
New Delhi | October 9, 2026
Updated | October 10, 2026
10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले 37 नाकों और सभी 15 पुलिस जिलों में हिरासत केंद्रों की तैयारी। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मेट्रो प्रतिबंध 57 से घटकर 45 स्टेशनों पर; उत्तर रेलवे के अनुसार लगभग 75 मेल और एक्सप्रेस सेवाएँ रद्द, स्थानीय यात्री रेल सेवाएँ भी प्रभावित।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा प्रतिबंधों का दायरा बढ़ गया है। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। राजधानी में 37 अवरोधक स्थान और सभी 15 पुलिस जिलों में हिरासत केंद्रों की तैयारी के बीच मध्य दिल्ली के चार किलोमीटर दायरे में 24 घंटे के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ निलंबित करने के निर्देश भी जारी किए गए हैं।
दिल्ली पुलिस के शुक्रवार शाम जारी पत्र के अनुसार, केंद्रीय गृह सचिव की मंजूरी से जनपथ और कर्तव्य पथ के चौराहे से चार किलोमीटर की परिधि में 9 अक्टूबर की रात 10 बजे से 10 अक्टूबर की रात 10 बजे तक मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बंद रखने को कहा गया है। दूरसंचार कंपनियों को इन निर्देशों को लागू करने के लिए कहा गया है।
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने रेल और मेट्रो सेवाओं पर व्यापक प्रतिबंधों से सामान्य नागरिकों को होने वाली परेशानी पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने सार्वजनिक परिवहन पर पूर्ण रोक के बजाय नियंत्रित संचालन सुनिश्चित करने को कहा। इसके बाद दिल्ली मेट्रो रेल निगम ने प्रवेश-निकास प्रतिबंधों वाले स्टेशनों की संख्या 57 से घटाकर 45 कर दी। अदालत ने दिल्ली मेट्रो रेल निगम, संबंधित रेलवे अधिकारियों और दिल्ली यातायात पुलिस को चार दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश भी दिया।
प्रदर्शन की जगह तय, लेकिन वहाँ पहुँचने पर रोक क्यों?
वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने शुक्रवार को दिल्ली में किए गए व्यापक सुरक्षा इंतजामों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर को सरकार ने स्वयं विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल बनाया है। लेकिन यदि उस स्थल को घेर दिया जाए और लोगों को वहाँ पहुँचने ही न दिया जाए, तो प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान का क्या अर्थ रह जाता है?
सिब्बल ने आरोप लगाया कि सरकार युवाओं और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध से भयभीत है। उनके अनुसार प्रदर्शनकारी मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की जवाबदेही से जुड़े सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने पूछा कि मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर उठ रहे सवालों का जवाब देने के बजाय इतनी व्यापक सुरक्षा पाबंदियों की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग का भी समर्थन किया। मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया को लेकर उन्होंने गंभीर आरोप लगाए। हालाँकि, चुनाव आयोग और भाजपा ने राजनीतिक उद्देश्य से मतदाता सूची में हेरफेर के आरोपों से इनकार किया है। इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण संबंधित निर्वाचन अभिलेखों और कानूनी परीक्षण के आधार पर ही संभव होगा।
गृह सचिव की मंजूरी से चार किलोमीटर दायरे में मोबाइल इंटरनेट बंद करने के निर्देश
