
कभी-कभी राजनयिक समारोह सिर्फ़ शिष्टाचार नहीं होते। वे उस क्षण का संकेत होते हैं, जब अंतरराष्ट्रीय रिश्ते नई शर्तों पर गढ़े जाने लगते हैं। भारत और यूरोप के बीच यह संवाद किसी तात्कालिक सौदे का परिणाम नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक अनिश्चितताओं की उपज है। यह कहानी व्यापार या सुरक्षा की नहीं, बल्कि उस संतुलन की है, जो शक्ति, भरोसे और विकल्पों के बीच तलाशा जा रहा है। यही संतुलन तय करेगा कि यह साझेदारी औपचारिकता बनकर रह जाएगी या भविष्य की दिशा तय करेगी।
यह वह क्षण है, जब राजनयिक औपचारिकताएँ पीछे हटती हैं और नीतियाँ बिना आवरण के बोलने लगती हैं।
गणतंत्र दिवस की परेड में जब सलामी की आवाज़ गूँजी और राजपथ पर यूरोपीय संघ के दो सर्वोच्च पदाधिकारी एक साथ खड़े दिखाई दिए, तो यह दृश्य केवल राजकीय शिष्टाचार का हिस्सा नहीं था। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा की संयुक्त मौजूदगी ने उस क्षण को एक साधारण समारोह से आगे ले जाकर राजनीतिक संकेतों के क्षेत्र में पहुँचा दिया। यह ऐसा दृश्य था जिसकी व्याख्या राष्ट्रीय ध्वज, संगीत और औपचारिक मुस्कानों से नहीं की जा सकती, क्योंकि इसके पीछे वह संदर्भ छिपा था जिसे कूटनीति में अक्सर बिना शब्दों के कहा जाता है।
यह वही समय था, जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में व्यापार, तकनीक और रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर असहजता साफ़ तौर पर महसूस की जा रही थी, और यह असहजता अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। ऐसे क्षण में यूरोप का संगठित, उच्चस्तरीय और प्रतीकात्मक भारत आगमन एक संदेश था, न कि संयोग। कूटनीति में संदेश अक्सर घोषणाओं से नहीं, बल्कि मंच, समय और उपस्थिति से दिए जाते हैं। राजपथ पर दिखाई दी यह सलामी भी उसी भाषा में कही गई बात थी, जो यह संकेत दे रही थी कि वैश्विक शक्ति संतुलन अब पुराने ढाँचों में सहज नहीं बैठ रहा।
बीस साल की बातचीत और छह महीने की तेज़ी
इस क्षण को समझने के लिए पीछे जाना ज़रूरी है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत लगभग दो दशक तक ठहरी रही। यह वही दौर था जब भारत बहुपक्षीय मुक्त व्यापार ढाँचों को लेकर लगातार सशंकित रहा, और अंततः RCEP (रीजनल कॉम्प्रिहेन्सिव इकनॉमिक पार्टनरशिप—एशिया प्रशांत देशों का प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता ) से बाहर निकलकर उसने यह स्पष्ट कर दिया कि वह बिना शर्त बाज़ार खोलने की नीति से पीछे हट चुका है। दूसरी ओर यूरोप भी चीन पर बढ़ती निर्भरता से असहज था और अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन की तलाश में था। इन दोनों चिंताओं ने धीरे–धीरे एक साझा धरातल तैयार किया, लेकिन यह धरातल अचानक सक्रिय हुआ, और यह अपने आप में एक राजनीतिक कहानी है।
पिछले कुछ महीनों में जिस तेज़ी से भारत और यूरोपीय संघ के बीच बातचीत ने गति पकड़ी, वह यह बताती है कि दोनों पक्ष अब प्रतीक्षा की स्थिति से बाहर आ चुके हैं। यह ‘छह महीने’ औपचारिक वार्ता की शुरुआत नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर निर्णायक सक्रियता के उभरने का कालखंड है। जिस समझौते को अब ’मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स’ कहा जा रहा है, वह केवल टैरिफ कटौती का दस्तावेज़ नहीं है। यह एक ऐसा ढाँचा है जिसमें यूरोप लगभग अपने पूरे व्यापारिक स्पेक्ट्रम को भारत के लिए खोल रहा है, और भारत यूरोपीय बाज़ार में दीर्घकालिक, नियम आधारित प्रवेश सुनिश्चित कर रहा है। इसका तात्कालिक प्रभाव भले ही सीमित दिखे, लेकिन इसका वास्तविक महत्व इस बात में है कि यह दोनों अर्थव्यवस्थाओं को एक–दूसरे की आपूर्ति श्रृंखला का स्थायी हिस्सा बनाता है।

व्यापार, सुरक्षा और एक नया सामरिक समीकरण
यूरोप के लिए भारत अब केवल एक उभरता हुआ बाज़ार नहीं है, बल्कि एक ऐसा विकल्प है जो चीन पर निर्भरता कम करने की उसकी रणनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। वहीं भारत के लिए यूरोपीय संघ का बाज़ार अमेरिकी अनिश्चितताओं के बीच स्थिरता और पूर्वानुमेयता प्रदान करता है। यह संयोग नहीं है कि यह समझौता ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका वैश्विक व्यापार को लेकर अधिक संरक्षणवादी रुख़ अपनाता दिख रहा है और तकनीकी क्षेत्र में अपने हितों को लेकर आक्रामक हो रहा है।
