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गहरी दरार का खुलासा: सच बोलने वाले जज और अदृश्य ताक़तों की टकराहट

संयोजित ग्राफिक : खुली किताब
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Written by
–नीलेश कटारिया

अहमदाबाद, 11 सितंबर 2025, गुजरात हाईकोर्ट का बहुचर्चित ‘फाइल गुम कांड’ अब केवल एक केस फाइल की गुमशुदगी भर नहीं रहा—यह उस गहरी दरार का खुलासा है जहाँ न्यायपालिका की पारदर्शिता और प्रशासनिक ताक़तें आमने-सामने खड़ी दिखती हैं। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की हालिया स्थानांतरण सिफ़ारिश सूची में न्यायमूर्ति संदीप भट्ट का नाम शामिल होने से यह विवाद और भी संवेदनशील और चर्चित हो गया है।

खुली किताब द्वारा दस्तावेज़ों और कोर्ट रिकॉर्ड की पड़ताल बताती है कि यह विवाद किसी एक दिन का हादसा नहीं, बल्कि वर्षों से पनप रही अनदेखी का नतीजा है—2016 की चेतावनियाँ, 2023 की तकनीकी हेरफेर, और 13 फ़रवरी 2025 की वह कड़ी टिप्पणी, जिसने 18 और 25 अगस्त 2025 के बीच पूरे घटनाक्रम को विस्फोटक बना दिया।

18 अगस्त को जस्टिस भट्ट ने आदेश में रजिस्ट्री और रिकॉर्ड विभागों में CCTV कैमरे लगाने में वर्षों की देरी को “prima facie unbelievable” (प्रथम दृष्टया अविश्वसनीय) और “red-tapism” (प्रशासनिक लालफीताशाही) कहा। यह महज़ टिप्पणी नहीं थी—यह सीधे उस प्रवृत्ति पर वार था, जो न्यायिक आदेशों को योजनाबद्ध तरीके से ठंडे बस्ते में डाल देती है।

यही आदेश उन्हें पारदर्शिता और सख़्ती का प्रतीक बना गया—लेकिन साथ ही वे उन प्रशासनिक गलियारों में ऐसा चुभता कांटा भी बने, जिसे निकालना आसान नहीं था। इससे पहले, 13 फ़रवरी 2025 को राधनपुर कोर्ट के ‘फाइल गुम’ प्रकरण (SCR.A/13562/2023, Jayashreeben Pradeepbhai Joshi v/s State of Gujarat & Anr.) पर दिए गए आदेश में, उन्होंने रजिस्ट्रार (IT) ए.टी. उक्रानी की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी की थी।

अब सवाल कानूनी हलकों से निकलकर सीधे न्यायपालिका की साख पर आ टिकता है—क्या उनकी यही बेबाक़ी और उनके लगातार दिए गए सख़्त आदेश ही जस्टिस भट्ट के खिलाफ अदृश्य दबाव और असामान्य तेज़ स्थानांतरण सिफ़ारिश की वजह बने?

यही घटनाक्रम वह बिंदु बना, जहाँ से पूरी कहानी तेज़ मोड़ लेती है—आदेश, अपील और असामान्य रफ़्तार की कड़ियाँ एक-एक कर सामने आने लगीं।


सात दिन में आदेश से अपील: न्याय की रफ़्तार या दबाव?

जाँच-पड़ताल से उभरी तस्वीर चौंकाने वाली है—18 अगस्त 2025 को जस्टिस संदीप भट्ट ने Special Civil Application No. 23158/2019 (Babubhai Sampatbhai Pateliya & Ors. v/s State of Gujarat & Ors.) में एक आदेश पारित किया, जिसने हाईकोर्ट रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा दिए। आदेश में साफ़ कहा गया कि रजिस्ट्री और रिकॉर्ड विभागों में CCTV कैमरे लगाने का निर्णय वर्षों पहले हो चुका था, लेकिन इसे आज तक लागू न करना “prima facie unbelievable” (प्रथम दृष्टया अविश्वसनीय) है। इस देरी और ढिलाई की सीधी ज़िम्मेदारी उन्होंने रजिस्ट्रार (IT) पर डाली।

लेकिन सिर्फ सात दिन बाद, 25 अगस्त 2025 को घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। हाईकोर्ट प्रशासन ने जस्टिस भट्ट के आदेश के खिलाफ Letters Patent Appeal (LPA No. 1035/2025) दायर की—और उसी दिन रजिस्ट्री ने इसे सूचीबद्ध भी कर दिया। हैरत की बात यह रही कि ठीक उसी दिन डिवीजन बेंच (जस्टिस ए.एस. सुपेहिया और जस्टिस आर.टी. वच्हाणी) ने सुनवाई पूरी कर फैसला भी सुना दिया।

आमतौर पर महीनों लगने वाली यह प्रक्रिया कुछ घंटों में निपटा दी गई—यह असामान्य तेजी अब भी कानूनी हलकों में बहस का विषय बनी हुई है। इसी असामान्य तेजी को समझने के लिए, पहले यह जानना ज़रूरी है कि LPA यानी Letters Patent Appeal दरअसल है क्या और इसका ढांचा कैसे काम करता है।


LPA क्या है और क्यों है अहम?

LPA यानी Letters Patent Appeal (लेटर्स पटेंट चार्टर्स) को अक्सर “हाईकोर्ट के भीतर हाईकोर्ट जैसी remedy (कानूनी सहारा/उपचार)” कहा जाता है। सरल भाषा में, इसका सीधा मतलब है आंतरिक अपील—यानी हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश (Single Judge) के आदेश को उसी हाईकोर्ट की दो जजों की पीठ (Division Bench) के सामने चुनौती दी जा सकती है।

इस अपीलीय व्यवस्था की जड़ें अंग्रेज़ शासनकाल की लेटर्स पटेंट चार्टर्स में हैं—वे अधिकार-पत्र जिनसे उच्च न्यायालयों को आंतरिक अपील का अधिकार मिला। संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 225 ने यह सुनिश्चित किया कि हाईकोर्ट के ये पहले से मौजूद अधिकार जारी रहेंगे, जब तक संसद या राज्य विधानमंडल कोई अलग कानून न बनाए।

इसका अर्थ यह है कि हर बार सुप्रीम कोर्ट की सीढ़ियाँ चढ़ने की ज़रूरत नहीं होती। यदि किसी सिंगल जज के आदेश से असहमति हो, तो हाईकोर्ट के भीतर ही Division Bench में अपील की जा सकती है।

हालाँकि, हर आदेश LPA के ज़रिए चुनौती योग्य (maintainable) नहीं होता। उदाहरण के लिए, कुछ संवैधानिक याचिकाएँ (Writ Petitions) और विशेष आपराधिक आवेदन (Special Criminal Applications) पर LPA का अधिकार नहीं माना जाता। इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट दिशा-निर्देश दे चुका है।

यानी, LPAतकनीकी होने के बावजूद—न्यायपालिका के भीतर न्यायिक पुनर्विचार (reconsideration) का बेहद अहम मार्ग है। जस्टिस भट्ट के मामले में, इसी अपील ने सात दिनों में वह राह खोली जिसने पूरे विवाद को नई दिशा दे दी।

अब देखिए, इसी अपील के ज़रिए 25 अगस्त 2025 को जस्टिस भट्ट के आदेश को किस तरह चुनौती दी गई और उस पर क्या निर्णय आया।


LPA का फैसला: आदेश पलटा, टिप्पणियाँ हटाईं

सिर्फ़ सात दिन के भीतर ही यानी 25 अगस्त 2025 को डिवीजन बेंच (जस्टिस ए.एस. सुपेहिया और जस्टिस आर.टी. वच्हाणी) ने LPA No. 1035/2025 पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस संदीप भट्ट के 18 अगस्त वाले आदेश (Special Civil Application No. 23158/2019) को निरस्त कर दिया। 25 अगस्त के आदेश के पेज नंबर 2 में कहा गया कि—

“By the impugned order, the learned Single Judge has made stigmatic observations on the Registry of this Court on the issue relating to the installation of the CCTV cameras in the Registry of this Institution. For the sake of the reputation of the Registry, we are not referring to the observations in detail.”

अर्थात, खंडपीठ ने माना कि एकल न्यायाधीश (जस्टिस भट्ट ) की टिप्पणियाँ रजिस्ट्री की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचाने वाली थीं। इसलिए दो जजों की खंडपीठ ने उन टिप्पणियों को विस्तार से सामने रखने के बजाय केवल उनका सार ही दर्ज किया—मानो न्यायिक शब्दों की धार को मुलायम आवरण में ढक दिया गया हो।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के State of Rajasthan v/s Prakash Chand (1998) केस का हवाला देते हुए डिवीजन बेंच ने आदेश के पेज नंबर 7–8 में यह भी उद्धृत किया कि—

“Under the constitutional scheme, the Chief Justice is the supreme authority and the other Judges, so far as officers and servants of the High Court are concerned, have no role to play on the administrative side.”

