Responsive Menu

Download App from

Download App

Follow us on

Donate Us

भारत–अमेरिका ट्रेड डील: टैरिफ़ के शोर में दबे खेत–खलिहान के सवाल

सुर्ख़ियों से दूर, खेत-खलिहान उन फैसलों का इंतज़ार कर रहे हैं जो दस्तावेज़ों में लिखे जा रहे हैं। प्रतीकात्मक कृषि परिदृश्य | खुली किताब
Author Image
Written by
—खुली किताब | रिसर्च टीम

सरकारी मंचों पर कृषि और डेयरी की “पूरी सुरक्षा” का दावा किया गया है, लेकिन व्हाइट हाउस और पीआईबी द्वारा जारी संयुक्त आधिकारिक दस्तावेज़ इस सुरक्षा को भविष्य की वार्ताओं से बाहर रखने वाली किसी स्पष्ट या बाध्यकारी कानूनी शर्त में परिवर्तित नहीं करते। दोनों वक्तव्य इस समझौते को एक अंतरिम ढाँचे के रूप में परिभाषित करते हैं, जिसके आधार पर आगे बाज़ार-पहुंच, टैरिफ़, गैर-टैरिफ बाधाओं और मानकों पर विस्तृत बातचीत होनी है।

यही वह बिंदु है जहाँ शुरुआती घोषणाओं का उत्सव रुकता है और सवाल शुरू होते हैं, क्योंकि दस्तावेज़ भविष्य के लिए दरवाज़ा खुला छोड़ते हैं, जबकि सार्वजनिक विमर्श आश्वासनों तक सीमित है। इस अंतर को दर्ज करना न विरोध है, न आशंका, बल्कि वही पत्रकारिता है, जो यह पूछती है कि क्या जनता को पूरी तस्वीर दिखाई जा रही है।


भारत–अमरीका ट्रेड डील को लेकर दोनों देशों ने फरवरी के पहले सप्ताह में आधिकारिक संयुक्त बयान जारी किए। संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से यह वक्तव्य 6 फ़रवरी को व्हाइट हाउस की वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ, जबकि भारत सरकार ने 7 फ़रवरी को प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) के माध्यम से उसी साझा समझौते का अपना आधिकारिक संस्करण सार्वजनिक किया। इन बयानों के सामने आते ही देश के राजनीतिक और आर्थिक गलियारों में तेज़ हलचल शुरू हो गई।

संयुक्त आधिकारिक वक्तव्यों से इतर, भारत के घरेलू मंचों पर सरकारी बयानों और सार्वजनिक प्रस्तुतियों में इस समझौते को “ऐतिहासिक” बताया गया। वही “तुरंत लागू” और “क्रांतिकारी” जैसे विशेषण मुख्यतः राजनीतिक वक्तव्यों और मीडिया नैरेटिव के स्तर पर उभरते दिखाई दिए। टैरिफ़ कट, व्यापार बढ़ोतरी और भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर इसके प्रमुख लाभ के रूप में प्रस्तुत किए गए, साथ ही यह आश्वासन भी दोहराया गया कि किसानों, डेयरी और संवेदनशील कृषि क्षेत्रों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं।

बहरहाल, इन्हीं संयुक्त राज्य अमेरिका–भारत आधिकारिक बयानों की भाषा एक अलग तस्वीर भी दिखाती है। दस्तावेज़ यह संकेत देते हैं कि यह कोई अंतिम और कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि नहीं, बल्कि एक अंतरिम ढाँचा है, जिसके आधार पर आगे विस्तृत वार्ताएँ और औपचारिक कानूनी दस्तावेज़ तैयार होना बाकी है। संयुक्त आधिकारिक वक्तव्य के प्रकाशन से पूर्व मीडिया ब्रीफिंग में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संकेत दिया था कि व्यापक, बाध्यकारी व्यापार समझौते के मसौदे को मार्च के मध्य तक अंतिम रूप देने का लक्ष्य रखा गया है; हालांकि यह समय-सीमा उस आधिकारिक दस्तावेज़ के पाठ में दर्ज नहीं है।

