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कोर्ट का समय किसका है? गुजरात हाईकोर्ट की सुनवाई से उठा न्यायिक प्रक्रिया का सवाल

गुजरात हाईकोर्ट भवन की वास्तविक तस्वीर पर आधारित सांकेतिक चित्रण। फोटो कम्पोजिट: खुली किताब
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Written by
–नीलेश कटारिया

Ahmedabad | June 20, 2026

स्थगन, सिक नोट, लीव नोट और फिर नया आवेदन। जमानत आवेदन की एक सुनवाई से न्यायिक प्रक्रिया के इस्तेमाल पर उठे गंभीर सवाल।

दालत की प्रक्रिया न्याय तक पहुंच का रास्ता है। लेकिन वही प्रक्रिया कभी-कभी सुनवाई को लंबा करने और अदालत का समय अनावश्यक रूप से खर्च करने का साधन भी बन जाती है। बीते शुक्रवार को गुजरात हाईकोर्ट में एक जमानत आवेदन की सुनवाई के दौरान इसकी एक स्पष्ट बानगी दिखाई दी।

मामला सूरत में दर्ज एक आपराधिक प्रकरण से जुड़े जमानत आवेदन का था। गुजरात हाईकोर्ट की एकल पीठ ने सुनवाई की शुरुआत में ही मूल सवाल उठाया कि पहले आवेदन के बाद ऐसी कौन-सी नई परिस्थिति आई है, जिसके आधार पर उसी मामले में फिर से जमानत पर विचार किया जाए।

जमानत कानून में यह सवाल अहम है। जब किसी आरोपी की ओर से पहले भी जमानत आवेदन किया जा चुका हो, तो बाद के आवेदन में सामान्यत: नया आधार दिखाना होता है। अदालत यह देखती है कि क्या पहले आदेश के बाद कोई नया तथ्य, नई परिस्थिति या वास्तविक बदलाव सामने आया है।

यदि ऐसा कोई बदलाव नहीं है, तो वही बात दोबारा रखना अदालत के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जाता। इस सुनवाई में अदालत की नाराजगी भी इसी सवाल पर केंद्रित दिखी।

अदालत ने पहले आवेदन से जुड़ी 8 मई और 11 मई की आदेशात्मक पृष्ठभूमि का उल्लेख किया। इसमें स्थगन, सिक नोट, लीव नोट, समकक्ष पीठ के सामने मामला जाने और फिर आवेदन वापस लेने जैसी बातें शामिल थीं। अदालत का संकेत साफ था कि जब पहले ही मामले पर विचार हो चुका था, तब बिना किसी बदली हुई परिस्थिति के नया आवेदन क्यों लाया गया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से इसे न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का उदाहरण बताया। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे आवेदन अदालत का कीमती समय खर्च करते हैं। इसी क्रम में 10,000 रुपए की लागत (कॉस्ट) लगाने की बात भी मौखिक रूप से सामने आई।

यह घटना केवल एक जमानत आवेदन तक सीमित नहीं है। यह उस प्रवृत्ति की ओर इशारा करती है, जिसमें पहले मामला बहस के लिए आता है, फिर समय मांगा जाता है, फिर बीमारी या अनुपस्थिति का नोट आता है, फिर आवेदन वापस लिया जाता है और उसके बाद उसी मामले में नया आवेदन दाखिल हो जाता है।

कानून में उपलब्ध प्रक्रिया का इस्तेमाल अपने आप में गलत नहीं है। वकील को अपने मुवक्किल के लिए वैधानिक रास्ते अपनाने का अधिकार है। लेकिन जब उसी प्रक्रिया का इस्तेमाल बिना किसी वास्तविक नई परिस्थिति के बार-बार होता दिखे, तो वह न्याय पाने की प्रक्रिया से हटकर न्यायिक समय पर दबाव डालने वाली प्रक्रिया बन जाती है।

