
गांधीनगर, 16 फरवरी 2026 | बीते रविवार की सुबह की हल्की ठंडक और वातावरण में गूँजता ‘ओम शांति’ का मधुर स्वर मानो संकेत दे रहा था कि आज का दिन सामान्य नहीं है। गुजरात की राजधानी गांधीनगर के सेक्टर 28 स्थित मुख्य ब्रह्माकुमारी सेवा केंद्र के परिसर में प्रवेश करते ही श्रद्धा, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का ऐसा संयमित और सौम्य वातावरण अनुभव हुआ, मानो यह स्थान किसी विशिष्ट आत्मिक उत्सव के स्वागत में पूर्णतः सुसज्जित होकर प्रतीक्षा कर रहा हो।
महाशिवरात्रि पर्व को शिव जयंती के रूप में भी गहन श्रद्धा से मनाया जाता है। यहां इसे परंपरागत उत्साह और सुव्यवस्थित अनुशासन के साथ मनाया गया। प्रातः काल की प्रथम आभा में परमपिता परमात्मा की स्मृति में संपन्न गहन योग और भोग से इस आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत हुई।
इसके पश्चात ध्वजारोहण, सामूहिक प्रतिज्ञा और भक्तिभाव से ओतप्रोत विविध कार्यक्रमों के माध्यम से यह क्रम दिनभर आत्मिक चेतना के एक सशक्त और प्रेरक अनुभव में विकसित होता चला गया।
प्रभात से रात्रि तक: योग, मुरली और आध्यात्मिक संदेश
कार्यक्रम का आरंभ सामूहिक राजयोग से हुआ, जहाँ साधकों ने परमात्मा शिव बाबा की स्मृति में स्वयं को स्थित किया। इसके पश्चात श्रद्धाभाव से भोग अर्पित किया गया और मुरली कक्षा में परमात्म ज्ञान का वाचन हुआ। उपस्थित श्रद्धालु मुरली वाचन (परमात्मा ज्ञान) के प्रत्येक बिंदु पर गंभीरता से मनन करते दिखाई दिए।
वातावरण में बाहरी शांति के साथ भीतर आत्मजागरण की प्रक्रिया स्पष्ट अनुभव की जा रही थी। सेवाकेंद्र प्रभारी राजयोगिनी बीके कैलाश दीदी ने महाशिवरात्रि के आध्यात्मिक महत्व को सरल शब्दों में स्पष्ट किया।
अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि ‘रात्रि’ कलियुग रूपी अज्ञान की अवस्था का प्रतीक है और परमात्मा शिव बाबा अजन्मा, अभोगता तथा निराकार हैं, जो इस अंधकार के अंत में विश्व कल्याण हेतु दिव्य अवतरण करते हैं। उन्होंने स्व-परिवर्तन द्वारा विश्व-परिवर्तन के मार्ग से जुड़ने का आह्वान किया और उपस्थितों से आत्मशुद्धि तथा वैश्विक शांति का संकल्प लेने का आग्रह किया।
राजयोगिनी बीके कैलाश दीदी के व्यक्तित्व की सहजता उनके वक्तव्यों में झलकती रही। शांत, संयत और करुणाभाव से युक्त उनकी प्रस्तुति ने उपस्थित श्रद्धालुओं को विषय से गहराई से जोड़े रखा। वातावरण में एक गंभीर किंतु सौम्य आध्यात्मिक एकाग्रता स्थापित होते दिखाई दी।

उनके आशीर्वचनों के पश्चात शिव जयंती के उपलक्ष्य में परमपिता शिव बाबा के दिव्य अवतरण दिवस का प्रतीकात्मक केक काटकर कार्यक्रम में एक उत्सवमय पल भी जुड़ा। गंभीर और आध्यात्मिक वातावरण के बीच यह क्षण विशेष आकर्षण का केंद्र बना, जहाँ परंपरा और आधुनिक अभिव्यक्ति का संतुलित रूप सामने आया।
घी से निर्मित पशुपतिनाथ शिवलिंग और गणमान्य अतिथियों की गरिमामय उपस्थिति
