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काग़ज़ों में कौशल, ज़मीनी हक़ीक़त में बेरोज़गारी

कौशल प्रशिक्षण और प्रमाणन के बढ़ते दावों के बीच रोज़गार की ज़मीनी वास्तविकता पर उठते सवाल। प्रतीकात्मक इमेज : खुली किताब
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Written by
–नीलेश कटारिया

CAG रिपोर्ट के आईने में PMKVY की पड़ताल…

अहमदाबाद, 13 जनवरी 2026 । भारत में कौशल विकास को पिछले एक दशक में बेरोज़गारी के सबसे भरोसेमंद समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह भरोसा केवल नीतिगत दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सार्वजनिक मंचों, सरकारी भाषणों और आँकड़ों के ज़रिये लगातार दोहराया गया कि प्रशिक्षण अपने आप रोज़गार में बदलेगा और प्रमाणपत्र भविष्य की सुरक्षा बन जाएगा। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) इसी विश्वास का सबसे बड़ा प्रतीक बनी—जहाँ प्रशिक्षण केंद्रों का विस्तार हुआ, लक्ष्य तय हुए और हर वर्ष करोड़ों प्रमाणपत्रों को “उपलब्धि” के रूप में पेश किया गया।

लेकिन जब इन उपलब्धियों को रोज़गार, आय और स्थिरता की कसौटी पर परखा गया, तो काग़ज़ी सफलता और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच एक गहरी खाई सामने आई। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट संख्या 20 ऑफ 2025 इसी खाई को औपचारिक भाषा में दर्ज करती है। रिपोर्ट के अनुसार 2015 से 2022 के बीच योजना के तीन चरणों में लगभग 14,449 करोड़ रुपए का बजट प्रस्तावित किया गया, जिसमें से 10,194 करोड़ रुपए जारी हुए और लगभग 9,261 करोड़ रुपए खर्च किए गए। इस अवधि में लगभग 1.10 करोड़ युवाओं को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए, जो तय लक्ष्य का लगभग 83% था।

काग़ज़ पर यह एक विशाल निवेश की कहानी प्रतीत होती है, लेकिन जब इन्हीं आँकड़ों को योजना के मूल उद्देश्य रोज़गार से जोड़ा जाता है, तो तस्वीर बदल जाती है। रिपोर्ट बताती है कि नए प्रशिक्षण और विशेष परियोजनाओं के अंतर्गत प्रमाणित युवाओं में से केवल लगभग 41% ही वास्तविक प्लेसमेंट तक पहुँच पाए। यह औसत अपने आप में चिंताजनक है, लेकिन राज्य स्तर पर जाते ही यह विफलता और तीखी दिखती है। बिहार जैसे बड़े राज्य में प्लेसमेंट दर लगभग 6% के आसपास पाई गई, जबकि ओडिशा में यह लगभग 11% के करीब रही। यही वह बिंदु है जहाँ कौशल विकास का दावा आँकड़ों से आगे बढ़कर सार्वजनिक कौशल-विश्वास की परीक्षा बन जाता है।

नीति की संरचना और मांग के बीच असंतुलन

CAG रिपोर्ट यह संकेत देती है कि समस्या केवल क्रियान्वयन तक सीमित नहीं थी। योजना की संरचना में ही एक मूलभूत असंतुलन मौजूद था। प्रशिक्षण का चयन देश में उपलब्ध वास्तविक कौशल मांग के अनुरूप नहीं किया गया। जिन क्षेत्रों में उद्योगों को श्रमिकों की आवश्यकता थी, वहाँ उस अनुपात में प्रशिक्षण नहीं पहुँचा। इसके विपरीत, कई ऐसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण चलता रहा जहाँ रोज़गार की संभावनाएँ पहले से सीमित थीं, और परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में युवा प्रमाणपत्र तो लेकर निकले लेकिन बाज़ार में उनके लिए अवसर सीमित रहे।

यहीं रिपोर्ट का एक तकनीकी लेकिन निर्णायक बिंदु सामने आता है। वर्षों से जिस राष्ट्रीय कौशल विकास योजना या रणनीति की बात की जाती रही, उसका व्यावहारिक रोडमैप प्रभावी रूप से तैयार नहीं था।

