
गांधीनगर, 4 फरवरी 2026 | गांधीनगर स्थित ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्व विद्यालय के सेवाकेंद्र में 26 फरवरी 2026 की शाम आयोजित विशेष आध्यात्मिक कक्षा में जीवन की असुरक्षा, भावनाओं और मानसिक स्थिरता को एक सुव्यवस्थित बॉक्स मॉडल के जरिए समझाया गया। राजयोगी बीके डॉ. प्रशान्त काकोड़े ने व्याख्यान के दौरान लैपटॉप से संचालित टीवी स्क्रीन पर प्रदर्शित ग्राफिक और सैद्धांतिक प्रस्तुतीकरण के माध्यम से स्पष्ट किया कि मनुष्य में असुरक्षा की भावना बाहर की परिस्थितियों से कम और भीतर की धारणाओं से अधिक जन्म लेती है।
कैंब्रिज (यूके) स्थित ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय के निदेशक एवं अनुभवी राजयोग शिक्षक बीके डॉ. प्रशान्त ने स्क्रीन पर एक आयताकार आकृति आरेखित करते हुए समझाया कि यह बॉक्स प्रतीकात्मक रूप से हमारी पूरी दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है। इसके भीतर हम जिन चीजों और संबंधों को रखते हैं, उन पर अनजाने में “मेरा” लिख देते हैं। मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा काम, मेरा पैसा। उन्होंने कहा कि यही “मेरा” भाव हमारे लगाव और अपेक्षाओं की जड़ बन जाता है।
राजयोगी बीके डॉ. प्रशांत उस बॉक्स के भीतर ’मेरा’ शब्द दिखाते हुए उदाहरण समझा रहे थे, तब कई साधक उस चित्र को गहरे ध्यान से देखते दिखाई दिए। कुछ लोग हल्का सा सिर हिलाकर सहमति जताते रहे, मानो वे अपने ही जीवन की झलक उस मॉडल में देख रहे हों। उस क्षण कक्षा में एक शांत स्वीकृति का भाव था, जैसे हर व्यक्ति भीतर ही भीतर अपने “मेरा” की सूची को पहचान रहा हो।
व्याख्यान के इसी क्रम में उन्होंने बॉक्स के किनारों पर “परिवर्तन, अंत और अनिश्चितता” की ओर संकेत करते हुए बताया कि इस दुनिया में हर चीज बदलती है, हर स्थिति का अंत निश्चित है और भविष्य हमेशा पूरी तरह हमारे नियंत्रण में नहीं होता। जब मनुष्य इन बदलती परिस्थितियों के बीच स्थायी सुरक्षा खोजता है, तभी असुरक्षा की शुरुआत होती है।

उन्होंने आगे कहा कि जो व्यक्ति आंतरिक रूप से स्थिर होता है वही दूसरों को भी सुरक्षा का अनुभव करा सकता है। यदि हम अपने आसपास के लोगों को स्वीकार और भरोसे का वातावरण दें, तो उनका श्रेष्ठ स्वभाव स्वयं सामने आने लगता है। इसके विपरीत असुरक्षा का माहौल व्यक्ति के व्यवहार को सीमित कर देता है।
असुरक्षा की जड़ को स्पष्ट करते हुए उन्होंने ‘इनसिक्योर’ से ‘डिज़ायर टू सिक्योर‘ तक की मानसिक प्रक्रिया समझाई। जब व्यक्ति भीतर से असुरक्षित महसूस करता है तो वह हर हाल में अपने को सुरक्षित बनाने की इच्छा पाल लेता है। यही इच्छा जब बाहरी वस्तुओं और संबंधों से जुड़ जाती है तो मन में अनिश्चितता पैदा होती है। “जो मैं चाहता हूँ वह होगा या नहीं। मेरी इच्छा पूरी होगी या नहीं।” यही अनिश्चितता आगे चलकर तनाव और भावनात्मक प्रतिक्रिया का कारण बनती है।