सरल शब्दों में, अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि रजिस्ट्री और स्टाफ पर प्रशासनिक नियंत्रण सिर्फ़ मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के पास है—अन्य जज इसमें दख़ल नहीं दे सकते।

साथ ही डिवीजन बेंच ने अपने आदेश के पेज नंबर 4 में यह भी दर्ज किया कि—

“…the learned Single Judge, by passing the impugned order, has travelled beyond the roster assigned by the Hon’ble the Chief Justice.”

यानी, अदालत का कहना था कि जस्टिस भट्ट ने उस मामले पर आदेश दिया, जो उनके हिस्से के काम (रोस्टर—यानी किस जज को कौन-से मामले सुनने हैं, इसका बँटवारा) में शामिल नहीं था। अदालतों में यह बँटवारा केवल मुख्य न्यायाधीश तय करते हैं। इसलिए डिवीजन बेंच ने माना कि जस्टिस भट्ट ने अपने निर्धारित दायरे से बाहर जाकर फैसला दिया, जो मुख्य न्यायाधीश की प्रशासनिक सर्वोच्चता के विपरीत था।


अदालत का निर्देश

डिवीजन बेंच ने LPA No. 1035/2025 में सुनाए गए आदेश में जस्टिस संदीप भट्ट का 18 अगस्त 2025 वाला आदेश पूरी तरह रद्द कर दिया। साथ ही, रजिस्ट्री पर की गई उनकी सख़्त टिप्पणियाँ (कलंकित/strictures) रिकॉर्ड से हटाने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि आगे रजिस्ट्री में CCTV  कैमरे लगाने की निगरानी अब जस्टिस भट्ट की अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं रहेगी।

यह न्यायिक निर्णय (आदेश) केवल तकनीकी व्याख्या या दख़ल का नहीं रहा, बल्कि पूरे विवाद को नई दिशा दे गया। इसने बहस को इस मूल प्रश्न पर ला खड़ा किया कि—

अदालत की रजिस्ट्री/स्टाफ पर टिप्पणी व दिशा-निर्देश देने का अधिकार किस हद तक न्यायिक आदेश का विषय हो सकता है, और किस बिंदु पर वह मुख्य न्यायाधीश के विशिष्ट प्रशासनिक अधिकार-क्षेत्र में आता है।

यहीं से मामला ‘फाइल गुम कांड’ से आगे बढ़कर न्यायिक स्वतंत्रता बनाम प्रशासनिक नियंत्रण की जंग का रूप लेता दिखा।


तेज़ रफ़्तार पर उठे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू आदेश का सार नहीं, बल्कि उसकी असामान्य गति रही। 28 अगस्त 2025 को भारत के मुख्य न्यायाधीश और कॉलेजियम सदस्य जस्टिस सूर्यकांत को सौंपे गए गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHAA) के प्रतिवेदन (representation) में ‘पक्का नंबर’ दिए जाने की प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति दर्ज की गई।

क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रतिवेदन सामूहिक विचार-विमर्श के बाद वरिष्ठ और अनुभवी अधिवक्ताओं (advocates) द्वारा तैयार किया गया एक तथ्यात्मक दस्तावेज़ है, जिसकी प्रामाणिकता को नकारा नहीं जा सकता। प्रतिवेदन में साफ़ शब्दों में दर्ज है—

“without waiting for Registration of the Letters Patent Appeal, the Registry was directed to issue ‘Pakka number’.”

अर्थात, सामान्य प्रक्रिया को दरकिनार कर आदेश के खिलाफ़ दाख़िल अपील (यानी अदालत में चुनौती देने वाली याचिका) को सीधे स्थायी केस संख्या—‘पक्का नंबर’—दे दिया गया; वह भी इतनी तेजी से कि औपचारिक जाँच-पड़ताल (scrutiny) और पंजीकरण (registration) की पूरी प्रक्रिया मानो एक झटके में पूरी कर दी गई।

जबकि प्रचलित प्रक्रिया (established procedure) यह है कि पहले अस्थायी पंजीकरण (provisional number) दिया जाता है; इसके बाद रजिस्ट्री—यानी न्यायालय का प्रशासनिक कार्यालय—हफ़्तों या महीनों चलने वाली स्क्रूटनी (औपचारिक जाँच-पड़ताल) करती है। इस दौरान कमियाँ दूर की जाती हैं और आवश्यक औपचारिकताएँ पूरी होने पर ही स्थायी केस संख्या (पक्का नंबर) दी जाती है। इसके बाद ही मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध (listing) होता है।

यहाँ, GHAA के प्रतिवेदन के अनुसार, सीधे ‘पक्का नंबर’ जारी हुआ—उसी दिन लिस्टिंग, उसी दिन सुनवाई और तो और, उसी दिन फ़ैसला भी हो गया। जहाँ आम पक्षकार महीनों–सालों तक इंतज़ार करते हैं, वहीं यह अपील मानो ‘एक्सप्रेस लेन’ में दौड़ती दिखी।

असामान्य गति का संकेत
यही वजह है कि कानूनी हलकों में अब सवाल उठ रहे हैं—क्या यह केवल संयोग था, या फिर जस्टिस भट्ट की सख़्त टिप्पणियों ने किसी अदृश्य दबाव (undue influence) को सक्रिय (triggered) कर दिया, जिसने प्रक्रिया को “फास्ट-ट्रैक” कर दिया? और यही सवाल आगे जुड़ता है रजिस्ट्री-संबंधी पहले के कथित हेर-फेर और ID-चोरी के उन खुलासों से, जिनकी ओर यह घटनाक्रम बार-बार इशारा करता है। इस ‘एक्सप्रेस पैटर्न’ को परखने के लिए, उस प्रकरण पर भी नज़र डालना ज़रूरी है जहाँ रजिस्ट्री-स्तर पर रिकॉर्ड में छेड़छाड़ के संकेत मिले।

केस-स्टेटस में छेड़छाड़ और CCTV की अनिवार्यता

दिसंबर 2023 में गुजरात हाईकोर्ट की रजिस्ट्री से जुड़ा सबसे चौंकाने वाला खुलासा सामने आया। मामला था Dharmesh Jivanlal Gurjar बनाम State of Gujarat (Special Criminal Application No. 996/2020), जहाँ यह खुलासा हुआ कि हाईकोर्ट रजिस्ट्री के भीतर ही केस-लिस्टिंग में सुनियोजित हेरफेर हुआ।

असल में क्या हुआ

9 अक्टूबर 2023 को यह केस Admission Board (प्रारंभिक सुनवाई की सूची) में होना चाहिए था, जहाँ केवल यह तय होता है कि केस सुना जाए या नहीं। लेकिन अचानक यह Final Hearing Board (अंतिम सुनवाई की सूची) में पहुँच गया—और वह भी किसी दूसरी बेंच के सामने।

साधारण भाषा में समझें तो यह वैसा ही था, जैसे किसी यात्री की टिकट लोकल ट्रेन के डिब्बे की हो, लेकिन अचानक उसका नाम राजधानी एक्सप्रेस की सूची में डाल दिया जाए—जहाँ सफ़र का स्तर, नियम और नतीजे पूरी तरह बदल जाते हैं।

जाँच में खुलासा

21 अक्टूबर 2023 को तकनीकी जाँच से सामने आया कि किसी ने कोर्ट मास्टर (Court Master) की ID और पासवर्ड का दुरुपयोग कर हाईकोर्ट की रजिस्ट्री के सिस्टम में लॉग-इन किया और केस-स्टेटस बदल दिया। यानी Admission Board की जगह केस सीधे Final Hearing Board में पहुँचा दिया गया।

सरल शब्दों में—यह वैसा ही था जैसे किसी फ़िल्म का केवल ट्रेलर (झलक) दिखना चाहिए था, लेकिन किसी ने रिकॉर्ड बदलकर दर्शकों को सीधा क्लाइमेक्स (अंतिम दृश्य/निष्कर्ष) दिखा दिया।

न्यायालय की कड़ी टिप्पणी

जस्टिस संदीप भट्ट ने इसे अदालत के प्रशासन पर सीधा प्रहार मानते हुए 13 दिसंबर 2023 के आदेश (R/Special Criminal Application No. 996/2020) में लिखा:

“This activity cannot be tolerated, more particularly in the Registry of the highest Court of the State. Such unscrupulous persons should be taken to task.”

यानी यह हरकत बर्दाश्त के लायक नहीं है, ख़ासकर तब जब यह राज्य की सर्वोच्च अदालत की रजिस्ट्री में हुई हो। इसी आदेश में उन्होंने साफ़ कहा कि—

“This Court clearly indicates that the attempt was made to interfere with the administration of justice.”

