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सरकारी योजनाएँ और पार्टी फंडिंग: कहाँ धुंधली होती है संवैधानिक रेखा?

प्रतीकात्मक इमेज: खुली किताब (इमेज स्रोत: NaMo App से लिया गया स्क्रीनशॉट)
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Written by
–नीलेश कटारिया
सरकारी योजनाएँ सत्ता का प्रचार नहीं, संवैधानिक उत्तरदायित्व होती हैं। लेकिन जब उन्हीं योजनाओं के नाम राजनीतिक फंडिंग की श्रेणियों में दर्ज दिखें, तो सवाल स्वाभाविक है। यह सवाल कानून की धाराओं से अधिक, उस संवैधानिक दूरी का है जो सरकार और राजनीतिक दल के बीच तय की गई है। आरटीआई दस्तावेज़ और डिजिटल दान इंटरफेस आज उसी दूरी की परीक्षा लेते दिखाई देते हैं।

अहमदाबाद, 12 दिसंबर 2025 । सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त वर्ष 2021–22 से जुड़े दस्तावेज़ों और द वायर द्वारा प्रकाशित आरटीआई-आधारित रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि भारतीय जनता पार्टी के दान रिकॉर्ड में स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और किसान सेवा जैसी केंद्रीय सरकारी योजनाओं के नाम “दान की श्रेणी (Cause for Donation)” के रूप में दर्ज पाए गए।

यह जानकारी किसी राजनीतिक भाषण, आरोप या चुनावी बयान से नहीं, बल्कि मंत्रालयों से प्राप्त आधिकारिक आरटीआई उत्तरों के आधार पर सामने आई है।

इसी संदर्भ में चेन्नई के वरिष्ठ पत्रकार और सथियाम टीवी के न्यूज़ एडिटर बी.आर. अरविंदाक्षन द्वारा आरटीआई के माध्यम से संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों से यह पूछा गया कि क्या इन योजनाओं के नाम राजनीतिक दल द्वारा दान जुटाने के लिए उपयोग करने की कोई अनुमति दी गई थी। मंत्रालयों के उत्तर एक-सुर में यही दर्शाते हैं कि ऐसी किसी अनुमति का कोई रिकॉर्ड उनके पास उपलब्ध नहीं है।

यहीं से यह मामला केवल राजनीतिक नैतिकता का नहीं, बल्कि उस संवैधानिक रेखा का प्रश्न बन जाता है, जो सरकार, राजनीतिक दल और सार्वजनिक संसाधनों के बीच स्पष्ट दूरी की अपेक्षा करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अनेक निर्णयों में यह रेखांकित किया है कि लोकतंत्र केवल वैधानिक अनुमतियों से नहीं, बल्कि संस्थाओं की स्पष्ट भूमिकाओं, सार्वजनिक संसाधनों के निष्पक्ष उपयोग और लोकविश्वास की रक्षा से संचालित होता है।

इसी संवैधानिक दृष्टि के अनुरूप ‘कॉमन कॉज़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (Common Cause v. Union of India)’ में न्यायालय ने सरकारी विज्ञापनों को दलगत या व्यक्तित्व-प्रचार का माध्यम बनने से रोकने के लिए दिशानिर्देशों का ढांचा स्थापित किया, ताकि राज्य की संचार-शक्ति और राजकोषीय संसाधन किसी राजनीतिक लाभ की छाया में न आएँ।

सरकारी योजनाएँ राज्य की ओर से नागरिकों के लिए बनाई जाती हैं। उनका नाम, प्रतीक और पहचान सार्वजनिक धन, नीति और संवैधानिक उत्तरदायित्व से जुड़ी होती है। राजनीतिक दल, चाहे वे सत्ता में हों या विपक्ष में, संवैधानिक संरचना में सरकार से अलग इकाइयाँ हैं। यही पृथक्करण भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है।