इस सवाल का महत्व गुजरात हाईकोर्ट के अपने लंबित मामलों के बोझ से भी समझा जा सकता है। रिपोर्ट लिखे जाने तक गुजरात हाईकोर्ट के वर्चुअल जस्टिस क्लॉक के लाइव स्नैपशॉट में लंबित मामलों की संख्या 1,73,472 दिखी। इसमें 1,17,553 सिविल और 55,919 आपराधिक मामले शामिल थे।

इस तरह गुजरात हाईकोर्ट में लंबित मामलों की संख्या करीब 1.73 लाख थी। कानून मंत्रालय/न्याय विभाग के आधिकारिक राज्यसभा जवाब के अनुसार, गुजरात हाईकोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 2021 के अंत में 1,55,006 थी, जो 01 दिसंबर 2025 तक 1,75,092 तक पहुंच गई थी। बाद के लोकसभा जवाब में गुजरात हाईकोर्ट के लिए यह संख्या 1,75,486 दर्ज की गई।

देशभर की अदालतें भी भारी लंबित मामलों के बोझ से जूझ रही हैं। रिपोर्ट लिखे जाने तक नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जिला और अधीनस्थ अदालतों में 4,94,93,731 मामले लंबित थे, यानी करीब 4.95 करोड़। हाईकोर्टों में भी 64,27,943 मामले लंबित थे, यानी 64 लाख से अधिक। सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 93,495 थी, यानी 93 हजार से ऊपर।

इन आंकड़ों के बीच अदालत का हर मिनट केवल जज, वकील या किसी एक पक्षकार का समय नहीं है। यह उन नागरिकों का भी समय है, जिनके मामले वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा में लंबित हैं।

जब कोई मामला बार-बार प्रक्रियात्मक रास्तों से लौटता है, तो उसका असर केवल एक फाइल पर नहीं पड़ता। वह पूरी न्याय व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने बेंच हंटिंग जैसी कड़ी टिप्पणी भी की। इस शब्द का सामान्य अर्थ है कि कोई पक्षकार या वकील ऐसी प्रक्रिया अपनाता दिखे, जिससे मामला किसी दूसरी पीठ या अनुकूल मंच के सामने पहुंच सके। अदालतें ऐसी धारणा को गंभीरता से देखती हैं, क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और व्यवस्था, दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

सुनवाई के बाद, मामले के पक्षकार के रूप में नहीं बल्कि बार के प्रतिनिधि के तौर पर, गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और सीनियर एडवोकेट यतिन ओझा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत के समक्ष उपस्थित हुए। वहीं, एसोसिएशन के उपाध्यक्ष एडवोकेट पृथ्वीराजसिंह जडेजा युवा महिला एडवोकेट के साथ कोर्ट रूम में मौजूद दिखे। 

ओझा ने अदालत से विनम्र निवेदन करते हुए कहा कि वे कोई कारण या सफाई देने नहीं आए हैं। वे और एसोसिएशन के उपाध्यक्ष, दोनों युवा महिला एडवोकेट की ओर से माफी व्यक्त करने आए हैं।

ओझा ने अदालत से इस माफी को रिकॉर्ड पर लेने का आग्रह किया। साथ ही युवा महिला एडवोकेट के करियर पर संभावित असर का हवाला देते हुए लागत और टिप्पणियों को लेकर नरमी बरतने का निवेदन किया।

अदालत ने इस बातचीत के दौरान यह स्पष्ट किया कि उसकी चिंता किसी एक व्यक्ति या एक मामले तक सीमित नहीं है। अदालत ने कहा कि हाल के दिनों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें जूनियर वकीलों द्वारा अदालत को गुमराह करने या अदालत की नरमी का दुरुपयोग करने जैसी स्थितियां देखी गई हैं।

बाद की बातचीत में अदालत की ओर से 10,000 रुपए की लागत को लेकर नरमी दिखाते हुए उसे हटाने की बात कही गई। अंतिम लिखित आदेश में भी लागत का कोई निर्देश दर्ज नहीं है। आवेदन को वापस लिया गया मानते हुए निस्तारित किया गया है। लिखित आदेश में बेंच हंटिंग या न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग जैसी कठोर मौखिक टिप्पणियां भी दर्ज नहीं की गईं।