अर्थात, अदालत ने इस चेतावनी से स्पष्ट कर दिया कि मामला महज़ “case-listing error” नहीं था, बल्कि यह किसी सुनियोजित हस्तक्षेप का आभास कराता है। जस्टिस भट्ट ने केवल दोषियों की पहचान और कार्रवाई की बात नहीं कही, बल्कि यह भी चेताया कि अदालत की रीढ़—यानी संस्थागत ढाँचे—को कमज़ोर करने वाली ताक़तें भीतर तक सक्रिय दिखती हैं।

इसीलिए यह टिप्पणी न्यायिक व्यवस्था के लिए एक तरह की खतरे की घंटी थी—जो आगाह करती है कि अगर ऐसे हस्तक्षेपों पर समय रहते रोक नहीं लगी, तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गहरी चोट पहुँच सकती है। यह बात आदेश के रिकॉर्ड में दर्ज न्यायालय के शब्दों को ही प्रतिध्वनित करती है और संस्थागत सतर्कता पर केंद्रित है।

2025 में भी वही कहानी

लेकिन आदेश के बाद भी हालात नहीं बदले। 8 अगस्त 2025 को, एक अलग केस—C/SCA/23158/2019 (बाबुभाई संपतभाई पटेलिया एवं अन्य बनाम गुजरात राज्य) की सुनवाई के दौरान फिर से रजिस्ट्री की गड़बड़ी सामने आई।

इस बार मामला office objections हटाने की तिथियों से जुड़ा था। रिकॉर्ड में पहले 15.07.2025 अंकित था, जिसे काटकर 21.07.2025 कर दिया गया। उसी दिन केस सुनवाई पर भी सूचीबद्ध था। अदालत ने इसे गंभीर माना और साफ़ टिप्पणी की कि यह रजिस्ट्री की “lackadaisical approach” (लापरवाह रवैया) का नतीजा है।

जस्टिस भट्ट ने कहा कि अगर 2023 के आदेश के अनुसार CCTV कैमरे समय पर लगाए गए होते, तो ऐसी objection-manipulation की घटनाएँ टल सकती थीं। यह भी दर्ज हुआ कि अगस्त 2025 तक केवल केबल बिछाने और निविदा प्रक्रिया जैसी शुरुआती कार्यवाहियाँ ही पूरी हुई थीं—यानी CCTV कैमरे की स्थापना अब भी अधूरी थी।

गहरी परतें

ये घटनाएँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि मामला सिर्फ़ तकनीकी उपकरणों तक सीमित नहीं है। यह सवाल खड़ा करता है—क्या यह महज़ प्रशासनिक लापरवाही थी, या फिर भीतर कहीं संस्थागत प्रतिरोध और ताक़तों की सक्रियता भी काम कर रही थी?

दरअसल, CCTV कैमरे का मुद्दा अब एक प्रतीक बन चुका है—न्यायिक गरिमा और प्रशासनिक रवैये की टकराहट का प्रतीक। एक ओर अदालतें पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही थीं, दूसरी ओर रजिस्ट्री में लगातार देरी, लापरवाही और प्रक्रियात्मक टालमटोल ने न्यायिक व्यवस्था की साख पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए।

यही वजह है कि case-status tampering से लेकर objection-manipulation तक की घटनाओं ने यह साफ़ कर दिया कि CCTV कैमरे की माँग सिर्फ़ कैमरे लगाने की औपचारिक माँग नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका की पारदर्शिता और स्वतंत्रता का गहरा प्रश्न है।

यह घटना किसी सामान्य तकनीकी गड़बड़ी की तरह नहीं देखी जा सकती थी। अदालत ने इसे सीधे-सीधे न्याय की रीढ़ पर हमला माना। संदेश साफ़ था—जो भी ताक़तें रजिस्ट्री के ज़रिए अदालत की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करेंगी, उन्हें “अंदरूनी मामला” कहकर दबाया नहीं जाएगा। इस संवेदनशीलता की जड़ समझने के लिए, पहले यह देखना ज़रूरी है कि रजिस्ट्री वास्तव में है क्या और कैसे काम करती है।


हाईकोर्ट की रजिस्ट्री: अदालत की धड़कन और रीढ़

अदालत की असली तस्वीर केवल जज और वकीलों तक सीमित नहीं रहती। असली धड़कन है रजिस्ट्री (Registry)—जहाँ से हर मुक़दमे की यात्रा शुरू होती है और उसी पर खत्म होती है। यही वह केंद्र है, जहाँ यह तय होता है कि कौन-सा मुक़दमा कब और किस न्यायाधीश की बेंच के सामने पहुँचेगा।
रजिस्ट्री का नेतृत्व और भूमिका

रजिस्ट्री का मुखिया रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General) होता है। अधिकांश हाईकोर्टों में यह पद उच्च न्यायिक सेवा (Higher Judicial Service—HJS) से प्रतिनियुक्त अधिकारियों को दिया जाता है। सामान्यतः यह अधिकारी ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश स्तर (Selection Grade / Super Time Scale / Principal District Judge) के होते हैं। नियुक्ति का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 229 के तहत केवल मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के पास निहित है।

रजिस्ट्री की भूमिका केवल “ऑफिस वर्क” तक सीमित नहीं है। यहाँ से केस की फाइलिंग, स्क्रूटनी (scrutiny), लिस्टिंग, दस्तावेज़ों की मूवमेंट और प्रशासनिक नियंत्रण तय होता है—जो सीधे-सीधे न्याय की डिलीवरी को प्रभावित करता है। इसीलिए इसे अदालत की “धड़कन और रीढ़” कहा जाता है।

रजिस्ट्री: कौन क्या संभालता है
  • रजिस्ट्रार जनरल → पूरे प्रशासनिक ढाँचे का शीर्ष अधिकारी; सीधे मुख्य न्यायाधीश को रिपोर्ट करता है।
  • रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल)केस की फाइलिंग, नोटिस जारी करना, लिस्टिंग (Admission Board, Final Hearing आदि) और अदालत के आदेशों का अनुपालन देखना।
  • रजिस्ट्रार (प्रशासन)कर्मचारियों की पोस्टिंग, डिप्लॉयमेंट और दफ़्तर/स्टाफ प्रबंधन
  • रजिस्ट्रार (SCMS & IT)अदालत के डिजिटल और तकनीकी ढाँचे (केस-मैनेजमेंट सिस्टम, CCTV, नेटवर्क आदि) की देखरेख
  • रजिस्ट्रार (विजिलेंस)स्टाफ आचरण और अनुशासन की निगरानी; विजिलेंस जांच और अनुशासनात्मक कार्यवाही का समन्वय
  • रजिस्ट्रार (इंस्पेक्शन एवं फाइनेंस)ज़िलों और विभागों का निरीक्षण और वित्तीय पहलुओं की निगरानी
रिपोर्टिंग संरचना
  • रजिस्ट्रार जनरलमुख्य न्यायाधीश
  • अन्य सभी रजिस्ट्राररजिस्ट्रार जनरल
  • डिप्टी/असिस्टेंट रजिस्ट्रारसंबंधित रजिस्ट्रार
  • कोर्ट मास्टर्स/क्लेरिकल स्टाफडिप्टी/असिस्टेंट रजिस्ट्रार

यानी, रजिस्ट्री केवल प्रशासनिक सहायक अंग नहीं है, बल्कि यह वह धुरी है जिसके जरिए न्यायिक प्रक्रिया की हर नस और धड़कन चलती है, और यदि यही धड़कन रुक जाए, तो न्यायिक तंत्र का पूरा रक्त-संचार ठप हो सकता है। अब इसी संरचना को ध्यान में रखकर देखें कि CCTV कैमरे की मांग पहली बार क्यों और कब उठी।


CCTV कैमरा की माँग क्यों उठी?

गुजरात हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में गड़बड़ियों का सिलसिला नया नहीं है। इसकी पहली गूंज 7 अक्टूबर 2016 को सुनाई दी, जब डिवीजन बेंच (जस्टिस एम.आर. शाह और जस्टिस ए.एस. सुपेहिया) ने LPA No. 2111/2009 की सुनवाई के दौरान कड़े निर्देश दिए—

“Registry is directed to see that no such incident takes place in future and Registrar General and Registrar (Judicial) are hereby directed to see that all precautionary measures are taken to see that no papers of judicial proceedings are missing from the Department.”

