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सच बोलने की सज़ा? फाइल गुम कांड से उठा लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल

संयोजित इमेज | खुली किताब
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Written by
–नीलेश कटारिया

अहमदाबाद, 26 अगस्त। गुजरात के राधनपुर शहर (जिला पाटन) की अदालत से गायब फाइल ने अब गुजरात हाईकोर्ट में एक बहुचर्चित ‘फाइल गुम कांड’ का रूप ले लिया है, जो सीधे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर रहा है। प्रतिष्ठित मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम (सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीशों की समिति, जो जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर तय करती है) ने 25–26 अगस्त 2025 की बैठकों में 14 उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के स्थानांतरण की सिफारिश की है—जिनमें गुजरात हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप भट्ट का नाम भी शामिल बताया गया है। आधिकारिक प्रस्ताव/आदेश सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक होना अभी बाकी है, लेकिन इस संभावित ट्रांसफर की खबर ने ही अदालत के गलियारों को हिला दिया है।

फरवरी 2025 में जस्टिस भट्ट ने राधनपुर आपराधिक केस फाइल गुमशुदगी पर अपने आदेश में सख़्त टिप्पणी की थी। उन्होंने इसे न्यायपालिका की साख और पीड़ित पक्ष के अधिकारों पर गहरी चोट बताया था और हाईकोर्ट प्रशासन से जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए थे। यही टिप्पणी अब “सच बोलने की सज़ा” जैसे सवालों को जन्म दे रही है।

इसी पृष्ठभूमि में गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHAA) ने 26 अगस्त को आपात बैठक बुलाकर सर्वसम्मति से संकल्प पारित किया और न्यायमूर्ति भट्ट के ट्रांसफर अनुशंसा का विरोध करने का एलान किया। देर शाम GHAA की तरफ से अध्यक्षीय स्पष्टिकरण भी आया कि यह विरोध न्यायपालिका की गरिमा और पारदर्शिता की रक्षा के लिए है, न कि अदालतों का काम ठप करने के लिए।

खुली किताब इस रिपोर्ट में दिखाता है कि कैसे जस्टिस भट्ट की टिप्पणियाँ, GHAA का संतुलित विरोध और कॉलेजियम का संभावित निर्णय—मिलकर न्यायपालिका के भविष्य पर एक अभूतपूर्व बहस खड़ी कर रहे हैं।


मामले की पृष्ठभूमि

दरअसल, क्रिमिनल केस नंबर 75/2010 (पाटन, राधनपुर अदालत) की मूल फाइल के गायब हो जाने के बाद यह मामला गुजरात हाईकोर्ट की चौखट पर पहुँचा। इस संबंध में दाखिल आपराधिक याचिका—(R/SCR.A/13562/2023, Jayashreeben Pradeepbhai Joshi V/S State of Gujarat & Anr.) को 11 अक्टूबर 2023 को रजिस्टर्ड किया गया। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और 226 (हाईकोर्ट की रिट याचिका की शक्ति) का हवाला दिया गया है। इसके साथ ही दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482 (न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियाँ) और भारतीय दंड संहिता, 1860 की धाराएँ 465, 467, 471 (फर्जी दस्तावेज़ व धोखाधड़ी), 120B (आपराधिक साज़िश) और 114 (सह-अपराध में उपस्थिति) भी इसमें जोड़ी गई हैं।

जब यह गंभीर तथ्य हाईकोर्ट के संज्ञान में आया, तो सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट ने 13 फरवरी 2025 को आदेश पारित किया और फाइल गुमशुदगी पर सख़्त टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट प्रशासन से विस्तृत रिपोर्ट तलब की।

हालाँकि, उक्त याचिका में अब तक कोई अंतिम आदेश पारित नहीं हुआ है और न ही इसका निपटारा किया गया है। यह मामला अब भी विचाराधीन है और अगली सुनवाई 22 सितम्बर 2025 को न्यायमूर्ति हसमुख डी. सुथार की बेंच में लिस्टेड है।

अपने आदेश में जस्टिस भट्ट ने इसे अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा कि फाइलों का गायब होना न केवल न्यायपालिका की साख पर चोट है बल्कि पीड़ित पक्ष के न्याय पाने के अधिकार को भी प्रभावित करता है। उन्होंने हाईकोर्ट प्रशासन से विस्तृत जांच रिपोर्ट पेश करने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए।