शुक्रवार शाम दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ के उपायुक्त मनीषी चंद्र की ओर से दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को एक पत्र जारी किया गया। इसमें कहा गया कि केंद्रीय गृह सचिव ने दिल्ली पुलिस के अनुरोध पर निर्धारित क्षेत्र में 24 घंटे के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से निलंबित करने की मंजूरी दी है।
यह पत्र एयरटेल, वोडाफोन आइडिया, जियो और एमटीएनएल के संबंधित अधिकारियों को संबोधित है। इसमें दूरसंचार अधिनियम, 2023 की धारा 20(2)(बी) और दूरसंचार सेवाओं के अस्थायी निलंबन संबंधी नियम, 2024 के नियम 3 का हवाला दिया गया है।
पत्र के अनुसार, जनपथ-कर्तव्य पथ चौराहे से चार किलोमीटर की परिधि में मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ 9 अक्टूबर की रात 10 बजे से अगले दिन रात 10 बजे तक निलंबित रखने के निर्देश हैं।
इस दायरे में जंतर-मंतर के अलावा कनॉट प्लेस और मध्य दिल्ली के कई महत्वपूर्ण सरकारी तथा व्यावसायिक क्षेत्रों के हिस्से भी आ सकते हैं। हालाँकि, वास्तविक प्रभावित क्षेत्र का निर्धारण सरकारी आदेश की सीमाओं और दूरसंचार कंपनियों द्वारा उसके क्रियान्वयन के आधार पर ही स्पष्ट होगा।
पुलिस ने सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताओं को इस निर्णय का आधार बताया है। लेकिन मोबाइल इंटरनेट निलंबन से प्रदर्शनकारियों के अतिरिक्त सामान्य नागरिकों, पत्रकारों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और डिजिटल सेवाओं पर निर्भर लोगों को भी परेशानी हो सकती है।
इंटरनेट बंद करने का मूल आदेश सार्वजनिक होना क्यों जरूरी है?
मोबाइल इंटरनेट निलंबन के फैसले से एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न सामने आया है।
दूरसंचार सेवाओं के अस्थायी निलंबन संबंधी नियम, 2024 के नियम 3 के अनुसार, सेवाएँ निलंबित करने का आदेश सक्षम प्राधिकारी द्वारा लिखित कारणों के साथ जारी किया जाना चाहिए। आदेश का प्रकाशन भी आवश्यक है। उसमें प्रतिबंध के कारण, प्रभावित क्षेत्र, सेवाओं का प्रकार और अवधि स्पष्ट होनी चाहिए।
नियम यह भी अपेक्षा करते हैं कि आदेश जारी करने से पहले सक्षम प्राधिकारी इस बात पर विचार करे कि निर्धारित उद्देश्य किसी अन्य उचित उपाय से प्राप्त किया जा सकता है या नहीं।
दिल्ली पुलिस के दूरसंचार कंपनियों को भेजे गए पत्र में केंद्रीय गृह सचिव की मंजूरी का उल्लेख है। हालाँकि, इस रिपोर्ट की जाँच के समय गृह सचिव के मूल कारणयुक्त निलंबन आदेश की स्वतंत्र रूप से सत्यापित सार्वजनिक प्रति उपलब्ध नहीं हो सकी।
ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि इंटरनेट बंद करने का निर्णय किन विशिष्ट सुरक्षा परिस्थितियों और अभिलेखों के आधार पर लिया गया। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कम प्रतिबंध वाले अन्य उपायों पर क्या विचार किया गया था।
दूरसंचार सेवाओं के अस्थायी निलंबन संबंधी नियम, 2024 के अनुसार, इंटरनेट बंद करने का आदेश जारी होने के 24 घंटे के भीतर उसकी प्रति समीक्षा समिति को भेजना जरूरी है। समिति को आदेश जारी होने के पाँच दिनों के भीतर यह जाँचना होता है कि निर्णय कानून के अनुरूप था या नहीं। यदि आदेश नियमों के विरुद्ध पाया जाता है, तो समिति उसे निरस्त कर सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इंटरनेट पर लगाई गई रोक समाप्त होने के बाद भी उस निर्णय की कानूनी समीक्षा हो सकती है।
इंटरनेट बंद करने का आदेश केवल 24 घंटे के लिए हो और समीक्षा समिति को पाँच दिनों के भीतर उसकी वैधानिकता जाँचनी हो, तो प्रतिबंध समाप्त होने के बाद की समीक्षा से नागरिकों को समय रहते राहत कैसे मिलेगी?
