
April 25, 2026, 6:30 PM IST
ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय में प्रतिदिन पढ़ा जाने वाला ईश्वरीय मुरली पाठ साधकों के लिए केवल आध्यात्मिक अध्ययन नहीं, बल्कि जीवन, सेवा, निश्चय और आत्मिक उन्नति की दिशा समझाने वाला मार्गदर्शन माना जाता है। 25 अप्रैल 2026 की मुरली इसी क्रम में एक अत्यंत सूक्ष्म लेकिन निर्णायक विषय पर ध्यान खींचती है, जहां निश्चय, श्रीमत और केवल शिव बाबा की याद में स्थिर रहने की अवस्था प्रमुख रूप से उभरकर सामने आती है।
वरिष्ठ राजयोगी बीके डॉ. सचिन परब ने अपने वीडियो चिंतन आज का ज्ञान रहस्य में इसी मुरली को केंद्र में रखते हुए यह प्रश्न उठाया कि जब इस मार्ग का मूल आधार निराकार शिव बाबा की याद है, तब साधक की बुद्धि देहधारी व्यक्तियों, निमित्त आत्माओं या अपने-अपने मतभेदों में क्यों उलझ जाती है। उनका मुख्य संकेत यही रहा कि भावना अपनी जगह पवित्र हो सकती है, लेकिन मुरली की स्पष्ट दिशा साधक को बार-बार यह याद दिलाती है कि अंतिम आधार केवल शिव बाबा ही हैं।
आज की मुरली के प्रश्न-उत्तर खंड में निश्चय की अवस्था को बेहद स्पष्ट रूप से रखा गया है। बताया गया है कि जिन बच्चों का शिवबाबा में अटूट निश्चय होता है, वे बिना किसी संशय के श्रीमत पर चलते रहते हैं। उनके मन में यह विचार नहीं आता कि इससे नुकसान होगा, क्योंकि उनके भीतर यह दृढ़ विश्वास होता है कि उनके हर कदम के पीछे स्वयं परमपिता की जिम्मेदारी है। यही निश्चय उनकी अवस्था को अडोल और अचल बना देता है।
डॉ. सचिन परब के विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि निराकार और साकार के बीच जो द्वंद्व कई बार साधकों के मन में उठता है, उसे मुरली के आधार पर समझना होगा। ब्रह्मा बाबा तक ने बच्चों से कहा कि मुझे याद मत करो, शिव बाबा को याद करो। जब ब्रह्मा बाबा के लिए भी यह स्पष्ट दिशा है, तो अन्य देहधारी आत्माओं की स्मृति में बुद्धि को उलझाना साधना की मूल दिशा से हटने का कारण बन सकता है। महान आत्माओं के प्रति सम्मान स्वाभाविक है, लेकिन याद का लक्ष्य केवल एक शिव बाबा ही रहना चाहिए।
यहीं भावना और विवेक का सूक्ष्म अंतर सामने आता है। जिन आत्माओं से पालना मिली, जिनके जीवन में विशेषताएं रहीं, उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता उचित है, लेकिन सम्मान और याद में अंतर है। सम्मान प्रेरणा देता है, जबकि याद आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है। यदि यह भेद स्पष्ट न रहे, तो साधक भावना में बहकर उस दिशा से हट सकता है, जिसे मुरली मूल पुरुषार्थ मानती है।
आज की मुरली निमित्त आत्माओं के प्रति दृष्टि को भी सूक्ष्मता से स्पष्ट करती है। संगठन और सेवा में कई आत्माएं निमित्त होती हैं, उनसे मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इससे साधना की दिशा नहीं बदलनी चाहिए। डॉ. सचिन परब इसी संदर्भ में यह बात सामने रखते हैं कि यदि निमित्त आत्मा से कोई भूल भी हो जाए, तो साधक का काम उस आत्मा में अटकना नहीं, बल्कि करण-करावनहार बाबा को देखना है।
