रों के हवाले से बताया कि 4 अक्टूबर को केंद्रीय गृह मंत्रालय की बैठक में कुछ राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और पुलिस आयुक्तों को संभावित प्रदर्शनकारियों की पहचान, उनकी गतिविधियों पर निगरानी, वित्तीय स्रोतों की जाँच और आवश्यकता के अनुसार निवारक कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।

रिपोर्ट के अनुसार, 8 अक्टूबर को तैयारियों की समीक्षा के लिए दूसरी बैठक हुई। महाराष्ट्र सहित कुछ राज्यों में संभावित प्रदर्शनकारियों को नोटिस दिए जाने की जानकारी भी सामने आई। गृह मंत्रालय ने संबंधित समाचार संस्थान के प्रश्नों का जवाब नहीं दिया था।

इसके बाद हिंदुस्तान टाइम्स की 11 अक्टूबर की रिपोर्ट में नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि पुलिस ने आयोजकों के पते, मोबाइल नंबर और सोशल मीडिया खातों की जानकारी जुटाई। उनके आवागमन पर नजर रखी गई तथा होटलों और अतिथि गृहों के रिकॉर्ड भी जाँचे गए।

रिपोर्ट में एक अधिकारी के हवाले से समग्र निगरानी केंद्रीय गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर किए जाने की बात भी कही गई। इन विशिष्ट दावों पर गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस का स्वतंत्र विस्तृत जवाब उपलब्ध नहीं था।

यदि ऐसी जानकारी का इस्तेमाल लोगों को प्रदर्शन स्थल तक पहुँचने से पहले रोकने या उनके ठहरने के स्थान पर कार्रवाई करने के लिए हुआ, तो सवाल है कि संबंधित निर्णय किस कानूनी अधिकार और किन लिखित निर्देशों के आधार पर लिए गए थे।

सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक खुफिया जानकारी जुटाना और नागरिकों की वैध राजनीतिक गतिविधियों पर अनुचित प्रतिबंध लगाना एक ही बात नहीं है। दोनों के बीच कानूनी सीमा और जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए।

मेट्रो के 45 स्टेशनों पर लगभग 25 घंटे प्रवेश-निकास बंद, सुप्रीम कोर्ट ने माँगा जवाब

9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन के कारण रेल और मेट्रो सेवाओं पर लगाए गए व्यापक प्रतिबंधों की समीक्षा की थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सार्वजनिक परिवहन का नियंत्रित संचालन बनाए रखने, यात्रियों को पर्याप्त जानकारी देने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक स्थानों पर विचार करने की आवश्यकता जताई थी।

इसके बाद दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों पर प्रस्तावित प्रवेश-निकास प्रतिबंधों को घटाकर 45 स्टेशनों तक सीमित किया गया। लेकिन 9 अक्टूबर की रात से 10 अक्टूबर की रात तक लगभग 25 घंटे इन स्टेशनों पर प्रवेश-निकास प्रतिबंधित रहा। डीएमआरसी के अनुसार, नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन को छोड़कर अन्य प्रभावित स्टेशनों पर जहाँ इंटरचेंज की सुविधा थी, उसे चालू रखा गया।

रविवार, 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई की। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मेट्रो की निर्धारित सेवाओं में कटौती नहीं की गई थी।

सॉलिसिटर जनरल मेहता के अनुसार, दिल्ली मेट्रो के 303 स्टेशनों में से 45 पर प्रवेश-निकास संबंधी प्रतिबंध लागू थे। दूसरी ओर, वरिष्ठ एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने 47 स्टेशनों को बंद किए जाने का मुद्दा उठाया। सुनवाई की लाइव रिपोर्टिंग के अनुसार, पीठ ने प्रभावित स्टेशनों का मानचित्र माँगा और यात्रियों की आवाजाही पर प्रतिबंधों के वास्तविक असर को लेकर सवाल किए।

यह प्रश्न महत्वपूर्ण है। मेट्रो ट्रेन चलना और यात्रियों का उस तक पहुँच पाना दो अलग बातें हैं। परिवहन प्रतिबंधों का वास्तविक असर केवल संचालित ट्रेनों की संख्या से नहीं, बल्कि स्टेशनों तक नागरिकों की पहुँच और यात्रा के उपलब्ध विकल्पों से भी निर्धारित होता है।

रेल सेवाओं को लेकर भी रविवार को नया विवरण सामने आया। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उत्तर रेलवे ने दिल्ली क्षेत्र में 214 यात्री रेल सेवाएँ बहाल कर दीं, जबकि 11 अक्टूबर को 30 सेवाएँ रद्द रहीं। इससे स्पष्ट है कि सभी प्रभावित रेल सेवाओं की बहाली रविवार को पूरी नहीं हुई थी।

