
अहमदाबाद, 6 फरवरी 2026 | राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (National Company Law Tribunal–NCLT), नई दिल्ली ने 3 फरवरी 2026 को अल्केमिस्ट लिमिटेड के खिलाफ चल रही पूरी दिवाला समाधान प्रक्रिया को रद्द कर दिया। न्यायाधिकरण का निष्कर्ष था कि यह कार्यवाही किसी वास्तविक आर्थिक दिवालियेपन का परिणाम नहीं, बल्कि दिवाला प्रक्रिया का उपयोग ऐसे तरीके से किया गया, जिससे आपराधिक जांच और संपत्ति-जब्ती की कार्यवाहियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता था।एनसीएलटी द्वारा पारित आदेश में स्पष्ट कहा गया कि दिवाला कानून का उद्देश्य संकटग्रस्त कंपनियों का पुनर्गठन है, न कि अपराध से अर्जित धन को वैधता का आवरण देना या मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में संरक्षण उपलब्ध कराना।
इस आदेश की पृष्ठभूमि में प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate–ED) की वह जांच है, जिसने अल्केमिस्ट समूह की कारोबारी संरचना के भीतर छिपे वित्तीय प्रवाह को उजागर किया। ईडी के अनुसार, समूह से जुड़ी विभिन्न कंपनियों ने आम निवेशकों से प्लॉट, विला, फ्लैट और असामान्य रूप से ऊँचे रिटर्न का वादा कर बड़े पैमाने पर धन जुटाया। यह धन किसी ठोस परियोजना या परिसंपत्ति में निवेश होने के बजाय, समूह की विभिन्न कंपनियों के बीच अंतर-कॉरपोरेट जमा (Inter-Corporate Deposits–ICDs) के रूप में स्थानांतरित किया गया और अंततः इसका एक बड़ा हिस्सा अल्केमिस्ट लिमिटेड तक पहुँचाया गया।
न्यायिक कार्यवाही में उपलब्ध तथ्यों और जांच एजेंसी के आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, इस प्रक्रिया में करीब 1,840 करोड़ रुपये से अधिक की राशि निवेशकों से वसूली गई। न तो वादे के अनुरूप संपत्ति दी गई और न ही निवेश की गई रकम लौटाई गई। ईडी की जांच में यह राशि अपराध से अर्जित धन (Proceeds of Crime) के रूप में चिन्हित हुई। इसी आधार पर, ईडी के हालिया प्रेस नोट के अनुसार, विभिन्न चरणों में कार्रवाई करते हुए लगभग 492.72 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त किया गया, जो धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत आगे की पुष्टि अथवा विचाराधीन प्रक्रिया के अधीन हैं। इसके साथ-साथ विशेष अदालत (PMLA) के समक्ष अभियोजन शिकायतें भी दायर की गईं। पहली शिकायत मार्च 2021 में और उसके बाद जुलाई 2024 तथा सितंबर 2025 में पूरक शिकायतें दाखिल की गईं।
एनसीएलटी के आदेश में दर्ज तथ्यों के अनुसार, ईडी ने पीएमएलए के तहत जांच कोलकाता और उत्तर प्रदेश में दर्ज एफआईआरों के आधार पर शुरू की थी, न कि किसी स्वतः संज्ञान के परिणामस्वरूप। ईडी की कार्रवाई फिलहाल संपत्ति जब्ती और अभियोजन प्रक्रिया तक सीमित है, जबकि आपराधिक मुक़दमा विशेष अदालत में विचाराधीन है।
इसी दौरान अल्केमिस्ट लिमिटेड के खिलाफ दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) के तहत कार्यवाही शुरू की गई। यहीं से मामला एक साधारण कॉरपोरेट विवाद से निकलकर एक गहरे संरचनात्मक सवाल में बदल जाता है। प्रश्न यह नहीं था कि कंपनी पर कर्ज़ है या नहीं। असली प्रश्न यह था कि क्या किसी कंपनी को IBC के तहत शुरू की गई कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (Corporate Insolvency Resolution Process—CIRP) जैसी एक वैध कानूनी प्रक्रिया के भीतर प्रवेश दिलाकर, उस पर चल रही आपराधिक जांच को निष्प्रभावी किया जा सकता है।
न्यायाधिकरण (NCLT) के सामने प्रस्तुत रिकॉर्ड से यह तस्वीर उभरकर आई कि दिवाला कार्यवाही शुरू करने वाली कंपनी और लेनदारों की समिति (Committee of Creditors – CoC) में शामिल प्रमुख इकाइयाँ उसी समूह से जुड़ी थीं, जिन पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप चल रहे थे। लेनदारों की समिति का स्वरूप ऐसा था कि निर्णय-निर्माण की शक्ति लगभग पूरी तरह समूह की अपनी कंपनियों के हाथों में केंद्रित हो गई। ऐसी स्थिति में न तो स्वतंत्र व्यावसायिक विवेक बचता है और न ही निष्पक्ष समाधान की कोई वास्तविक संभावना।
