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कल से अब तक: समय की धड़कन और समाज का आईना

ग्राफिक इमेज : खुली kitan
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Written by
–नीलेश कटारिया
जब कल की तारीख ढलती है और आज की सुबह आती है, तो इतिहास की घड़ी कुछ नए मोड़ पेश करती है…
हर उगते सूरज के साथ बीते पलों की गूंज और आने वाले समय की आहट मिलती है। यही मिलन हमें सिखाता है कि घटनाएँ सिर्फ़ घटती नहीं, बल्कि भविष्य की नींव भी रखती हैं।
कभी ये मोड़ आशा की किरण बनकर सामने आते हैं, तो कभी चेतावनी की तरह हमें सावधान कर जाते हैं।
समय का यह प्रवाह ही हमें याद दिलाता है कि कल और आज की कड़ी हमेशा अटूट रहती है, और हर सुबह इतिहास की किताब में एक नया पन्ना जोड़ देती है।

अहमदाबाद, 1 अक्टूबर 2025। बीता कल सिर्फ़ बीतती हुई घड़ी का नाम नहीं होता, वह आज की सुबह को एक नया अर्थ भी देता है। 30 सितम्बर से 1 अक्टूबर की ओर बढ़ते हुए समय ने कुछ ऐसे दृश्य रचे हैं जिनमें अर्थव्यवस्था की गूंज है, राजनीति की आहट है, खेल का उत्साह है, संस्कृति का उत्सव है, विज्ञान की चेतावनी है, पर्यावरण की चिंता और समाज का धड़कता हुआ दर्द भी है। आइए, ठहरकर देखें — कल से आज तक की यह यात्रा हमें क्या सिखाती है।


आर्थिक मोड़: व्यापार और बैंकिंग में नई धड़कन

30 सितम्बर को सरकार ने अधिसूचना जारी कर RoDTEP (Remission of Duties and Taxes on Exported Products) योजना को 31 मार्च 2026 तक बढ़ा दिया। यह योजना निर्यातकों को उन अप्रत्यक्ष करों और शुल्कों से राहत देती है जो पहले रिफंड योग्य नहीं थे — जैसे बिजली, परिवहन और स्थानीय कर। इसका मक़सद भारतीय निर्यात को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाए रखना है।

इसी दिन अशीष पांडे (यूनियन बैंक ऑफ इंडिया) और कल्याण कुमार (सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया) को नए MD–CEO नियुक्त किया गया।

यह सिर्फ़ एक नीति नहीं, बल्कि उन लाखों कारोबारियों और श्रमिकों का भरोसा है जिनकी रोटी–रोज़गार इन फैसलों से जुड़ी है। वैश्विक अनिश्चितताओं और दबावों के बीच यह कदम संदेश देता है कि भारत अपनी नाव को स्थिर जल पर रखना चाहता है — ताकि व्यापार जगत को सहारा मिले और आम परिवारों की धड़कनें सुरक्षित रहें। यह वही भरोसा है जो अर्थव्यवस्था को सिर्फ़ आंकड़ों से नहीं, बल्कि विश्वास से भी मजबूत करता है।

खेल का मोड़: महिला शक्ति का परचम

30 सितम्बर, गुवाहाटी (बारसापारा क्रिकेट स्टेडियम) में महिला विश्वकप का उद्घाटन मैच भारत–श्रीलंका के बीच खेला गया। भारत ने DLS विधि (बारिश से बाधित मैचों में लक्ष्य तय करने का नियम) से 59 रन से जीत दर्ज की। दीप्ति शर्मा (53 रन और 3 विकेट) ने ऑलराउंड प्रदर्शन किया।

यह जीत केवल खेल का स्कोर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का उद्घोष है। हर रन और हर विकेट यह कहता है कि बेटियाँ सिर्फ़ मैदान नहीं, समाज की सोच भी बदल रही हैं। यह प्रदर्शन उन पीढ़ियों को नया संदेश देता है जो अब भी बेटियों को सीमाओं में बाँधना चाहती हैं—कि भविष्य की सीमाएँ मैदान में बनती हैं, चारदीवारी में नहीं। खेल का यह क्षण आने वाले कल की मानसिकता को भी नया आकार दे सकता है।

सांस्कृतिक मोड़: अष्टमी–नवमी का आलोक

नवमी तिथि 30 सितम्बर शाम 6:06 बजे से शुरू होकर 1 अक्टूबर शाम 7:01 बजे तक रहेगी। अधिकांश घरों में नवमी-पूजन आज सम्पन्न हुआ, जबकि अष्टमी-पूजन कल सम्पन्न हुआ।

अष्टमी पर माँ महागौरी — शांति और तपस्या का प्रतीक।
नवमी पर माँ सिद्धिदात्री — सिद्धि और पूर्णता का स्वरूप।