यहीं से असली सवाल जन्म लेता है। जब अभी लागू ढाँचा अंतरिम है और आगे की बातचीत में टैरिफ़, गैर-टैरिफ बाधाओं, मानकों और बाज़ार-पहुँच जैसे संवेदनशील मुद्दों पर निर्णय होने बाकी हैं, तो क्या किसानों और डेयरी को मिली “पूरी सुरक्षा” एक स्थायी क़ानूनी गारंटी है, या फिर यह एक ऐसी राजनीतिक आश्वस्ति है जिसकी परीक्षा आने वाले दस्तावेज़ों और वार्ताओं में होगी? असल परीक्षा राजनीतिक आश्वासनों और आने वाले क़ानूनी दस्तावेजी मसौदे के बीच मौजूद अंतर में छिपी है। यहीं से दस्तावेज़ों की भाषा और सार्वजनिक प्रस्तुति के बीच का अंतर स्पष्ट होना शुरू होता है।

व्हाइट हाउस और पीआईबी के दस्तावेज़ में क्या लिखा है, जो भारत में पूरी तरह नहीं दिखा

अमेरिकी व्हाइट हाउस की वेबसाइट पर जारी संयुक्त आधिकारिक बयान स्पष्ट रूप से दर्ज करता है कि भारत, अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं के साथ-साथ “खाद्य और कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला” पर भी टैरिफ़ घटाने या समाप्त करने के लिए सहमत हुआ है। इस संदर्भ में ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स, पशु-चारे के लिए लाल ज्वार, ट्री नट्स, ताज़े और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स जैसे उत्पादों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है। यह सूची किसी विश्लेषण या व्याख्या का परिणाम नहीं, बल्कि संयुक्त आधिकारिक वक्तव्य में दर्ज प्रतिबद्धता है।

संयुक्त आधिकारिक वक्तव्य की भाषा यह दर्ज करती है कि दोनों पक्ष द्विपक्षीय व्यापार को प्रभावित करने वाली गैर-टैरिफ बाधाओं के समाधान पर सहमत हुए हैं। विशेष रूप से, भारत ने अमेरिकी खाद्य व कृषि उत्पादों के व्यापार में लंबे समय से चली आ रही गैर-टैरिफ बाधाओं की समीक्षा तथा आयात लाइसेंसिंग, गुणवत्ता मानकों, परीक्षण और प्रमाणन प्रक्रियाओं जैसे चिन्हित नियामकीय क्षेत्रों में आगे विचार-विमर्श की सहमति दी है। वही वक्तव्य यह भी स्पष्ट करता है कि समझौते के प्रवर्तन में आने के छह महीने के भीतर चिन्हित क्षेत्रों में अमेरिकी या अंतरराष्ट्रीय मानकों की स्वीकार्यता पर निर्णय-प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस चरण पर किसी ‘स्पष्ट बहिष्करण उपबंध’ (explicit exclusion clause) का उल्लेख नहीं मिलता, जो कृषि या डेयरी क्षेत्रों को भविष्य की वार्ताओं से विधिक रूप से स्थायी तौर पर बाहर रखता हो। अतः ‘वर्तमान में कोई रियायत नहीं’ और ‘भविष्य में विचार-विमर्श से स्थायी छूट’—इन दोनों के बीच का अंतर दस्तावेज़ीय रूप से स्पष्ट है। इसी अंतर में इस अंतरिम ढाँचे की वास्तविक संवेदनशीलता निहित है, क्योंकि अंतिम स्थिति आगामी बाध्यकारी मसौदों और वार्ताओं के परिणाम से ही निर्धारित होगी।

