
April 22, 2026, 5:10 PM IST
ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय में प्रतिदिन पढ़ा जाने वाला ईश्वरीय मुरली पाठ अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का प्रमुख आधार माना जाता है। यह केवल धार्मिक वाचन नहीं, बल्कि जीवन और आत्मचेतना को समझने का एक व्यवस्थित पाठ है, जिसमें आत्मा, परमात्मा और समय के गहरे संबंधों को सरल भाषा में समझाया जाता है। 22 अप्रैल 2026 की मुरली भी इसी क्रम में एक ऐसे बिंदु पर केंद्रित दिखाई देती है, जहां साधना का सार अत्यंत सहज होते हुए भी भीतर तक झकझोर देने वाला बन जाता है।
इस दिन की मुरली का केंद्रीय शब्द है याद, लेकिन यह सामान्य स्मरण नहीं, बल्कि एक्यूरेट याद के रूप में सामने आता है। वरिष्ठ राजयोगी बीके डॉ. सचिन परब ने अपने वीडियो चिंतन आज का ज्ञान रहस्य में इसी बिंदु को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि यहां केवल याद करने की बात नहीं है, बल्कि उस याद की गुणवत्ता को समझने का आह्वान है। एक्यूरेट याद वह स्थिति है, जिसमें मन इधर-उधर नहीं भटकता, बुद्धि अनेक बातों में नहीं उलझती, और आत्मा एक बिंदु पर स्थिर होकर अपने परमपिता का अनुभव करती है।
योग शब्द वर्षों से आध्यात्मिक परंपराओं में प्रचलित रहा है, लेकिन आधुनिक संदर्भ में उसकी छवि बदल चुकी है। आज योग को अधिकतर आसन, प्राणायाम और शारीरिक अभ्यास तक सीमित समझ लिया गया है। ऐसे समय में याद शब्द अधिक सीधा और संबंधपरक रूप में उभरता है। जिस प्रकार एक बच्चा अपने पिता को याद करता है, या कोई अपने प्रिय को, उसी सहजता से आत्मा का अपने परमपिता से जुड़ना ही इस मुरली का मूल संकेत है। इसमें तकनीक नहीं, संबंध है। इसमें प्रदर्शन नहीं, अनुभव है।
यह मुरली जीवन के समय को लेकर भी एक सशक्त चेतावनी देती है। मनुष्य अक्सर यह सोचता है कि पहले जीवन के काम पूरे कर ले, बाद में आत्मिक उन्नति कर लेगा। लेकिन एक साधारण गणना ही इस भ्रम को तोड़ देती है कि जीवन का अधिकांश हिस्सा शरीर, परिवार, कामकाज, भोजन और विश्राम में बीत जाता है। आत्मा के लिए वास्तविक समय कितना बचता है, यह प्रश्न स्वयं में एक झटका है। यही चेतना भीतर यह स्पष्ट करती है कि परिवर्तन और साधना को टालने का अर्थ है उसे खो देना।
याद टिकती क्यों नहीं, इसका उत्तर भी इसी प्रवाह में सामने आता है। केवल बैठ जाने से स्मरण स्थिर नहीं होता। यदि दिनभर का जीवन अस्थिरता, देह-अभिमान, तुलना, चिंता और डिजिटल विचलनों में उलझा हुआ है, तो मन का एकाग्र होना कठिन है। इसी कारण मुरली जीवन की पवित्रता को याद की आधारशिला के रूप में प्रस्तुत करती है। शुद्ध भोजन, मर्यादित जीवन, अच्छा संग, पवित्रता और स्वमान की स्थिति मिलकर वह भूमि तैयार करते हैं, जहां स्मृति टिक सके। जैसा अन्न, वैसा मन केवल एक कहावत नहीं, बल्कि संकल्पों और कर्मों के बीच का सीधा संबंध है।
