
अहमदाबाद, 27 सितंबर। भारत का इतिहास लंबे समय से स्मृति और साक्ष्य के बीच टकराव का मंच रहा है। अयोध्या उस मंच का सबसे तीखा रूप है—जहाँ आस्था और दस्तावेज़, भावनाएँ और प्रमाण बार-बार आमने-सामने खड़े होते रहे हैं।
नवंबर 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर अंतिम निर्णय सुनाया, कई पर्यवेक्षकों को लगा कि यह सदी-पुरानी बहस थम जाएगी। निर्णय में यह माना गया कि प्राचीन संरचना के संकेत अवश्य हैं, परन्तु यह निष्कर्ष न्यायालय ने स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी।

पांच वर्ष बाद, उसी निर्णय के सह-लेखक और देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने न्यूज़लॉन्ड्री को दिए एक साक्षात्कार में बाबरी मस्जिद के निर्माण को “fundamental act of desecration” (मूलभूत अपवित्रीकरण का कार्य) बताया।
यह कथन—“बाबरी मस्जिद का स्वयं निर्माण ही एक मूलभूत अपवित्रीकरण का कार्य था”—केवल एक ऐतिहासिक टिप्पणी नहीं माना जा सकता; यह उस गहरे वैचारिक संघर्ष को शब्द देता प्रतीत होता है, जिसमें पवित्रता और अधिकार लगातार टकराते रहे हैं, और जिसे अदालत ने 2019 के फ़ैसले में उपलब्ध साक्ष्यों के आलोक में आंशिक रूप से स्वीकार किया था।
यह वाक्य इस ओर संकेत करता है कि मस्जिद की नींव रखने का क्षण किसी पवित्र स्थल के उल्लंघन के तुल्य समझा जा सकता है—एक ऐसा विचार, जो न्यायिक तर्क और धार्मिक इतिहास के बीच की गहरी खाई को उजागर करता है।
उक्त टिप्पणी को अनेक विशेषज्ञों ने व्यक्तिगत विचार के रूप में देखा है; फिर भी, यह 2019 के निर्णय में दर्ज साक्ष्य-आधारित निष्कर्षों से भिन्न स्वर प्रस्तुत करती प्रतीत होती है। यही कारण है कि यह बयान राजनीतिक गलियारों और कानूनी हलकों में तुरंत बहस का विषय बना। द वायर हिंदी सहित कुछ मीडिया मंचों ने इसे सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फ़ैसले की आत्मा से असंगत बताया। यह मीडिया-विश्लेषण है, कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
अयोध्या निर्णय 2019: आस्था नहीं, साक्ष्य निर्णायक
“The conclusion in the ASI report about the remains of an underlying structure of a Hindu religious origin symbolic of temple architecture of the twelfth century A.D. must however be read contextually with the following caveats:
(i) While the ASI report has found the existence of ruins of a pre-existing structure, the report does not provide:
(a) The reason for the destruction of the pre-existing structure; and
(b) Whether the earlier structure was demolished for the purpose of the construction of the mosque.
(ii) Since the ASI report dates the underlying structure to the twelfth century, there is a time gap of about four centuries between the date of the underlying structure and the construction of the mosque. No evidence is available to explain what transpired in the course of the intervening period of nearly four centuries;
(iii) The ASI report does not conclude that the remnants of the pre-existing structure were used for the purpose of constructing the mosque (apart, that is, from the construction of the mosque on the foundation of the erstwhile structure).”
यह विस्तृत उद्धरण केवल पुरातात्त्विक तथ्य नहीं बताता, बल्कि अदालत की सावधानी और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण को भी रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ASI रिपोर्ट में बारहवीं सदी के हिंदू धार्मिक मूल की मंदिर-शैली वाली एक आधारभूत संरचना के संकेत अवश्य हैं, पर इस निष्कर्ष को संदर्भ सहित पढ़ा जाना चाहिए।
रिपोर्ट यह नहीं बताती कि वह पुरानी संरचना क्यों नष्ट हुई, न ही यह स्थापित करती है कि उसे जानबूझकर तोड़कर ही मस्जिद बनाई गई। अदालत ने यह भी इंगित किया कि बारहवीं सदी की उस संरचना और बाबरी मस्जिद के निर्माण के बीच लगभग चार सदियों का अंतर है—और उन अंतराल वर्षों में क्या घटित हुआ, इसका कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी दर्ज किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने ASI रिपोर्ट पर यही टिप्पणी की थी कि सैकड़ों साल पुराने ढांचे के बारे में यह तय करना कठिन है कि वह प्राकृतिक कारणों से गिरा या मानव हस्तक्षेप से—और ASI ने demolition (विध्वंस) पर कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं दिया।
यानी “पुरानी संरचना का होना” और “मस्जिद के निर्माण के लिए सुनियोजित विध्वंस होना”—दो अलग प्रश्न हैं। ASI की खुदाई से यह तो स्पष्ट हुआ कि नीचे बारहवीं सदी की एक बड़ी, गैर-इस्लामी संरचना थी, लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से ‘मंदिर’ घोषित नहीं किया, और यह सिद्ध नहीं हुआ कि उसके अवशेषों का योजनाबद्ध उपयोग मस्जिद बनाने में किया गया।
इसीलिए अदालत ने ज़ोर दिया कि अयोध्या भूमि का स्वामित्व तय करते समय भावना नहीं, बल्कि ठोस कानूनी साक्ष्य—जैसे निरंतर पूजा-अर्चना, अधिकार-प्रमाण, दीवानी विधि के मानक—ही निर्णायक होंगे; मंदिर-विध्वंस के किसी अनुमान पर नहीं। यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की साक्ष्य-आधारित परंपरा का प्रतीक है, जहाँ आस्था से ऊपर उठकर न्याय केवल प्रमाण और तर्क की कसौटी पर परखा जाता है।
ट्वीट्स से उठी बहस
“Justice Chandrachud has been on an interview spree recently… Says destruction of Temple 500 yrs ago (of which there was no evidence) is good reason to give the land to the destroyers of the mosque now!”