यही भाषा भारत सरकार द्वारा प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) के माध्यम से जारी संयुक्त आधिकारिक वक्तव्य में भी लगभग शब्दशः दिखाई देती है। उसी दस्तावेज़ में यह भी दर्ज है कि भारत, अमेरिका के औद्योगिक सामानों और अमेरिकी खाद्य एवं कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर टैरिफ़ को समाप्त या कम करेगा, तथा इन उत्पादों के व्यापार से जुड़ी गैर-टैरिफ व्यवस्थाओं पर आगे कार्रवाई के लिए सहमत है। इसका अर्थ यह है कि ये प्रतिबद्धताएँ केवल अमेरिकी वक्तव्य तक सीमित नहीं, बल्कि भारत सरकार के अपने आधिकारिक दस्तावेज़ में भी उसी स्पष्टता के साथ मौजूद हैं।

अंतर यहाँ दस्तावेज़ों के शब्दों में नहीं, बल्कि उनके सार्वजनिक प्रस्तुतिकरण में दिखाई देता है। जहाँ घरेलू स्तर पर यह धारणा प्रमुखता से उभरी कि किसानों और डेयरी को स्थायी सुरक्षा प्राप्त हो चुकी है, वहीं संयुक्त अमेरिकी-भारतीय आधिकारिक वक्तव्य भारत की ओर से अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों की व्यापक श्रेणी पर टैरिफ़ घटाने और नियामकीय प्रक्रियाओं पर आगे कदम बढ़ाने की प्रतिबद्धता दर्ज करता है।

ध्यान रहे कि 6–7 फ़रवरी के संयुक्त वक्तव्य ‘फ्रेमवर्क शर्तें’ प्रस्तुत करते हैं, जबकि 9 फ़रवरी की फैक्ट शीट उसी ढाँचे पर व्हाइट हाउस का व्याख्यात्मक/प्रस्तुतिकरण दस्तावेज़ है, जिसमें कुछ संदर्भ अधिक स्पष्ट रूप में रखे गए हैं।

9 फ़रवरी को जारी अमेरिकी फैक्ट शीट में यह उल्लेख किया गया है कि अमेरिका ने भारत पर लागू पारस्परिक टैरिफ़ दर को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने का निर्णय लिया है। यह प्रावधान दर्शाता है कि अंतरिम ढाँचा पूर्णतः एकतरफ़ा नहीं है और इसमें भारत को भी कुछ व्यापारिक राहत प्राप्त हुई है। तथापि, कृषि और डेयरी से जुड़े प्रावधानों का मूल्यांकन उनके विशिष्ट दस्तावेज़ीय और कानूनी संदर्भ में ही किया जाना चाहिए, क्योंकि इन क्षेत्रों के संबंध में अंतिम स्थिति आगामी वार्ताओं और बाध्यकारी मसौदों से स्पष्ट होगी।

अमेरिकी फैक्ट शीट में यह भी कहा गया है कि भारत पर लागू ‘अतिरिक्त 25%’ टैरिफ हटाने के निर्णय को भारत द्वारा रूसी तेल-खरीद पर रुख बदलने से जोड़ा गया है; हालांकि यह संदर्भ 6–7 फ़रवरी के संयुक्त आधिकारिक वक्तव्यों के पाठ का हिस्सा नहीं है।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि दोनों सरकारों के किसी भी संयुक्त आधिकारिक दस्तावेज़ में यह नहीं लिखा गया कि कृषि या डेयरी को हमेशा के लिए या कानूनी गारंटी के साथ समझौते के दायरे से बाहर रखा गया है। दस्तावेज़ तकनीकी और प्रक्रियागत भाषा में यह स्पष्ट करता है कि टैरिफ़, गैर-टैरिफ बाधाओं और मानकों पर निर्णय आगे की समय-सीमा और वार्ताओं के भीतर लिए जाएँगे। यह तथ्य दस्तावेज़ों की सीमा को रेखांकित करता है। सरकार की मंशा का अंतिम आकलन आने वाले बाध्यकारी कानूनी मसौदों से ही संभव होगा।