यह भी उल्लेखनीय है कि कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया के दौरान ही CoC की संरचना और उसके मतदान अधिकारों को लेकर न्यायाधिकरण के समक्ष औपचारिक आपत्तियाँ दाख़िल की जा चुकी थीं। ये आपत्तियाँ एक अलग अंतरिम आवेदन (I.A. No. 4176 of 2022) के माध्यम से याचिकाकर्ता सुमित राजनिकांत मेहता द्वारा दाख़िल की गई थीं। इन आपत्तियों में समूह से जुड़ी कई कंपनियों, विशेष रूप से टेक्नोलॉजी पार्क्स लिमिटेड सहित 24 संस्थाओं, की CoC में भागीदारी, प्रतिनिधित्व और मतदान अधिकारों पर सवाल उठाए गए थे।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि ऐसी कंपनियाँ दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की धारा 21(2) के अंतर्गत CoC में बने रहने योग्य नहीं हैं, जिससे यह प्रश्न सीधे उठता है कि निर्णय प्रक्रिया में कौन वोट कर रहा था और किन हितों का प्रतिनिधित्व हो रहा था। हालाँकि, 3 फरवरी 2026 को पूरी दिवाला प्रक्रिया के ही निरस्त हो जाने के बाद न्यायाधिकरण ने इन आपत्तियों पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय देना आवश्यक नहीं समझा और संबंधित याचिका को निरर्थक घोषित कर दिया।
बावजूद इसके, यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि CoC की वैधता और संतुलन को लेकर उठे ये प्रश्न CIRP रद्द होने के बाद गढ़ी गई दलीलें नहीं थे, बल्कि दिवाला प्रक्रिया के सक्रिय चरण में ही न्यायाधिकरण के समक्ष औपचारिक रूप से दर्ज हो चुके थे—जो अंततः पूरी प्रक्रिया के विफल होने के व्यापक संदर्भ से जुड़ते हैं।
NCLT के आदेश में दर्ज “अपराध से अर्जित 1,314.89 करोड़ रुपये की राशि पहले अल्केमिस्ट टाउनशिप इंडिया लिमिटेड से टेक्नोलॉजी पार्क्स लिमिटेड तक पहुँची। इसके बाद इसी राशि में से 685 करोड़ रुपये टेक्नोलॉजी पार्क्स लिमिटेड द्वारा अल्केमिस्ट लिमिटेड को स्थानांतरित किए गए। यही अल्केमिस्ट लिमिटेड इस प्रकरण में न्यायाधिकरण के समक्ष कॉरपोरेट डेब्टर के रूप में खड़ी थी। विडंबना यह थी कि जिस टेक्नोलॉजी पार्क्स लिमिटेड ने इस धन के हस्तांतरण में केंद्रीय भूमिका निभाई, वही कंपनी लेनदारों की समिति में सबसे बड़ी वित्तीय लेनदार बनकर उभरी, जिसके पास 97 प्रतिशत मतदान अधिकार थे।”
यहीं वह बिंदु सामने आता है, जहाँ कॉरपोरेट कानून और आपराधिक कानून के बीच की महीन रेखा स्पष्ट होती है। दिवाला कानून यह मानकर चलता है कि कंपनी की विफलता एक व्यावसायिक असफलता है। लेकिन जब उसी विफलता के पीछे धन के संदिग्ध स्रोत, निवेशकों से धोखा और आपराधिक लेन-देन जुड़े हों, तब केवल बैलेंस शीट देखकर निर्णय लेना न्याय के साथ समझौता बन जाता है।
न्यायाधिकरण ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि दिवाला कानून और मनी लॉन्ड्रिंग कानून अपने-अपने क्षेत्र में समानांतर रूप से संचालित हो सकते हैं। लेकिन न्यायाधिकरण ने यह रेखा भी खींची कि इस समानांतर संचालन की अवधारणा को इस हद तक नहीं बढ़ाया जा सकता कि एक कानून की प्रक्रिया का उपयोग दूसरे कानून की प्रभावशीलता को निष्प्रभावी करने के लिए किया जाए। ऐसा करना न केवल दिवाला कानून की आत्मा के विरुद्ध होगा, बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली को भीतर से खोखला कर देगा।
यदि ऐसी अनुमति दी जाती, तो इसका अर्थ यह होता कि कोई भी समूह पहले अवैध तरीकों से धन जुटाए, फिर कंपनियों के जाल के भीतर उस धन को घुमाए और अंततः दिवाला प्रक्रिया की आड़ में खुद को कानूनी रूप से ‘स्वच्छ’ घोषित करा ले। न्यायाधिकरण ने इसी प्रवृत्ति को कानून की घोर अवहेलना मानते हुए पूरी दिवाला प्रक्रिया को रद्द कर दिया।
