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होर्मुज पर जकड़न, भारत पर बढ़ता दबाव: ईरान-इजराइल युद्ध ने तेल, रुपये और बाजार को झकझोरा

होर्मुज संकट का असर भारत की मुद्रा, तेल लागत और बाजार पर साफ दिखाई दिया। प्रतीकात्मक इमेज: खुली किताब
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—खुली किताब | रिसर्च टीम

अहमदाबाद, 17 मार्च 2026 | ईरान-इजराइल युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक संघर्ष का असर केवल सैन्य ठिकानों और सीमा क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा। अलबत्ता इसका दबाव ऊर्जा आपूर्ति, मुद्रा बाजार, महंगाई और शेयर बाजार तक पहुंच चुका है। इस समय पूरी दुनिया की नजर होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी है, क्योंकि वैश्विक तेल आपूर्ति की सबसे अहम धारा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरती है।

युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज जलडमरूमध्य से प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल गुजर रहा था। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के जून 2025 तक उपलब्ध आधिकारिक संकेत बताते हैं कि 2025 की पहली तिमाही में भी इस मार्ग पर तेल का प्रवाह लगभग इसी स्तर पर बना हुआ था।

अब स्थिति सामान्य नहीं कही जा सकती। 28 फरवरी 2026 को युद्ध शुरू होने के बाद से 17 मार्च तक होर्मुज से कुल मिलाकर केवल लगभग 2.4 करोड़ बैरल तेल गुजर पाने का अनुमान सामने आया है। इस अवधि के लिए कोई एकल सार्वजनिक सरकारी दैनिक गणना उपलब्ध नहीं है, इसलिए यह आकलन उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और समुद्री गतिविधि के संकलित संकेतों पर आधारित है।

इसी आधार पर औसत दैनिक प्रवाह घटकर लगभग 13 से 14 लाख बैरल प्रतिदिन रह जाता है, जो सामान्य स्तर की तुलना में तीखी गिरावट का संकेत देता है। 2 मार्च से 14 मार्च के बीच केवल 47 जहाजों के पार होने की सूचना भी इसी असामान्य स्थिति की पुष्टि करती है।

ऊर्जा बाजार पर दबाव का आधिकारिक संकेत अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के हालिया आकलनों में भी दिखाई देता है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि होर्मुज पूरी तरह बंद नहीं हुआ, लेकिन हमले के जोखिम और बीमा संबंधी बाधाओं के कारण बड़ी संख्या में टैंकर इस मार्ग से बचने लगे हैं। इसका सीधा असर क्षेत्रीय उत्पादन, आपूर्ति और वैश्विक ऊर्जा प्रवाह पर पड़ रहा है। यही वजह है कि यह संकट केवल समुद्री तनाव नहीं, बल्कि वैश्विक तेल बाजार की स्थिरता से जुड़ा गंभीर संकट बन चुका है।

भारत में इसका असर सीधे आर्थिक संकेतकों पर दिखाई दे रहा है। पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ के उपलब्ध अभिलेख बताते हैं कि 13 मार्च 2026 को भारतीय कच्चे तेल के मानक मिश्रित मूल्य का स्तर 136.56 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। दूसरी ओर भारतीय रिजर्व बैंक की संदर्भ विनिमय दर के उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार 16 मार्च 2026 को डॉलर के मुकाबले रुपया 92.3966 पर दर्ज था। 17 मार्च को भी रुपया दबाव में रहा और 92.37 प्रति डॉलर के आसपास कारोबार करता हुआ अपने रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब बना रहा। महंगा कच्चा तेल और दबाव में रुपया मिलकर आयात निर्भर अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं, जिसका असर आगे चलकर ईंधन लागत, परिवहन खर्च और महंगाई पर पड़ना स्वाभाविक माना जा सकता है।

भारतीय शेयर बाजार ने इस तनावपूर्ण माहौल में टूटने के बजाय संभलकर प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रीय शेयर बाजार के आधिकारिक संकेतकों के अनुसार 17 मार्च 2026 को निफ्टी 50 23581.15 पर बंद हुआ और उसमें 0.74 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई। इसी दिन बीएसई सेंसेक्स भी 76070.84 पर बंद हुआ और उसमें 0.75 प्रतिशत की बढ़त रही। यह बताता है कि बाजार में घबराहट का माहौल पूरी तरह हावी नहीं था, लेकिन तेजी के भीतर सतर्कता स्पष्ट बनी हुई थी।

बाजार की इसी सतर्कता का व्यापक अर्थ रॉयटर्स की रिपोर्टिंग में और स्पष्ट दिखाई देता है। एजेंसी के अनुसार ऊंचे कच्चे तेल ने बाजार की बढ़त को सीमित रखा और मार्च में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से 6.9 अरब डॉलर निकाल लिए। रॉयटर्स ने यह भी रेखांकित किया कि यही वजह है कि सूचकांकों में उछाल के बावजूद निवेशक विश्वास पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिख रहा।

रॉयटर्स की 16 मार्च की एक ऊर्जा रिपोर्ट के अनुसार शिपिंग और ट्रैकिंग आंकड़ों ने संकेत दिया कि 15 मार्च तक के सप्ताह में पश्चिम एशिया के आठ प्रमुख देशों का तेल निर्यात फरवरी के स्तर से कम से कम 60 प्रतिशत गिर गया था। यह पूरा क्षेत्रीय निर्यात है, सीधे होर्मुज से गुजरने वाली हर बैरल मात्रा का आधिकारिक हिसाब नहीं। फिर भी इससे इतना स्पष्ट होता है कि संकट केवल आशंका का नहीं, वास्तविक आपूर्ति बाधा का रूप ले चुका है।

भारत के लिए इस पूरी तस्वीर का निष्कर्ष स्पष्ट है। पश्चिम एशिया का युद्ध ऊर्जा आपूर्ति की सबसे संवेदनशील धुरी को झकझोर चुका है और उसका असर अब भारत के भीतर कई स्तरों पर महसूस किया जा रहा है। हालात अभी पूरी तरह बेकाबू नहीं दिखते, लेकिन संकेत यही हैं कि यदि होर्मुज पर तनाव लंबा खिंचा तो महंगाई, आयात लागत और निवेशक विश्वास पर इसका असर और अधिक गहरा हो सकता है।

यही कारण है कि इस युद्ध को केवल भू राजनीतिक टकराव के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह अब आम आदमी की जेब, देश की आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था, महंगाई की दिशा और बाजार की मनोदशा से जुड़ा हुआ वास्तविक आर्थिक संकट बन चुका है।

क्या बिना तय समय-सीमा के, राज्यपालों द्वारा बिलों पर देरी राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बढ़ाती है?

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