इसका अर्थ यह नहीं कि निमित्त आत्माओं की जिम्मेदारी कम हो जाती है। जो मंच पर हैं, जिन पर दूसरों की दृष्टि है, उन्हें अपने हर कर्म में सावधानी रखनी होती है। लेकिन साधक के लिए मूल पुरुषार्थ यह बनता है कि वह मतभेद को मनभेद न बनने दे। सेवा में अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं, पर मन में दूरी, शिकायत और प्रतिक्रिया की भावना आत्मिक स्थिति को कमजोर करती है।
मुरली के संकेतों से यह भी स्पष्ट होता है कि श्रीमत में मनमत को मिलाना सबसे सूक्ष्म बंधनों में से एक है। जब साधक स्वयं को समझदार मानकर बाबा की बात में अपनी बुद्धि की मिलावट करता है, तब वह बाहर से सही दिखते हुए भी भीतर से श्रीमत की शुद्धता से दूर हो रहा होता है। यही बुद्धि का अभिमान है, जो साधना की गति को धीमा कर देता है।
इसी संदर्भ में एक और अत्यंत सूक्ष्म बिंदु उभरता है। जब आत्मा श्रीमत को समझने के बजाय उसे अपनी बुद्धि के अनुसार ढालने लगती है, तब मार्ग की स्पष्टता धीरे-धीरे कम होने लगती है। यही वह स्थिति है जहाँ निश्चय और संशय के बीच का वास्तविक अंतर सामने आता है।
इस संदर्भ में आज की मुरली का वरदान अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। योगयुक्त स्थिति की पहचान बंधनमुक्त अवस्था है। यदि कोई आलोचना करे या कमजोरी का संकेत दे और उस समय मन में व्यर्थ संकल्प उठ जाए, तो वह भी बंधन है। हार-जीत, निंदा-स्तुति और मान-अपमान में समान स्थिति ही आत्मा को वास्तविक बंधनमुक्ति की ओर ले जाती है।
आज की मुरली यह भी स्पष्ट करती है कि निश्चय का बल आत्मा को अचल और अडोल बनाता है। जब आत्मा यह मानकर चलती है कि जो श्रीमत मिल रही है उसमें कल्याण समाया हुआ है और उसका दायित्व स्वयं बाबा पर है, तब भय और संशय समाप्त होने लगते हैं। यही निश्चय साधक को परिस्थितियों की हलचल से बचाता है और भीतर स्थिरता प्रदान करता है।
मुरली का मूल आधार आत्मा और परमात्मा का भेद है। आत्मा सूक्ष्म है, अविनाशी है, लेकिन जन्म-मरण के चक्र में आती है। परमात्मा जन्म-मरण से परे, सदा पावन और पतित-पावन है। इसलिए आत्मा को पावन बनाने का कार्य कोई देहधारी नहीं कर सकता। बाप दूरदेश से आते हैं और बच्चों को स्वर्ग के योग्य बनाते हैं। यही स्मृति साधक को देहधारी आधारों से निकालकर परम आधार की ओर ले जाती है।
इस पूरी मुरली का सार यही है कि साधक को निश्चयबुद्धि बनकर श्रीमत पर चलना है, शिव बाबा को याद करना है और सेवा में स्वयं को समर्पित करना है। सेवा का अर्थ केवल बाहरी कार्य नहीं, बल्कि दूसरों को सुख देना और अपनी स्थिति से प्रेरणा देना है। जो सेवा श्रीमत के आधार पर होती है, वही आत्मा को ऊंचे पद की ओर ले जाती है।
अंततः 25 अप्रैल की मुरली साधक के सामने एक स्पष्ट कसौटी रखती है। क्या बुद्धि शिव बाबा में स्थिर है या देहधारी आधारों में उलझी है। क्या मतभेद मनभेद बन रहा है या निश्चय उसे पार करा रहा है। क्या श्रीमत शुद्ध रूप में स्वीकार हो रही है या उसमें अपनी बुद्धि की मिलावट हो रही है। यही प्रश्न आज की मुरली के वास्तविक मंथन को सामने रखते हैं।
सच्चा पुरुषार्थ यही है कि सम्मान सबके लिए रहे, लेकिन याद एक की रहे। सेवा सबके लिए हो, लेकिन आधार बाबा ही रहें। मतभेद आएं, फिर भी मनभेद न बने। और जब भी संशय उठे, तब मुरली को सामने रखकर स्वयं से केवल इतना पूछा जाए कि बाबा ने क्या कहा। यही निश्चय साधना को स्थिर करता है और आत्मा को बंधनमुक्ति की दिशा में आगे बढ़ाता है।








