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निजता का कवच या सूचना की दीवार: डिजिटल डेटा कानून का बदलता संतुलन

निजता और सूचना के बीच संतुलन का बदलता स्वरूप, जहाँ एक ओर डेटा सुरक्षा का कवच है, वहीं दूसरी ओर जानकारी तक पहुँच का दरवाज़ा सिमटता हुआ दिखाई देता है। (प्रतीकात्मक इमेज)
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Written by
–नीलेश कटारिया

✍️ एक सवाल, कानून के भीतर…


कानून हमेशा संसद में बनते हैं, लेकिन उनका असर लोगों तक धीरे धीरे पहुँचता है। डिजिटल डेटा संरक्षण कानून भी कुछ ऐसा ही है। ऊपर से यह एक भरोसा देता है कि आपकी निजी जानकारी सुरक्षित रहेगी। यह सुनने में सुकून देता है। लेकिन इसी कानून के भीतर एक ऐसा बदलाव छिपा है, जिसने एक पुराने सवाल को फिर से जिंदा कर दिया है कि अब नागरिक क्या जान पाएगा और क्या नहीं।

सूचना का अधिकार कोई साधारण कानून नहीं था, बल्कि एक लंबे संघर्ष का परिणाम था। लोगों ने यह सवाल उठाया कि सरकार जनता के पैसे से चलती है, तो उसके कामकाज की जानकारी जनता से छुपी क्यों रहे। यह मांग गांवों से उठी और पूरे देश में फैल गई। 2005 में इसे कानूनी रूप मिला और पहली बार एक आम नागरिक को यह अधिकार मिला कि वह बिना कारण बताए सरकार से जानकारी मांग सके।

यही वह बदलाव था जिसने सरकारी फाइलों को बंद कमरों से निकालकर सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में ला दिया। इसी रास्ते से राशन वितरण में गड़बड़ियां उजागर हुईं, मनरेगा के भुगतान में फर्जीवाड़ा सामने आया और सरकारी नियुक्तियों की परतें खुलीं। पत्रकारों के साथ साथ आम नागरिक भी अब केवल दर्शक नहीं रहा, वह सिस्टम से जवाब लेने वाला बन गया।

अब उसी व्यवस्था के समानांतर एक दूसरा कानून खड़ा हुआ है। डेटा संरक्षण कानून कहता है कि किसी भी व्यक्ति की निजी जानकारी को बिना वजह सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। यह अपने आप में जरूरी सिद्धांत है। कोई भी व्यक्ति नहीं चाहेगा कि उसकी निजी जानकारी बिना नियंत्रण के सामने आ जाए। लेकिन जब यही सिद्धांत सरकारी रिकॉर्ड पर लागू होता है, तब सवाल बदल जाता है।

यहीं से दोनों कानूनों का टकराव सामने आता है। एक कानून कहता है कि जानकारी दी जानी चाहिए, दूसरा कहता है कि यह निजी जानकारी है और इसे रोका जाना चाहिए। पहले इस स्थिति में एक संतुलन मौजूद था, जहाँ यदि किसी जानकारी में बड़ा सार्वजनिक हित होता, तो उसे दिया जा सकता था। अब उसी संतुलन की प्रकृति बदलती हुई दिखाई देती है।

यहाँ तस्वीर साफ होती है। एक दरवाजा पहले से खुला था, जहाँ सार्वजनिक हित के आधार पर जानकारी तक पहुँचा जा सकता था। लेकिन अब उसी ढांचे में एक ऐसा दूसरा दरवाजा खड़ा कर दिया गया है, जो उस पहुँच को सीमित करने की क्षमता रखता है।

यही वह बिंदु है जहाँ इस पूरे विवाद की संवैधानिक नींव समझना आवश्यक हो जाता है। भारत के संविधान के तहत जहाँ एक ओर अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमामय जीवन और निजता का अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 19(1)(अ) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ सूचना तक पहुँच के अधिकार को भी संरक्षित करता है। इन दोनों अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना ही विधायिका और न्यायपालिका की सबसे बड़ी जिम्मेदारी रही है।