“डेयरी और किसानों की सुरक्षा”: अंतरिम आश्वासन बनाम क़ानूनी वास्तविकता

भारत सरकार की ओर से भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर सबसे ज़्यादा दोहराया गया आश्वासन यह है कि “डेयरी को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है” और “इस सेक्टर में कुछ भी नहीं खोला गया।” यही भाषा किसानों के संदर्भ में भी प्रयुक्त हुई है कि उनके हित सुरक्षित हैं और यह समझौता उनके लिए अवसर लेकर आएगा।

राजनीतिक स्तर पर यह संदेश स्पष्ट और आश्वस्त करने वाला है। संयुक्त अमेरिकी–भारतीय आधिकारिक बयान और उसी का प्रतिबिंब पीआईबी द्वारा जारी वक्तव्य यह साफ़ करते हैं कि मौजूदा सहमति कोई अंतिम और कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि नहीं, बल्कि एक अंतरिम ढाँचा है। इसमें आगे चलकर एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की वार्ता का रास्ता खुला छोड़ा गया है, जिसमें अतिरिक्त बाज़ार-पहुँच से जुड़ी प्रतिबद्धताएँ जोड़ी जा सकती हैं। इसका अर्थ यह है कि सरकार द्वारा आज दिए जा रहे आश्वासन एक प्रक्रिया के मौजूदा चरण का वर्णन हैं, न कि अंतिम क़ानूनी गारंटी।

कानूनी गारंटी के अभाव में, डेयरी किसान का भविष्य अंतरिम दस्तावेज़ों और आने वाली वार्ताओं के भरोसे टिका है।

यहीं पर स्थायित्व को लेकर पहला निर्णायक प्रश्न खड़ा होता है। यदि अंतरिम चरण में किसी क्षेत्र को बाहर रखा गया है, तो क्या इसकी कोई लिखित और बाध्यकारी गारंटी मौजूद है कि अगली वार्ताओं में इसे फिर से चर्चा की मेज़ पर नहीं लाया जाएगा? दस्तावेज़ इस संभावना को न तो स्वीकार करता है और न ही स्पष्ट रूप से खारिज करता है। ऐसे में डेयरी और किसानों की दीर्घकालिक सुरक्षा आने वाले कानूनी मसौदों पर निर्भर करती है, न कि वर्तमान राजनीतिक वक्तव्यों पर।

दूसरा अहम सवाल सीधे डेयरी या मुख्य फसलों से नहीं, बल्कि पूरे कृषि और डेयरी इकोसिस्टम से जुड़ा है। संयुक्त आधिकारिक बयान में जिन अमेरिकी कृषि उत्पादों का स्पष्ट उल्लेख है, जैसे ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स, पशु-चारे के लिए लाल ज्वार, खाद्य तेल और प्रसंस्कृत कृषि उत्पाद, ये दूध या अनाज नहीं हैं, लेकिन उत्पादन लागत और बाज़ार संतुलन पर सीधा असर डालते हैं। यदि ऐसे इनपुट आयात के ज़रिये सस्ते और बड़े पैमाने पर उपलब्ध होते हैं, तो इसका प्रभाव छोटे पशुपालकों, चारा-उत्पादकों, सहकारी डेयरी मॉडल और अंततः ग्रामीण आय संरचना पर पड़ सकता है। सवाल यह नहीं कि ऐसा होना तय है, बल्कि यह है कि क्या इस संभावित असर का कोई सार्वजनिक और दस्तावेज़ आधारित प्रभाव-आकलन अब तक सामने आया है।