आध्यात्मिक कक्षा के दूसरे चरण में बीके डॉ. प्रशान्त ने मनुष्य की भावनाओं का एक रोचक मानचित्र प्रस्तुत किया। लैपटॉप से टीवी स्क्रीन पर चार बिंदु ए, बी, सी और डी दर्शाते हुए उन्होंने समझाया कि अलग-अलग भावनाएँ कैसे हमारी इच्छाओं और परिस्थितियों से जुड़ती हैं और धीरे-धीरे हमारे व्यवहार और अनुभवों को आकार देती हैं।
जैसे ही यह चित्र स्क्रीन पर उभरा, माहौल और अधिक गंभीर तथा एकाग्र हो गया। कई साधक ध्यान से उन बिंदुओं को देखते हुए उनके अर्थ को समझने की कोशिश करते दिखाई दिए, जबकि कुछ तुरंत अपनी नोटबुक में उन्हें लिखने लगे। उस क्षण स्पष्ट था कि यह केवल एक चित्र नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का एक व्यावहारिक ढांचा बन चुका था।
बिंदु ए पर उन्होंने समझाया कि जब तीव्र इच्छा हो और उसके पूरे होने को लेकर भरोसा न हो तो मन की स्थिति तनाव बन जाती है। बिंदु बी पर उन्होंने बताया कि चाह हो लेकिन वह पूरी न हो तो क्रोध उत्पन्न होता है। इच्छा जितनी गहरी और टूटने का अनुभव जितना तीखा, क्रोध भी उतना ही अधिक। बिंदु सी पर उन्होंने उस अवस्था को रखा जहाँ इच्छा हो, वह पूरी न हो और किसी को दोष देने का आधार भी न हो।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति भीतर ही भीतर मान लेता है कि उसकी इच्छा अब पूरी नहीं होगी और वहीं से उदासी और निराशा जन्म लेती है। बिंदु डी पर उन्होंने ईर्ष्या को एक मिश्रित भावना बताया जिसमें अधूरी चाह की उदासी और तुलना से उपजा क्रोध दोनों शामिल होते हैं।
इसके बाद सत्र के अगले चरण में उन्होंने समाधान की दिशा प्रस्तुत की। अगली स्लाइड में उन्होंने एक नई आयताकार आकृति आरेखित की, जिसके एक ओर प्रवेश और दूसरी ओर निकास का संकेत था। उसी संरचना का परिवर्तित रूप सामने आया, जिसमें परिवार, समाज, काम और जीवन की विभिन्न परिस्थितियाँ दर्शायी गईं। इसी के साथ उन्होंने स्पष्ट किया कि यहाँ की कोई भी वस्तु वास्तव में स्थायी रूप से हमारी नहीं है।
उनका कहना था कि जब मनुष्य इस दुनिया को स्थायी घर के बजाय एक अस्थायी ठहराव की जगह की तरह देखना शुरू करता है, तब भीतर की पकड़ ढीली होने लगती है। इससे मन में हल्कापन और शांति का अनुभव होता है। जब यह समझ पक्की हो जाती है कि यहाँ से कुछ भी साथ नहीं जाना है, तब असुरक्षा का आधार कमजोर पड़ने लगता है। उन्होंने समझाया कि गेस्ट हाउस में ठहराव होता है, स्वामित्व नहीं, और यही बोध असुरक्षा की जड़ को कमजोर करता है।
इसके बाद उन्होंने डाउनवर्ड स्पाइरल, यानी गिरती हुई अवस्था का चित्र प्रदर्शित किया। इस मॉडल के माध्यम से उन्होंने बताया कि कैसे छोटी-सी नकारात्मक सोच या अपेक्षा धीरे-धीरे मन की स्थिति को नीचे की ओर ले जाती है और व्यक्ति अनजाने में ही उलझनों के चक्र में फँसता चला जाता है।
इस स्पाइरल चित्र को समझाते समय बीके डॉ. प्रशान्त कभी स्क्रीन की ओर इशारा करते, तो कभी साधकों की तरफ देखकर सरल उदाहरण देते। कई श्रोता उस मॉडल को अपनी जीवन स्थितियों से जोड़कर समझने लगे। इसी कारण कक्षा का वातावरण और अधिक संवादपूर्ण और चिंतनशील बन गया, जहाँ सुनना केवल जानकारी लेना नहीं बल्कि स्वयं को पहचानने की प्रक्रिया बन गया।