अर्थात अदालत ने रजिस्ट्री को चेतावनी दी कि भविष्य में कोई भी न्यायिक कागज़ात (judicial papers/proceedings) गुम न हों और इसके लिए रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General) तथा रजिस्ट्रार, ज्यूडिशियल (Registrar, Judicial)  सभी आवश्यक एहतियाती कदम उठाएँ।

इस आदेश को प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को रिपोर्ट किया गया। उनकी स्वीकृति के बाद मामला चैंबर कमेटी (Chamber Committee) के समक्ष रखा गया। 22 नवंबर 2016 की बैठक में औपचारिक निर्णय लिया गया कि रजिस्ट्री और रिकॉर्ड विभाग में CCTV कैमरे लगाए जाएँ।

लेकिन यह निर्णय सात वर्षों तक काग़ज़ों में ही दबा रहा, और यही प्रशासनिक ढिलाई 2023 में विस्फोटक रूप में सामने आई, जब रजिस्ट्री में केस-स्टेटस से छेड़छाड़ का मामला उजागर हुआ।

यहीं से यह सवाल और भी पेचीदा हो गया—क्या यह महज़ लापरवाही थी, या फिर भीतर कहीं और भी ताक़तें सक्रिय थीं? इस संदर्भ में एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने यह दिखा दिया कि मामला सिर्फ़ CCTV कैमरे तक सीमित नहीं, बल्कि न्यायिक गरिमा और प्रशासनिक रवैये की टकराहट तक जा पहुँचा। इन्हीं लंबित निर्देशों और प्रक्रियात्मक ढिलाई की पृष्ठभूमि में, एक घटना ने संस्थागत रवैये पर सवाल और भी तीखे कर दिए।


जब एक वरिष्ठ जज ने अपमान के विरोध में इस्तीफ़ा चुना

यह प्रसंग केवल व्यक्तिगत असहमति नहीं, बल्कि उस संस्थागत रवैये का संकेत था जो आगे चलकर 2025 के घटनाक्रम में परिलक्षित हुआ। GHAA के 28 अगस्त 2025 के प्रतिवेदन के अनुसार, आईटी अनुभाग से जुड़े अधिकारी ए.टी. उक्रानी की रक्षा के उद्देश्य से एक चैंबर कमेटी बैठक में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस उमेश ए. त्रिवेदी को सार्वजनिक रूप से ‘snub’/‘run down’ (फटकारना/अपमानित करना) किया—और इस अपमान के विरोध में जस्टिस त्रिवेदी ने अपनी सभी समितियों से इस्तीफ़ा दे दिया।

GHAA का कहना है कि यह घटना बार (वकीलों का संगठन) में अविश्वास की भावना को जन्म देने वाली रही और “एक अधिकारी की रक्षा बनाम न्यायिक गरिमा” जैसा गलत संतुलन स्थापित करती दिखी।

यह प्रकरण 2016 से लंबित CCTV कैमरे फैसले, 2023 की ID-misuse/listing manipulation (पहचान का दुरुपयोग/लिस्टिंग में हेरफेर) और रजिस्ट्री के भीतर लालफीताशाही (red-tapism) की शिकायतों से बनी पृष्ठभूमि के बीच एक पैटर्न की ओर इशारा करता है—जहाँ प्रशासनिक प्राथमिकताएँ और न्यायिक गरिमा आपस में टकराती दिखीं।

इसी माहौल में, 13 फ़रवरी 2025 के आदेश के बाद रोस्टर बदला गया और फिर कुछ ही महीनों में 25 अगस्त 2025 को अपील की ‘एक्सप्रेस’ सुनवाई हुई। बार (GHAA) और कानूनी हलकों ने इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि उसी सिलसिले की कड़ी के तौर पर देखा। इन्हीं परिस्थितियों ने आगे ‘एक्सप्रेस अपील’ और LPA आदेश तक पहुँचा दिया, जिसने पूरे विवाद को नई दिशा दी।

यह केवल एक बैठक की घटना नहीं थी; इसके धागे उन अधूरे आदेशों से जुड़ते हैं जो सालों से काग़ज़ों में ही कैद रहे। अब क्रमवार देखें, कैसे बार-बार दिए गए निर्देश भी CCTV कैमरों तक नहीं पहुँच पाए।


आदेश पर आदेश, पर CCTV अधूरा

  • 07.10.2016LPA No. 2111/2009 में डिवीजन बेंच (जस्टिस एम.आर. शाह और जस्टिस ए.एस. सुपेहिया) ने न्यायिक कागज़ात गुम होने पर एहतियाती कदम उठाने का आदेश दिया।
  • 22.11.2016GHAA प्रतिवेदन के अनुसार, इस आदेश के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने CCTV इंस्टॉलेशन की अनुमति दी और चैंबर कमेटी मीटिंग में CCTV लगाने का औपचारिक निर्णय लिया गया।
  • 08.11.2023जस्टिस संदीप भट्ट ने रजिस्ट्री में CCTV लगाने का आदेश दिया और स्टेटस रिपोर्ट मांगी।
  • 13.12.2023जस्टिस भट्ट ने रजिस्ट्री की गड़बड़ी को “interfere with the administration of justice” (न्यायिक प्रशासन में हस्तक्षेप का प्रयास) बताया और कहा कि यह बर्दाश्त योग्य नहीं है। इससे स्पष्ट था कि CCTV कैमरे तब तक नहीं लगे थे।
  • 15.01.2024CCTV इंस्टॉलेशन की डेडलाइन तय हुई; रजिस्ट्रारों और CCTV प्रभारी को समयसीमा तक काम पूरा करने का निर्देश दिया गया, पर यह डेडलाइन पूरी नहीं हो सकी।
  • 16.02.2024जस्टिस सी.एम. रॉय (नया रोस्टर) ने आदेश में Registrar General की रिपोर्ट के हवाले से दर्ज किया कि टेंडर आमंत्रित हो चुके हैं और फ़ाइनल होने पर वर्क ऑर्डर जारी होगा; CCTV मुद्दा प्रशासनिक पक्ष पर निपटाया जाएगा।
  • 18.08.2025जस्टिस संदीप भट्ट ने कहा कि CCTV इंस्टॉलेशन वर्षों से स्वीकृत है, लेकिन अब तक लागू न होना “prima facie unbelievable” (प्रथम दृष्टया अविश्वसनीय) है, और इसकी सीधी ज़िम्मेदारी Registrar (IT) पर डाली।
  • 25.08.2025हाईकोर्ट प्रशासन ने जस्टिस भट्ट के आदेश के खिलाफ LPA No. 1035/2025 दायर की। खंडपीठ ने आदेश रद्द करते हुए कहा कि CCTV इंस्टॉलेशन का काम “presently going on” (फिलहाल चल रहा है) और “under active implementation” (सक्रिय रूप से लागू किया जा रहा है) है, और यह विषय चीफ़ जस्टिस के प्रशासनिक नियंत्रण आता है।
एक ओर CCTV कैमरों का मुद्दा आदेश दर आदेश खिंचता गया, दूसरी ओर 2025 की घटनाओं ने वकीलों को संकेत दिया कि अब चुप रहना विकल्प नहीं है। यहीं से GHAA का सीधा और मुखर हस्तक्षेप शुरू हुआ।

GHAA का दो टूक संदेश: न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधी पैरवी

अहमदाबाद के वकील समुदाय ने सात महीनों में जिस सधे हुए, पर मुखर अंदाज़ में न्यायिक स्वतंत्रता का पक्ष रखा है, वह गुजरात हाईकोर्ट के इतिहास में मिसाल है। 17 फ़रवरी 2025 से लेकर 26 अगस्त 2025 तक—दो असाधारण आमसभाओं में—गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHAA) ने यह दिखा दिया कि वकीलों का समूह केवल दर्शक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन का सजग प्रहरी है।

13 फ़रवरी 2025 को राधनपुर अदालत की गुम फाइल प्रकरण पर जस्टिस संदीप भट्ट की कड़ी टिप्पणियों के तुरंत बाद उनका रोस्टर बदल दिया गया। इसके विरोध में 17 फ़रवरी 2025 को GHAA ने असाधारण आमसभा बुलाई। बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय हुआ कि न्यायपालिका की पारदर्शिता और संस्थागत साख की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट और कॉलेजियम के समक्ष औपचारिक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाएगा। साथ ही बहुमत ने यह भी तय किया कि आवश्यकता पड़ने पर मुख्य न्यायाधीश के स्थानांतरण की माँग भी प्रतिनिधित्व का हिस्सा होगी।

इसके बाद 18 अगस्त 2025 को जस्टिस भट्ट द्वारा पारित आदेश और महज़ सात दिन में 25 अगस्त 2025 को इसी आदेश के खिलाफ दाख़िल हुई Letters Patent Appeal (LPA No. 1035/2025) की तत्काल सुनवाई ने वकीलों की चिंता को और गहरा कर दिया। इसी बीच, 25–26 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठकों के बाद जारी स्थानांतरण सिफ़ारिशों की सूची में जस्टिस भट्ट का नाम सामने आते ही GHAA का स्वर और मुखर हो गया।

नतीजतन, 26 अगस्त 2025 को दूसरी असाधारण आमसभा बुलाई गई। बैठक में यह साफ़ संदेश दिया गया कि जस्टिस भट्ट का स्थानांतरण अब केवल एक जज का व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर सीधा प्रहार है। प्रस्ताव पारित हुआ कि इसका विरोध संस्था-स्तर पर, संवैधानिक दायरे में रहकर किया जाएगा। उसी शाम अध्यक्ष बृजेश जे. त्रिवेदी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल गठित किया गया, जिसमें असीम पांड्या, भार्गव भट्ट, बाबुभाई मंगुकिया, दीपेन दवे और हार्दिक ब्रह्मभट्ट प्रमुख रूप से शामिल थे।

महज़ दो दिन बाद, 28 अगस्त 2025 को यह प्रतिनिधिमंडल दिल्ली पहुँचा और भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा कॉलेजियम सदस्य जस्टिस सूर्यकांत से मुलाक़ात कर विस्तृत प्रतिवेदन सौंपा। इसमें साफ़ लिखा गया—

“In fact, if the language in all the orders, passed by the Hon’ble Mr. Justice Sandeep N. Bhatt is read, the Hon’ble Judge has never crossed the legal ‘Laxman Rekha’ and maintained very high standards.”