आदेश में दर्ज टिप्पणी/रिकॉर्ड के अनुसार जांच में यह भी सामने आया कि यह घटना अकेली नहीं है। 2019 में सूरत की अदालत से भी 15 फाइलें इसी तरह गायब हुई थीं। उस समय तत्कालीन अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ए.टी. उक्राणी पर इन फाइलों को लेकर सवाल उठे थे। जस्टिस भट्ट ने आदेश में टिप्पणी की कि वही अधिकारी छह वर्षों से हाईकोर्ट रजिस्ट्री में प्रभावशाली पद पर बैठा है और खुद को “सर्वशक्तिमान (Omnipotent)” समझने लगा है।

लेकिन इस आदेश के तुरंत बाद, महज़ कुछ ही दिनों में जस्टिस भट्ट का रोस्टर बदल दिया गया  और उन्हें उस मामले से अलग कर दिया गया। इस घटना के बाद अदालत के गलियारों में यह चर्चा तेज़ हो गई कि क्या यह “सच बोलने की सज़ा” है।

इसके तुरंत बाद 17 फरवरी को गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHAA) ने आपात बैठक कर मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल के ट्रांसफर की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया। ठीक इसके अगले ही दिन मुख्य न्यायाधीश ने अवकाश ले लिया। यद्यपि अवकाश लेना उनका संवैधानिक और पूर्ण व्यक्तिगत अधिकार है, लेकिन इसकी टाइमिंग ने न्यायिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दिया और विवाद को और गहरा कर दिया।


GHAA का विरोध और रणनीति

26 अगस्त 2025 को गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHAA) ने एक असाधारण आमसभा बुलाई। इस बैठक में अधिवक्ताओं के बीच एक ही मुद्दा गूंज रहा था—क्या सच बोलने वाले न्यायाधीश को ट्रांसफर की सज़ा दी जा रही है?

बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ कि न्यायमूर्ति संदीप भट्ट के ट्रांसफर की अनुशंसा का विरोध किया जाएगा। वकीलों ने इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर सीधा आघात बताया।

प्रस्ताव में यह भी तय किया गया कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के समक्ष बहुत सशक्त प्रतिनिधित्व प्रस्तुत किया जाएगा। इसके लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं और बार के पदाधिकारियों की एक विशेष समिति गठित की गई। समिति में GHAA अध्यक्ष बृजेश त्रिवेदी, सचिव हार्दिक ब्रह्मभट्ट, वरिष्ठ अधिवक्ता असीम पांड्या, बाबुभाई मंगुकिया, दीपेन दवे (सदस्य, बार काउंसिल ऑफ गुजरात) और भार्गव भट्ट सहित अन्य प्रतिष्ठित अधिवक्ता शामिल हैं। यह प्रतिनिधिमंडल सीधे भारत के मुख्य न्यायाधीश और कॉलेजियम के सदस्यों से मिलकर बार का पक्ष रखेगा।

महत्वपूर्ण यह भी है कि प्रस्ताव की सीसी कॉपी गुजरात हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल को भी सौंपी गई। यह संकेत था कि वकीलों का विरोध महज़ प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग को सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचा रहा है।

प्रस्ताव के तुरंत बाद GHAA ने घोषणा की कि सदस्य कार्य से विरत (abstain) रहेंगे। यह फैसला अधिवक्ताओं के सामूहिक असंतोष और चिंता का प्रतीक है, जिसने गुजरात हाईकोर्ट के गलियारों को हिला दिया।


बार नेतृत्व का संतुलित रुख

गुजरात हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की असाधारण बैठक में दोपहर को पारित प्रस्ताव ने अधिवक्ताओं की सामूहिक असहमति को सामने रखा। प्रस्ताव में कहा गया कि सदस्य कोर्ट के काम से दूर रहेंगे और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के सामने न्यायमूर्ति संदीप भट्ट के ट्रांसफर पर प्रतिनिधित्व किया जाएगा।

हालाँकि, इस प्रस्ताव के स्वरूप को लेकर देर शाम अधिवक्ता समुदाय में चर्चा का माहौल गर्म रहा। खुली किताब ने जब इस मुद्दे पर GHAA अध्यक्ष बृजेश त्रिवेदी से सीधे संपर्क किया तो उन्होंने तकनीकी स्पष्टिकरण दिया। त्रिवेदी ने साफ शब्दों में कहा—

यह किसी तरह की बाध्यकारी हड़ताल नहीं है। हर एडवोकेट को अपनी इच्छा से यह तय करने की स्वतंत्रता है कि वह प्रतीकात्मक विरोध के रूप में कोर्ट का काम न ले।”

त्रिवेदी का यह बयान यह दर्शाता है कि उन्होंने एक तरफ बार एसोसिएशन की सामूहिक भावना को सम्मान दिया, वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका की गरिमा और जनता के अधिकारों की सुरक्षा का भी ध्यान रखा। विरोध और अनुशासन के इस संतुलन ने यह साफ कर दिया कि नेतृत्व का असली मतलब सिर्फ भावनाओं को हवा देना नहीं बल्कि संवैधानिक सीमाओं के भीतर रास्ता निकालना है।


जजों का ट्रांसफर: प्रक्रिया और विवाद

कॉलेजियम क्या है?

