
अमेरिका से जारी हजारों एप्स्टीन दस्तावेज़ सामने आते ही भारत में अचानक डिजिटल हलचल मच गई, लेकिन जिन दावों ने सोशल मीडिया को गरमा दिया, उनकी जड़ में सिर्फ संदर्भहीन ईमेल, गलतफहमियाँ और राजनीतिक व्याख्याएँ थीं। दुनिया भर के प्रमुख संस्थानों की स्वतंत्र जांच एक ही निष्कर्ष पर ठहरती है: न कोई आपराधिक संपर्क, न कोई बैठक, न कोई सबूत; सिर्फ एकतरफ़ा दावे। फिर भी भ्रम का यह तूफ़ान डिजिटल अफवाहों, फर्जी स्क्रीनशॉट और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से मुख्यधारा की बहसों तक पहुँच गया। मगर असली सवाल यह है कि इतने स्पष्ट दस्तावेज़ों के बावजूद भ्रम इतनी तेज़ी से कैसे फैल गया?
अहमदाबाद, 2 दिसंबर 2025 । अमेरिका के कुख्यात वित्तकार और यौन अपराधी जेफ्री एप्स्टीन से जुड़े अठारह हजार से अधिक ईमेलों और हजारों दस्तावेज़ों के नवंबर 2025 में सार्वजनिक होने के बाद भारत के डिजिटल राजनीतिक परिदृश्य में अचानक एक नई हलचल पैदा हो गई। सोशल मीडिया पर कई पोस्ट दावा करने लगीं कि इन दस्तावेज़ों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम किसी “पेडोफाइल लिस्ट” या अंतरराष्ट्रीय सेक्स-तस्करी नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। ये दावे जितने सनसनीखेज दिखते हैं, उतने ही तथ्यहीन हैं। उपलब्ध दस्तावेज़ों, अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और आधिकारिक रिकॉर्ड का परीक्षण यह साफ़ करता है कि इन आरोपों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।
जेफ्री एप्स्टीन एक अमेरिकी वित्तकार था, जो 1990 और 2000 के दशकों में नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण, अंतरराष्ट्रीय सेक्स-तस्करी और प्रभावशाली व्यक्तियों के नामों का इस्तेमाल कर ब्लैकमेल तंत्र चलाने के आरोपों के कारण कुख्यात हुआ। न्यूयॉर्क, फ्लोरिडा और वर्जिन आइलैंड्स में उसकी आलीशान संपत्तियाँ इस नेटवर्क के केंद्र मानी जाती थीं।
2008 में उसे हल्की सजा मिली, लेकिन 2019 में दोबारा गिरफ्तारी के बाद जेल में उसकी मौत हो गई, जिसे आधिकारिक रूप से आत्महत्या कहा गया। उसकी मृत्यु के बाद अमेरिकी अदालतें उसके ईमेलों, दस्तावेज़ों और संचार रिकॉर्ड को क्रमशः सार्वजनिक कर रही हैं, और नवंबर 2025 में जारी हुए नए दस्तावेज़ों ने इस विवाद को जन्म दिया।
नवंबर 2025 की इस व्यापक रिलीज़ में अमेरिकी हाउस ओवरसाइट कमिटी और अदालतों ने एप्स्टीन से जुड़े हजारों ईमेल, टेक्स्ट और संचार रिकॉर्ड सार्वजनिक किए। ये दस्तावेज़ 2009 से 2019 तक की गतिविधियों से जुड़े थे और इनमें दुनिया भर के सैकड़ों प्रभावशाली लोगों में राजनेताओं, उद्योगपतियों, वैज्ञानिकों और कूटनीतिज्ञों के नाम अलग-अलग संदर्भों में मिले।
लेकिन स्वतंत्र मीडिया जांच, कमिटी रिकॉर्ड और अमेरिकी न्याय विभाग के दस्तावेज़ों के अनुसार, इन उल्लेखों में अधिकांश बातचीत सामान्य सलाह-मशविरों, कार्यक्रमों, अनौपचारिक संपर्कों या एप्स्टीन द्वारा स्वयं को प्रभावशाली दिखाने की कोशिशों से संबंधित थी; किसी नए आपराधिक सबूत का खुलासा नहीं हुआ। इसी विस्तृत अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़-संग्रह में तीन ईमेल ऐसे मिले जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आया, लेकिन इनमें न कोई प्रतिक्रिया थी, न कोई संवाद, न कोई बैठक, और न किसी प्रकार का आपराधिक संकेत। यह स्पष्ट है कि यह केवल एप्स्टीन का एकतरफ़ा दावा था, जिसकी कोई आधिकारिक या दस्तावेज़ी पुष्टि नहीं मिलती।