सत्र के अंतिम हिस्से में उन्होंने बढ़ती हुई स्पाइरल का चित्र दिखाया और बताया कि जब व्यक्ति बाहरी वस्तुओं में सुरक्षा खोजने के बजाय अपने भीतर स्थिरता विकसित करता है तो उसका मन ऊपर की ओर उठता है। यही डिटैचमेंट उसे संतुलित और मजबूत बनाता है।
इसके समापन चरण में बीके डॉ. प्रशान्त ने अदृश्य मुसाफिर का प्रतीक प्रस्तुत किया। स्क्रीन पर बॉक्स के ऊपर एक छोटा सा सितारा दिखाते हुए उन्होंने कहा कि हम सब इस दुनिया में यात्री हैं। जब चेतना यह स्वीकार कर लेती है कि यह दुनिया स्थायी नहीं है, तब मन हल्का हो जाता है।

बीके डॉ. प्रशान्त के समापन शब्दों के बाद कक्षा में कुछ क्षणों के लिए गहरा मौन छा गया। ऐसा लगा जैसे उपस्थित साधक अभी-अभी सुने गए विचारों को अपने भीतर शांत मन से बैठा रहे हों और उन्हें अपने जीवन से जोड़कर देख रहे हों।
गांधीनगर ब्रह्माकुमारीज सेवाकेंद्र में यह आयोजन केवल व्याख्यान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि असुरक्षा, तनाव, क्रोध, उदासी और ईर्ष्या के मनोविज्ञान को बॉक्स मॉडल के माध्यम से समझाने वाली एक प्रयोगात्मक और सहभागितापूर्ण प्रक्रिया बनकर सामने आई।
उपस्थित कई भाई बहन आपस में एक ही बात दोहराते दिखाई दिए कि यदि दुनिया एक बॉक्स है तो हम वास्तव में मुसाफिर हैं और वास्तविक सुरक्षा बाहर नहीं बल्कि भीतर है। उपस्थित प्रतिभागियों में गुजरात राज्य सचिवालय के शिक्षा विभाग में कार्यरत एक उप सचिव स्तर की महिला अधिकारी भी शामिल रहीं, जिन्होंने पूरे कक्षा सत्र के दौरान विस्तार से नोट्स लिए।
इसके अलावा इस कक्षा में गुजरात राज्य के सेवानिवृत्त अधिकारियों के साथ ब्रिटेन के लेस्टर शहर से आई चार महिलाएँ भी शामिल रहीं, जिससे इस आध्यात्मिक अध्ययन सत्र में अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति भी दिखाई दी। बीके डॉ. प्रशान्त का व्याख्यान मुख्यतः हिंदी में रहा, जबकि कुछ अवधारणाओं को स्पष्ट करने के लिए वे बीच-बीच में अंग्रेज़ी शब्दों और वाक्यों का भी प्रयोग करते दिखाई दिए।
आध्यात्मिक कक्षा के समापन अवसर पर मंच से ब्रह्माकुमारीज सेवाकेंद्र की प्रभारी वरिष्ठ राजयोगिनी बीके कैलाश दीदी ने उपस्थित साधकों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि यह हम सभी का सौभाग्य है कि राजयोगी भ्राता बीके डॉ. प्रशान्त आज हमारे बीच उपस्थित रहे और उन्होंने ईश्वरीय ज्ञान को अत्यंत सरल, स्पष्ट और सारगर्भित शैली में प्रस्तुत करते हुए हम सबका मार्गदर्शन किया।
बीके कैलाश दीदी ने उनके व्याख्यान की सराहना करते हुए साधकों को इस ज्ञान को अपने जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा दी तथा अंत में बीके डॉ. प्रशान्त के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।