यदि समीक्षा में आदेश कानून के अनुरूप नहीं पाया जाता, तब भी इंटरनेट से वंचित रहने के 24 घंटे कौन लौटाएगा? सवाल यह है कि ऐसी बाद की समीक्षा नागरिकों के अधिकारों को कितनी प्रभावी सुरक्षा देती है और प्रतिबंध से हुई परेशानी का क्या उपचार उपलब्ध है?
सुप्रीम कोर्ट ने परिवहन सेवाओं पर व्यापक रोक को लेकर चिंता जताई
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में रेल और मेट्रो सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों का मामला उठाया गया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सामान्य नागरिकों को होने वाली संभावित परेशानी पर चिंता जताई।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, वृंदा ग्रोवर, प्रशांत भूषण और अन्य वकीलों ने अदालत का ध्यान दिल्ली मेट्रो तथा रेलवे से संबंधित निर्देशों की ओर दिलाया।
सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के लिखित आदेश में पुलिस के 8 अक्टूबर के मेट्रो संबंधी पत्र और 9 अक्टूबर के रेलवे संबंधी पत्राचार का उल्लेख है। इनमें संवेदनशील स्थानों की ओर अनियंत्रित भीड़ बढ़ने की आशंका के आधार पर परिवहन सेवाएँ सीमित करने की बात कही गई थी।
आदेश के अनुच्छेद 7 में अदालत ने कहा कि उपलब्ध अधिसूचनाएँ आवश्यकता से अधिक व्यापक प्रतीत होती हैं, क्योंकि उनसे आवश्यक सार्वजनिक परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध जैसी स्थिति बन रही है।
अदालत ने पूर्ण प्रतिबंध और नियंत्रित संचालन के बीच अंतर स्पष्ट किया। उसने कहा कि मेट्रो और अन्य रेल सेवाओं के बारे में निर्णय लेते समय अनुपातिकता के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कामकाजी लोगों, विद्यार्थियों और वरिष्ठ नागरिकों की परेशानियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सभी लोगों के पास निजी वाहन नहीं होते और बड़ी संख्या में नागरिक अपनी आजीविका तथा दैनिक जरूरतों के लिए सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं।
सॉलिसिटर जनरल ने प्रतिबंधों की समीक्षा कराने का आश्वासन दिया
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सुरक्षा संबंधी तैयारियाँ पिछले प्रदर्शनों के अनुभव और कानून-व्यवस्था से जुड़ी आशंकाओं पर आधारित हैं।
सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने और संभावित अव्यवस्था रोकने के लिए प्रशासन को एहतियाती कदम उठाने पड़ते हैं।
इसके जवाब में अदालत ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दायित्व और सामान्य नागरिकों की आवाजाही के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया।
सॉलिसिटर जनरल ने संबंधित अधिकारियों से बातचीत कर प्रतिबंधों का पुनर्मूल्यांकन कराने और सार्वजनिक परिवहन को नियंत्रित तरीके से संचालित करने का आश्वासन दिया।
चार दिनों के भीतर अदालत में देनी होगी अनुपालन रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट के लिखित आदेश के अनुच्छेद 8 में स्पष्ट किया गया है कि मेट्रो ट्रेनों की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। संबंधित अधिकारी मेट्रो और अन्य रेल सेवाओं के नियंत्रित संचालन के लिए उचित निर्णय ले सकते हैं, लेकिन इससे सामान्य नागरिकों को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए।
अदालत ने ऐसे निर्णयों की जानकारी व्यापक रूप से सार्वजनिक करने को कहा। साथ ही शहर के भीतर वाहनों की सुचारु आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए यातायात संबंधी परामर्श समाचारपत्रों और ऑनलाइन माध्यमों पर प्रकाशित करने का निर्देश दिया।