इन तीन ईमेलों में संदर्भ 2019 का है, जब भारत-अमेरिका संबंधों पर वैश्विक स्तर पर सक्रियताएँ चल रही थीं। ईमेलों में एप्स्टीन ने उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रणनीतिकार रहे स्टीव बैनन को लिखा कि वह मोदी के साथ एक मुलाकात “तय करा सकता है” और दावा किया कि “मोदी ऑन बोर्ड” हैं।
दस्तावेज़ों की समीक्षा बताती है कि यह दावे आधारहीन थे और एप्स्टीन की उसी पुरानी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं, जिसमें वह प्रभावशाली लोगों के नाम लेकर स्वयं को महत्वपूर्ण साबित करने की कोशिश करता था। न तो मोदी पक्ष से किसी प्रतिक्रिया का कोई प्रमाण मिलता है, न प्रधानमंत्री कार्यालय का कोई उत्तर, और न कोई अतिरिक्त दस्तावेज़ जो यह दिखाए कि ऐसी किसी बैठक की योजना बनी थी।
दस्तावेज़ों में दो अन्य भारतीय हरदीप सिंह पुरी और अनिल अंबानी के नाम भी मिलते हैं। पुरी उस समय संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि थे और ईमेलों में उनके साथ दर्ज कुछ औपचारिक, पेशेवर बैठकों का उल्लेख है।
अंबानी के मामले में कुछ रक्षा-संबंधी सामान्य बातचीत का संदर्भ मिलता है। इन दोनों ही उल्लेखों में कोई अनुचित या आपराधिक संकेत नहीं है और संदर्भ पूरी तरह प्रक्रियागत या पेशेवर हैं।
इस विवाद को हवा देने में सोशल मीडिया का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। शुरुआत बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की एक पोस्ट से हुई, जिसमें उन्होंने संकेत दिया कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो सकता है। बाद में उन्होंने वह पोस्ट हटा दी।
इसके बाद कुछ विपक्षी कार्यकर्ताओं, पाकिस्तानी अकाउंट्स और विदेशी-आधारित खालिस्तानी प्रोफाइलों ने फर्जी स्क्रीनशॉट, पुरानी तस्वीरें और संदर्भहीन दस्तावेज़ों का इस्तेमाल कर भ्रम फैलाने की कोशिश की। कई पोस्टों में पिछली घटनाओं और असंबंधित दस्तावेज़ों को नए रिकॉर्ड से जोड़कर जनता में भ्रम बढ़ाया गया।
जब तथ्यों पर लौटकर देखा जाए तो तस्वीर एकदम स्पष्ट होती है। अमेरिकी अदालतों के आधिकारिक रिकॉर्ड, हाउस ओवरसाइट कमिटी की वेबसाइट, ड्रॉप साइट न्यूज द्वारा प्रकाशित मूल दस्तावेज़, तथा न्यूयॉर्क टाइम्स, बीबीसी, रॉयटर्स और द वायर जैसी स्वतंत्र और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थाओं ने जांच कर यही निष्कर्ष निकाला है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एप्स्टीन के किसी अपराध नेटवर्क से कोई संबंध नहीं है।
उपलब्ध दस्तावेज़ों में केवल एक मृत अपराधी का एकतरफ़ा दावा नजर आता है, जिसका कोई प्रमाणिक आधार नहीं है।
समग्र आकलन यही स्थापित करता है कि नरेंद्र मोदी का नाम एप्स्टीन फाइल्स में किसी अपराध, तस्करी नेटवर्क या किसी अनुचित संपर्क के संदर्भ में नहीं आता। विवाद न तो दस्तावेज़ों पर आधारित है, न किसी जांच-एजेंसी की खोज पर, बल्कि सोशल मीडिया की जल्दबाज़ी, राजनीतिक व्याख्याओं और एप्स्टीन की दावागिरी के मिश्रण से उत्पन्न हुआ है।
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों पर प्रसारित होती अप्रमाणित, अधूरी या भ्रामक सूचनाओं के बीच सत्य को पहचानने के लिए आवश्यक है कि पाठक हर संवेदनशील दावे की जाँच विश्वसनीय स्रोतों से करें। लोकतंत्र में सार्वजनिक समझ ही सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है।









