
New Delhi | June 5, 2026, 11:00 AM IST
अमेरिका ने इज़राइल और लेबनान के बीच युद्धविराम की घोषणा कर क्षेत्रीय तनाव कम करने की कोशिश की है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब इज़राइल-लेबनान संघर्ष को लेकर ईरान अमेरिका के साथ चल रही वार्ताओं को प्रभावित करने के संकेत दे रहा था।
अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा जारी संयुक्त बयान के अनुसार, युद्धविराम व्यवस्था हिज़्बुल्लाह द्वारा पूर्ण रूप से गोलीबारी बंद करने और लिटानी नदी के दक्षिणी क्षेत्र से अपने लड़ाकों को हटाने की शर्तों पर आधारित है।
प्रस्तावित व्यवस्था में लेबनानी सशस्त्र बलों को कुछ क्षेत्रों में विशेष सुरक्षा जिम्मेदारी देने और गैर-सरकारी सशस्त्र तत्वों की गतिविधियों को सीमित करने की भी बात कही गई है। ऐसी व्यवस्थाओं को लेकर अतीत में भी चर्चा होती रही है, हालांकि उनके क्रियान्वयन को लेकर विवाद बने रहे।
लिटानी नदी का उल्लेख इस समझौते में विशेष महत्व रखता है। दक्षिणी लेबनान का यह क्षेत्र लंबे समय से इज़राइल और हिज़्बुल्लाह के बीच तनाव का केंद्र रहा है।
इज़राइल का तर्क रहा है कि उसकी उत्तरी सीमा की सुरक्षा तब तक सुनिश्चित नहीं हो सकती जब तक हिज़्बुल्लाह के सशस्त्र तत्व सीमा के निकट सक्रिय रहेंगे।
दूसरी ओर हिज़्बुल्लाह स्वयं को लेबनान की सुरक्षा संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है और इज़राइल की सैन्य गतिविधियों को अपने अस्तित्व के लिए खतरा बताता रहा है।
युद्धविराम घोषणा से पहले ईरान ने संकेत दिया था कि लेबनान में जारी इज़राइली सैन्य कार्रवाई और क्षेत्रीय हालात अमेरिका के साथ चल रही कूटनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
तेहरान का कहना था कि लेबनान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों को व्यापक वार्ता प्रक्रिया से पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता। यह बयान ऐसे समय आया जब अमेरिका और ईरान के बीच संपर्कों तथा संभावित समझौतों को लेकर पहले से ही अनिश्चितता बनी हुई थी।
रॉयटर्स के अनुसार, ईरान ने संकेत दिया है कि वाशिंगटन के साथ किसी भी व्यापक शांति समझौते के लिए लेबनान में युद्धविराम एक महत्वपूर्ण शर्त है। इसी कारण लेबनान मोर्चे पर होने वाले घटनाक्रमों को अमेरिका-ईरान वार्ता से अलग करके नहीं देखा जा रहा है।
ईरान का यह रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हिज़्बुल्लाह को लंबे समय से तेहरान का प्रमुख क्षेत्रीय सहयोगी माना जाता रहा है।
हालांकि लेबनान सरकार और हिज़्बुल्लाह की अपनी राजनीतिक तथा सैन्य संरचनाएँ हैं, फिर भी क्षेत्रीय विश्लेषकों का मानना है कि लेबनान से जुड़े बड़े घटनाक्रमों पर ईरान की स्थिति को नज़रअंदाज़ करना कठिन है।
युद्धविराम की घोषणा के बाद भी दक्षिणी लेबनान से सैन्य गतिविधियों और सुरक्षा अभियानों की खबरें आती रहीं। इज़राइल की ओर से कुछ सुरक्षा अभियानों और सैन्य गतिविधियों की रिपोर्टें भी सामने आईं, जिससे समझौते के तत्काल प्रभाव को लेकर सवाल बने रहे।
क्षेत्र में सक्रिय अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों द्वारा प्रकाशित रिपोर्टों ने संकेत दिया कि राजनीतिक स्तर पर बनी सहमति को ज़मीन पर लागू करना अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
इस बीच हिज़्बुल्लाह नेतृत्व ने युद्धविराम प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि संगठन किसी ‘आंशिक युद्धविराम’ को स्वीकार नहीं करेगा और इज़राइली बलों की पूर्ण वापसी की मांग दोहराई।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हिज़्बुल्लाह इस समझौते का औपचारिक पक्षकार नहीं है, जबकि वार्ता प्रक्रिया में भी उसकी प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं रही। चूँकि संघर्ष का प्रमुख पक्ष समझौते की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था, इसलिए उसकी प्रतिक्रिया को इस पूरी व्यवस्था की सफलता या विफलता तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में माना जा रहा है।
संयुक्त बयान में हिज़्बुल्लाह की जिम्मेदारियों का उल्लेख है, लेकिन इज़राइली सैनिकों की वापसी या उनकी तैनाती को लेकर स्पष्ट समयसीमा सामने नहीं आई है। इससे सीमा क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था के भविष्य को लेकर कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी खुले हुए हैं।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब मध्य पूर्व में जारी संघर्ष का असर ऊर्जा बाज़ार, समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी दिखाई दे रहा है।
तेल की कीमतों, समुद्री परिवहन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों को लेकर पहले से बनी चिंताओं के बीच किसी भी नए संघर्ष या तनाव को वैश्विक आर्थिक दृष्टि से भी देखा जा रहा है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य, लाल सागर और पूर्वी भूमध्यसागर से जुड़े मार्गों का महत्व इस पूरे परिदृश्य को और संवेदनशील बना देता है।
इसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि लेबनान संघर्ष और ईरान से जुड़े मुद्दों पर अलग-अलग कूटनीतिक प्रयास किए जा रहे हैं।
5 जून की सुबह तक सामने आई ताज़ा प्रतिक्रियाओं ने इस समझौते के भविष्य को लेकर नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। हिज़्बुल्लाह नेता नईम कासिम ने अमेरिकी मध्यस्थता वाले प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि संगठन तब तक अपने प्रतिरोध को समाप्त नहीं करेगा जब तक दक्षिणी लेबनान में इज़राइली सैन्य उपस्थिति बनी रहेगी।
दूसरी ओर इज़राइल ने भी संकेत दिया है कि वह सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अपने सैन्य अभियानों और दक्षिणी क्षेत्र में गतिविधियों को तत्काल समाप्त करने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में राजनीतिक स्तर पर घोषित युद्धविराम को ज़मीन पर लागू करना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
फिलहाल युद्धविराम की घोषणा हो चुकी है, लेकिन इसकी वास्तविक प्रभावशीलता का आकलन ज़मीनी स्थिति से ही होगा। अब निगाहें हिज़्बुल्लाह की प्रतिक्रिया, दक्षिणी लेबनान में सुरक्षा व्यवस्था के क्रियान्वयन और क्षेत्रीय कूटनीतिक प्रयासों की दिशा पर टिकी हैं।