तीसरा और सबसे संवेदनशील पहलू मानकों और नियामकीय ढाँचे से जुड़ा है। व्हाइट हाउस और पीआईबी दोनों के आधिकारिक दस्तावेज़ में यह दर्ज है कि भारत और अमेरिका लंबे समय से चली आ रही गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करेंगे और समझौते के प्रवर्तन में आने के बाद छह महीने के भीतर यह तय करेंगे कि अमेरिकी या अंतरराष्ट्रीय मानक कुछ चिन्हित क्षेत्रों में स्वीकार किए जाएँगे या नहीं। भारत अब तक सख़्त परीक्षण, लेबलिंग और स्वच्छता मानकों के माध्यम से घरेलू किसानों, डेयरी उत्पादकों और उपभोक्ताओं की सुरक्षा करता रहा है।

यह कहना कि अभी कोई तत्काल जोखिम सिद्ध हो चुका है, तथ्यात्मक रूप से जल्दबाज़ी होगी। लेकिन यह मान लेना कि भविष्य में कोई जोखिम उत्पन्न ही नहीं हो सकता, उतनी ही बड़ी सरलीकरण की गलती होगी। क्योंकि दस्तावेज़ स्वयं आगे की वार्ताओं, मानकों के पुनर्मूल्यांकन और बाज़ार-पहुँच के विस्तार की बात करता है। ऐसे में इन संभावित प्रभावों पर प्रश्न उठाना न तो विरोध है और न ही आशंका फैलाना, बल्कि सार्वजनिक हित में की गई वह वैध जाँच है, जो किसी भी गंभीर व्यापार समझौते के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी होनी चाहिए।

प्रेस कॉन्फ़्रेंस, संसद और दस्तावेज़: “आधा सच” कैसे नैरेटिव बनता है

संयुक्त आधिकारिक बयान सामने आने के बाद दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंसों और टेलीविज़न इंटरव्यूज़ में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बार-बार यह दोहराया कि भारत–अमेरिका ट्रेड डील में “डेयरी में कुछ भी नहीं खोला गया है”, “किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं” और “संवेदनशील कृषि क्षेत्रों पर कोई रियायत नहीं दी गई।” यही वाक्य हिंदी और अंग्रेज़ी मीडिया की सुर्ख़ियों में भी प्रमुखता से उभरे। इन बयानों का राजनीतिक संदर्भ स्पष्ट है। कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर किसी भी सरकार के लिए यह आवश्यक होता है कि वह संभावित असंतोष से पहले आश्वासन दे और स्थिति को नियंत्रित रखे।

लेकिन यहीं से एक बुनियादी प्रश्न जन्म लेता है—क्या ये सार्वजनिक आश्वासन उसी भाषा और उसी स्तर की निश्चितता के साथ आधिकारिक दस्तावेज़ों में भी दर्ज हैं? संयुक्त अमेरिकी–भारतीय आधिकारिक बयान, चाहे वह व्हाइट हाउस की वेबसाइट पर प्रकाशित हो या भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा जारी, कहीं भी यह नहीं कहता कि कृषि या डेयरी को समझौते के दायरे से स्थायी रूप से बाहर रखा गया है। इसके विपरीत, दस्तावेज़ यह स्पष्ट करता है कि मौजूदा सहमति एक अंतरिम ढाँचा है, जिसके आधार पर आगे चलकर एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर वार्ताएँ होंगी और उनमें अतिरिक्त बाज़ार-पहुंच प्रतिबद्धताएँ जोड़ी जा सकती हैं।

यहीं पर घरेलू मंचों से दिए गए संदेश और दस्तावेज़ की भाषा के बीच एक मौन अंतर दिखाई देता है। सार्वजनिक बयानों में जहाँ “कुछ भी नहीं खोला गया” जैसी अंतिमता झलकती है, वहीं आधिकारिक दस्तावेज़ की भाषा कृषि-खाद्य उत्पादों की एक विस्तृत श्रेणी पर टैरिफ़ में कटौती, गैर-टैरिफ बाधाओं में कमी और मानकों पर पुनर्विचार की प्रक्रिया को स्वीकार करती है। लेकिन यह ज़रूर दर्शाता है कि राजनीतिक आश्वासन और क़ानूनी दस्तावेज़ समान स्तर की निश्चितता और स्थायित्व के साथ बात नहीं कर रहे हैं।