भारत में जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर की बागडोर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के हाथ में होती है। इसमें पाँच वरिष्ठतम जज शामिल रहते हैं। अगस्त 2025 तक कॉलेजियम की संरचना इस प्रकार है—

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई (Chief Justice Bhushan Ramkrishna Gavai), जस्टिस सूर्य कांत (Justice Surya Kant), जस्टिस बी.वी. नागरत्ना (Justice B.V. Nagarathna), जस्टिस विक्रम नाथ (Justice Vikram Nath) और जस्टिस जे.के. महेश्वरी (Justice J.K. Maheshwari)।

SCC Times की एक रिपोर्ट अनुसार 25–26 अगस्त 2025 की बैठकों में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 14 हाईकोर्ट न्यायाधीशों के स्थानांतरण की सिफारिश की है। इनमें गुजरात हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप भट्ट का नाम भी शामिल बताया गया है। आधिकारिक आदेश/प्रस्ताव अभी सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक होना शेष है, लेकिन मीडिया रिपोर्टों में जिन जजों के नाम सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं:

  1. न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन (Madhya Pradesh → Chhattisgarh)
  2. न्यायमूर्ति संजय अग्रवाल (Chhattisgarh → Allahabad)
  3. न्यायमूर्ति जे. निशा बनु (Madras → Kerala)
  4. न्यायमूर्ति दिनेश मेहता (Rajasthan → Delhi)
  5. न्यायमूर्ति अवनीश झींगन (Rajasthan → Delhi)
  6. न्यायमूर्ति अरुण मोंगा (Delhi → Rajasthan)
  7. न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह (Allahabad → Patna)
  8. न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल (Allahabad → Calcutta)
  9. न्यायमूर्ति मनावेन्द्रनाथ रॉय (Gujarat → Andhra Pradesh)
  10. न्यायमूर्ति डोनाडी रमेश (Andhra Pradesh → Repatriated)
  11. न्यायमूर्ति संदीप नटवरलाल भट्ट (Gujarat → Madhya Pradesh)
  12. न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा (Kerala → Delhi)
  13. न्यायमूर्ति तारा विटस्ता गंजू (Delhi → Karnataka)
  14. न्यायमूर्ति शुभेन्दु संभा (Calcutta → Andhra Pradesh)

ट्रांसफर क्यों किए जाते हैं? हाईकोर्ट जजों के स्थानांतरण के पीछे तीन प्रमुख आधार बताए जाते हैं—

  • प्रशासनिक संतुलन: जहाँ काम का बोझ असमान हो।
  • जनहित और निष्पक्षता: ताकि लंबे समय तक एक ही राज्य में रहने से संभावित पक्षपात या दबाव न बने।
  • विशेष परिस्थितियाँ: जब किसी आदेश या टिप्पणी से विवाद उठे और न्यायपालिका की साख पर असर पड़े।

प्रक्रिया कैसे चलती है?

कॉलेजियम संबंधित हाईकोर्ट और भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय लेकर विचार करता है। सिफारिश केंद्र सरकार को भेजता है। सरकार टिप्पणियाँ या आपत्तियाँ दर्ज कर सकती है, लेकिन पुनर्विचार के बाद कॉलेजियम का फैसला अंतिम होता है। राष्ट्रपति की मंजूरी से ट्रांसफर लागू हो जाता है।

पारदर्शिता बनाम गोपनीयता

हाल के वर्षों में कॉलेजियम ने अपनी सिफारिशें वेबसाइट पर डालनी शुरू की हैं। पर कई बार केवल आंशिक जानकारी सामने आती है या देरी होती है। सवाल यह उठता है—क्या जनता को केवल नामों की सूची जानने से संतोष हो जाएगा, या निर्णय के पीछे के कारण भी खुलकर बताने चाहिए?