इस बीच, दिल्ली यातायात पुलिस ने 9 अक्टूबर को एक परामर्श जारी किया। इसमें 10 अक्टूबर की सुबह छह बजे से कानून-व्यवस्था की स्थिति के अनुसार राजधानी के लगभग 30 प्रमुख स्थानों पर यातायात का मार्ग बदलने की संभावना बताई गई है। इनमें धौला कुआँ, मंडी हाउस, झंडेवालान और कनॉट प्लेस के आसपास के मार्ग शामिल हैं। यात्रियों को परिस्थितियों के अनुसार जारी आधिकारिक यातायात सूचनाओं का पालन करने की सलाह दी गई है।
आदेश के अनुच्छेद 11 में दिल्ली मेट्रो रेल निगम, संबंधित रेलवे अधिकारियों और दिल्ली यातायात पुलिस को चार दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
इससे प्रशासन के आगामी निर्णयों की न्यायिक समीक्षा का रास्ता खुलता है। अब यह देखना होगा कि संबंधित अधिकारी प्रतिबंधों में क्या संशोधन करते हैं और उन निर्णयों का सामान्य नागरिकों पर कितना असर पड़ता है।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट की यह कार्यवाही मुख्य रूप से सार्वजनिक परिवहन पर प्रतिबंधों से संबंधित थी। अदालत ने इस आदेश में सीजेपी को 10 अक्टूबर का प्रदर्शन आयोजित करने की अनुमति नहीं दी है। उसने मोबाइल इंटरनेट निलंबन आदेश की वैधानिकता पर भी कोई निर्णय नहीं दिया।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 57 से घटकर 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध
दिल्ली पुलिस की परिवहन रेंज के संयुक्त आयुक्त ने 8 अक्टूबर को दिल्ली मेट्रो रेल निगम को पत्र भेजा था। इसमें 57 मेट्रो स्टेशनों पर ट्रेनों की आवृत्ति कम करने और प्रवेश-निकास द्वार बंद करने का प्रस्ताव रखा गया था।
दिल्ली मेट्रो रेल निगम ने शुरुआत में 57 स्टेशनों पर प्रतिबंधों की घोषणा की थी। लेकिन शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस व्यवस्था में संशोधन करते हुए प्रभावित स्टेशनों की संख्या घटाकर 45 कर दी गई।
दिल्ली मेट्रो की संशोधित सूचना के अनुसार, इन 45 स्टेशनों पर 9 अक्टूबर की रात नौ बजे से 10 अक्टूबर की शाम छह बजे तक प्रवेश और निकास बंद रखने की घोषणा की गई। सुरक्षा एजेंसियाँ परिस्थितियों की समीक्षा कर आगे का निर्णय लेंगी।
प्रभावित स्टेशनों में राजीव चौक, नई दिल्ली, केंद्रीय सचिवालय, पटेल चौक, कश्मीरी गेट, जनपथ और मंडी हाउस सहित दिल्ली के विभिन्न हिस्सों के स्टेशन शामिल हैं।
संशोधित सूचना के अनुसार, नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन को छोड़कर अन्य प्रभावित स्टेशनों पर यात्रियों को एक लाइन से दूसरी लाइन में बदलने की सुविधा उपलब्ध रहेगी। प्रवेश और निकास पर प्रतिबंध का अर्थ मेट्रो ट्रेनों का परिचालन पूरी तरह बंद होना नहीं है।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि कानून-व्यवस्था संबंधी उपाय करते समय सार्वजनिक परिवहन पर पूर्ण रोक लगाने और नियंत्रित संचालन में अंतर रखा जाना चाहिए।
उत्तर रेलवे के अनुसार लगभग 75 मेल और एक्सप्रेस सेवाएँ रद्द, यात्री रेल सेवाएँ भी प्रभावित
कपिल सिब्बल ने रेल सेवाओं पर प्रतिबंधों को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि दूसरे राज्यों से दिल्ली आने वाले प्रत्येक यात्री का प्रस्तावित प्रदर्शन से संबंध होना आवश्यक नहीं है। कोई परीक्षा देने, परिवार से मिलने या चिकित्सा संबंधी जरूरत के लिए भी यात्रा कर सकता है।
