Responsive Menu

Download App from

Download App

Follow us on

Donate Us

पश्चिम एशिया संकट में भारत: संतुलित कूटनीति या नियंत्रित चुप्पी?

पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत ऊर्जा, समुद्री व्यापार और कूटनीतिक संतुलन के जटिल दबावों के बीच खड़ा है। प्रतीकात्मक इमेज: खुली किताब
Author Image
Written by
–नीलेश कटारिया

श्चिम एशिया का युद्ध अब केवल मिसाइलों, ड्रोन और सीमाई टकराव की घटना नहीं रह गया है। यह ऊर्जा, समुद्री व्यापार, वैश्विक बाजार, कूटनीतिक संतुलन और राष्ट्रीय हितों की परीक्षा बन चुका है। भारत के लिए यह संकट इसलिए और जटिल है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र उसकी ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ा है। इस क्षेत्र में बड़ी भारतीय आबादी काम करती है, और यही उसके व्यापारिक समुद्री मार्गों की धुरी भी है।

ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसद में दिया गया वक्तव्य और सरकार का समूचा रवैया एक गहरे प्रश्न को जन्म देता है। क्या नई दिल्ली केवल अपने तात्कालिक राष्ट्रीय हितों को बचाने में लगी है, या उसकी अत्यधिक सावधान भाषा अब ऐसे सवाल भी पैदा कर रही है जिन्हें केवल तैयारी और प्रबंधन के दावों से शांत नहीं किया जा सकता।

यह स्वीकार करना होगा कि सरकार ने इस संकट को केवल विदेश नीति का मामला मानकर नहीं छोड़ा। संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे आर्थिक, राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय तीनों स्तरों की चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि भारत के आर्थिक मूलतत्व मजबूत हैं, पेट्रोल और कोयले की उपलब्धता पर्याप्त है, और सरकार ऊर्जा, उर्वरक, शिपिंग, बिजली तथा आपूर्ति शृंखला पर सक्रिय तैयारी कर रही है। यही वह बिंदु है जहाँ सरकार का संकट-प्रबंधन दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता है। यह रुख बताता है कि नई दिल्ली युद्ध को दूर बैठे देखने की मुद्रा में नहीं, बल्कि उसके घरेलू असर को सीमित करने की स्थिति में रहना चाहती है।

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सरकार ने इस संकट को केवल बयानबाजी के स्तर पर नहीं छोड़ा। संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऊर्जा, उर्वरक, शिपिंग, बिजली, प्रवासी भारतीयों और आवश्यक आपूर्ति पर जोखिम का स्पष्ट उल्लेख किया, जबकि 22 मार्च की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी बैठक में कृषि, पेट्रोलियम, व्यापार, निर्यात, वित्त और सप्लाई चेन पर संभावित असर की समीक्षा की गई। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, ऊर्जा आयात के विविधीकरण, एलपीजी प्रबंधन और नियंत्रण कक्ष जैसी व्यवस्थाओं का हवाला यह दिखाता है कि सरकार कम से कम प्रशासनिक स्तर पर नुकसान सीमित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यही सक्रियता सार्वजनिक कूटनीतिक स्पष्टता में भी दिखी।

संसद में पश्चिम एशिया युद्ध, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति प्रबंधन और भारतीयों की सुरक्षा पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरा वक्तव्य नीचे देखा जा सकता है।

प्रधानमंत्री के भाषण का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि उसका एक बड़ा हिस्सा वर्तमान संकट की तात्कालिक चुनौतियों से आगे बढ़कर बार-बार पिछले एक दशक की नीतिगत तैयारियों और उपलब्धियों को रेखांकित करता दिखाई देता है।

ऊर्जा आयात के विविधीकरण से लेकर रणनीतिक भंडार, इथेनॉल, रेलवे विद्युतीकरण, मेट्रो, अक्षय ऊर्जा और उर्वरक उत्पादन तक के संदर्भ यह संकेत देते हैं कि सरकार केवल मौजूदा स्थिति का जवाब नहीं दे रही थी, बल्कि यह राजनीतिक संदेश भी दे रही थी कि आज की तैयारी उसके पूर्ववर्ती निर्णयों और नीतिगत निवेशों की देन है। इसीलिए यह वक्तव्य केवल संकट-प्रबंधन का दस्तावेज नहीं, बल्कि नियंत्रित आत्म-प्रस्तुति का भाषण भी पढ़ा जा सकता है।

