
अहमदाबाद, 23 मार्च 2026 | मध्य पूर्व के युद्ध में आखिरी पल पर एक बड़ा मोड़ आया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के पावर प्लांट्स और बिजली ढांचे पर संभावित हमले को पाँच दिन के लिए टालने का निर्देश दिया है। ट्रंप ने दावा किया कि पिछले दो दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच ऐसी बातचीत हुई है, जिससे मध्य पूर्व में टकराव खत्म करने की दिशा में कुछ ठोस प्रगति की उम्मीद बनी है। लेकिन इसी के तुरंत बाद ईरानी समाचार एजेंसी फार्स ने किसी प्रत्यक्ष या मध्यस्थ वार्ता से इनकार कर दिया। इसका मतलब यह है कि तत्काल सैन्य टकराव भले टल गया हो, पर अविश्वास, जवाबी धमकियाँ और खाड़ी के ऊर्जा तथा जल ढांचे पर बना खतरा अभी दूर नहीं हुआ है।
शनिवार को ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह नहीं खोला गया तो ईरानी पावर प्लांट्स को निशाना बनाया जा सकता है। सोमवार को तय समयसीमा से कुछ घंटे पहले उन्होंने अपना रुख बदलते हुए कहा कि हमले को पाँच दिन के लिए रोका जा रहा है। दूसरी ओर ईरान ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर उसकी बिजली व्यवस्था पर हमला हुआ तो वह इज़राइल के बिजली संयंत्रों और खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों को बिजली देने वाले ढांचों पर प्रहार करेगा। यही वजह है कि कहानी अब “तुरंत हमले” से हटकर “अस्थायी विराम, गहरा अविश्वास और जारी जोखिम” की बन गई है।
अमेरिकी रुख नरम होने के बावजूद इज़राइली सैन्य कार्रवाई जारी रही। रॉयटर्स के अनुसार सोमवार को इज़राइली सेना ने कहा कि वह तेहरान में हमले कर रही है। इससे साफ है कि अमेरिकी स्तर पर आया यह अस्थायी विराम अभी व्यापक सैन्य ठहराव में नहीं बदला है और जमीनी तनाव अब भी बना हुआ है।
यह जोखिम इसलिए साधारण नहीं है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में बिजली और पानी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। बहरीन और कतर अपने इस्तेमाल के लगभग पूरे पानी के लिए विलवणीकरण पर निर्भर हैं। संयुक्त अरब अमीरात अपनी पेयजल जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा समुद्री पानी को मीठा बनाकर पूरा करता है, जबकि सऊदी अरब भी अपनी जल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी तकनीकी व्यवस्था से प्राप्त करता है। इसलिए अगर बिजली संयंत्र, पावर ग्रिड या सप्लाई चेन पर हमला होता है, तो बात केवल अंधेरे तक सीमित नहीं रहेगी। पीने के पानी, अस्पतालों, कूलिंग सिस्टम, बंदरगाहों, डेटा ढांचे और शहरी जीवन की मूल धड़कन तक असर पहुँच सकता है। यही वजह है कि यह संघर्ष तेल के सवाल से आगे बढ़कर मानवीय और संरचनात्मक संकट का रूप ले चुका है।
ट्रंप की टालमटोल टिप्पणी का असर बाजारों पर तुरंत दिखाई दिया। वैश्विक बाजारों पर आई रॉयटर्स की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप की घोषणा के बाद ब्रेंट कच्चे तेल में एक समय करीब 13 प्रतिशत की गिरावट आई और वैश्विक शेयर बाजारों में तेज राहत देखी गई। हालांकि बाद में तेल ने कुछ गिरावट वापस ली, जिससे यह साफ हुआ कि बाजारों ने इसे स्थायी समाधान नहीं, बल्कि एक अस्थायी राहत के रूप में पढ़ा। यानी कीमतों में राहत आई है, पर संकट की जड़ अब भी बनी हुई है।
दुनिया की प्रतिक्रियाएँ भी इसी बदले हुए परिप्रेक्ष्य को दिखाती हैं। चीन की चेतावनी में साफ कहा गया कि अगर युद्ध और बढ़ा तो पूरा मध्य पूर्व एक विनाशकारी चक्र में फँस सकता है, और बीजिंग ने विशेष रूप से अमेरिका तथा इज़राइल से सैन्य कार्रवाई रोककर कूटनीतिक रास्ते पर लौटने की अपील की। यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काया कैलास ने ईरानी विदेश मंत्री से बात की और क्षेत्रीय भागीदारों से भी संपर्क साधा।
इसी बीच सिंगापुर ने भी चेतावनी दी कि मध्य पूर्व में बढ़ता व्यवधान एशिया के लिए गंभीर ऊर्जा संकट का रूप ले सकता है, क्योंकि एशियाई अर्थव्यवस्थाएँ खाड़ी से आने वाली आपूर्ति पर बहुत अधिक निर्भर हैं। रूस ने बुशेहर परमाणु संयंत्र के आसपास हमलों को खतरनाक बताया और राजनीतिक समाधान की जरूरत दोहराई, जबकि वेटिकन ने तत्काल युद्धविराम की अपील की। इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि अब चिंता केवल युद्ध तक सीमित नहीं, बल्कि ऊर्जा, नौवहन, नागरिक जीवन और वैश्विक आर्थिक स्थिरता तक फैल चुकी है।
अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में सबसे गंभीर चेतावनी अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की ओर से आई है। एपी की रिपोर्ट के अनुसार एजेंसी प्रमुख फातिह बिरोल ने कहा कि मौजूदा ऊर्जा संकट 1970 के दशक के तेल संकटों और यूक्रेन युद्ध के बाद की गैस उथल-पुथल को मिलाकर भी अधिक गंभीर साबित हो सकता है। एजेंसी अतिरिक्त रणनीतिक तेल भंडार जारी करने पर सरकारों से विचार-विमर्श कर रही है। इसका सीधा अर्थ यह है कि खाड़ी तनाव को अब सिर्फ भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक नीति के मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।
भारत के लिए तस्वीर अब भी चिंताजनक बनी हुई है। रुपये पर दबाव और भारतीय बाजारों में गिरावट पर आई रॉयटर्स रिपोर्टों के अनुसार 23 मार्च को रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक गया, निफ्टी और सेंसेक्स पर दबाव बना, विदेशी निवेशकों की बिकवाली तेज रही और भारतीय बाजार अस्थिरता सूचकांक यानी इंडिया वीआईएक्स जून 2024 के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुँचा। यह उस गहरी चिंता का संकेत है कि यदि तेल लंबे समय तक ऊँचा रहता है और होर्मुज पर अनिश्चितता बनी रहती है, तो भारत पर ऊर्जा लागत, चालू खाते, महंगाई और विकास समेत सभी मोर्चों पर दबाव बढ़ सकता है। ट्रंप की पाँच दिन की मोहलत से वैश्विक जोखिम-भावना में कुछ राहत जरूर आई है, लेकिन भारत की मूल असुरक्षा अभी समाप्त नहीं हुई है।
भारत सरकार ने इसी संभावना को देखते हुए कई एहतियाती कदम पहले ही सक्रिय कर दिए हैं। 22 मार्च की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी बैठक में कृषि, उर्वरक, खाद्य सुरक्षा, पेट्रोलियम, बिजली, लघु उद्योग, निर्यात, शिपिंग, व्यापार, वित्त और सप्लाई चेन पर संभावित असर की समीक्षा की गई। सरकार ने अल्पकाल, मध्यमकाल और दीर्घकालीन उपायों पर विचार किया, मंत्रियों और सचिवों के समूह बनाने की बात की, राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाने और आवश्यक वस्तुओं में जमाखोरी व कालाबाजारी रोकने पर जोर दिया। यह बैठक किसी एक नाटकीय फैसले से अधिक एक व्यापक संकट-प्रबंधन ढांचा सक्रिय करने वाली बैठक थी।
लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वक्तव्य से भी यही रेखांकित हुआ कि भारत ने नागरिकों, ऊर्जा और परिवहन अवसंरचना पर हमलों का विरोध किया है, व्यावसायिक जहाजों पर हमला और होर्मुज जैसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग में बाधा अस्वीकार्य है, और भारत का रुख संयम, तनाव-नियंत्रण, संवाद और कूटनीति पर आधारित है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि घरेलू एलपीजी उपयोग को प्राथमिकता दी जा रही है, ऊर्जा आयात के स्रोतों का दायरा बढ़ाया गया है, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार उपलब्ध है, और 24×7 नियंत्रण कक्ष, हेल्पलाइन, निकासी तथा सुरक्षा उपाय सक्रिय हैं। इससे स्पष्ट है कि नई दिल्ली सार्वजनिक बयानबाजी से अधिक वास्तविक तैयारी की दिशा में काम कर रही है।
ऊर्जा आपूर्ति के मोर्चे पर भी भारत ने पहले से तैयारी की है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के संसद वक्तव्य के अनुसार सरकार ने रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन अधिकतम करने का निर्देश दिया, आयात-स्रोतों का दायरा खाड़ी से आगे अमेरिका, नॉर्वे, कनाडा, अल्जीरिया और रूस तक बढ़ाया, और राज्यों के साथ समन्वय में नियंत्रित आपूर्ति तथा वैकल्पिक ईंधन रणनीति पर काम शुरू किया। इसलिए पाँच दिन की अमेरिकी मोहलत ने भले अंतरराष्ट्रीय तनाव को अस्थायी रूप से नरम किया हो, भारत की तैयारी अभी भी इस मान्यता पर आधारित है कि संकट फिर भड़क सकता है।
विदेश नीति के स्तर पर भी भारत की आधिकारिक लाइन बदली नहीं है। विदेश मंत्रालय के 3 मार्च के बयान और 19 मार्च की साप्ताहिक ब्रीफिंग में नई दिल्ली ने संयम, डी-एस्केलेशन, नागरिक सुरक्षा और संवाद पर जोर दिया। भारत ने ट्रंप के अल्टीमेटम का शब्दशः समर्थन या विरोध नहीं किया, बल्कि पूरे संकट को ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और भारतीय हितों के व्यापक संदर्भ में देखा। यही वजह है कि भारत की प्रतिक्रिया ऊँचे स्वर वाली राजनीतिक मुद्रा से अधिक व्यावहारिक, संतुलित और तैयारी-केंद्रित दिखाई देती है।
अब इस संकट का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रह गया कि 48 घंटे की चेतावनी पूरी होने पर क्या होगा। सवाल यह है कि क्या पाँच दिन की यह मोहलत वास्तविक कूटनीति में बदलेगी, या यह केवल एक सामरिक विराम साबित होगी जिसके बाद ऊर्जा, बिजली और जल अवसंरचना पर खतरा फिर लौट आएगा। फिलहाल तेल को कुछ राहत मिली है, बाजारों ने थोड़ी साँस ली है, लेकिन खाड़ी की नाजुक जीवन-व्यवस्था पर मंडराता जोखिम अभी भी टला नहीं है। दुनिया इसे परख रही है। भारत इसे लेकर सतर्क है। और असली परीक्षा अब इन अगले पाँच दिनों की है।









