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मोदी के दो ताज़ा संदेश और पश्चिम एशिया संकट पर भारत के सार्वजनिक रुख में बदलाव

पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत ने होर्मुज़, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों पर अपनी सार्वजनिक प्राथमिकताएँ अधिक स्पष्ट कीं। प्रतीकात्मक इमेज: खुली किताब
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–नीलेश कटारिया

श्चिम एशिया संकट पर भारत के रुख को लेकर उठ रही बहस के बीच 24 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो सार्वजनिक संदेशों ने इस चर्चा को एक नया आयाम दे दिया। यह बदलाव इतना बड़ा नहीं है कि भारत की नीति को पूरी तरह बदला हुआ कहा जाए, लेकिन इतना मामूली भी नहीं है कि इसे सामान्य औपचारिक कूटनीतिक संवाद मानकर छोड़ दिया जाए।

इन दो संदेशों से भारत की सार्वजनिक भाषा अब कुछ अधिक स्पष्ट रूप से समुद्री सुरक्षा, वैश्विक ऊर्जा स्थिरता और क्षेत्रीय समन्वय की दिशा में उभरती दिखाई देती है।

इससे पहले ‘खुली किताब’ ने अपनी पिछली विस्तृत रिपोर्ट में इस पूरे घटनाक्रम का विस्तार से विश्लेषण किया था, जिसमें भारत की सार्वजनिक भाषा और उसके कूटनीतिक संतुलन की पड़ताल की गई थी।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत तनाव कम करने और जल्द से जल्द शांति बहाल करने का समर्थन करता है। इसके साथ ही उन्होंने होर्मुज़ जलडमरूमध्य के खुले, सुरक्षित और सुलभ बने रहने को पूरी दुनिया के लिए आवश्यक बताया। यह केवल एक सामान्य कूटनीतिक वाक्य नहीं था।

इसी एक पंक्ति से यह संकेत मिलता है कि पश्चिम एशिया का मौजूदा तनाव भारत के लिए केवल दूरस्थ भू-राजनीतिक घटना नहीं है। यह तेल, व्यापार, शिपिंग, बीमा, बाजार और व्यापक आर्थिक स्थिरता से जुड़ा प्रश्न भी है। जब भारत सार्वजनिक रूप से होर्मुज़ का उल्लेख करता है, तो इससे यह संकेत मिलता है कि उसकी चिंता युद्ध की राजनीतिक भाषा के साथ-साथ उसके आर्थिक और सामरिक परिणामों से भी जुड़ी हुई है।

इसी दिन श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके से हुई बातचीत ने इस रुख की दूसरी परत भी सामने रखी। वहाँ पश्चिम एशिया की स्थिति को सीधे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, भारत श्रीलंका ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ जोड़ा गया। इसका अर्थ केवल इतना नहीं है कि भारत अपने पड़ोसी के साथ सामान्य राजनयिक संपर्क बनाए हुए है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि नई दिल्ली इस संकट को ऊर्जा मार्गों, क्षेत्रीय स्थिरता और पड़ोसी समन्वय से जुड़े व्यापक परिप्रेक्ष्य में देख रही है। दूसरे शब्दों में, भारत यह दर्शाता हुआ दिखाई देता है कि पश्चिम एशिया का तनाव उसके निकटवर्ती क्षेत्र की ऊर्जा और सुरक्षा चिंताओं से भी जुड़ रहा है।

इन दोनों संदेशों को साथ रखकर पढ़ने पर भारत की सार्वजनिक भाषा में एक हल्का लेकिन महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। अब यह रुख केवल भीतर की तैयारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बाहरी अस्थिरता के असर पर भी बोलता दिखाई देता है।

यह बदलाव केवल शांति और स्थिरता की सामान्य अपील तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट होता है कि समुद्री मार्ग खुले रहना, वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग उसके लिए तत्काल प्राथमिकता के प्रश्न बन गए हैं। इससे पहले भारत का सार्वजनिक स्वर अधिकतर नियंत्रित, सीमित और व्यापक रणनीतिक संकेतों से परहेज करता दिखाई देता था।

लेकिन यहीं रुक जाना अधूरा पढ़ना होगा। इस नई स्पष्टता की भी अपनी सीमाएँ हैं। भारत ने शांति, स्थिरता, तनाव कम करना, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा प्रवाह की बात की है, पर उसने अब भी युद्ध की नैतिक जिम्मेदारी, आक्रामकता की सीधी पहचान या किसी पक्ष की प्रत्यक्ष आलोचना का रास्ता नहीं चुना है।

न अमेरिका की भूमिका पर कोई खुली सार्वजनिक कठोरता दिखाई देती है, न इज़राइल के संदर्भ में वैसी स्पष्ट आलोचनात्मक भाषा सामने आती है। यही वह बिंदु है जहाँ भारत का रुख अब भी संतुलित कूटनीति और नियंत्रित सावधानी के बीच खड़ा दिखाई देता है। फर्क केवल इतना है कि पहले जो चुप्पी अधिक दिखाई देती थी, उसकी जगह अब नपी-तुली और चयनित सार्वजनिक सक्रियता ने लेना शुरू किया है।

क्या बिना तय समय-सीमा के, राज्यपालों द्वारा बिलों पर देरी राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बढ़ाती है?

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