फिर भी यह ध्यान रखना होगा कि प्रधानमंत्री का वक्तव्य केवल कूटनीतिक संतुलन या ऊर्जा जोखिम तक सीमित नहीं था। उसके भीतर भारतीयों की वापसी, मिशनों की सक्रियता, हेल्पलाइन, किसानों और खाद सुरक्षा, बिजली की बढ़ती मांग, वैकल्पिक ऊर्जा, रेलवे विद्युतीकरण, इथेनॉल, अक्षय ऊर्जा और आंतरिक सुरक्षा जैसे बिंदु भी प्रमुखता से मौजूद थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि भाषण का उद्देश्य केवल युद्ध पर राजनीतिक प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि देश के भीतर भरोसा, तैयारी और सतर्कता की एक व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करना भी था।

बहरहाल, यहीं से दूसरी परत खुलती है। तैयारियाँ होना एक बात है, कूटनीतिक स्पष्टता दिखाना दूसरी। संसद के भाषण में नागरिकों, ऊर्जा और परिवहन अवसंरचना पर हमलों का विरोध था, होर्मुज जैसे समुद्री मार्ग खुले रखने की अपील थी, और संवाद तथा कूटनीति की भाषा थी। पर उसी अनुपात में न अमेरिका की भूमिका पर सीधी आलोचना थी, न इज़राइल की कार्रवाई पर वैसी सार्वजनिक कठोरता, जैसी कुछ दूसरे देशों की प्रतिक्रियाओं में दिखाई दी। यही वह बिंदु है जहाँ सरकार का संतुलित रुख, उसके आलोचकों की नजर में, परिपक्व कूटनीति से अधिक नियंत्रित अस्पष्टता जैसा दिखाई देता है। यह अंतर केवल शब्दों का नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक स्थिति और उसकी विदेश नीति की शैली का है।

मोदी की इज़राइल यात्रा पर भी यही दोहरी दृष्टि लागू होती है। यात्रा ऐसे समय हुई जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ रहा था। इस तथ्य ने बाद में संदेहों को जन्म दिया कि क्या नई दिल्ली को आने वाले बड़े सैन्य टकराव का अनुमान था। लेकिन अभी तक उपलब्ध सार्वजनिक और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सुरक्षित नहीं है कि भारत को हमले की पूर्व जानकारी थी या यात्रा किसी बाहरी शक्ति की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा थी। फिलहाल उपलब्ध तथ्यों से इतना ही कहा जा सकता है कि यात्रा की टाइमिंग ने राजनीतिक सवाल जरूर पैदा किए, लेकिन उसे किसी सुनियोजित षड्यंत्र के रूप में सिद्ध नहीं किया जा सकता।

ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या के बाद भारत की सार्वजनिक भाषा ने भी असहज प्रश्न पैदा किए। प्रधानमंत्री की ओर से तत्काल सार्वजनिक शोक संदेश का न दिखना राजनीतिक रूप से नोटिस किया गया। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बाद के दिनों में भारत ने ईरान से संवाद बनाए रखा और प्रधानमंत्री ने ईरानी नेतृत्व से बात कर महत्त्वपूर्ण अवसंरचना पर हमलों की निंदा और नौवहन की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया।

यानी भारत ने ईरान से औपचारिक दूरी नहीं बनाई, लेकिन उसकी सार्वजनिक भाषा ने यह भी दिखाया कि उसने भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय नियंत्रित कूटनीतिक प्रतिक्रिया को प्राथमिकता दी। यहीं से मतभेद की जमीन बनती है। आलोचक इसे ठंडापन कह सकते हैं, समर्थक इसे राज्य-व्यवहार का संयम।

भारत की वास्तविक चिंता कहाँ है, इसका सबसे स्पष्ट उत्तर बाजार और ऊर्जा के आँकड़े देते हैं। रॉयटर्स की रिपोर्टों से साफ है कि युद्ध ने भारतीय परिसंपत्तियों पर दबाव बढ़ाया, रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक गया, और होर्मुज के लगभग बंद हो जाने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा जोखिम खड़ा हुआ। प्रधानमंत्री ने संसद में कहा कि भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है।