रविवार की विशेष सुनवाई: अवमानना याचिका पर नोटिस, नागरिक अधिकारों पर अंतरिम निर्देश

11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने दिल्ली में 10 अक्टूबर की पुलिस कार्रवाई से संबंधित अवमानना और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर सुनवाई की। अदालत ने इस सुनवाई का लिखित आदेश भी जारी किया।

एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने 9 अक्टूबर के आदेश की कथित अवहेलना को लेकर अवमानना याचिका दाखिल की थी। न्यायालय के रिकॉर्ड में गोविंद मोहन का नाम प्रतिवादी के रूप में दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया मामला पाते हुए कथित अवमाननाकर्ताओं को नोटिस जारी किया और 13 अक्टूबर तक जवाबी हलफनामा तथा आदेश के पालन की रिपोर्ट माँगी। अदालत ने हिरासत की वैधता को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर भी नोटिस जारी किया।

संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर वरिष्ठ एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने इस याचिका को कुछ नामित व्यक्तियों तक सीमित न मानकर व्यापक हिरासत के मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया।

अवमानना का मामला न्यायालय के आदेश की कथित जानबूझकर अवहेलना से संबंधित है, जबकि बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका हिरासत के कानूनी आधार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के परीक्षण से संबंधित है। दोनों का कानूनी उद्देश्य अलग है।

सुनवाई में वरिष्ठ एडवोकेट कपिल सिब्बल, शादान फरासत, गोपाल शंकरनारायणन और अन्य वकीलों ने पुलिस कार्रवाई तथा नागरिकों की स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्न उठाए। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रतिबंधों और हिरासत संबंधी कार्रवाइयों पर पक्ष रखा।

सुप्रीम कोर्ट के लिखित आदेश के अनुसार, पीठ ने निर्देश दिया कि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी ढंग से हिरासत में नहीं लिया जाए। अदालत ने विशेष रूप से उन लोगों के मामले में यह निर्देश दिया, जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत प्रतिबंधित क्षेत्र से बाहर शांतिपूर्वक और बिना हथियार एकत्र होते हैं।

अदालत ने मेट्रो और रेल सेवाओं का सामान्य संचालन जारी रखने को कहा। सार्वजनिक व्यवस्था की वास्तविक आवश्यकता होने पर कानूनसम्मत प्रतिबंध लगाने की अधिकारियों की शक्ति बरकरार रहेगी।

पीठ ने लोगों की आवाजाही को यातायात संबंधी वैध नियमों के अधीन सुचारु रखने और बैरिकेड की आवश्यकता की तत्काल समीक्षा करने के निर्देश दिए। इंटरनेट सेवाएँ निर्बाध रखने की बात भी कही गई। साथ ही स्पष्ट किया गया कि कानून के अंतर्गत प्रशासन को प्राप्त शक्तियाँ समाप्त नहीं की जा रही हैं।

पीठ को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट परिसर में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लागू होने की सूचना देने वाला बोर्ड लगाया गया है। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि यह बोर्ड अब भी लगा है, तो उसे तत्काल हटाया जाए, ताकि सुप्रीम कोर्ट या किसी अन्य न्यायालय में आने-जाने को लेकर किसी प्रकार की आशंका न रहे।

सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि इंटरनेट सेवाएँ बहाल कर दी गई हैं और सभी मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए हैं। सॉलिसिटर जनरल ने पत्रकारों, वकीलों और दूसरे पेशेवरों के काम में बाधा नहीं पहुँचाने का आश्वासन दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने लिखित आदेश में भी स्पष्ट निर्देश दिया कि इन पेशेवरों को उनका काम करने से किसी भी तरह नहीं रोका जाए।

न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों से मंगलवार, 13 अक्टूबर तक जवाब और अनुपालन विवरण प्रस्तुत करने को कहा। अन्य संबंधित अर्जियों को भी मुख्य कार्यवाही के साथ जोड़ने का निर्देश दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिका में प्रथम दृष्टया मामला पाया है, लेकिन अभी किसी अधिकारी को अवमानना का दोषी नहीं ठहराया है। इसी तरह अदालत ने 10 अक्टूबर की सभी हिरासतों को अवैध घोषित करने का भी कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। इन मामलों पर आगे की स्थिति संबंधित अधिकारियों के जवाब और न्यायालय के आगामी आदेशों से स्पष्ट होगी।