विवाद और आलोचना

मनीकंट्रोल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की एक सिफारिश—जस्टिस विपुल पंचोली को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत करने—का विरोध करते हुए इसे “counter-productive” बताया। उनका असहमति नोट सामने आने के बाद यह बहस तेज हो गई कि जब कॉलेजियम के भीतर भी मतभेद मौजूद हैं, तो जनता को निर्णय के वास्तविक कारण क्यों नहीं बताए जाते। आलोचकों का कहना है—गोपनीयता का यह कवच न्यायपालिका की विश्वसनीयता को कमजोर करता है और पारदर्शिता की मांग को और प्रबल बनाता है।


हड़ताल अवैध, कर्तव्य सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट

जब बार एसोसिएशन अदालतों का कामकाज रोकने या कार्य से विरत (abstain) रहने का प्रस्ताव पारित करती है, तो आम लोगों के मन में पहला सवाल यही उठता है—क्या वकीलों को अदालत का काम ठप करने का संवैधानिक अधिकार है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) हर नागरिक को अपनी पसंद का पेशा अपनाने और चलाने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन यह स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है। जनता के व्यापक हित और कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। वकालत का पेशा सीधा न्यायपालिका से जुड़ा है, और जब अदालतों का काम रुकता है, तो उसका सीधा असर जनता के न्याय पाने के मौलिक अधिकार—अनुच्छेद 21—पर पड़ता है।

इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार दोहराया है कि वकीलों की हड़ताल न तो संवैधानिक है और न ही कानूनी। Ex-Capt. Harish Uppal V/S Union of India, निर्णय दिनांक 17 दिसम्बर 2002 (प्रकाशित: (2003) 2 SCC 45) में सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा संदेश देते हुए कहा था—

“Lawyers have no right to go on strike or give a call for boycott, not even on a token strike… only in the rarest of rare cases, where the dignity, integrity and independence of the Bar and/or the Bench are at stake, Courts may ignore (turn a blind eye) to a protest abstention from work for not more than one day.”

अर्थात वकील किसी भी परिस्थिति में अदालत का काम ठप नहीं कर सकते। सिर्फ असाधारण हालात—जहाँ न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा और गंभीर संकट मंडरा रहा हो—वहीं एक दिन के प्रतीकात्मक बहिष्कार को अदालत नज़रअंदाज़ कर सकती है।

यही रुख सुप्रीम कोर्ट ने Hussain V/S Union of India (2017) में भी अपनाया। न्यायालय ने Harish Uppal के निर्णय को दोहराते हुए सख्त टिप्पणी की—

“such suspension of work or strikes are clearly illegal and it is high time that the legal fraternity realizes its duty to the society which is the foremost.”

यह टिप्पणी साफ कर देती है कि अदालतों का बहिष्कार करके न्याय प्रणाली को बंधक बनाना कानूनन भी अवैध है और संवैधानिक दृष्टि से भी अस्वीकार्य।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि बार एसोसिएशन का कोई भी प्रस्ताव व्यक्तिगत  अधिवक्ताओं पर बाध्यकारी नहीं है। यदि कोई वकील अपने मुवक्किल का केस लड़ना चाहता है, तो एसोसिएशन उसे रोक नहीं सकती। न्यायालय के शब्दों में—

“No lawyer can be visited with any adverse consequences by the Association or the Council and no threat or coercion of any nature including that of expulsion can be held out against those who appear in Court.”

निष्कर्ष यह है कि बार एसोसिएशन सामूहिक असहमति व्यक्त कर सकती है, प्रस्ताव पारित कर सकती है, लेकिन उसे “हड़ताल” का रूप देना न संविधान में कहीं मान्य है और न ही सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि में। अदालत का कामकाज ठप कर देना सीधा-सीधा जनता के मौलिक अधिकारों पर हमला है—और यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे बार-बार अवैध ठहराया है।


अदालत के गलियारों में उठते सवाल

न्यायमूर्ति संदीप भट्ट का स्थानांतर केवल एक प्रशासनिक अनुशंसा नहीं है, बल्कि इसने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालतों की विश्वसनीयता तभी तक सुरक्षित रह सकती है, जब जज बिना दबाव के अपनी टिप्पणी और आदेश लिख सकें।

इस मुद्दे पर खुली किताब  ने कई अनुभवी अधिवक्ताओं और विशेषज्ञों से बातचीत की। दिलचस्प बात यह रही कि किसी ने भी अपना नाम सामने आने नहीं दिया। वजह साफ़ है—वे सभी उसी न्यायिक गलियारे में काम कर रहे हैं, जहाँ रोज़ाना इन्हीं जजों के सामने पेश होना पड़ता है। इस पेशेगत विवशता के बावजूद उनकी आवाज़ें दबाई नहीं जा सकीं।

एक कानूनी विशेषज्ञ ने सख़्त शब्दों में कहा:

“यदि किसी न्यायाधीश को उनकी सख़्त टिप्पणियों के बाद अचानक ट्रांसफर का सामना करना पड़े, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रहता। यह पूरी न्यायपालिका के भीतर स्वतंत्रता के माहौल और न्यायिक साहस पर सीधा प्रहार है।”

एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने भी अपना नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा:

“न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। यदि सच बोलने वाले जजों को प्रशासनिक फैसलों से किनारे किया जाएगा, तो इसका असर पूरे तंत्र पर पड़ेगा और यह आम जनता के भरोसे को कमजोर करेगा।”

इसी विषय पर खुली किताब ने इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ, निरमा यूनिवर्सिटी में इंटीग्रेटेड कोर्स बी.कॉम एल.एल.बी. के अंतिम वर्ष में अध्ययनरत छात्रा फेनी कटारिया से भी विस्तृत बातचीत की। न्यायपालिका को सम्मान और पवित्रता की दृष्टि से देखने वाली फेनी ने इस विचार से सहमति जताते हुए यह माना कि—

“यह केवल एक ट्रांसफर का मामला नहीं है। यह उस साहसिक टिप्पणी की कीमत है, जो जस्टिस संदीप भट्ट ने फाइल गुम प्रकरण में की है। अदालतें तभी तक लोगों की नज़रों में मंदिर बनी रहेंगी, जब जज सच कहने से नहीं डरेंगे। और अगर सच बोलने वालों को ही हाशिये पर धकेला जाएगा, तो यह लोकतंत्र और न्यायपालिका दोनों के लिए खतरनाक संकेत है।”

फेनी का यह मानना केवल उनकी व्यक्तिगत राय तक सीमित नहीं है, बल्कि उस पूरे छात्रवर्ग की भावना को व्यक्त करता है जो न्यायपालिका को “मंदिर” मानकर उसमें प्रवेश करने का सपना देखता है। जब यही युवा वर्ग यह महसूस करने लगे कि मंदिर की पवित्रता पर आँच आ रही है, तो यह चिंता अदालतों से निकलकर पूरे लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर देती है।

इन बयानों से साफ़ है कि यह विवाद अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रहा। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी साख पर खड़ी वह गहरी बहस है, जिसे बार और बेंच दोनों ही अनदेखा नहीं कर सकते।


मुद्दा ट्रांसफर का नहीं, न्यायपालिका के भरोसे का है

गुजरात हाईकोर्ट का फाइल गुम कांड और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा न्यायमूर्ति संदीप भट्ट का स्थानांतरण की अनुशंसा—यह केवल घटनाओं की एक श्रृंखला नहीं है। यह उस गहरी खाई को उजागर करता है, जहाँ न्यायिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक निर्णय आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।

GHAA का विरोध, वरिष्ठ अधिवक्ताओं की चिंताएँ और युवा वकीलों तथा लॉ स्टूडेंट्स की प्रतिक्रियाएँ यह साफ कर रही हैं कि मामला केवल एक व्यक्ति या पद का नहीं है। यह पूरी न्यायपालिका की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।

खुली किताब का मानना है कि न्यायपालिका की ताकत उसके आदेशों और फैसलों से कहीं अधिक उस वातावरण में निहित है, जहाँ जज बिना किसी दबाव के अपनी टिप्पणियाँ दे सकें। यदि किसी जज को अपनी ही सख़्त टिप्पणियों के कारण प्रशासनिक दबाव या स्थानांतरण का भय सताने लगे, तो यह अदालतों की गरिमा ही नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए भी गंभीर संकट है।

आज ज़रूरत है कि इस विवाद को केवल ट्रांसफर की कवायद समझकर न देखा जाए। बहस व्यापक है—न्यायपालिका की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर। यही बहस तय करेगी कि जनता का भरोसा अदालतों पर कितना कायम रह सकता है।

न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा तभी तक कायम रहेगा, जब सच बोलने वाले न्यायाधीश सुरक्षित होंगे और उनकी टिप्पणियाँ सुधार का कारण बनेंगी—न कि स्थानांतरण का बहाना।

खुली किताब इस विवाद में किसी पक्ष या व्यक्ति का बचाव नहीं कर रहा, बल्कि केवल इस बुनियादी सिद्धांत पर खड़ा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता। यही स्वतंत्रता इस लोकतंत्र की अंतिम और सबसे मज़बूत गारंटी है। यदि इस रिपोर्ट से संबंधित कोई अधिकृत पक्ष अपना आधिकारिक पक्ष रखना चाहता है, तो खुली किताब उसे स्थान देने के लिए प्रतिबद्ध है।

क्या बिना तय समय-सीमा के, राज्यपालों द्वारा बिलों पर देरी राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बढ़ाती है?

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