प्रतिवेदन के तेवर से पता चलता है कि यह दस्तावेज़ महज़ औपचारिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि वकीलों का तथ्यात्मक और संस्थागत बयान है। इस प्रतिवेदन के माध्यम से वकीलों ने स्पष्ट कर दिया कि जस्टिस भट्ट की टिप्पणियाँ न तो संस्थागत अधिकार को चुनौती थीं और न ही न्यायिक मर्यादा से बाहर जाने की कोशिश। उनका असली लक्ष्य था—रजिस्ट्री और प्रशासनिक निष्क्रियता की उन अदृश्य परतों को उजागर करना, जो न्यायपालिका की पारदर्शिता को आघात पहुँचा रही थीं।

GHAA ने अपने प्रतिवेदन (representation) में साफ़ कर दिया कि जस्टिस भट्ट की ईमानदारी और कार्यक्षमता पर कोई सवाल नहीं उठ सकता। चार साल के छोटे से कार्यकाल में 19,000 मामलों का निपटारा अपने आप में उस भरोसे को मज़बूत करता है जो वकीलों ने उनके पक्ष में जताया।

यह दस्तावेज़ जस्टिस भट्ट की साख और ईमानदारी को न्यायपालिका की रीढ़ के रूप में पेश करता है। संदेश साफ़ था—अगर ऐसे ईमानदार जज को स्थानांतरण के ज़रिये किनारे किया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर हमला माना जाएगा।

प्रतिवेदन का दोहरा संदेश
  • अंदरूनी पारदर्शिता की माँग: अदालत की रजिस्ट्री और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में लापरवाही को उजागर करने वाले जज को सज़ा देना न्यायपालिका के मूल्यों पर चोट है।
  • संस्थागत चेतावनी: अगर बार की आवाज़ अनसुनी की गई तो यह मिसाल भविष्य में न्यायिक स्वतंत्रता के लिए ख़तरनाक रास्ता खोल देगी।

सबसे अहम यह रहा कि GHAA ने विरोध दर्ज करते समय संवैधानिक मर्यादा का पूरा ध्यान रखा। सुप्रीम कोर्ट ने Harish Uppal v. Union of India (2003) में वकीलों की हड़ताल को अस्वीकार्य ठहराया है और स्पष्ट किया है कि यह जनता के न्याय पाने के मौलिक अधिकार (Article 21) का हनन करती है। GHAA ने इन मर्यादाओं का ध्यान रखते हुए अपना विरोध इस तरह व्यक्त किया कि न तो अदालतों की प्रक्रिया पूरी तरह ठप पड़ी और न ही जनता के अधिकार पर सीधी चोट पहुँची। बार की नाराज़गी संस्थागत थी, लेकिन उसका आचरण संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही रहा। यह संतुलन दर्शाता है कि GHAA का संघर्ष किसी व्यक्ति-विशेष तक सीमित नहीं था, बल्कि Bar और Bench के बीच न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता की रक्षा का प्रतीक था।

बार ने न्यायिक स्वतंत्रता की पैरवी की, पर अदालत की तरफ़ से चुप्पी टूटी नहीं। यह खामोशी ही अब अगला अध्याय लिखती है—संस्थागत सन्नाटा।


संस्थागत चुप्पी: सवालों के बीच सन्नाटा

गुजरात हाईकोर्ट की रजिस्ट्री विवाद’ और न्यायमूर्ति संदीप भट्ट के आदेशों से उपजे घटनाक्रम अब केवल कानूनी तकनीकीताओं (legal technicalities) तक सीमित नहीं रहे। असली सवाल यह है कि जब अदालत के भीतर गंभीर अनियमितताओं और आदेशों की अनदेखी के आरोप सामने आए, तो संस्थागत प्रतिक्रिया धुंधली क्यों रही?

13 फ़रवरी 2025 को दिए आदेश के तुरंत बाद रोस्टर बदला गया और उसी दिन GHAA ने इसे प्रशासनिक हस्तक्षेप मानकर विरोध दर्ज किया।

इसके बावजूद हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से कोई ठोस या विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया। उपलब्ध रिकॉर्ड और दस्तावेज़ों की छानबीन के बाद भी पारदर्शी जवाब अनुपस्थित रहा। यही कारण है कि कानूनी हलकों में सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है—जब आरोप इतने गंभीर हों, तो चुप्पी क्यों?

दरअसल, जहाँ एक ओर रजिस्ट्री की प्रक्रियाएँ असामान्य तेज़ी से चलीं—एक अपील को उसी दिन ‘पक्का नंबर’ देकर सुनवाई और फ़ैसला भी सुना दिया गया—वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक पक्ष से स्पष्ट सफ़ाई अब तक नहीं आई। इस विरोधाभास ने ही शंकाओं को और गहरा कर दिया।

यही वह सन्नाटा है जिसने कानूनी हलकों और वकीलों के बीच अविश्वास को जन्म दिया है। सवाल सीधा है—क्या न्यायपालिका जनता को स्पष्ट और पारदर्शी जवाब देगी, या फिर यह सन्नाटा ही उसका जवाब माना जाएगा? इन सवालों का वजन तब समझ आता है, जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट की स्थापित नज़ीरों (judicial precedents) की रोशनी में परखा जाए।


कानूनी नज़ीरें और व्यापक संदर्भ

‘गुजरात हाईकोर्ट की रजिस्ट्री विवाद’ और न्यायमूर्ति संदीप भट्ट के आदेशों से उपजा विवाद किसी एक अदालत या एक न्यायाधीश तक सीमित नहीं है। यह भारतीय न्यायपालिका की उस गहराई को छूता है, जहाँ सवाल सिर्फ़ फ़ाइलों के गुम होने का नहीं, बल्कि पूरी न्याय-व्यवस्था की पारदर्शिता और स्वतंत्रता पर उठ रहे संदेह का है।

GHAA के प्रतिवेदन का केंद्रीय तर्क यही रहा कि जस्टिस संदीप भट्ट ने कभी मुख्य न्यायाधीश के Master of Roster  (मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार कि कौन-सा मामला किस न्यायाधीश/पीठ को सौंपा जाएगा) अधिकार को चुनौती नहीं दी। उन्होंने केवल उन्हीं पुराने आदेशों को पुनः सामने रखा और उनके अनुपालन की माँग की, जिन्हें 2016 में ही लागू कर देना चाहिए था, लेकिन जिन्हें रजिस्ट्री ने फाइलों में दबाकर भुला दिया।

असल में, उन्होंने अपनी ‘लक्ष्मण रेखा’ नहीं लांघी—बल्कि उसी के भीतर रहकर पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग उठाई। लेकिन यह सवाल यहीं खत्म नहीं होता। असली कसौटी तो वही है जो सुप्रीम कोर्ट अपनी ऐतिहासिक नज़ीरों (landmark judicial precedents) में खींच चुका है—जहाँ हर बार यह तय किया गया कि ट्रांसफ़र और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को किस दायरे में समझा जाए।

पहली गूंज: 1981 का चेतावनी भरा फैसला

30 दिसंबर 1981 को सुप्रीम कोर्ट ने S.P. Gupta v/s Union of Indiaपहले जजेस केस—में यह दर्ज किया:

“The Constitution expects the Chief Justice of India to ensure in the process of consultation that the power to transfer is not used arbitrarily against a Judge of a High Court, that it is not employed as a disguise for punishing him, and that, even if the ground for the proposed transfer is made out, it will be in the public interest to effect the transfer.”

सुप्रीम कोर्ट की यह ऐतिहासिक टिप्पणी सिर्फ़ एक वाक्य नहीं, बल्कि न्यायपालिका की रीढ़ को संभालने वाली चेतावनी है। अदालत ने साफ़ कहा कि उच्च न्यायालयों में जजों के स्थानांतरण की शक्ति कभी भी मनमानी का हथियार या छुपा हुआ दंड (disguised punishment) नहीं बननी चाहिए। अनुच्छेद 222 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार है, लेकिन प्रक्रिया का केंद्र Chief Justice of India से अनिवार्य परामर्श है—और यहीं पर CJI की संवैधानिक जिम्मेदारी तय होती है: हर प्रस्तावित ट्रांसफ़र को सार्वजनिक हित की कसौटी पर परखना होगा।

यह पंक्ति किसी मुख्य न्यायाधीश की आत्म-चेतावनी नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट का बाध्यकारी संवैधानिक सिद्धांत है—एक ऐसा मार्गदर्शन जो हर दौर के CJI को यह याद दिलाता है कि अगर यह शक्ति विवेकहीन हुई, तो “न्याय की स्वतंत्र आत्मा पर प्रहार” होगा।
यही वह निहितार्थ है जिसे आज की कॉलेजियम प्रणाली में भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

दूसरी नज़ीर: 1991 में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान की रीढ़

29 अक्टूबर 1991 को Sub-Committee on Judicial Accountability v/s Union of India & Ors. में सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“Independence of the judiciary is an essential attribute of rule of law.”

