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डेडलाइन के साए में होर्मुज: राहत या बड़ा हमला, दुनिया की नजरें टिकीं

होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते वैश्विक तेल मार्ग, जिस पर दुनिया की बड़ी ऊर्जा आपूर्ति निर्भर करती है। प्रतीकात्मक इमेज: खुली किताब
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–नीलेश कटारिया

श्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष अब उस निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है जहाँ कूटनीति और युद्ध एक साथ आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन दोनों में से कोई भी अब तक किसी निर्णायक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाया है। पांच सप्ताह से जारी इस टकराव के बीच एक तरफ युद्धविराम की कोशिशें तेज़ हुई हैं, तो दूसरी तरफ डेडलाइन के ठीक पहले स्थिति और जटिल होती नजर आ रही है।

ईरान ने अस्थायी युद्धविराम के प्रस्ताव को ठुकराते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल अस्थायी समझौते के आधार पर होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने को तैयार नहीं है, जबकि अमेरिका की ओर से सैन्य कार्रवाई की चेतावनियां और तीखी हो गई हैं। अब यह संघर्ष केवल बातचीत या दबाव की कहानी नहीं रह गया, बल्कि एक ऐसी उलटी गिनती में बदल चुका है जहाँ आने वाले कुछ घंटे तय करेंगे कि हालात संभलेंगे या और ज्यादा बिगड़ेंगे।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से होर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही बहाल करने को कहा है। इसके लिए मंगलवार रात 8 बजे (अमेरिकी समय), यानी भारत में बुधवार सुबह करीब 5:30 बजे तक की समयसीमा तय की गई है। चेतावनी दी गई है कि यदि तय समय तक कोई समझौता नहीं होता, तो ईरान के ऊर्जा संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को निशाना बनाया जा सकता है।

यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की समयसीमा तय की गई हो। इससे पहले भी कई बार डेडलाइन घोषित की गई और बाद में उसे आगे बढ़ाया गया। लेकिन इस बार अमेरिकी पक्ष इसे अंतिम समयसीमा के रूप में पेश कर रहा है, जिससे स्थिति की गंभीरता और बढ़ गई है।

होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग पाँचवां हिस्सा वहन करता है। हालांकि मौजूदा हालात में कुछ सीमित और नियंत्रित आवाजाही की अनुमति दिए जाने की खबरें भी सामने आई हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पूर्ण अवरोध के बावजूद आंशिक गतिविधि जारी है। फरवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने के बाद से इस मार्ग पर ईरान का नियंत्रण और प्रतिबंध वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े दबाव के रूप में उभरा है। यही कारण है कि यह जलडमरूमध्य अब केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि इस पूरे टकराव का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक केंद्र बन चुका है।

इस बीच कूटनीतिक स्तर पर भी प्रयास जारी हैं। पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये जैसे देशों की मध्यस्थता में एक चरणबद्ध प्रस्ताव सामने आया है, जिसमें पहले तत्काल युद्धविराम और उसके बाद 15 से 20 दिनों के भीतर स्थायी समझौते की दिशा में बातचीत का प्रावधान रखा गया है। लेकिन यह प्रस्ताव अभी तक किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पाया है, क्योंकि दोनों पक्षों के बीच मूलभूत शर्तों पर सहमति नहीं बन पाई है।

हालांकि कूटनीतिक स्तर पर संपर्क अभी भी जारी हैं, जिससे अंतिम क्षणों में किसी समझौते की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। लेकिन जिस तरह से दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं, उससे यह भी साफ है कि किसी भी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा।

ईरान का रुख इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बन गया है। तेहरान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह किसी भी प्रकार के अल्टीमेटम या समयसीमा के दबाव में निर्णय नहीं लेगा और अस्थायी युद्धविराम के बदले होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने के लिए तैयार नहीं है।

यह रुख केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि पिछले दौर की बातचीत के दौरान हुए हमलों के बाद पैदा हुए अविश्वास से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है। ईरान ने इस प्रस्ताव को खारिज करने के साथ-साथ अपनी शर्तों पर आधारित एक विस्तृत प्रतिप्रस्ताव भी रखा है, जिसमें स्थायी युद्धविराम, प्रतिबंधों में ढील और सुरक्षा आश्वासन जैसी मांगें शामिल हैं।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी और मानवीय चिंताएं भी सामने आई हैं। संयुक्त राष्ट्र ने नागरिक अवसंरचना पर संभावित हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला देते हुए चिंता जताई है। हालांकि अमेरिकी पक्ष ने इन आशंकाओं को गंभीरता से नहीं लिया है, जिससे इस संघर्ष के कानूनी आयाम भी चर्चा का विषय बन गए हैं।

जमीन पर हालात अभी भी बेहद गंभीर बने हुए हैं। क्षेत्र में लगातार हवाई हमले और जवाबी कार्रवाई जारी हैं, ऊर्जा संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जा रहा है और संघर्ष का दायरा कई देशों तक फैल चुका है। हजारों लोगों की मौत और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान ने इस युद्ध को एक गहरे मानवीय संकट का रूप दे दिया है। डेडलाइन के ठीक पहले भी क्षेत्र में हमले जारी हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जमीन पर संघर्ष थमा नहीं है।

वैश्विक बाजारों में भी इस तनाव का सीधा असर दिखाई दे रहा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और निवेशकों की सतर्कता यह संकेत देती है कि बाजार अभी भी अनिश्चितता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

डेडलाइन समाप्त होने में अब बेहद कम समय शेष है। अमेरिकी समयानुसार तय यह समयसीमा भारत में बुधवार सुबह लगभग 5:30 बजे समाप्त होगी, यानी अब हर गुजरता क्षण इस संकट को या तो शांति की ओर मोड़ सकता है या फिर इसे एक और बड़े टकराव की दिशा में धकेल सकता है।

अंततः यह स्थिति उसी निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है जहाँ यह समयसीमा केवल कूटनीतिक सफलता या विफलता तय नहीं करेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि यह संघर्ष थमेगा या एक और बड़े सैन्य विस्तार की ओर बढ़ेगा।

दुनिया के बड़े फैसले अक्सर बंद कमरों में लिए जाते हैं, लेकिन उनके असर की गूंज सबसे पहले बाजारों में सुनाई देती है और धीरे-धीरे आम जीवन में उतरती चली जाती है। और यहीं से वैश्विक घटनाओं का असर आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी में उतरने लगता है।

क्या सुप्रीम कोर्ट की सलाहकारी राय भारतीय संघवाद में राज्यपालों की भूमिका को और अधिक शक्तिशाली बना देती है?

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