भूषण का आशय यह है कि जस्टिस चंद्रचूड़ के हालिया इंटरव्यू में धार्मिक पक्षपात दृष्टिगोचर होता है। उनका आरोप है कि पाँच सौ वर्ष पूर्व मंदिर-ध्वंस के ठोस प्रमाण न होने के बावजूद, भूमि-आवंटन को उन लोगों के पक्ष में उचित ठहराया गया जिन्होंने बाद में मस्जिद गिराई।
लेखक आकार पटेल ने भी इसे बेहद खतरनाक न्यायिक दृष्टिकोण बताया। उन्होंने ट्वीट किया:
“‘they deserved it’ jurisprudence from our finest”
पटेल के अनुसार यह ऐसा न्यायशास्त्रीय नजरिया प्रतीत होता है, जिसमें यह भाव झलकता है कि “उन्हें वही मिला जिसके वे हकदार थे”—जो बदले की भावना जैसा आभास दे सकता है और न्यायपालिका की तटस्थता पर प्रश्न उठाता है।
इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि यह मुद्दा सिर्फ़ व्यक्तिगत राय तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि न्यायिक निष्पक्षता पर सार्वजनिक विमर्श का विषय बन गया है।

आलोचनाओं के बाद सफ़ाई
“सोशल मीडिया पर लोग मेरे उत्तर के एक हिस्से को उठाकर दूसरे हिस्से से जोड़ देते हैं और पूरे संदर्भ को हटा देते हैं।”
उन्होंने ज़ोर देकर बताया कि अयोध्या का निर्णय केवल धार्मिक भावना पर नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्यों और क़ानूनी तर्क पर खड़ा है। उनका कहना था कि आलोचना करने वालों में से ज़्यादातर ने पूरा फ़ैसला पढ़ा तक नहीं:
“निर्णय 1,045 पृष्ठ का है और केस रिकॉर्ड 30,000 पृष्ठों का था।”
यह स्पष्टीकरण इस तथ्य को रेखांकित करता है कि उनका मूल आशय अदालत के निर्णय की साक्ष्य-आधारित प्रकृति पर ज़ोर देना था, न कि कोई नई ऐतिहासिक व्याख्या प्रस्तुत करना।
कानून बनाम इतिहास: दो कसौटियां
यह विवाद दो अलग-अलग धरातलों को सामने लाता है—पहला, न्यायिक कसौटी: जहाँ हर दावा दस्तावेज़ और प्रमाण पर परखा जाता है। दूसरा, सामाजिक स्मृति और इतिहास: जहाँ भावनाएं और परंपराएं अपनी-अपनी सच्चाइयाँ गढ़ती हैं। चंद्रचूड़ का ताज़ा कथन (न्यूज़लॉन्ड्री को दिए गए इंटरव्यू में) शायद दूसरे धरातल की उपज है, जबकि उनका 2019 का निर्णय पहले धरातल पर खड़ा था। यही विरोधाभास इस बहस का मूल है।
लोकतांत्रिक विमर्श की नई चुनौती
या फिर यह नागरिक अधिकार का हिस्सा है कि पूर्व जज अपने ऐतिहासिक दृष्टिकोण को खुलकर साझा करें—भले ही इससे उस निर्णय पर बहस तेज़ हो जाए, जिसका वे स्वयं सह-लेखक रहे हों?
इस सवाल का जवाब आसान नहीं है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि भारत जैसे बहुलवादी समाज में कानून का सच और इतिहास का सच हमेशा एक राह पर नहीं चलते। जब कोई पूर्व मुख्य न्यायाधीश ऐसा बयान देता है, तो वह लोकतंत्र को यह सोचने पर विवश करता है कि न्यायपालिका और इतिहास के बीच संवाद की ज़िम्मेदारी और संतुलन कैसे कायम रखा जाए।
डी.वाई. चंद्रचूड़ का ‘fundamental act of desecration’ (मूलभूत अपवित्रीकरण का कार्य) वाला कथन हमें यह याद दिलाता है कि भारत की सर्वोच्च अदालत का फ़ैसला चाहे अंतिम क्यों न हो, इतिहास की अदालत में कभी अंतिम शब्द नहीं होता। 2019 का सुप्रीम कोर्ट फ़ैसला कानून और साक्ष्य पर खड़ा है; नया बयान इतिहास और सामूहिक स्मृति की गूंज है।
अब यह पाठक और समाज पर है कि वे किसे अधिक महत्व देते हैं—अदालत का दस्तावेज़ी सच, या एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश की ऐतिहासिक व्याख्या।