यह टिप्पणी उस समय की सबसे अहम चेतावनी थी, जिसने साफ़ कर दिया कि न्यायपालिका और संविधान का रिश्ता महज़ औपचारिक नहीं, बल्कि संरचना की नींव से जुड़ा हुआ है। अदालत ने कहा—संविधान की व्याख्या करते वक्त हमेशा यह ध्यान रखा जाए कि उसकी बुनियादी संरचना और मूलभूत विशेषताएँ और मज़बूत हों। Rule of Law यानी कानून का शासन तभी सुरक्षित रह सकता है जब न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र हो। यह स्वतंत्रता कोई केवल आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा है।

तीसरा पड़ाव: 1998 का नौ-न्यायाधीशीय फैसला

28 अक्टूबर 1998 को Special Reference No. 1 of 1998तीसरे जजेस केस—में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशीय पीठ ने यह स्पष्ट किया:

“The opinion of the Chief Justice of India… is sufficient safeguard and protection against any arbitrariness or bias, as well as any erosion of the independence of the judiciary.”

अदालत ने रेखा खींच दी कि ट्रांसफ़र पर जज का कोई “न्यायिक अधिकार” नहीं बनता। केवल यह देखा जाएगा कि क्या ट्रांसफ़र CJI की सिफ़ारिश पर हुआ है। यदि हाँ, तो कारणों की पर्याप्तता की जाँच अदालत का काम नहीं है। संदेश साफ़ था—सीमा तय है, न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है, और अंतिम संतुलन CJI पर टिका है।

चौथा और कठोर सबक: 2017 का जस्टिस कर्णन प्रकरण

9 मई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने In Re: Justice C.S. Karnan मामले में कहा:

“…it was prima-facie felt, that his conduct… had seriously blemished and tarnished the image of… the judiciary as a whole.”

यहाँ अदालत ने किसी लंबी तथ्य-जांच की आवश्यकता नहीं समझी। जस्टिस कर्णन का आचरण—बार-बार प्रेस में आरोप लगाना और साथी जजों पर FIR के आदेश देना—कोर्ट ने माना कि यह न्यायपालिका की समग्र साख पर सीधा हमला है। परिणामस्वरूप, उन्हें छह महीने की सज़ा सुनाई गई।

इन्हीं नज़ीरों की पृष्ठभूमि में, दो अलग प्रकृति के प्रकरणजस्टिस कर्णन और जस्टिस भट्ट—अक्सर साथ रखकर देखे जाते हैं; अंतर कहाँ है, यह समझना ज़रूरी है।


तुलनात्मक नज़रिया: जस्टिस कर्णन बनाम जस्टिस भट्ट

जस्टिस संदीप भट्ट और जस्टिस सी.एस. कर्णन के प्रकरण पहली नज़र में समान प्रतीत हो सकते हैं—दोनों में न्यायपालिका के भीतर से उठी आवाज़ों ने संस्थान को झकझोरा। लेकिन गहराई से देखने पर तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।

जस्टिस कर्णन: हमला संस्थान पर

जस्टिस सी.एस. कर्णन ने बार-बार प्रेस और मीडिया के सामने अनेक जजों पर सीधे भ्रष्टाचार और अनैतिक आचरण के आरोप लगाए। यहाँ तक कि अपने “आदेश” से सुप्रीम कोर्ट के जजों पर FIR दर्ज करने का निर्देश भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे “grossest contempt of court” (अदालत की सबसे घोर अवमानना) माना और स्पष्ट किया कि उनका सार्वजनिक रवैया ही न्यायपालिका की गरिमा को कलंकित करने के लिए पर्याप्त है। आरोपों की तथ्यगत जांच आवश्यक नहीं समझी गई; अदालत ने केवल उनके आचरण और बयानों को ही दोष सिद्ध मानते हुए कठोर कार्रवाई की और उन्हें छह महीने की सज़ा सुनाई।

जस्टिस भट्ट: पारदर्शिता की माँग

जस्टिस संदीप भट्ट का मामला अलग प्रकृति का है। उन्होंने किसी जज पर व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाया; उनका ज़ोर रजिस्ट्री और रिकॉर्ड विभाग की पारदर्शिता पर रहा—जैसे फाइल-गायब होना, आईडी का दुरुपयोग और प्रशासनिक हेरफेर को रोकने के लिए CCTV कैमरे लगाने के निर्देश। उनकी भाषा कड़ी थी—“This is nothing but interference with administration of justice” और “This delay is prima facie unbelievable… nothing but red-tapism”—लेकिन उद्देश्य संस्थान को चोट पहुँचाना नहीं, बल्कि उसकी कमज़ोरियों को उजागर कर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाना था।

अलग मंतव्य, अलग परिणाम
  • जस्टिस कर्णन को न्यायपालिका को बदनाम करने वाले आचरण पर छह महीने की सज़ा हुई।
  • जस्टिस भट्ट के मामले में, पारदर्शिता की माँग पर दिए गए उनके आदेश के अगले ही दिन 14 फ़रवरी 2025 को उनका रोस्टर बदल दिया गया, जो 17 फ़रवरी से लागू हुआ। कुछ महीनों बाद, 25 अगस्त 2025 को डिवीजन बेंच ने LPA के माध्यम से उनका आदेश पलट दिया और रजिस्ट्री पर की गई टिप्पणियाँ रिकॉर्ड से हटा दीं। इसके बाद उनका नाम स्थानांतरण की सिफ़ारिश सूची में भी शामिल कर लिया गया। (रोस्टर-परिवर्तन और LPA अलग-अलग कार्यवाहियाँ हैं; यहाँ उनका उल्लेख केवल क्रम और परिप्रेक्ष्य स्पष्ट करने के लिए है।)
असल फ़र्क

जस्टिस कर्णन का प्रकरण न्यायपालिका की गरिमा पर हमला था; जस्टिस भट्ट का प्रकरण न्यायपालिका की रीढ़रजिस्ट्री—को पारदर्शी बनाने की जद्दोजहद। उनकी बेबाक़ी ने उसी साख को बचाने के लिए भीतरूनी गड़बड़ियों (internal irregularities) पर उंगली उठाने का साहस दिखाया। फ़र्क यही है: एक ने संस्था को चोट पहुँचाई, दूसरे ने संस्था को आईना दिखाया।

इस तुलना का उद्देश्य किसी व्यक्ति-विशेष पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि न्यायिक संस्थान के प्रति जवाबदेही और पारदर्शिता की माँग के भिन्न-भिन्न रास्तों को समझना है। यहीं, स्थानांतरण को लेकर उठ रहे सवालों के बीच, एक बात साफ़ करना उपयोगी है—उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का स्थानांतरण आखिर होता कैसे है?


न्यायाधीशों के स्थानांतरण की प्रक्रिया

भारतीय न्यायपालिका में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों का स्थानांतरण संविधान के अनुच्छेद 222 (Article 222) और सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) के अधीन होता है। यह पूरी तरह से एक संवैधानिक और संस्थागत प्रक्रिया है, ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संतुलन सुरक्षित रह सके।

1. प्रारंभ (Initiation)
  • स्थानांतरण का प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India—CJI) और कॉलेजियम से आता है।
  • कॉलेजियम में CJI और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • वे किसी न्यायाधीश की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता, प्रशासनिक या संस्थागत परिस्थितियाँ (administrative/institutional issues), या कभी-कभी शिकायतों और व्यावहारिक आवश्यकताओं को देखते हुए सिफ़ारिश तैयार करते हैं।
2. उच्च न्यायालय की भूमिका (Role of High Court)
  • हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश सीधे तौर पर किसी जज के स्थानांतरण की सिफ़ारिश नहीं करता।
  • हाँ, यदि कोई गंभीर प्रशासनिक या संस्थागत विवाद हो, या लगातार शिकायतें सामने आती हों, तो मुख्य न्यायाधीश एक रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेज सकता है।
  • उस रिपोर्ट पर विचार करना और निर्णय लेना केवल कॉलेजियम का अधिकार है।
3. शिकायतें और अनुरोध (Complaints or Requests)
  • कभी-कभी बार एसोसिएशन, अधिवक्ता समूह या अन्य माध्यमों से शिकायतें सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचती हैं।
  • न्यायाधीश स्वयं भी व्यक्तिगत कारणों (जैसे स्वास्थ्य या पारिवारिक स्थिति) के आधार पर स्थानांतरण का अनुरोध कर सकते हैं।
  • लेकिन अंततः, किसी भी प्रकार की इनपुट या शिकायत का अंतिम फ़िल्टर और निर्णय केवल सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ही करता है।
4. अंतिम निर्णय और प्रक्रिया (Final Decision and Process)
  • कॉलेजियम  द्वारा तय की गई स्थानांतरण सिफ़ारिश विधि एवं न्याय मंत्रालय (Ministry of Law and Justice) को भेजी जाती है।
  • मंत्रालय इसे राष्ट्रपति के अनुमोदन (approval of the President of India) के लिए आगे बढ़ाता है।
  • राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही स्थानांतरण औपचारिक रूप से प्रभावी होता है और अधिसूचना (official notification) जारी की जाती है।