शिव जयंती के विशेष अवसर पर पशुपतिनाथ के शिवलिंग के स्वरूप में तैयार किए गए घी के शिवलिंग का अनावरण इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहा। पुष्पों और सौम्य सज्जा से अलंकृत यह अस्थायी मंदिर श्रद्धालुओं में विशेष आकर्षण का केंद्र बना।
गांधीनगर (उत्तर) की विधायक रीटा बहन पटेल सहित मंचस्थ अतिथियों में कॉर्पोरेटर वैशाली बहन, उद्योगपति दिनेशभाई चावड़ा तथा कैपिटल ऑफसेट के अग्रणी एवं समाजसेवी रमेशभाई पटेल की उपस्थित इस अवसर को विशेष महत्व प्रदान करती देखी गईं। सभी अतिथियों ने परमात्मा शिव बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की और इस आध्यात्मिक आयोजन की सराहना की।
चार्ट और मॉडल से आत्मावलोकन तक: आध्यात्मिक यात्रा का जीवंत चित्रण
प्रदर्शनी हॉल में प्रवेश करते ही आत्मा, परमात्मा और सृष्टि चक्र को दर्शाते सुस्पष्ट चार्ट, मॉडल और आध्यात्मिक संदेशों से सुसज्जित पोस्टर लोगों को सहज ही आकर्षित कर रहे थे। समर्पित भाई-बहन सरल और स्पष्ट शब्दों में प्रत्येक चित्र और प्रतीक का अर्थ समझा रहे थे।

एक ओर दीप और ज्योति के उदाहरण से आत्मा और परमात्मा के संबंध को स्पष्ट किया गया, तो दूसरी ओर कलियुग से सतयुग की परिवर्तन यात्रा को दृश्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था। उपस्थित लोग गंभीरता से सुनते, प्रश्न पूछते और फिर कुछ क्षणों के लिए मौन खड़े होकर अपने भीतर झांकते दिखाई दिए।
यहाँ केवल जानकारी नहीं दी जा रही थी, बल्कि यह समझाया जा रहा था कि “मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और मेरा वास्तविक घर कौन-सा है।” ज्ञान का यह स्पर्श अनेक चेहरों पर एक गहरी शांति बनकर उतरता दिखाई दे रहा था।
इसी ज्ञान यात्रा को और अधिक सृजनात्मक आयाम वैल्यू गेम्स स्टॉल ने प्रदान किया। खेल-खेल में सकारात्मक चिंतन, एकाग्रता, आत्म-संयम और नैतिक मूल्यों का संदेश दिया गया। लक्ष्य पर केंद्रित रहने, निर्णय क्षमता को संतुलित रखने और मन को परमात्म स्मृति में स्थिर करने जैसे आध्यात्मिक सिद्धांतों को प्रतीकात्मक खेलों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। इन खेलों के जरिए साधकों को व्यवहारिक जीवन में इन मूल्यों को अपनाने का संदेश दिया गया। सेवा केंद्र के समर्पित बीके भाई–बहन इन्हें सरल और सहज भाषा में समझा रहे थे।
कार्यक्रम में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर आयु वर्ग की उत्साहपूर्ण सहभागिता देखी गई। वातावरण उल्लास से सराबोर था, किन्तु अनुशासन भी उतना ही स्पष्ट था। यह दृश्य प्रमाणित कर रहा था कि यहाँ आध्यात्मिकता केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवंत अनुभव है।
सेवा केंद्र परिसर में ही मुरली वाचन हॉल के नजदीकी अन्य हॉल में दिनभर प्रदर्शित की गई आध्यात्मिक लघु फिल्म ने इस अनुभूति को और गहराई दी। मंद प्रकाश और शांत वातावरण में उभरते प्रश्न जैसे ‘आप कौन हैं’, ‘क्या यह शरीर ही आपकी पहचान है’ और ‘आपका मूल घर कहाँ है’ दर्शकों को भीतर तक स्पर्श कर रहे थे।