इसी संतुलन को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन (2012) के निर्णय में कहा था कि किसी सरकारी कर्मचारी से जुड़ी सेवा संबंधी जानकारी, संपत्ति विवरण और आयकर संबंधी सूचनाएं ‘व्यक्तिगत जानकारी’ की श्रेणी में आती हैं। ऐसी जानकारी का प्रकटीकरण सामान्यतः निजता में अनावश्यक हस्तक्षेप माना जाएगा। लेकिन न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सक्षम प्राधिकारी इस बात से संतुष्ट हो कि व्यापक सार्वजनिक हित ऐसी जानकारी के प्रकटीकरण को उचित ठहराता है, तो उसे पूरी तरह रोका नहीं जा सकता।

यानी कानून ने पहले ही एक संतुलित रास्ता तय कर रखा था। यहाँ न तो निजता पूर्णतः अछूती थी और न ही सूचना का अधिकार पूरी तरह निरंकुश था। लेकिन अब जो नए प्रावधान सामने आए हैं, वे इस स्थापित संतुलन को किस दिशा में ले जा रहे हैं, यही इस पूरी बहस का केंद्रीय प्रश्न बन जाता है।

यह भी समझना जरूरी है कि यह बदलाव केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि संसद की विधायी प्रक्रिया के तहत लाया गया है। संविधान के अनुच्छेद 107 से 111 तक संसद को कानून बनाने की शक्ति और प्रक्रिया निर्धारित करते हैं। इसमें विधेयक का प्रस्तुत होना, दोनों सदनों से पारित होना और अंततः राष्ट्रपति की स्वीकृति शामिल होती है। अर्थात यह परिवर्तन एक पूर्ण विधायी प्रक्रिया से गुजरकर लागू हुआ है। इससे इसकी वैधता पर कोई संदेह नहीं रहता, लेकिन इसके प्रभावों पर सवाल उठाना पूरी तरह वैध और लोकतांत्रिक अधिकार है।

डिजिटल डेटा संरक्षण कानून के तहत केवल एक नया ढांचा ही नहीं बना, बल्कि इसके माध्यम से सूचना के अधिकार कानून की धारा 8(1)(j) में ऐसा संशोधन किया गया, जिसने व्यक्तिगत जानकारी की व्याख्या को एक नया आधार दे दिया। पहले जहाँ सार्वजनिक हित और निजता के बीच संतुलन की कसौटी लागू होती थी, अब व्यक्तिगत डेटा स्वयं में जानकारी रोकने का आधार बन गया है, भले ही सार्वजनिक हित का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ हो।

यह बदलाव केवल कानून का नहीं, दृष्टिकोण का है। जहाँ पहले जानकारी देने को सही माना जाता था, अब जानकारी रोकना सुरक्षित विकल्प बनता जा रहा है। जानकारी पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन उसे पाने के लिए अब पहले से ज्यादा ठोस आधार दिखाना पड़ता है।

सूचना के अधिकार कानून में किया गया यह बदलाव किसी अलग संशोधन विधेयक के माध्यम से नहीं, बल्कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 की धारा 44(3) के जरिए किया गया है। संसद ने अगस्त 2023 में इस कानून को पारित किया और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह कानून बन गया। विधायी प्रक्रिया के अनुसार यह पूरी तरह वैध है, लेकिन इसका प्रभाव अब न्यायालय के सामने एक बड़े संवैधानिक प्रश्न के रूप में खड़ा है।

डिजिटल डेटा संरक्षण कानून कागज पर 2023 में लागू हो चुका है, लेकिन इसका वास्तविक असर चरणबद्ध तरीके से सामने आ रहा है। जनवरी 2025 में इसके मसौदा नियम सामने आए, जिस पर सुझाव मांगे गए। इसके बाद 13 नवंबर 2025 को अंतिम नियम अधिसूचित किए गए। लेकिन पूरा ढांचा एक साथ लागू नहीं हुआ है। असली अनुपालन और दंडात्मक व्यवस्था 2027 तक जाकर पूरी तरह सक्रिय होगी।