इस संदर्भ में रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि नीति स्तर पर पहचानी गई कौशल जरूरतों और वास्तविक प्रशिक्षण पैटर्न के बीच गंभीर अंतर रहा। इसी अंतर को रिपोर्ट ने NPSDE (National Policy on Skill Development and Entrepreneurship – राष्ट्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता नीति) के कौशल-फोकस और PMKVY के प्रशिक्षण चयन के बीच लगभग 40–60% तक के मिसमैच के रूप में दर्ज किया। इसका सार यही था कि जिन कौशलों की ज़रूरत सबसे अधिक थी, वहाँ प्रशिक्षण उस अनुपात में नहीं पहुँचा, और जिन कौशलों में प्रशिक्षण दिया गया, वहाँ काम के अवसर पर्याप्त नहीं थे।

इस असंतुलन का असर केवल आँकड़ों पर नहीं, बल्कि उस भरोसे पर पड़ता है जो प्रशिक्षण के बाद रोज़गार की उम्मीद से जुड़ा होता है; क्योंकि जब प्रशिक्षण और स्थानीय/क्षेत्रीय मांग के बीच मेल नहीं बैठता, तो “स्किल” का वादा धीरे-धीरे एक ऐसे दस्तावेज़ में बदल जाता है जो जीवन में बदलाव की गारंटी नहीं दे पाता।

डेटा, निगरानी और प्रमाणन में भरोसे की कमी

योजना का पूरा ढाँचा जिस डेटा प्रणाली पर आधारित था, वही प्रणाली भरोसेमंद नहीं पाई गई। लाभार्थियों, प्रशिक्षकों और मूल्यांकनकर्ताओं से जुड़ी प्रविष्टियों में डुप्लीकेशन, अधूरी जानकारी और अमान्य विवरण सामने आए। CAG रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया कि लाभार्थियों के रिकॉर्ड में ऐसे ई-मेल पते और बैंक विवरण दर्ज पाए गए, जो सत्यापन-योग्य/मान्य नहीं थे अथवा जिनमें असंगतियाँ पाई गईं, जिससे डेटा की विश्वसनीयता और सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

निगरानी की सबसे ठोस कसौटी प्रशिक्षण केंद्रों में उपस्थिति की व्यवस्था थी, और उपस्थिति दर्ज करने के लिए लागू की गई बायोमेट्रिक प्रणाली का प्रभावी संचालन केवल लगभग 13% केंद्रों में पाया गया।

इसका अर्थ यह हुआ कि अधिकांश केंद्रों में यह सुनिश्चित कर पाना कठिन था कि प्रशिक्षण वास्तव में हुआ या केवल काग़ज़ों में दर्ज किया गया। फीडबैक प्रणाली भी लगभग निष्क्रिय रही। एक प्रतिशत से भी कम लाभार्थियों की राय दर्ज की गई, जिससे सुधार की कोई ठोस आधारभूमि विकसित ही नहीं हो सकी।

जब किसी सार्वजनिक योजना में लाभार्थी की आवाज़ लगभग अनुपस्थित हो, तो योजना का मूल्यांकन भी अंततः “आंतरिक आँकड़ों” के सहारे चलता है और वही आँकड़े फिर सफलता का प्रमाण बनकर लौट आते हैं। इस परिदृश्य में तकनीक का उद्देश्य निगरानी बनना चाहिए था, लेकिन कमजोर क्रियान्वयन के कारण तकनीक कई जगह अपेक्षित निगरानी-भूमिका पूरी तरह निभा नहीं सकी, और यही वह बिंदु है जहाँ सिस्टम की विश्वसनीयता पर सबसे गहरा प्रश्न उठता है।

कन्वर्जेंस का अभाव, प्रमाणन की दरार और बिखरा हुआ कौशल-इकोसिस्टम

कौशल विकास के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती किसी एक योजना की नहीं, बल्कि उस व्यापक इकोसिस्टम की रही, जिसमें अनेक केंद्रीय और राज्य स्तरीय पहलें समानांतर रूप से चलती रहीं। CAG रिपोर्ट जिस विखंडन की ओर संकेत करती है, वह केवल प्रशासनिक समन्वय की कमी नहीं, बल्कि नीति के स्तर पर एकीकृत दृष्टि के अभाव को भी उजागर करता है। कौशल विकास से जुड़े लगभग बीस अन्य कार्यक्रमों और पहलों के साथ PMKVY का तालमेल प्रभावी ढंग से स्थापित नहीं हो सका। न तो डेटा साझा करने की ठोस व्यवस्था बनी और न ही यह सुनिश्चित किया गया कि अलग-अलग योजनाएँ एक-दूसरे के प्रयासों को पूरक बनाएं।