फिल्म के माध्यम से आत्मा और परमात्मा के सूक्ष्म संबंध, परमधाम की अवधारणा तथा वर्तमान समय की आध्यात्मिक आवश्यकता को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया। प्रदर्शन के पश्चात कई श्रद्धालु कुछ क्षणों तक मौन बैठे दिखाई दिए, मानो वे स्वयं से संवाद कर रहे हों।
ध्वजारोहण, संकल्प और सेवाधारियों का समर्पण
सेवा केंद्र परिसर के भीतर 1936 में परमपिता परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण की स्मृति में परंपरागत रूप से 90वां शिवध्वज फहराया गया और उसके पश्चात विधिवत् ध्वज वंदन किया गया। ध्वज की ऊँचाई के साथ उठता सामूहिक संकल्प वातावरण में एक विशिष्ट गंभीरता भर रहा था।
उपस्थित तमाम श्रद्धालुओं ने आत्मशुद्धि, विश्वशांति और मूल्यनिष्ठ जीवन के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा ली।

इस आयोजन की सुव्यवस्थित और अनुशासित रूपरेखा के पीछे केंद्र के समर्पित ब्रह्माकुमारी बहनों और भाइयों का अथक योगदान रहा।
प्रदर्शनी, ध्यान कक्ष, लघु फिल्म प्रदर्शन और आगंतुकों के मार्गदर्शन सहित प्रत्येक क्षेत्र में सेवाधारियों ने समर्पणभाव से अपनी भूमिका निभाई। विशेष रूप से सेवा केंद्र में समर्पित राजयोगी बीके राजूभाई का इस कार्यक्रम की संपूर्ण व्यवस्था में गुप्त किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान उल्लेखनीय रहा।
मंच सज्जा से लेकर व्यवस्थागत समन्वय तक उन्होंने निस्वार्थ भाव से पर्दे के पीछे रहकर कार्य किया, जिससे पूरा आयोजन सुचारु रूप से संचालित होते देखा गया। राजयोगी बीके राजूभाई का यह मौन समर्पण सेवा की सच्ची भावना का परिचायक रहा।
श्रद्धा, ज्ञान और आत्मजागरण का संगम
शिव जयंती पर सेवा केंद्र का पूरा दिन श्रद्धा और ज्ञान के संगम का साक्षी बना। कोई प्रदर्शनी में आत्मा और परमात्मा के संबंध को समझ रहा था, तो कोई ध्यान कक्ष में कुछ क्षणों की शांति अनुभव कर रहा था। यह आयोजन केवल एक पर्व नहीं रहा, बल्कि आत्मबोध की दिशा में उठाया गया एक सामूहिक कदम सिद्ध हुआ।
सेक्टर 28 स्थित गांधीनगर का आध्यात्मिक रूप से प्रसिद्ध यह सेवा केंद्र बीते रविवार अनेक लोगों के भीतर एक स्थायी शांति और जागृति की अनुभूति छोड़ गया। महाशिवरात्रि का यह आयोजन केवल परंपरागत उत्सव नहीं रहा, बल्कि आत्मिक जागृति का अवसर बना।
राजयोगिनी बीके कैलाश दीदी के नेतृत्व और सेवा केंद्र के सेवाधारियों के समर्पण ने इस पर्व को एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभव में परिवर्तित कर दिया, जहाँ श्रद्धा, ज्ञान और सेवा का संगम एक साथ प्रवाहित होता रहा। दिनभर चला यह आयोजन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि जब सौम्यता, सेवा और परमात्म ज्ञान का संगम होता है, तब उत्सव जीवन में एक गहरे अनुभव के रूप में स्थापित हो जाता है।