उत्तर रेलवे ने 9 अक्टूबर को रेल सेवाओं के रद्दीकरण और समय परिवर्तन संबंधी कई आधिकारिक सूचनाएँ जारी कीं। इनमें नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन पहुँचने वाली मेल और एक्सप्रेस रेलगाड़ियों के साथ दिल्ली क्षेत्र में चलने वाली कुछ यात्री सेवाओं के रद्दीकरण का भी विवरण है।
उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी हिमांशु शेखर उपाध्याय के बयान के अनुसार, लगभग 40 दिल्ली पहुँचने वाली मेल और एक्सप्रेस सेवाएँ रद्द की गईं। इन रेलगाड़ियों के रेक उपलब्ध नहीं होने के कारण वापसी की लगभग 35 सेवाएँ भी रद्द हुईं। इस प्रकार उस समय लगभग 75 मेल और एक्सप्रेस सेवाओं के रद्द होने की जानकारी दी गई थी। इस संख्या में स्थानीय यात्री रेल सेवाओं का कुल रद्दीकरण शामिल नहीं है।
उत्तर रेलवे की 9 अक्टूबर की आधिकारिक रद्दीकरण सूची में मगध एक्सप्रेस, राजेंद्र नगर-नई दिल्ली तेजस राजधानी, संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस, शताब्दी और अन्य महत्वपूर्ण रेल सेवाओं का उल्लेख है।
इसके अतिरिक्त उत्तर रेलवे की एक अन्य आधिकारिक सूचना में रेवाड़ी, हिसार और दिल्ली क्षेत्र से संबंधित यात्री सेवाओं के रद्दीकरण का विवरण भी उपलब्ध है। इससे स्पष्ट है कि प्रतिबंधों का प्रभाव केवल लंबी दूरी की मेल और एक्सप्रेस रेलगाड़ियों तक सीमित नहीं था।
रेलवे ने नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों के आसपास संभावित गंभीर सड़क यातायात अवरोधों को इन निर्णयों का कारण बताया है। कुछ रेल सेवाओं के समय में परिवर्तन भी किया गया है।
पीटीआई द्वारा प्रकाशित पश्चिम रेलवे के बयान के अनुसार, मुंबई सेंट्रल-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस (12951) और मुंबई सेंट्रल-हजरत निजामुद्दीन अगस्त क्रांति राजधानी एक्सप्रेस (12953) के प्रस्थान समय को पाँच घंटे विलंबित किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय नियंत्रित और अनुपातिक व्यवस्था अपनाने को कहा है। अब यह देखना होगा कि रेलवे ने न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद परिचालन संबंधी अपने निर्णयों में क्या बदलाव किए और यात्रियों को उससे कितनी राहत मिली।
37 नाकों और सभी 15 पुलिस जिलों में हिरासत केंद्रों की तैयारी
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली जिले में 37 अवरोधक स्थान निर्धारित किए हैं। साथ ही राजधानी के सभी 15 पुलिस जिलों में विशेष हिरासत केंद्रों की व्यवस्था करने की तैयारी की गई है।
रिपोर्ट में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि संभावित प्रदर्शनकारियों को उनके संबंधित जिलों में ही रोकने की रणनीति तैयार की गई है। होटल और गेस्टहाउस की निगरानी तथा जंतर-मंतर पहुँचने वाले मार्गों पर विशेष सुरक्षा इंतजामों की जानकारी भी सामने आई है।
समाचार रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगभग 23 हजार केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल कर्मियों को उपलब्ध कराया गया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उस समय नई दिल्ली जिले में करीब पाँच हजार दिल्ली पुलिसकर्मी तैनात थे। अधिकारियों ने इस संख्या में और वृद्धि की संभावना भी जताई थी।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, पिछले प्रदर्शनों के अनुभवों के आधार पर इस बार भीड़ का आकलन, सुरक्षा बलों की तैनाती और विभिन्न जिलों के बीच समन्वय पर विशेष ध्यान दिया गया है।
पुलिस का कहना है कि इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखना है।
पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति क्यों नहीं दी?