“निवेशकों से 1,840 करोड़ रुपये जुटाने के आरोप, प्रवर्तन निदेशालय की जांच में 492 करोड़ की संपत्ति जब्ती और दिवाला कानून की आड़ में कानूनी संरक्षण की कोशिश—NCLT का आदेश उस कॉरपोरेट संरचना को उजागर करता है, जहाँ वैध दिखने वाली प्रक्रिया अपराध के लिए कवच बनने लगती है।”
न्यायाधिकरण ने यह माना कि दिवाला प्रक्रिया का इस्तेमाल कंपनी ने आपराधिक जांच और संपत्ति जब्ती से बचने के कानूनी औज़ार के रूप में किया, और इसी दुरुपयोग के कारण पूरी कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) को रद्द कर दिया गया।
न्यायाधिकरण के समक्ष दाख़िल अर्ज़ियों और पारित आदेशों के रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट होता है कि कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया के दौरान ऐसी कानूनी पहलें की गईं, जिनका प्रभाव प्रवर्तन निदेशालय की चल रही कार्रवाई और संपत्ति-जब्ती को दिवाला प्रक्रिया के दायरे में समाहित या अप्रभावी करने का हो सकता था। इस क्रम में दिवाला समाधान पेशेवर (Resolution Professional – RP) द्वारा न्यायाधिकरण के समक्ष अलग-अलग अर्ज़ियाँ दायर की गईं, जिनमें प्रवर्तन निदेशालय को कार्यवाही में पक्षकार बनाए जाने, बैंक खातों तथा अन्य वित्तीय परिसंपत्तियों पर लगी जब्ती अथवा रोक को निष्प्रभावी करने जैसी राहतें माँगी गई थीं।
हालाँकि, 3 फरवरी 2026 को पूरी कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) के निरस्त हो जाने के बाद, न्यायाधिकरण ने इन सभी अर्ज़ियों पर गुण-दोष के आधार पर विचार करना आवश्यक नहीं समझा और उन्हें निरर्थक घोषित कर दिया। इसके बाद RP द्वारा दायर पृथक आवेदन को भी न्यायाधिकरण ने, CIRP पहले ही निरस्त हो जाने के आधार पर, निरर्थक मानते हुए निस्तारित कर दिया। इसके बावजूद, यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि आपराधिक जांच और संपत्ति-जब्ती से जुड़ी कार्यवाहियों के बीच, दिवाला प्रक्रिया के माध्यम से वैकल्पिक कानूनी रास्ते तलाशे जाने के प्रयास सक्रिय रूप से किए जा रहे थे।
इन आदेशों की श्रृंखला यह संकेत देती है कि मामला केवल दिवाला समाधान का नहीं, बल्कि कानून की विभिन्न प्रक्रियाओं के बीच ऐसे रास्ते तलाशने का भी था, जिनसे आपराधिक जांच का प्रभाव सीमित किया जा सके।
न्यायाधिकरण ने इस दुरुपयोग को केवल सैद्धांतिक टिप्पणी तक सीमित नहीं रखा। अपने आदेश में यह भी दर्ज किया गया कि जिस ऑपरेशनल क्रेडिटर के आवेदन पर यह दिवाला प्रक्रिया शुरू की गई थी, उसकी भूमिका निष्कलंक नहीं थी। इसी आधार पर न्यायाधिकरण ने संबंधित ऑपरेशनल क्रेडिटर साई टेक मेडिकेयर प्राइवेट लिमिटेड पर 5 लाख रुपए का मौद्रिक दंड लगाया। यह दंड इस बात का संकेत था कि न्यायाधिकरण ने पूरी प्रक्रिया को केवल त्रुटिपूर्ण नहीं, बल्कि कानून के साथ की गई सुनियोजित छेड़छाड़ के रूप में देखा।
यह फैसला केवल अल्केमिस्ट समूह तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक भ्रम को तोड़ता है, जो अक्सर शेयर बाजार और कॉरपोरेट जगत में देखा जाता है कि जो कुछ काग़ज़ों में वैध दिखाई देता है, वह वास्तविकता में भी वैध ही होगा। यह प्रकरण दिखाता है कि वैध दिखने वाली संरचना के भीतर भी अपराध व्यवस्थित तरीके से पनप सकता है, और यदि दस्तावेज़ों और प्रक्रियाओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ पढ़ा जाए, तो वैधता का यह भ्रम देर तक टिक नहीं पाता।
न्यायाधिकरण द्वारा पूरी दिवाला प्रक्रिया को रद्द करना केवल एक कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि यह उस सोच पर सीधा हस्तक्षेप है, जिसमें कानून की भाषा और प्रक्रियाओं का इस्तेमाल सच को ढकने के लिए किया जाता है। न्यायाधिकरण (NCLT) का यह आदेश स्पष्ट संकेत देता है कि कानून केवल प्रक्रिया का रास्ता नहीं दिखाता, बल्कि न्याय की दिशा भी तय करता है—और जब वह दिशा ही विकृत हो, तो पूरी प्रक्रिया अस्वीकार्य हो जाती है।