इसी पृष्ठभूमि में संसद की भूमिका को देखना आवश्यक है। 6 और 7 फ़रवरी को संयुक्त वक्तव्यों के जारी होने के बाद यह अपेक्षा स्वाभाविक थी कि संसद में दस्तावेज़ों की भाषा और संभावित प्रभावों पर विस्तृत चर्चा होगी। अब तक संसद में जो प्रतिक्रियाएँ दर्ज हुई हैं, वे मुख्यतः नीतिगत इरादों और राजनीतिक आश्वासनों की व्याख्या तक सीमित रही हैं। यह स्थिति असामान्य नहीं कही जा सकती, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों के अंतरिम चरण में क्लॉज-स्तरीय बहस प्रायः तभी होती है, जब अंतिम, कानूनी रूप से बाध्यकारी मसौदा सामने आता है या घरेलू क़ानूनों में संशोधन प्रस्तावित होते हैं। इस दृष्टि से संसद की मौजूदा भूमिका प्रक्रिया के अनुरूप ही प्रतीत होती है।

मगर समस्या तब उभरती है, जब संसद की इस प्रक्रियात्मक सीमा को सार्वजनिक विमर्श की सीमा भी मान लिया जाता है। मीडिया के बड़े हिस्से में सरकारी ब्रीफिंग की भाषा लगभग शब्दशः दोहराई जाती दिखाई दी—“कृषि और डेयरी सुरक्षित हैं”, “कुछ भी नहीं खोला गया है”, “चिंताओं का समाधान हो चुका है।” इन वक्तव्यों को तथ्यात्मक असत्य कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि वे राजनीतिक आश्वासन के रूप में दिए गए हैं। समस्या वहाँ पैदा होती है, जहाँ यही आश्वासन पूरे विमर्श पर हावी हो जाते हैं और आधिकारिक दस्तावेज़ों में दर्ज शर्तें, प्रक्रियाएँ और भविष्य की वार्ताओं से जुड़ी अनिश्चितताएँ चर्चा के हाशिये पर चली जाती हैं। यहीं से वह स्थिति बनती है, जिसे इस रिपोर्ट में “आधा सच” कहा गया है। आधा सच इसलिए नहीं कि प्रस्तुत तथ्य ग़लत हैं, बल्कि इसलिए कि प्रस्तुत तस्वीर अधूरी है।

असली जाँच उन प्रश्नों से शुरू होती है, जिन पर अब तक सार्वजनिक विमर्श ठहरता नहीं दिखता। आने वाली वार्ताओं में कृषि और डेयरी से जुड़े मानकों की वास्तविक दिशा क्या होगी, आयात-दबाव की संभावनाओं का मूल्यांकन किन मानकों पर किया जाएगा, और इन संभावित बदलावों का छोटे किसानों तथा सहकारी ढाँचों पर क्या असर पड़ सकता है—ये वे प्रश्न हैं, जो गढ़ी गई घोषणात्मक सार्वजनिक प्रस्तुति में अपेक्षाकृत पीछे छूट गए हैं, जबकि इन्हीं के उत्तर इस समझौते के दीर्घकालिक परिणामों की दिशा तय करेंगे।

यह स्थिति किसी एक संस्था या मंच की विफलता नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है। जब सकारात्मक तथ्य और राजनीतिक संदेश सुर्ख़ियों में स्थायी स्थान बना लेते हैं और दस्तावेज़ों में दर्ज शर्तें व प्रक्रियाएँ अपेक्षाकृत चुप्पी में रह जाती हैं, तो धीरे-धीरे ऐसा नैरेटिव आकार लेता है जो पूरी तरह असत्य नहीं होता, पर पूरी तस्वीर भी नहीं दिखाता। यहीं पर पत्रकारिता की भूमिका केवल रिपोर्टिंग की नहीं, बल्कि उस अंतर को दर्ज करने की हो जाती है, जहाँ खामोशी महज़ मौन नहीं रहती, बल्कि स्वयं नैरेटिव का हिस्सा बन जाती है।