यह कानून सीधे तौर पर सूचना को रोकने का आदेश नहीं देता, लेकिन यह व्यक्तिगत डेटा के उपयोग पर ऐसे मानक तय करता है, जिनके कारण व्यवहार में जानकारी तक पहुंच का रास्ता अधिक जटिल हो सकता है। कौन सी जानकारी नागरिक तक पहुँचेगी और कौन सी निजता के नाम पर रुक जाएगी, इसका वास्तविक आधार अब इसी ढांचे के भीतर तय होगा।

दोनों कानूनों में सजा की प्रकृति ही उनके उद्देश्य को स्पष्ट कर देती है। एक कानून संस्था को नियंत्रित करता है और भारी आर्थिक दंड के जरिए अनुशासन लाता है। डेटा उल्लंघन या सुरक्षा में चूक होने पर सैकड़ों करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। दूसरी ओर सूचना का अधिकार कानून एक अधिकारी को जवाबदेह बनाता है और सीमित दंड के जरिए पारदर्शिता सुनिश्चित करने की कोशिश करता है।

यहीं से यह अंतर और स्पष्ट हो जाता है। एक कानून का दबाव जानकारी को सुरक्षित रखने की ओर है, जबकि दूसरा कानून जानकारी को सामने लाने की दिशा में काम करता है। और जब ये दोनों दबाव एक साथ काम करते हैं, तब व्यवहार में एक नया संतुलन बनता है। अक्सर सुरक्षित रास्ता वही माना जाता है जिसमें जोखिम कम हो, और ऐसे में जानकारी रोकना कई बार जानकारी देने से आसान विकल्प बन जाता है।

यही वह जगह है जहाँ एक साधारण नागरिक, एक पत्रकार और एक सूचना अधिकारी तीनों के लिए स्थिति सरल नहीं रह जाती। सवाल पूछना भी कठिन होता है और जवाब देना भी। धीरे धीरे एक मनोविज्ञान भी बनता है, जिसमें पारदर्शिता से ज्यादा प्राथमिकता सुरक्षित निर्णय को मिलने लगती है।

यह केवल एक तकनीकी कानून नहीं है। यह तय करता है कि राज्य और नागरिक के बीच जानकारी का प्रवाह कैसा होगा। यह तय करता है कि सवाल पूछना कितना आसान रहेगा और जवाब मिलना कितना कठिन होगा। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति दिखाई देती है।

इस कानून के कुछ प्रावधान सरकार को यह अधिकार भी देते हैं कि वह जरूरत पड़ने पर डेटा मांग सके। कागज पर इसके लिए सीमाएं रखी गई हैं और उद्देश्य तय किए गए हैं, लेकिन एक सवाल यहाँ भी उठता है कि इन शक्तियों की निगरानी कौन करेगा। जब निर्णय लेने वाला और लागू करने वाला एक ही ढांचे के भीतर हो, तब संतुलन बनाए रखना हमेशा आसान नहीं होता।

इसी वजह से यह मामला अब अदालत तक पहुँच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय इस पर विचार कर रहा है कि क्या यह बदलाव उस संवैधानिक संतुलन को प्रभावित करता है, जहाँ एक तरफ निजता का अधिकार है और दूसरी तरफ जानकारी का अधिकार। यह केवल कानूनी बहस नहीं है, बल्कि उस दिशा का संकेत है जिसमें लोकतंत्र आगे बढ़ेगा।

इस पूरी बहस को अगर एक साधारण सवाल में बदलें, तो वह यह है कि क्या हम एक ऐसे दौर में जा रहे हैं जहाँ जानकारी पाने के लिए ज्यादा वजह बतानी पड़ेगी और ज्यादा साबित करना पड़ेगा। या फिर यह केवल एक जरूरी संतुलन है, जो डिजिटल युग में निजता को बचाने के लिए आवश्यक था।

दोनों पक्ष अपनी जगह सही लगते हैं। लेकिन हर कानून की असली परीक्षा कागज पर नहीं, जमीन पर होती है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह कानून नागरिक को सुरक्षित करता है या उसे थोड़ा और चुप कर देता है। क्योंकि अंत में कानून के भीतर सवाल यही रहता है कि क्या एक नागरिक बिना डर के सवाल पूछ सकता है, और क्या उसे जवाब मिल पाएगा।

क्या आपको लगता है कि तकनीकी चेतावनियों को बार-बार नजरअंदाज करना प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण है?

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