यहीं इस मामले की दूसरी महत्वपूर्ण परत सामने आती है। मौखिक कार्यवाही में अदालत का रुख सख्त दिखा, लेकिन अंतिम लिखित आदेश की भाषा काफी संयत रही। कानून की दृष्टि से लागू और बाध्यकारी आदेश वही होता है, जो लिखित रूप में हस्ताक्षरित होकर रिकॉर्ड पर आता है।

फिर भी अदालत में कही गई मौखिक टिप्पणियां महत्वहीन नहीं होतीं। वे न्यायिक माहौल, वकीलों के आचरण और अदालत की चिंता को समझने का संकेत देती हैं। लाइव कार्यवाही के दौर में यह फर्क और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि अब मौखिक कार्यवाही भी सार्वजनिक निगाह से दूर नहीं रहती।

इस घटना को किसी एक वकील या किसी एक आवेदन तक सीमित कर देना आसान होगा। लेकिन ऐसा करने से बड़ा सवाल पीछे छूट जाएगा।

असली सवाल यह है कि जब अदालतें लंबित मामलों के बोझ से दबी हों, तब प्रक्रियात्मक अधिकारों का इस्तेमाल न्याय पाने के लिए हो रहा है या कभी-कभी सुनवाई को टालने के लिए भी किया जा रहा है।

वकीलों की भूमिका न्याय व्यवस्था में केंद्रीय है। वे नागरिक और अदालत के बीच सबसे महत्वपूर्ण सेतु हैं। इसलिए उनके अधिकारों के साथ उनकी पेशेवर जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

इसी पेशेवर जिम्मेदारी का तकाजा है कि अदालत के सामने तथ्य साफ रखे जाएं, अनावश्यक स्थगन से बचा जाए और पुराने मामले को बिना वास्तविक बदलाव के नए आवेदन के रूप में न दोहराया जाए।

बार और बेंच के बीच हुई बातचीत ने एक और बात सामने रखी। अदालत पेशेवर आचरण पर सख्त टिप्पणी कर सकती है। वहीं, बार की विनम्र पहल के बाद भी अंतिम निर्णय अदालत के न्यायिक विवेक का विषय होता है।

ऐसे मामलों में रिकॉर्ड की स्पष्टता और पारदर्शिता जरूरी है, ताकि नागरिक समझ सकें कि अदालत में क्या कहा गया और अंतिम आदेश में क्या दर्ज किया गया।

इस घटना का सीधा संदेश यही है कि न्यायालय का समय निजी संसाधन नहीं है। यह सार्वजनिक न्यायिक संसाधन है। इसका उपयोग जितनी सावधानी से अदालत को करना चाहिए, उतनी ही सावधानी से वकीलों और पक्षकारों को भी करना चाहिए।

जब किसी मामले में बिना नई परिस्थिति के बार-बार आवेदन, स्थगन, नोट और वापसी की प्रक्रिया अपनाई जाती है, तो देरी केवल उसी मामले तक सीमित नहीं रहती। इसका असर उन अनगिनत नागरिकों की प्रतीक्षा पर भी पड़ता है, जो वर्षों से अदालत की तारीखों के बीच न्याय की उम्मीद लेकर खड़े हैं।

गुजरात हाईकोर्ट की यह सुनवाई याद दिलाती है कि न्यायिक सुधार केवल नए जजों की नियुक्ति, नई अदालतों या तकनीकी व्यवस्था से नहीं होंगे। सुधार अदालत में खड़े हर व्यक्ति के आचरण से भी जुड़ा है।

जज, वकील और पक्षकार अपने-अपने आचरण में पेशेवर ईमानदारी न रखें, तो न्याय व्यवस्था न्याय से अधिक प्रक्रिया बनकर रह जाती है।

क्या बिना तय समय-सीमा के, राज्यपालों द्वारा बिलों पर देरी राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बढ़ाती है?

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