दस्तावेज़ से आगे की कसौटी: असली सवाल कब और कहाँ तय होंगे

भारत–अमेरिका ट्रेड डील इस समय किसी अंतिम निर्णय से अधिक एक संक्रमणकालीन प्रक्रिया के रूप में मौजूद है। व्हाइट हाउस और भारत सरकार द्वारा जारी संयुक्त आधिकारिक वक्तव्य यह स्पष्ट करते हैं कि मौजूदा सहमति एक अंतरिम ढाँचा है, जिसके आधार पर आगे विस्तृत वार्ताएँ, तकनीकी सहमतियाँ और कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज़ तैयार किए जाने हैं।

इतिहास बताता है कि व्यापार समझौतों का वास्तविक प्रभाव घोषणाओं के साथ नहीं, बल्कि समय के साथ ज़मीनी स्तर पर सामने आता है। टैरिफ़ में बदलाव, गैर-टैरिफ़ प्रक्रियाओं का पुनर्गठन और मानकों से जुड़ी नीतिगत सहमतियाँ अक्सर चरणबद्ध ढंग से लागू होती हैं। उनका असर धीरे-धीरे किसानों, डेयरी सहकारिताओं और छोटे उत्पादकों तक पहुँचता है। इसी कारण “फिलहाल सुरक्षित” और “कानूनी रूप से सुरक्षित” के बीच का अंतर केवल शब्दों का नहीं, बल्कि नीति-परिणामों का अंतर होता है।

यहाँ मूल प्रश्न यह नहीं है कि सरकार किस दिशा में आगे बढ़ेगी। असली प्रश्न यह है कि आगे होने वाली वार्ताओं में किन शर्तों पर निर्णय लिए जाएँगे और वे निर्णय कहाँ दर्ज होंगे। कृषि और डेयरी से जुड़े मानकों की दिशा क्या होगी, आयात-दबाव की संभावनाओं का मूल्यांकन किन आधारों पर किया जाएगा, और इन संभावित बदलावों का छोटे किसानों तथा सहकारी ढाँचों पर क्या प्रभाव पड़ेगा—ये वे बिंदु हैं, जिनका उत्तर किसी प्रेस बयान में नहीं, बल्कि आने वाले कानूनी दस्तावेज़ों और सहमतियों में मिलेगा।

इसी बिंदु पर सार्वजनिक विमर्श की भूमिका निर्णायक हो जाती है। जब आधिकारिक दस्तावेज़ कुछ प्रश्नों को भविष्य की प्रक्रिया पर छोड़ते हैं, तो उन “खाली जगहों” की ओर ध्यान दिलाना न विरोध है, न आशंका। यह उस पत्रकारिता का मूल दायित्व है, जो सार्वजनिक और राजनीतिक घोषणात्मक प्रस्तुति के बीच यह पूछती है कि अंतिम शर्तें कहाँ लिखी जाएँगी और किनके लिए उनका क्या अर्थ होगा।

यही कारण है कि इस ट्रेड डील की असली परीक्षा आज नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में होगी, जब अंतरिम ढाँचे से निकलकर वास्तविक, कानूनी और बाध्यकारी दस्तावेज़ सामने आएँगे। सवाल यह नहीं कि क्या तय किया जाएगा, बल्कि यह है कि उसे किस स्तर की पारदर्शिता और सार्वजनिक समझ के साथ तय किया जाएगा।

क्या सुप्रीम कोर्ट की सलाहकारी राय भारतीय संघवाद में राज्यपालों की भूमिका को और अधिक शक्तिशाली बना देती है?

Advertisement Box
Advertisement Box