अष्टमी और नवमी केवल तिथियाँ नहीं, बल्कि समाज के सांस्कृतिक आईने हैं। कन्याओं का पूजन यह याद दिलाता है कि शक्ति का वास्तविक निवास नारी के सम्मान में है — मंदिर की प्रतिमाओं में श्रद्धा के रूप में और जीवित कन्याओं में साक्षात चेतना के रूप में। जब दोनों आयाम साथ मिलते हैं, तभी पूजा परंपरा का उद्देश्य पूरा होता है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि भक्ति तभी पूर्ण है जब श्रद्धा और संवेदना दोनों एक साथ चलें।

विज्ञान का मोड़: आसमान से आई चेतावनी

30 सितम्बर रात, NASA ने बताया कि 2025 SA3 नामक 16.5 मीटर व्यास का क्षुद्रग्रह पृथ्वी के पास से लगभग 29,000 किमी/घंटा की गति से गुज़रेगा। टक्कर की आशंका नहीं है।

यह हमें विनम्र बनाता है कि ब्रह्मांड की विशालता के आगे हमारी ताक़त बौनी है। वैज्ञानिक निगरानी हमारी ढाल है, वरना आकाश की एक चिंगारी पृथ्वी की समूची कहानी बदल सकती है। यह घटना याद दिलाती है कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की रक्षा की पहली पंक्ति में खड़ा है। यही सजगता भविष्य की पीढ़ियों के लिए हमारी विरासत बनेगी।

सामाजिक मोड़: श्रमिकों की चीख

30 सितम्बर रात, चेन्नई के निकट एन्नोर SEZ थर्मल पावर प्लांट में निर्माणाधीन मेटल रूफ-स्ट्रक्चर गिरने से 9 मजदूरों की दर्दनाक मौत हुई।

यह हादसा विकास की रफ़्तार और सुरक्षा मानकों के बीच खड़े विरोधाभास का आईना है। वे हाथ, जिनसे शहर खड़े होते हैं, अक्सर सबसे असुरक्षित रह जाते हैं। यह चेतावनी है कि अगर विकास की ईंट नींव से ही कमजोर रखी जाएगी, तो गगनचुंबी इमारतें भी मलबा बनकर गिर सकती हैं।

यह घटना सिर्फ़ एक निर्माणाधीन ढांचे का गिरना नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक था जो मजदूरों को केवल संख्या मानती है, इंसान नहीं। श्रमिकों की यह चीख हमें याद दिलाती है कि असली तरक्की तब होगी जब सुरक्षा और सम्मान हर निर्माण की नींव में हों।

मौसम का मोड़: बारिश का उपहार और खतरा

IMD की रिपोर्ट के अनुसार 2025 का मानसून 8% ऊपर-औसत रहा। इसी दौरान, मुंबई–ठाणे–पुणे सहित गुजरात–महाराष्ट्र के कई ज़िलों में ऑरेंज/रेड अलर्ट जारी हुआ।

अतिरिक्त वर्षा किसानों के लिए अमृत भी है और शहरों के लिए संकट भी। बारिश का ‘अधिक’ होना तभी आशीर्वाद है जब उसके साथ जल-संचय और निकासी का विवेक हो। यह परिदृश्य बताता है कि प्रकृति अपनी कृपा और चेतावनी एक साथ देती है—निर्णय हमें लेना होता है कि इसे वरदान बनाएँ या आपदा। अगर तैयारी समय पर न हो, तो बूंदें भी तूफ़ान बन सकती हैं।

पर्यावरण का मोड़: सुबह की हवा

1 अक्टूबर सुबह, दिल्ली में कई स्टेशनों पर AQI (Air Quality Index , वायु गुणवत्ता सूचकांक) Unhealthy–Very Unhealthy (स्वास्थ्य के लिए हानिकारक–अत्यधिक अस्वस्थकारी) श्रेणी तक पहुँचा (उदा. आनंद विहार, जहांगीरपुरी)।

यह चेतावनी है कि सुबह की ताज़गी भी अब प्रदूषण की परतों में कैद हो रही है। स्वच्छ हवा नीति का वादा नहीं, जीवन का अधिकार है। हर सांस अब हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास का मॉडल किस कीमत पर बन रहा है। अगर हवा ही कैद हो जाए, तो स्वतंत्रता का अर्थ अधूरा रह जाता है। दिल्ली की हवा की यह स्थिति हर महानगर का भविष्य हो सकती है, अगर आज ठोस कदम न उठाए जाएँ।

प्रधानमंत्री मोदी ने RSS शताब्दी समारोह में विशेष डाक टिकट और स्मारक सिक्के का विमोचन किया। (फोटो साभार: BJP YouTube चैनल)