रविवार को भी प्रदर्शन और हिरासतें जारी, न्यायिक निर्देशों के पालन पर सवाल

11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई के दिन भी दिल्ली में प्रदर्शन और हिरासत की कार्रवाई जारी रही। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, रविवार को 500 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया। पुलिस सूत्रों ने बताया कि शनिवार के प्रदर्शनों से संबंधित कम से कम 20 एफआईआर दर्ज की गई हैं। इनमें सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने और कानून-व्यवस्था भंग करने के आरोप शामिल हैं। हालाँकि, एफआईआर की अंतिम संख्या, आरोपियों का विवरण और सभी कानूनी धाराएँ अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं।

रविवार को हिरासत में लिए गए लोगों में माकपा के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास भी शामिल थे, जिन्हें कुछ समय बाद छोड़ दिया गया।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, कनॉट प्लेस में लगभग 100 प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने दो बसों में बैठाया। एक अन्य व्यक्ति को प्रदर्शनकारी होने के संदेह में भोजनालय से बाहर निकाला गया। बाद में पुलिस ने उसे जाने दिया।

रविवार को पत्रकारों की हिरासत का एक और मामला सामने आया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उसके हिंदी संस्करण के तीन पत्रकारों, शाश्वत, सिया और विजय कुमार को कनॉट प्लेस क्षेत्र में रिपोर्टिंग के दौरान हिरासत में लिया गया। प्रेस पहचान-पत्र दिखाने के बावजूद उन्हें पुलिस बस में बैठाया गया। लगभग 45 मिनट बाद उन्हें छत्रसाल स्टेडियम के पास, करीब 12 किलोमीटर दूर, छोड़ दिया गया। संस्थान के अनुसार, पुलिस ने हिरासत का स्पष्ट कानूनी आधार नहीं बताया।

इन घटनाओं ने रविवार के न्यायिक निर्देशों के पालन पर भी सवाल खड़े किए हैं। हालाँकि, केवल हिरासत में लिए जाने से अदालत के आदेश का उल्लंघन सिद्ध नहीं होता। प्रत्येक कार्रवाई का कानूनी आधार और उसकी परिस्थितियाँ अलग-अलग जाँच का विषय हैं।

रविवार शाम महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस कार्रवाई का एक और मामला सामने आया। इंडियन एक्सप्रेस की जमीनी रिपोर्ट के अनुसार, कनॉट प्लेस में शाम छह बजे के बाद महिला प्रदर्शनकारियों को पुलिस बसों में बैठाया गया। इनमें एक महिला वकील भी शामिल थीं। पूर्व जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष और एक अन्य महिला बस को आगे बढ़ने से रोकने के लिए उसके सामने चढ़ गईं। पुलिसकर्मियों ने दोनों को नीचे उतारकर बस में बैठा दिया।

इस बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोमवार, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने की घोषणा की। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों से मार्च में शामिल होने की अपील की है। उनका कहना है कि मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपकर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण पर रोक और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग की जाएगी।

हालाँकि, बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के मुलाकात संबंधी अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संबंधित मुद्दे पहले से न्यायालय में विचाराधीन हैं और इन्हें न्यायिक कार्यवाही के माध्यम से उठाया जा सकता है। उन्होंने प्रस्तावित मार्च के बारे में कोई निर्णय नहीं दिया।

दूसरी ओर, सीजेपी नेताओं ने सोमवार, 12 अक्टूबर को सुबह दस बजे संसद मार्ग पुलिस थाने पहुँचकर जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए तारीख माँगने की घोषणा की है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सीजेपी नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने कहा कि पुलिस ने 24 घंटे के भीतर तारीख नहीं दी तो संगठन स्वयं नए प्रदर्शन की घोषणा करेगा।

मतदाता सूची से नाम हटाने पर विवाद: आरोप और चुनाव आयोग का पक्ष

प्रदर्शन का मूल मुद्दा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित अनियमितताएँ थीं। विपक्षी दलों और आंदोलनकारी संगठनों ने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से पात्र मतदाता प्रभावित हुए और सत्तारूढ़ दल को राजनीतिक लाभ पहुँचा।

रॉयटर्स ने निर्वाचन आयोग के आँकड़ों के आधार पर लगभग 13 करोड़ मतदाता प्रविष्टियाँ हटाए जाने की जानकारी दी है। इनमें स्थान बदलने वाले, पता नहीं चल पाने वाले और मृत घोषित व्यक्तियों से संबंधित प्रविष्टियाँ शामिल बताई गई हैं।

निर्वाचन आयोग का कहना है कि ये मसौदा पुनरीक्षण प्रक्रिया में पहचानी गई प्रविष्टियाँ हैं और गलत तरीके से हटाए गए पात्र व्यक्ति दोबारा अपना नाम जुड़वा सकते हैं।