इसी पृष्ठभूमि में जब किसी राजनीतिक फंडिंग प्रक्रिया में सरकारी योजना का नाम “प्रेरक श्रेणी” या “Cause for Donation” के रूप में दिखाई देता है, तो प्रश्न केवल तकनीकी वैधता का नहीं रहता। प्रश्न यह बन जाता है कि क्या इससे नागरिक के मन में राज्य और राजनीतिक दल के बीच की रेखा धुंधली पड़ रही है—और यही धुंधलापन लोकतंत्र की सबसे संवेदनशील कसौटी है।

द वायर की रिपोर्ट जहाँ 2021–22 के दस्तावेज़ों तक सीमित थी, वहीं इस प्रश्न की समकालीन प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। 12 दिसंबर 2025 को नमो ऐप के माध्यम से किए गए एक वास्तविक दान में यह तथ्य सामने आया कि दान की श्रेणी में, इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक ‘स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और किसान सेवा’ जैसी केंद्रीय सरकारी योजनाओं के नाम उपलब्ध पाए गए। इसी श्रेणी के अंतर्गत दान करने पर प्राप्त रसीद भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय द्वारा जारी की गई, जिसमें आयकर अधिनियम के अंतर्गत पार्टी को मिलने वाली कर-छूट का उल्लेख है, न कि किसी सरकारी योजना के खाते का।

नमो ऐप के माध्यम से किए गए दान की रसीद का प्रासंगिक अंश
नमो ऐप के माध्यम से किए गए दान की रसीद का प्रासंगिक अंश, जिसमें “Cause for Donation” के अंतर्गत केंद्रीय सरकारी योजना का नाम दर्ज दिखाई देता है। दानदाता की पहचान गोपनीयता के कारण छुपाई गई है।


यह स्थिति एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है। यदि धन सीधे राजनीतिक दल को जा रहा है, तो सरकारी योजना का नाम उस प्रक्रिया में किस भूमिका में है। क्या वह केवल एक प्रेरक श्रेणी है, या वह नागरिक के मन में राज्य और राजनीतिक दल के बीच ऐसा संबंध निर्मित करती है, जिसे संविधान स्पष्ट रूप से अलग रखता है।

इसी संदर्भ में सबसे स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि क्या देश की सबसे बड़ी और संसाधन-संपन्न राजनीतिक पार्टी ऐसी फंडिंग व्यवस्था को बिना कानूनी और संवैधानिक समीक्षा के अपना सकती है। यह प्रश्न किसी आरोप से अधिक, राजनीतिक और संस्थागत यथार्थ की समझ से जुड़ा है।

भारतीय जनता पार्टी दशकों से सत्ता और संगठन दोनों स्तरों पर सक्रिय रही है। केंद्र और राज्यों में शासन का लंबा अनुभव, चुनावी कानूनों की गहरी समझ और विशेषज्ञ कानूनी सलाहकारों की उपलब्धता को देखते हुए यह मानना कठिन है कि किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म या फंडिंग प्रक्रिया को बिना विधिक परीक्षण के सार्वजनिक किया गया होगा।

यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम को “अनजाने में हुई चूक” के रूप में देखना व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता। बल्कि यह उस संरचना की ओर संकेत करता है, जिसमें कानून की स्पष्ट मनाही के अभाव में ऐसे रास्ते अपनाए जाते हैं जो तकनीकी रूप से वैध हों, लेकिन संवैधानिक दृष्टि से असहजता पैदा करते हों।