यानी, स्थानांतरण पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफ़ारिश और राष्ट्रपति की स्वीकृति पर आधारित प्रक्रिया है। हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश केवल इनपुट दे सकता है; अंतिम अधिकार न तो उसके पास है और न ही किसी अन्य संस्था के पास।

यही वजह है कि जब किसी न्यायाधीश का नाम स्थानांतरण सूची में आता है, तो उसके पीछे का निर्णय सीधे कॉलेजियम की सोच और राष्ट्रपति की स्वीकृति को दर्शाता है। इस संदर्भ में, गुजरात हाईकोर्ट की हालिया घटनाओं को समझने के लिए बार (GHAA) की भूमिका और उसकी संस्थागत प्रतिक्रिया पर ध्यान देना ज़रूरी हो जाता है।


न्याय का असली इम्तिहान और बार (GHAA) की भूमिका

न्यायपालिका की असली ताक़त केवल उसके आदेशों में नहीं, बल्कि उस भरोसे में है जो जनता अदालतों से जोड़कर देखती है। यही भरोसा तब डगमगाता है जब संस्थागत चुप्पी छा जाती है। ऐसे समय में अदालतों और जनता के बीच पुल का काम बार करती है।

GHAA ने हालिया घटनाओं में यही भूमिका निभाई। उसने स्पष्ट किया कि उसकी सक्रियता किसी व्यक्तिगत जज के समर्थन/विरोध तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और स्वतंत्रता की रक्षा से जुड़ी है।

GHAA की बड़ी ताक़त यह रही कि उसने अपना विरोध संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर व्यक्त किया। जब वकीलों की हड़ताल को सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार अवैध ठहराया है, तब GHAA ने “काम से विरत रहने” का रास्ता चुनकर दिखाया कि वह जनता के न्याय पाने के अधिकार को आहत किए बिना भी अपनी असहमति दर्ज करा सकती है। यह संवेदनशील संतुलन बताता है कि बार की लड़ाई केवल अंदरूनी (internal) राजनीति की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की है।

दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट किया कि आने वाले समय में बार-एंड-बेंच (Bar and Bench—वकील और न्यायाधीशों के रिश्ते) की असली कसौटी यही होगी—क्या बार केवल पेशेवर प्रतिनिधि संस्था बनी रहेगी, या लोकतंत्र की प्रहरी की भूमिका को और मज़बूती से निभाएगी। GHAA का हस्तक्षेप संकेत देता है कि जब संस्थागत सन्नाटा हो, तब वकीलों की सामूहिक आवाज़ ही जनता के भरोसे को सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी गारंटी बन सकती है। ऊपर की घटनाओं को तिथियों के क्रम में समेटकर देखें तो तस्वीर और साफ़ होती है।


टाइमलाइन: आदेश से अनदेखी तक — गुजरात हाईकोर्ट रजिस्ट्री की पूरी कहानी

7 अक्टूबर 2016डिवीजन बेंच (जस्टिस एम.आर. शाह और जस्टिस ए.एस. सुपेहिया) ने केस फ़ाइलें गुम होने पर रजिस्ट्री को सख़्त चेतावनी दी और सभी एहतियाती कदम उठाने का निर्देश दिया।

22 नवंबर 2016चैंबर कमेटी बैठक में रजिस्ट्री और रिकॉर्ड विभाग में CCTV कैमरे लगाने का निर्णय लिया गया।

15 अप्रैल 2023सेक्शन ऑफ़िसर ने CCTV लगाने के लिए पत्र लिखा।

19 अप्रैल 2023मुख्य न्यायाधीश की स्वीकृति लेकर रजिस्ट्रार (IT) को ज़िम्मेदारी सौंपी गई, लेकिन अमल नहीं हुआ।

13 दिसंबर 2023जस्टिस संदीप भट्ट ने रजिस्ट्री के अनियमितताओं/आईडी दुरुपयोग प्रकरण में कड़ी टिप्पणियाँ दर्ज कीं; रजिस्ट्री और रिकॉर्ड विभाग में CCTV लगाने के संबंध में 15 जनवरी 2024 की समयसीमा तय की। (आदेश: SCR.A/996/2020)

13 फ़रवरी 2025SCR.A/13562/2023 (Jayashreeben Pradeepbhai Joshi v. State of Gujarat & Anr.) में रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी

14 फ़रवरी 2025रोस्टर बदला गया, प्रभाव 17 फ़रवरी से।

17 फ़रवरी 2025GHAA ने असाधारण बैठक कर रोस्टर बदलाव को “प्रशासनिक हस्तक्षेप” बताते हुए विरोध दर्ज किया और प्रस्ताव पारित किया।

18 अगस्त 2025SCA No. 23158/2019 (Babubhai Sampatbhai Pateliya & Ors. v. State of Gujarat & Ors.) में CCTV न लगाने की देरी को जस्टिस भट्ट ने “prima facie unbelievable” (प्रथम दृष्टया अविश्वसनीय) और “red-tapism” (प्रशासनिक लालफीताशाही) कहा।

25 अगस्त 2025हाईकोर्ट प्रशासन ने जस्टिस भट्ट के आदेश के ख़िलाफ़ LPA No. 1035/2025 दायर किया, और उसी दिन डिवीजन बेंच ने आदेश पलटकर उनकी टिप्पणियाँ रिकॉर्ड से हटाईं

28 अगस्त 2025GHAA के प्रतिनिधिमंडल ने CJI और जस्टिस सूर्यकांत से मुलाक़ात कर विस्तृत प्रतिवेदन (representation) सौंपा, जिसमें जस्टिस भट्ट की ईमानदारी और कार्यशैली पर भरोसा जताया गया।

इन घटनाओं की कड़ी यह बताती है कि मामला किसी एक आदेश या एक दिन की कार्रवाई भर का नहीं है, बल्कि एक लम्बे समय से चले आ रहे टकराव और अनदेखी का परिणाम है। अब सवाल यही है कि इस पूरी प्रक्रिया को इतिहास किस रूप में दर्ज करेगा—एक जाने–अनजाने प्रशासनिक चूक की कहानी के तौर पर, या न्यायपालिका की असली परीक्षा के तौर पर।


टेस्ट केस और न्यायपालिका की परीक्षा

गुजरात हाईकोर्ट की रजिस्ट्री विवाद अब केवल एक प्रशासनिक गड़बड़ी या स्थानांतरण की बहस नहीं रह गई—यह न्यायपालिका की पारदर्शिता और स्वतंत्रता की असली परीक्षा बन चुकी है। यह मुक़दमा एक तरह का टेस्ट केस है, जो आने वाले समय में इतिहास के पन्नों में दर्ज होते हुए यह परखेगा कि अदालतें अपने भीतर उठे सवालों का सामना कितनी ईमानदारी और पारदर्शिता से कर पाती हैं।

बार के लिए सबक

जब संस्थागत अनियमितताओं पर चुप्पी छा जाए, तब बार की सामूहिक आवाज़ ही सबसे बड़ा संतुलन बनती है। GHAA का प्रतिवेदन इसी संवैधानिक जिम्मेदारी और सजगता का प्रतीक है। यह दिखाता है कि बार केवल पेशेवर प्रतिनिधि संस्था नहीं, बल्कि न्यायपालिका की पारदर्शिता की प्रहरी भी है।

यह केस साफ़ करता है कि न्याय की प्रक्रिया केवल कोर्टरूम की बहसों तक सीमित नहीं है। रजिस्ट्री (Registry) और उसकी पारदर्शिता ही न्यायिक व्यवस्था की असली रीढ़ (backbone) है। यदि रजिस्ट्री से छेड़छाड़ हो, तो अदालत की पूरी साख और जनता का विश्वास डगमगा सकता है।

संस्थागत ढांचे के लिए चेतावनी

जजों का स्थानांतरण प्रशासनिक निर्णय हो सकता है, लेकिन वह कभी भी कलंकित (stigmatic) नहीं दिखना चाहिए और यदि पारदर्शिता पर सवाल उठें, तो संस्थागत चुप्पी सबसे बड़ा जोखिम बन जाती है। मौन केवल अफ़वाहों को जन्म देता है, जबकि साफ़ और तथ्यपूर्ण जवाब भरोसे को और मज़बूत करते हैं।

इतिहास गवाह है—जब अदालतों ने अपने तर्क विस्तार से रखे और जनता के सवालों का सीधा, स्पष्ट जवाब दिया, तब भरोसा और गहरा हुआ:

  • Kesavananda Bharati Sripadagalvaru v/s State Of Kerala And Anr (1973)संविधान की मूल संरचना (basic structure) कोई भी सत्ता बदल नहीं सकती।
  • Indira Nehru Gandhi v/s Shri Raj Narain & Anr (1975)कानून का शासन (Rule of Law) सब पर लागू होता है—यहाँ तक कि प्रधानमंत्री पर भी।
  • Supreme Court Advocates-on-Record Association v/s Union of India (2015)NJAC फैसला, जिसमें अदालत ने विस्तार से समझाया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर समझौता क्यों नहीं हो सकता।
  • M Siddiq (D) Thr Lrs v/s Mahant Suresh Das & Ors (2019)अयोध्या केस, जहाँ सदियों पुराने विवाद को पारदर्शी और तर्कसंगत व्याख्या से सुलझाया गया।

लेकिन जब अदालतों ने पारदर्शिता से परहेज़ किया या जनता के सवालों का सामना करने से कतराई, तब भरोसा डगमगा गया:

  • ADM Jabalpur v/s Shivkant Shukla (1976)आपातकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा से हाथ खींच लिया।
  • Justice Loya case (2018) और Pegasus surveillance case (2021–22) — जहाँ अदालत के रुख ने कानूनी हलकों में यह सवाल खड़ा किया कि क्या न्यायपालिका ने सचमुच पारदर्शिता की कसौटी पूरी की।

संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—जहाँ तथ्यपूर्ण और पारदर्शी जवाब मिलते हैं, वहाँ भरोसा गहराता है; और जहाँ चुप्पी या अधूरी पारदर्शिता होती है, वहाँ भरोसा डगमगाता है।

गुमनाम लेकिन तीखे बयान

नाम गुमनाम रहे, लेकिन शब्दों ने अदालत के गलियारों की खामोशी तोड़ दी। खुली किताब से बातचीत में कई सीनियर एडवोकेट्स और अनुभवी वकीलों ने साफ़ कहा कि वे खुलकर सामने नहीं आ सकते—क्योंकि रोज़ उन्हें इसी अदालत में पेश होना पड़ता है। पेशे की मजबूरी ने उन्हें सार्वजनिक बयान देने से रोका, लेकिन उनकी आशंकाएँ और असहमति दबाई नहीं जा सकतीं।

कई अधिवक्ताओं ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर यह भी स्वीकार किया कि वे GHAA का हिस्सा हैं और वहीं से उन्होंने सामूहिक रूप से अपना विरोध दर्ज कराया।

उनका साझा निष्कर्ष यही था—
“जब रजिस्ट्री और प्रशासनिक फैसलों की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं और संस्थागत चुप्पी दीवार बनकर खड़ी हो जाती है, तब सबसे गहरी चोट न्यायपालिका की साख पर होती है। जनता का भरोसा केवल आदेशों से नहीं, बल्कि उस स्पष्टता से बनता है जिससे अदालत यह जताए कि वह अपने ही घर की सफ़ाई करने का साहस रखती है।”

गुजरात हाईकोर्ट की यह कड़ी, जहाँ आदेश, अपील और स्थानांतरण अदृश्य रफ़्तार (unprecedented speed) में गुज़रे और अदालत की भीतरूनी कार्यप्रणालियाँ (internal functioning) उजागर हुईं, अब केवल एक घटना नहीं रही बल्कि पूरे न्यायिक ढांचे के लिए आईना बन गई है; यह आईना जितना साफ़ दिखेगा, लोकतंत्र की रीढ़ उतनी ही मज़बूत होगी। लेकिन सवाल यह है कि जब पारदर्शिता की माँग करने वाली आवाज़ को ही असामान्य गति से दबा दिया जाए तो जनता उस मौन को कैसे पढ़े—संस्थागत जवाबदेही के संकेत के रूप में या विडंबना के एक और कटाक्ष के रूप में।


कटाक्ष की परछाई

न्यायपालिका की पारदर्शिता पर सवाल उठाने वाले जज के खिलाफ स्थानांतरण की सिफ़ारिश सामने आई—यह केवल एक संस्थागत औपचारिकता नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा है। अदालत के भीतर उठे इस विवाद ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि क्या सच बोलने वाली आवाज़ को संस्थागत तंत्र दबा देगा, या वही आवाज़ भविष्य में सुधार की दिशा तय करेगी? जेहन में अचानक एक धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन में सुनी गई व्यंग्यात्मक कविता की गूंज और भी तीखी प्रतीत होती है।

उस मंच पर कवि ने जिस तरह अपने शब्दों को खींच-खींचकर प्रस्तुत किया, वह दृश्य मानो आज की परिस्थितियों पर भी कटाक्ष करता हुआ सुनाई देता है—

“सऽऽर… सेऽऽ… सर…
सर केऽऽ… सरके…
साड़ीऽऽ… सभा… देखती है… सारीऽऽऽ…

साड़ीऽऽ… सरकी… सर… सेऽऽ…
कईऽऽ… लोके… लाज … उतारीऽऽ…

येऽऽ… सर… साड़ी… सर… से… सरकेऽऽ…
उसेऽऽ… नारी… तुरंत… सजाऽऽऽएं…

औरऽऽ… आज… के युग मेंऽऽ…
खुद… नारीऽऽ… हीऽऽ… धर्म… से… सरकेऽऽ…
तोऽऽ… उसेऽऽ… कौनऽऽ… सजाऽऽऽएं…”

सरल पाठ रूप
सर से सर सर के सरके, साड़ी सभा देखती है सारी,
साड़ी सरकी सर से, कई लोके लाज उतारी,
ये सर साड़ी सर से सरके, उसे नारी तुरंत सजाएं…
और आज के युग में खुद नारी ही धर्म से सरके तो उसे कौन सजाएं…”

यानी, यह कविता केवल मंचीय व्यंग्य नहीं, बल्कि उस सामाजिक और संस्थागत दोहरेपन की याद दिलाती है जहाँ छोटी-सी जाने–अनजाने चूक पर तुरंत दंड का शोर उठता है, लेकिन जब बड़ी ज़िम्मेदारियाँ डगमगाती हैं, तो मौन और गहरा हो जाता है। इस रिपोर्ट के संदर्भ में भी यही प्रतीकात्मक कटाक्ष सामने आता है।

“सर से सर सर के सरके साड़ी सभा देखती है सारी…” की छवि उन छोटी–छोटी चूकों की तरह है जिन पर तुरंत उंगली उठा दी जाती है—जैसे रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली में आई कोई प्रक्रियात्मक ढिलाई। वहीं, “साड़ी सरकी सर से, कई लोके लाज उतारी…” यह दिखाती है कि कैसे मामूली गलती को सामूहिक अपमान में बदल दिया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी एक स्तर पर दोष डालकर असली जवाबदेही से ध्यान हटा दिया जाता है।

इसके आगे “ये सर साड़ी सर से सरके, उसे नारी तुरंत सजाएं…” उस प्रवृत्ति को उजागर करती है जहाँ दंड तत्काल सुना दिया जाता है, मानो गलती का बोझ सिर्फ़ एक पक्ष पर हो। यही प्रतीक उस स्थिति में दिखता है जब पारदर्शिता पर सवाल उठाने वाली आवाज़ पर ही असामान्य तेजी से प्रतिक्रिया हो जाए, जबकि गहरी जड़ें अनछुई रह जाएँ। और अंत में “और आज के युग में खुद नारी ही धर्म से सरके तो उसे कौन सजाएं…” सबसे कठोर प्रश्न छोड़ जाती है—जब नेतृत्व या व्यवस्था के भीतर से ही कर्तव्य या पारदर्शिता से विचलन हो, तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा? यही सवाल इस रिपोर्ट के संदर्भ में भी गूंजता है—यदि न्यायपालिका की पारदर्शिता पर ही सवाल उठे और उत्तर मौन से मिले, तो आखिर जिम्मेदारी किस दरवाज़े पर टिकेगी?

रिपोर्ट पूरी तरह न्यायालय के आदेशों और उपलब्ध आधिकारिक रेकॉर्ड पर आधारित निष्पक्ष प्रस्तुति है। इसमें उद्धृत सभी तथ्य ज्यों का त्यों (as-is) आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। उद्देश्य किसी न्यायाधीश, न्यायालय या प्रशासनिक अधिकारी की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचाना नहीं है; प्रस्तुत सभी निष्कर्ष न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन समझे जाएं। यदि किसी पक्ष को इस विषय पर अपना आधिकारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना हो तो खुली किताब उसे प्राथमिकता से प्रकाशित करेगा। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि केवल प्रमाणित, तथ्यात्मक और औपचारिक प्रतिक्रिया ही प्रकाशित की जाएगी, न कि अप्रमाणित दावे या व्यक्तिगत आरोप।

क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिलों पर समय-सीमा तय न करने का निर्णय राज्यों के लिए शासन को और कठिन बनाता है?

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