लगभग 13 करोड़ मतदाता प्रविष्टियाँ हटाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि उतने ही पात्र मतदाताओं का मतदान अधिकार छिन गया। असली सवाल यह है कि कितने पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए, कितनों के नाम दोबारा जोड़े गए और कितनी आपत्तियाँ अब भी लंबित हैं। इन सवालों का जवाब अंतिम मतदाता सूचियों, संबंधित आदेशों और अपीलों के निपटारे के रिकॉर्ड से ही मिल सकेगा।

चुनाव आयोग के फैसलों पर सवाल उठाना और उनकी आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है। मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप कितने सही हैं, यह दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया से तय होगा। लेकिन आरोपों की पुष्टि न होना अपने आप में शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने का आधार नहीं बन सकता।

प्रशासन का पक्ष: सुरक्षा, अनुमति और सार्वजनिक व्यवस्था

दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति न देने के पीछे सुरक्षा संबंधी आशंकाएँ, पूर्व प्रदर्शनों में शर्तों के कथित उल्लंघन और आवेदन समय पर नहीं दिए जाने का तर्क रखा। नई दिल्ली के संबंधित इलाकों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के अंतर्गत निषेधात्मक आदेश लागू होने का भी हवाला दिया गया।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि शहर को बंधक नहीं बनने दिया जाएगा। उन्होंने विरोध की आड़ में अव्यवस्था फैलाने की राजनीति का विरोध किया। भाजपा नेताओं ने भी प्रदर्शनकारी संगठनों और विपक्ष की आलोचना की।

पुलिस की कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी वास्तविक है। किसी प्रदर्शन से अन्य नागरिकों की सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन और आवश्यक सेवाओं को खतरा होने की परिस्थितियों में प्रशासन कानून के अनुसार प्रतिबंध लगा सकता है।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार हिंसा करने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने या दूसरे नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करने की छूट नहीं देता।

इसी तरह, कानून-व्यवस्था के नाम पर लगाया गया हर प्रतिबंध अपने आप सही नहीं हो जाता। प्रतिबंध लगाने का कारण, उसका दायरा और अवधि कानून की कसौटी पर खरे उतरने चाहिए। यह भी सवाल है कि क्या कम सख्त उपायों से स्थिति संभाली जा सकती थी।

संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(ख) बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत आते हैं, जबकि शांतिपूर्ण सभा के अधिकार पर उचित प्रतिबंधों का प्रावधान अनुच्छेद 19(3) में है।

इन अधिकारों पर लागू प्रतिबंध कानूनसम्मत और परिस्थितियों के अनुपात में होने चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र की चिंता, भारत ने अनुचित हस्तक्षेप बताया

10 अक्टूबर की घटनाओं पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने भी चिंता जताई। उसने भारत में शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का सम्मान सुनिश्चित करने और सार्वजनिक चिंताओं पर सार्थक संवाद करने का आग्रह किया।

भारत के जिनेवा स्थित स्थायी मिशन ने इस प्रतिक्रिया को अनुचित हस्तक्षेप बताया। मिशन ने कहा कि भारत का संविधान शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था के हित में उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।

रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में दोनों पक्षों की प्रतिक्रिया प्रकाशित की। इस अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया से भारत में हुई प्रत्येक पुलिस कार्रवाई के बारे में कोई स्वतः कानूनी निष्कर्ष नहीं निकलता। उसकी वैधता का परीक्षण भारतीय कानून, न्यायिक निर्देशों और वास्तविक साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।

पुलिस कार्रवाई का अंतिम रिकॉर्ड क्या बताएगा?

10 अक्टूबर के घटनाक्रम के बाद अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर सार्वजनिक नहीं हुए हैं।

दिल्ली पुलिस को हिरासत में लिए गए लोगों की अंतिम संख्या, उनके विरुद्ध लागू कानूनी प्रावधान, हिरासत केंद्रों में रखे जाने की अवधि और रिहाई की प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए।

पत्रकारों के फोन अपने कब्जे में लेने के मामलों में संबंधित अधिकारियों की पहचान और जब्ती का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण है। वकीलों और दूसरे नागरिकों के साथ कथित बल प्रयोग की जाँच में मूल वीडियो, मेडिकल रिपोर्ट और ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों का विवरण महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं।

प्रशासन को यह भी बताना चाहिए कि प्रदर्शन के लिए कोई वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया गया था या नहीं। यदि नहीं, तो किन परिस्थितियों और कारणों से ऐसा निर्णय लिया गया?