भारतीय कानून व्यवस्था में ऐसे उदाहरण नए नहीं हैं, जहाँ कोई कार्य कानून की भाषा के भीतर रहकर किया गया हो, लेकिन उसका प्रभाव संविधान की भावना से टकराता हो। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक अवसरों पर यह स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र केवल वैधानिक अनुमतियों से नहीं चलता, बल्कि लोकविश्वास और संस्थागत दूरी जैसे मूल सिद्धांतों पर टिका होता है।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि दान किसे मिला, बल्कि यह है कि दान के लिए जिस प्रेरणा का उपयोग किया गया, वह क्या नागरिक के मन में राज्य और राजनीतिक दल के बीच की रेखा को धुंधला करती है। जब सरकारी योजनाओं के नाम राजनीतिक फंडिंग के संदर्भ में सामने आते हैं, तो यह स्थिति सीधे तौर पर किसी कानून का उल्लंघन न भी हो, तब भी यह संविधान द्वारा कल्पित शासन और राजनीति के पृथक्करण पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

कानूनी रूप से यह स्थिति स्पष्ट है कि मौजूदा कानूनों में ऐसी फंडिंग व्यवस्था पर कोई सीधा आपराधिक प्रतिबंध नहीं है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, चुनावी नियम या आयकर कानून इस पर स्पष्ट रोक नहीं लगाते। यही कारण है कि यह मामला अदालत में दंड का नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता और राजनीतिक जवाबदेही का प्रश्न बनकर उभरता है।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड से जुड़े मामलों में भी यह रेखांकित किया है कि राजनीतिक फंडिंग का तंत्र जितना अधिक अपारदर्शी होगा, उतना ही अधिक वह लोकतांत्रिक विश्वास को कमजोर करेगा। इस संदर्भ में सरकारी योजनाओं के नाम का पार्टी फंडिंग प्रक्रिया से जुड़ना एक संरचनात्मक समस्या की ओर संकेत करता है, जिसे केवल राजनीतिक बयानबाज़ी से नहीं सुलझाया जा सकता।

यह रिपोर्ट किसी एक दल को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास नहीं करती। भारत के राजनीतिक इतिहास में सत्ता में रहे विभिन्न दलों ने समय-समय पर राज्य की उपलब्धियों और सरकारी कार्यक्रमों को राजनीतिक पूंजी में बदलने की कोशिश की है। अंतर यह है कि आज यह प्रक्रिया डिजिटल प्लेटफॉर्म, दस्तावेज़ों और आरटीआई उत्तरों के साथ प्रमाणित रूप में सामने आई है।

खुली किताब इस पूरे घटनाक्रम को किसी न्यायिक निर्णय के रूप में नहीं, बल्कि एक संवैधानिक प्रश्न के रूप में दर्ज करती है। प्रश्न यह नहीं है कि दान वैध है या अवैध, बल्कि यह है कि क्या भारतीय लोकतंत्र में सरकार और राजनीतिक दल के बीच वह स्पष्ट और भरोसेमंद दूरी अब भी उतनी ही सुरक्षित है, जिसे संविधान और सुप्रीम कोर्ट दोनों लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त मानते हैं।

यही प्रश्न आने वाले समय में चुनाव सुधार, राजनीतिक फंडिंग और संवैधानिक नैतिकता से जुड़ी बहसों का केंद्र बनेगा।

सरकारी योजनाओं की पहचान राजनीतिक फंडिंग के संदर्भ में प्रयुक्त होती है, तो भले ही वह मौजूदा कानूनों की सीमा के भीतर हो, फिर भी वह शासन और राजनीति के बीच की उस स्पष्ट दूरी को चुनौती देती है, जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अनिवार्य माना गया है। यह प्रश्न किसी एक दल या व्यक्ति से आगे बढ़कर उस संवैधानिक संतुलन से जुड़ता है, जिस पर भारतीय लोकतंत्र टिका है।

यह विमर्श अदालत में दंड तय करने का नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास, राजनीतिक जवाबदेही और भविष्य के चुनावी सुधारों से जुड़े एक गहरे संस्थागत प्रश्न का है, जिसे अनदेखा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए दीर्घकालिक जोखिम बन सकता है।

क्या बिना तय समय-सीमा के, राज्यपालों द्वारा बिलों पर देरी राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बढ़ाती है?

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