दिल्ली पुलिस की संयुक्त आयुक्त नूपुर प्रसाद ने शुक्रवार को बताया कि सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास का आवेदन 7 अक्टूबर को प्राप्त हुआ था, जबकि निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रदर्शन से कम-से-कम दस दिन पहले आवेदन देना आवश्यक है।
पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि पूर्व में प्रदर्शन की अनुमति मिलने के बावजूद संगठन ने कुछ शर्तों और अपने लिखित आश्वासनों का पालन नहीं किया था।
इन कारणों के साथ सार्वजनिक सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और यातायात संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए 10 अक्टूबर के प्रदर्शन को अनुमति देने से इनकार कर दिया गया।
सिब्बल ने शुक्रवार को दिए अपने बयान में अनुमति अस्वीकार किए जाने के समय पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि आयोजकों को ऐसे निर्णय की जानकारी पर्याप्त समय पहले दी जानी चाहिए।
हालाँकि, पुलिस द्वारा बताई गई 7 अक्टूबर की आवेदन-तिथि को देखते हुए यह जाँचना आवश्यक है कि आवेदन कब प्रस्तुत हुआ, उसकी प्राप्ति कब दर्ज की गई और अस्वीकृति आदेश कब जारी तथा संप्रेषित किया गया।
धारा 163 और जंतर-मंतर की घेराबंदी का प्रश्न
जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस के प्रतिबंधात्मक आदेशों पर भी सवाल उठे हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत सक्षम प्राधिकारी को सार्वजनिक सुरक्षा और शांति भंग होने की आशंका जैसी परिस्थितियों में रोकथाम संबंधी निर्देश जारी करने की शक्ति दी गई है।
कपिल सिब्बल ने संसद मार्ग क्षेत्र से संबंधित प्रतिबंधों पर सवाल उठाते हुए कहा कि निर्धारित क्षेत्र में बिना लिखित अनुमति सभा, जुलूस, नारेबाजी और प्रदर्शन जैसी गतिविधियों पर रोक लगाई गई है।
उन्होंने पूछा कि जब जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान माना जाता है, तो उसके आसपास ऐसी पाबंदियाँ लगाने का क्या औचित्य है, जिनसे नागरिकों का वहाँ तक पहुँचना ही कठिन हो जाए?
यह प्रश्न केवल प्रतिबंध लगाने के अधिकार का नहीं, बल्कि उसके दायरे और आवश्यकता का भी है। इसके उत्तर के लिए पुलिस के संबंधित आदेशों, प्रतिबंधित क्षेत्र के नक्शे और जंतर-मंतर पर लागू अनुमति संबंधी शर्तों की जाँच आवश्यक है।
वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल पर विचार करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में दिल्ली में शांतिपूर्ण और वैधानिक प्रदर्शनों के लिए बेहतर सुविधाओं वाले वैकल्पिक स्थान निर्धारित करने का सुझाव भी सामने आया।
अदालत के लिखित आदेश के अनुच्छेद 10 में कहा गया है कि शांतिपूर्ण और वैधानिक प्रदर्शन करने वालों के लिए बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिए। इसके लिए उपयुक्त वैकल्पिक स्थानों की पहचान और उन्हें निर्धारित करने के सुझाव पर सक्षम प्राधिकारी को विचार कर उचित निर्णय लेने को कहा गया है।
हालाँकि, अदालत ने इस आदेश में सीजेपी को किसी वैकल्पिक स्थान पर 10 अक्टूबर का प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी है।
गिरफ्तारी की आशंका पहले ही जता चुके हैं सीजेपी नेता
इससे पहले 8 अक्टूबर को द न्यूज़ मिनट को दिए गए एक इंटरव्यू में सीजेपी के अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास ने प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले संभावित गिरफ्तारियों को लेकर अपनी आशंकाएँ व्यक्त की थीं।