इसके साथ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है। जब प्रदर्शन से पहले राज्यों को निगरानी और निवारक कार्रवाई संबंधी निर्देश भेजे जाने की खबर सामने आई, तब उन निर्देशों के पालन तथा उनकी कानूनी समीक्षा के लिए कौन-सी व्यवस्था लागू थी?

9 अक्टूबर के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रेल और मेट्रो प्रतिबंधों की समीक्षा किस अधिकारी ने की? क्या यातायात संबंधी नए निर्देश सार्वजनिक किए गए? और 11 अक्टूबर को इंटरनेट सेवाओं तथा सड़कों पर लगाए गए अवरोधकों के संबंध में दिए गए अंतरिम निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या लिखित कार्रवाई की गई?

इन सवालों के उत्तर केवल पुलिस की प्रेस विज्ञप्तियों या प्रदर्शनकारी संगठनों के बयानों से पूरे नहीं होंगे। इसके लिए मूल प्रशासनिक आदेश, हिरासत रजिस्टर, ड्यूटी रिकॉर्ड, कैमरों की रिकॉर्डिंग, जब्ती दस्तावेज़, परिवहन संचालन रिकॉर्ड तथा अदालत में दाखिल अनुपालन रिपोर्ट महत्वपूर्ण होंगे।

विरोध पर प्रतिबंध से आगे, अब कार्रवाई की जवाबदेही का प्रश्न

10 अक्टूबर की घटनाओं ने पुलिस की शक्ति और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न फिर सामने रखा है। पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। यदि किसी प्रदर्शन से हिंसा या सार्वजनिक सुरक्षा का वास्तविक खतरा उत्पन्न होता है, तो कानून के अंतर्गत आवश्यक और अनुपातिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी पुलिस को मनमानी की छूट नहीं देती। किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने, उसकी आवाजाही रोकने या उसके डिजिटल उपकरण अपने कब्जे में लेने का स्पष्ट कानूनी आधार होना चाहिए। हर कार्रवाई के पीछे क्या कारण थे और उसका आदेश किस अधिकारी ने दिया, इसका जवाब भी सामने आना चाहिए।

जंतर-मंतर की घेराबंदी के बाद विरोध दिल्ली के दूसरे इलाकों में फैल गया। हजारों लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें आईं। पत्रकारों, वकीलों और सामान्य नागरिकों से जुड़ी शिकायतों ने कार्रवाई के दायरे पर सवाल उठाए।

रविवार की विशेष सुनवाई के बाद 10 अक्टूबर की पुलिस कार्रवाई से जुड़े प्रश्न अब न्यायिक परीक्षण के एक नए चरण में पहुँच गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत, परिवहन सेवाओं, इंटरनेट और नागरिकों की आवाजाही पर अंतरिम निर्देश दिए हैं। साथ ही अधिकारियों से अवमानना याचिका पर जवाब तथा पहले के आदेश के पालन का विवरण माँगा गया है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार अपने हलफनामे में किन परिस्थितियों को प्रतिबंधों और हिरासत की कार्रवाई का आधार बताती है। क्या प्रत्येक निर्णय का लिखित रिकॉर्ड उपलब्ध है? क्या पुलिस कार्रवाई केवल वास्तविक सुरक्षा जरूरत तक सीमित थी? और क्या नागरिकों के अधिकारों पर कम प्रतिबंध लगाने वाले विकल्पों की समीक्षा की गई थी?

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार असीमित नहीं है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस की शक्तियाँ भी असीमित नहीं हैं। दोनों की सीमाएँ संविधान और कानून तय करते हैं।

10 अक्टूबर की पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही केवल पुलिस और प्रदर्शनकारी संगठनों के बयानों से तय नहीं होगी। इसका वास्तविक आधार प्रशासनिक आदेश, हिरासत का रिकॉर्ड, कैमरों की मूल रिकॉर्डिंग, परिवहन संबंधी दस्तावेज और अदालत में दाखिल सरकारी जवाब होंगे।

जंतर-मंतर तक पहुँचने के रास्तों पर प्रशासन कानूनसम्मत प्रतिबंध लगा सकता है। लेकिन राज्य की शक्तियों के इस्तेमाल पर प्रश्न पूछने और उनके लिए जवाबदेही माँगने का अधिकार भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है।

सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा और नागरिक अधिकारों का संरक्षण, दोनों को एक साथ सुनिश्चित करना ही इस पूरे घटनाक्रम की वास्तविक संवैधानिक कसौटी है।

क्या सुप्रीम कोर्ट की सलाहकारी राय भारतीय संघवाद में राज्यपालों की भूमिका को और अधिक शक्तिशाली बना देती है?

Advertisement Box
Advertisement Box

और भी पढ़ें