राजनीति का मोड़: RSS शताब्दी और राजनीतिक संकेत

दिल्ली में 1 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का शताब्दी समारोह ऐतिहासिक प्रतीकों और सियासी संदेशों के साथ शुरू हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समारोह में हिस्सा लिया और संघ की सौ साल की यात्रा को याद करते हुए विशेष स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी किया।RSS की शताब्दी पर विशेष स्मारक डाक टिकट जारी। (फोटो साभार: BJP YouTube चैनल)

डाक टिकट पर “राष्ट्र सेवा के 100 वर्ष (1925–2025)” अंकित है। ₹100 के स्मारक सिक्के के एक ओर “सत्यमेव जयते” और “भारत/INDIA” लिखा है, जबकि दूसरी ओर “भारत माता” और संघ कार्यकर्ताओं की आकृति उकेरी गई है, जिसके साथ “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष (1925–2025)” अंकित है।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि संघ के स्वयंसेवकों ने हर परिस्थिति में संयम और धैर्य दिखाया है। उन्होंने दोहराया कि “संघ का मंत्र यही रहा है — जो अच्छा है, जो कम अच्छा, सब हमारा है।”

प्रधानमंत्री के भाषण की तीन मुख्य ध्वनियाँ: स्थापना का अर्थ — उन्होंने कहा कि RSS की स्थापना महज़ संयोग नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन राष्ट्र चेतना का पुनरुत्थान है। उद्देश्य की एकता — संघ की शाखाओं और धाराओं में भले विस्तार हुआ हो, लेकिन हर धारा का भाव और लक्ष्य एक ही रहा: “राष्ट्र प्रथम।” चुनौतियों की चेतावनी — मोदी ने घुसपैठ और जनसंख्या–संतुलन को बड़ा ख़तरा बताते हुए कहा कि सरकार और संघ दोनों को इनसे सतर्क रहना होगा।

यह समारोह समर्थकों की दृष्टि में संघ की संगठनात्मक शक्ति और समाज–सेवा की मान्यता का प्रतीक है। उनके लिए “100 वर्ष” का स्मारक टिकट और सिक्का संघ की राष्ट्र–निर्माण यात्रा की पुष्टि हैं, लेकिन आलोचकों का मत है कि यह आयोजन राजनीति और विचारधारा के गहरे समीकरण का संकेत देता है, जहाँ “राष्ट्र चेतना” की भाषा सत्ता–समीकरण को मज़बूत करने का औज़ार बन सकती है। घुसपैठ और जनसंख्या संतुलन जैसे मुद्दों पर दिए गए संदेशों को भी विरोधी दल “राजनीतिक नैरेटिव” मान रहे हैं।

संतुलन यही है कि इतिहास इन दोनों दृष्टियों को दर्ज करेगा — पाठक और समाज तय करेंगे कि आने वाले दशकों में यह पर्व स्मृति के रूप में देखा जाएगा या राजनीति की दिशा बदलने वाले मोड़ के रूप में। इतिहास तय करेगा कि यह आयोजन स्मृति बनेगा या राजनीतिक टर्निंग प्वाइंट।

किसान–अर्थनीति का मोड़: खेत–खलिहानों की धड़कन

खरीफ फ़सलें (धान, कपास) इस मानसून की अधिक वर्षा से प्रभावित हुईं — कहीं जलभराव, कहीं कटाव।

खेतों का दर्द शहरों की थाली में उतरता है। पानी का संतुलन जब बिगड़ता है, तो हरियाली की जगह बेचैनी उगती है। यह सच्चाई बताती है कि किसान का संघर्ष अकेला नहीं होता—उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। यदि नीति समय पर सहारा न बने, तो खेतों की नमी आँसुओं में बदल जाती है। यही पल सरकार और समाज दोनों की असली परीक्षा है।

समय की सीख

30 सितम्बर से 1 अक्टूबर की यह यात्रा बताती है कि एक ही दिन कितने आयाम खोल सकता है—आर्थिक फैसले, राजनीतिक संकेत, खेल की चमक, संस्कृति का आलोक, विज्ञान की चेतावनी, समाज का दर्द, मौसम की चुनौती, हवा की चिंता और खेतों की सच्चाई।

सुबह की धूप की तरह ये घटनाएँ हमें चमकाती भी हैं और चेताती भी। तथ्य और विश्लेषण का यही संगम हमें समझाता है कि हर दिन केवल खबरों का क्रम नहीं, बल्कि भविष्य को दिशा देने वाला आईना भी है। पाठक जब इन घटनाओं को पढ़ता है, तो वह सिर्फ़ सूचना नहीं, बल्कि उस चेतना को महसूस करता है जो समाज और लोकतंत्र को जीवित रखती है।

 

क्या सुप्रीम कोर्ट की सलाहकारी राय भारतीय संघवाद में राज्यपालों की भूमिका को और अधिक शक्तिशाली बना देती है?

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