दीपके ने बताया था कि संगठन के प्रतिनिधि इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि गिरफ्तारी की स्थिति में आगे कौन-सा रास्ता अपनाया जाएगा।
संगठन के प्रतिनिधियों ने विभिन्न राज्यों में अपने कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने और कुछ लोगों को दिल्ली जाने से रोकने के आरोप भी लगाए।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पुलिस विभागों से हिरासत तथा गिरफ्तारी के आधिकारिक आँकड़े प्राप्त करना आवश्यक है। किसी व्यक्ति को एहतियातन हिरासत में लेना और औपचारिक रूप से गिरफ्तार करना भी दो अलग कानूनी स्थितियाँ हैं।
चुनाव आयुक्तों के कानूनी संरक्षण पर भी सवाल
कपिल सिब्बल और सीजेपी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों को मिले कानूनी संरक्षण पर भी सवाल उठाए हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 के तहत वर्तमान और पूर्व चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए या किए जाने का दावा किए गए कार्यों और कथनों के संबंध में दीवानी तथा आपराधिक न्यायिक कार्यवाही से संरक्षण दिया गया है।
इस प्रावधान के दायरे और संवैधानिक वैधता का प्रश्न अलग कानूनी परीक्षण का विषय है। केवल इस्तीफा देने से आधिकारिक कार्यों के संबंध में दिया गया संरक्षण अपने-आप समाप्त हो जाएगा, ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
अब जवाबदेही के तीन महत्वपूर्ण प्रश्न
10 अक्टूबर के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले प्रशासनिक कार्रवाई के तीन प्रमुख पहलू सामने आए हैं। पहला, प्रदर्शन की अनुमति अस्वीकार करना और व्यापक पुलिस सुरक्षा व्यवस्था। दूसरा, रेल तथा मेट्रो सेवाओं पर प्रतिबंध, जिनकी समीक्षा का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। तीसरा, केंद्रीय गृह सचिव की मंजूरी से मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ निलंबित करने के निर्देश।
इन तीनों व्यवस्थाओं के कानूनी आधार अलग हैं। लेकिन सामान्य नागरिकों की आवाजाही, संचार सुविधाओं और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर इनके संभावित प्रभाव को एक साथ देखना महत्वपूर्ण है।
विशेष रूप से मोबाइल इंटरनेट निलंबन के मूल कारणयुक्त आदेश का प्रकाशन, उसमें दर्ज सुरक्षा संबंधी आधार, अन्य उचित विकल्पों पर विचार और समीक्षा समिति की कार्रवाई सरकारी जवाबदेही के महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दिल्ली मेट्रो ने प्रवेश-निकास प्रतिबंधों वाले स्टेशनों की संख्या 57 से घटाकर 45 कर दी है। यह प्रारंभिक बदलाव सामने आ चुका है। अब अदालत के चार दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश से स्पष्ट होगा कि मेट्रो, रेलवे और यातायात पुलिस ने नागरिकों की परेशानी कम करने के लिए और कौन-से निर्णय लिए तथा उन्हें किस तरह लागू किया।
10 अक्टूबर का प्रस्तावित प्रदर्शन अब केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की माँग तक सीमित नहीं रह गया है। इसने एक व्यापक संवैधानिक प्रश्न सामने रखा है कि किसी संभावित विरोध प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन नागरिकों की आवाजाही और संचार सुविधाओं पर कितने व्यापक प्रतिबंध लगा सकता है, और उन प्रतिबंधों की आवश्यकता का परीक्षण किन सार्वजनिक अभिलेखों के आधार पर होगा।