जब कोई सरकार अपने भाषण में बार-बार एलपीजी, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, उर्वरक, शिपिंग, नियंत्रण कक्ष और वापसी अभियानों की बात करती है, तो उससे यह संकेत मिलता है कि उसका प्राथमिक लक्ष्य विचारधारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के ठोस स्तंभों की रक्षा है। अभी उपलब्ध साक्ष्य इसी निष्कर्ष की ओर अधिक संकेत करते हैं। 24 मार्च के ताज़ा आर्थिक संकेतकों ने इस चिंता को और गहरा किया, जब भारत की निजी क्षेत्रीय वृद्धि तीन साल के निचले स्तर पर दर्ज हुई, रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर से थोड़ा संभलने के बावजूद दबाव में रहा, और तेल कीमतों में फिर उछाल दिखा।

फिर भी सरकार के इस व्यावहारिक रुख को अंतिम निष्कर्ष मान लेना जल्दबाज़ी होगी। कोई भी उभरती हुई शक्ति केवल अपने जहाज, अपने तेल और अपने बाजार बचाने तक सीमित रह जाए, तो उसके कूटनीतिक दावे कमजोर पड़ते हैं। प्रश्न यह है कि क्या भारत को केवल अपने हितों का प्रबंधक बनकर रहना है, या उसे ऐसे क्षणों में अधिक स्पष्ट नैतिक और राजनीतिक रेखा भी खींचनी चाहिए। जब युद्ध क्षेत्रीय स्थिरता को तोड़ रहा हो, ऊर्जा को दबाव के औजार में बदल रहा हो और नागरिक ढांचे तक को जोखिम में डाल रहा हो, तब अत्यधिक सावधानी कुछ क्षणों में दूरदर्शिता कम और अस्पष्टता ज्यादा लग सकती है। यही वह जगह है जहाँ सरकार की नीति की सबसे कठिन परीक्षा शुरू होती है।

दुनिया की प्रतिक्रियाएँ भी इस बहस को समझने में मदद करती हैं। चीन ने युद्ध के और बढ़ने को विनाशकारी चक्र कहा। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इस संकट को 1970 के दशक के तेल संकटों और यूक्रेन युद्ध के बाद की ऊर्जा उथल-पुथल से भी अधिक गंभीर बताया। सिंगापुर ने साफ चेतावनी दी कि खाड़ी में व्यवधान एशिया के लिए ऊर्जा संकट का रूप ले सकता है, क्योंकि एशिया की निर्भरता गहरी है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत अकेला नहीं है जो इस संकट को नैतिक या वैचारिक प्रश्न से पहले ऊर्जा और स्थिरता के प्रश्न के रूप में पढ़ रहा है। फर्क केवल इतना है कि भारत एक साथ इज़राइल, ईरान, अमेरिका और खाड़ी देशों से अपने संबंधों को संतुलित रखना चाहता है, इसलिए उसकी भाषा और भी ज्यादा नियंत्रित है।

अब सबसे कठिन निष्कर्ष पर आया जाए। क्या भारत सरकार का स्टैंड सही है? इसका सरल उत्तर न पूरी तरह हाँ है, न पूरी तरह नहीं। प्रशासनिक तैयारी और संकट-प्रबंधन के पैमाने पर देखें तो सरकार का रवैया कई स्तरों पर सक्रिय दिखता है। लेकिन कूटनीतिक स्पष्टता और नैतिक मुखरता के पैमाने पर वही रुख अधूरा, सीमित और असंतोषजनक भी लग सकता है। यह निष्कर्ष निकालने के लिए अभी पर्याप्त सार्वजनिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं कि भारत ने वैचारिक कारणों से भीतर ही भीतर अमेरिका और इज़राइल का साथ दिया। लेकिन यह प्रश्न टालना मुश्किल है कि भारत की सावधान चुप्पी और सीमित सार्वजनिक भाषा ने संदेहों को जन्म दिया है।

यही इस पूरे प्रकरण का सबसे तीखा और सबसे सुरक्षित निष्कर्ष है। भारत सरकार फिलहाल अपने हितों की रक्षा में लगी दिखती है। लेकिन उसी प्रक्रिया के भीतर उसकी चुप्पी, उसके शब्दों की मितव्ययता, और युद्ध की नैतिकता पर उसका नियंत्रित स्वर ऐसे सवाल छोड़ता है जो खत्म नहीं हुए हैं। भारत ने तैयारी दिखाई है। भारत ने संतुलन भी साधा है। लेकिन यही संतुलन क्या कुछ निर्णायक प्रश्नों पर चुप्पी में बदल गया? असली बहस शायद अब यहीं से शुरू होती है।

क्या आपको लगता है कि तकनीकी चेतावनियों को बार-बार नजरअंदाज करना प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण है?

Advertisement Box
Advertisement Box

और भी पढ़ें