लेकिन यह पूरी कहानी सिर्फ़ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। इस व्यापार समझौते के साथ–साथ भारत और यूरोपीय संघ ने पहली बार औपचारिक रूप से सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर भी मुहर लगाई है। यह एक मौलिक बदलाव है। अब तक यूरोप स्वयं को मुख्यतः एक आर्थिक और मानक–निर्धारक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहा है, जबकि सुरक्षा के प्रश्नों पर उसकी भूमिका सीमित रही है। भारत के साथ इस साझेदारी के ज़रिये यूरोप यह संकेत दे रहा है कि वह हिंद प्रशांत क्षेत्र में केवल नैतिक उपदेश देने वाला दर्शक नहीं रहना चाहता।
समुद्री सुरक्षा, साइबर खतरे, आतंकवाद रोधी सहयोग और रक्षा उद्योग में संभावित साझेदारी जैसे विषय अब भारत–यूरोपीय संघ संबंधों का औपचारिक हिस्सा बन चुके हैं। इसका निहितार्थ यह है कि यूरोप भारत को एशिया में स्थिरता के एक स्तंभ के रूप में देख रहा है, और भारत यूरोप को केवल व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि रणनीतिक वार्ताकार के रूप में स्वीकार कर रहा है। यह साझेदारी किसी सैन्य गठबंधन की घोषणा नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से बताती है कि वैश्विक सुरक्षा ढाँचे में नए संवाद उभर रहे हैं।

समारोह से आगे, स्थायी साझेदारी की परीक्षा
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे दिलचस्प परत अमेरिका की पृष्ठभूमि में उभरती है। भारत और यूरोप दोनों ही इस बात को लेकर सतर्क हैं कि यह समीकरण किसी भी रूप में अमेरिका विरोधी न लगे। वास्तव में यह गठजोड़ विरोध की नहीं, संतुलन की राजनीति है। भारत यह दिखा रहा है कि वह किसी एक शक्ति पर निर्भर नहीं है, और यूरोप यह स्वीकार कर रहा है कि एशिया में उसकी भूमिका अमेरिका की छाया में सीमित नहीं रह सकती। यह बहुध्रुवीय विश्व की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है, न कि उसका घोषणापत्र।
घरेलू स्तर पर इस समझौते के प्रभाव समान रूप से सकारात्मक या सरल नहीं हैं। निर्यात उन्मुख राज्यों और उद्योगों में जहाँ उम्मीदें जगी हैं, वहीं कृषि, पर्यावरणीय मानकों और नियामकीय अनुपालन को लेकर आशंकाएँ भी मौजूद हैं। यूरोपीय संघ का कार्बन और वनों से जुड़ा नियामकीय ढाँचा आने वाले वर्षों में भारतीय उत्पादकों के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर सकता है। यह समझौता अवसरों के साथ साथ दबाव भी लाएगा, और यही इसकी वास्तविक परीक्षा होगी।
यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि यह समझौता अभी अंतिम मंज़िल नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया की शुरुआत है। यूरोप के भीतर अलग–अलग देशों की राजनीतिक संवेदनाएँ, उद्योगों के हित और पर्यावरणीय समूहों की आपत्तियाँ इस रास्ते को आसान नहीं रहने देंगी। भारत में भी जैसे जैसे इसके प्रभाव ज़मीनी स्तर पर दिखेंगे, वैसी वैसी राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ सामने आएँगी। इसीलिए इसे किसी त्वरित कूटनीतिक जीत के बजाय एक दीर्घकालिक पुनर्संरेखण के रूप में देखना अधिक यथार्थवादी होगा।
राजपथ पर गणतंत्र दिवस की परेड में दिखी वह सलामी दरअसल एक बदलते वैश्विक क्षितिज की ओर इशारा करती है। भारत और यूरोपीय संघ ने एक–दूसरे को किसी विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि आवश्यकता के रूप में चुना है। यह निर्णय न तो भावनात्मक है और न ही तात्कालिक। यह उस दुनिया की स्वीकृति है जो अब एक केंद्र के इर्द–गिर्द नहीं घूमती। यदि आने वाले वर्षों में यह साझेदारी काग़ज़ से निकलकर समुद्र, बाज़ार और नीति निर्माण की वास्तविक ज़मीन पर उतरती है, तो इतिहास शायद इस क्षण को केवल एक राजकीय समारोह के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में एक शांत लेकिन निर्णायक मोड़ के रूप में याद करेगा।