यहां एक और गहरी बात उभरती है कि याद केवल मानसिक शांति का साधन नहीं है। यह आत्मा पर जमा पुराने संस्कारों और पापों के बोझ को हल्का करने की प्रक्रिया भी है। मुरली में संकेत मिलता है कि पतित से पावन बनने की यह यात्रा किसी बाहरी कर्मकांड से नहीं, बल्कि एक परमात्मा की याद से पूरी होती है। यह परिवर्तन धीरे-धीरे भीतर से होता है, जहां आत्मा हल्की होने लगती है और उसकी दिशा बदलने लगती है।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह मार्ग केवल व्यक्तिगत प्रयास का विषय नहीं है। इसमें दिशा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब आत्मा श्रीमत के अनुसार चलती है, तभी उसका पुरुषार्थ सही दिशा में बढ़ता है। निश्चय और आज्ञाकारिता के इस संगम को ही सफलता का आधार बताया गया है। यहां यह भी उभरकर आता है कि यह ज्ञान और राजयोग कोई मनुष्य नहीं सिखा सकता। इसे सिखाने वाला स्वयं परमात्मा है, जो इस समय साधारण माध्यम से असाधारण शिक्षा दे रहा है।
आज के समय में संग का अर्थ भी बदल गया है। पहले कुसंग केवल व्यक्तियों तक सीमित था, अब वह डिजिटल माध्यमों में भी दिखाई देता है। मोबाइल, रील्स और निरंतर बदलती सामग्री मन को चंचल बनाती है। जहां रुचि होती है, वहीं ध्यान जाता है, और जहां ध्यान जाता है, वहीं स्मृति बनती है। इसलिए याद को जबरन पकड़ने की बजाय उसके प्रति रुचि और अपनापन विकसित करना आवश्यक है। जब आत्मा को परमात्मा के साथ संबंध में आनंद अनुभव होने लगता है, तब याद प्रयास नहीं रहती, बल्कि स्वाभाविक बन जाती है।
मुरली का एक अत्यंत गहरा संकेत अशरीरी अवस्था की ओर भी है। इसका अर्थ शरीर छोड़ना नहीं, बल्कि शरीर में रहते हुए उससे न्यारा अनुभव करना है। देह और उससे जुड़े संबंध, पद, काम और परिस्थितियां एक जाल की तरह हैं। जैसे मकड़ी अपने जाल को समेट लेती है, वैसे ही आत्मा को भी इन सब से अपनी शक्ति को वापस खींचकर एक बिंदु में स्थिर करना होता है। यही स्थिति मन को हल्का करती है और स्मृति को सहज बनाती है।
जब यह स्मृति स्थिर होने लगती है, तो उसका प्रभाव बाहर भी दिखाई देने लगता है। मुरली यह स्पष्ट करती है कि जो आत्माएं सच्ची याद में रहती हैं, उनके चेहरे पर एक अलग प्रकार की शांति और चमक दिखाई देती है। उनकी वाणी में मधुरता और व्यवहार में संतुलन आ जाता है। यह कोई दिखावा नहीं, बल्कि भीतर के अनुभव का स्वाभाविक परिणाम है।
इसी के साथ आत्मा की भूमिका भी स्पष्ट होती है। केवल स्वयं तक सीमित रहने की बजाय उसे एक मार्गदर्शक की भूमिका में भी देखा गया है। स्पिरिचुअल लाइट हाउस और माइट हाउस बनने का अर्थ है स्वयं प्रकाशमान रहना और दूसरों को भी दिशा देना। जब आत्मा अपने स्वमान में स्थित होकर चलती है, तो उसका हर कर्म स्वाभाविक रूप से प्रभावशाली बनता है।
समग्र रूप से यह मुरली जीवन को हल्का, शुद्ध और उद्देश्यपूर्ण बनाने की दिशा में एक स्पष्ट मार्ग दिखाती है। याद का अर्थ केवल आंखें बंद करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि आत्मा का वास्तविक संबंध एक परमात्मा से है। संसार एक पड़ाव है, अंतिम ठिकाना नहीं। शरीर एक साधन है, पहचान नहीं। संबंध जिम्मेदारियां हैं, बंधन नहीं।
अंततः यह समझ स्पष्ट रूप से उभरती है कि कठिनाई परमात्मा को याद करने में नहीं है, बल्कि उन बातों से मन हटाने में है जो परमात्मा से जुड़ी नहीं हैं। जिस दिन यह अंतर स्पष्ट हो जाता है, उसी दिन से याद प्रयास नहीं रहती, अनुभव बन जाती है।