इस विखंडन का परिणाम यह हुआ कि संसाधनों का दोहराव बढ़ता गया और प्रभाव का फैलाव सीमित होता गया; “स्केल” का विस्तार हुआ, लेकिन “इम्पैक्ट” का नहीं। इसी बिखरे हुए ढाँचे के भीतर प्रमाणन की वह व्यवस्था विकसित हुई, जिसने CAG रिपोर्ट में सबसे गंभीर सवाल खड़े किए।

पूर्व अनुभव के आधार पर कौशल मान्यता की व्यवस्था, विशेष रूप से RPL-BICE (Recognition of Prior Learning – Batch/Industry/Cluster-based Evaluation) मॉडल को अनुभवी श्रमिकों के लिए एक अवसर के रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन CAG ऑडिट निष्कर्ष बताते हैं कि यही मॉडल प्रमाणन की विश्वसनीयता को सबसे अधिक नुकसान पहुँचा रहा था। डुप्लीकेट फोटो, एक ही व्यक्ति का अलग-अलग राज्यों में प्रमाणन और ऐसे नियोक्ता विवरण जिनका कर्मचारी से कोई स्पष्ट संबंध नहीं, इस बात के संकेत थे कि प्रमाणपत्रों का एक हिस्सा वास्तविक कौशल की पहचान करने के बजाय लक्ष्य पूर्ति की प्रक्रिया में बदल गया था।

ऑडिट निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि कुछ मामलों में प्रमाणन-प्रक्रिया की विश्वसनीयता/सत्यापन-ढाँचा कमजोर पाया गया, जिससे प्रमाणपत्रों के उद्देश्य-आधारित मूल्यांकन पर प्रश्न खड़े होते हैं।

जब प्रमाणन की स्वतंत्र पुष्टि ही कठिन हो जाए, तब सर्टिफिकेट “स्किल” का प्रमाण कम और “सिस्टम की स्वीकृति” अधिक बन जाता है; और इसी बिंदु पर नीति का उद्देश्य रोज़गार और जीवन-स्तर में सुधार पृष्ठभूमि में चला जाता है, जबकि प्रमाणन स्वयं एक अंत बन जाता है।

सार्वजनिक धन, अधूरा प्रतिफल और वित्तीय अनुशासन का प्रश्न

वित्तीय प्रबंधन की तस्वीर भी उसी असंतुलन को दर्शाती है, जो पूरी योजना के क्रियान्वयन में दिखाई देता है। राज्यों को जारी की गई राशि का एक बड़ा हिस्सा उपयोग में नहीं आ सका और लगभग 277 करोड़ रुपए लंबे समय तक बिना खर्च के पड़े रहे। इसके समानांतर, CAG रिपोर्ट यह भी दर्ज करती है कि 34 लाख प्रमाणित युवाओं को तय 500 रुपए की प्रोत्साहन राशि नहीं मिल सकी, क्योंकि उनके बैंक या पहचान से जुड़े विवरण प्रणाली में सही ढंग से दर्ज नहीं थे। यह स्थिति केवल डेटा-एंट्री की त्रुटि नहीं थी, बल्कि उस बुनियादी व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करती है, जिसके सहारे सार्वजनिक धन अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने वाला था।

रिपोर्ट में एक अन्य वित्तीय संकेत भी उल्लेखित है, जहाँ क्रियान्वयन एजेंसी स्तर पर कुछ दावों/चार्जिंग को लेकर प्रश्न उठे, जिनमें लगभग 24 करोड़ रुपए के अतिरिक्त चार्ज के दावे जैसी टिप्पणियाँ शामिल रहीं। इन बिंदुओं का अर्थ किसी पर आरोप लगाना नहीं है, बल्कि यह बताना है कि जब डेटा और निगरानी कमजोर हो, तब वित्तीय अनुशासन भी उसी कमजोर ढाँचे में काम करता है और सार्वजनिक धन का मूल्यांकन केवल खर्च तक सीमित होने लगता है। सार्वजनिक धन खर्च हुआ, प्रमाणपत्र वितरित हुए, लेकिन लाभ का प्रवाह अधूरा रहा—और ऐसे में यह प्रश्न केवल लेखा-जोखा तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक विश्वास से जुड़ जाता है।

सुधारों का दावा और ज़मीन की परीक्षा

CAG रिपोर्ट के बाद सरकार ने यह कहा कि महामारी के दौरान योजना के क्रियान्वयन पर असर पड़ा और बाद के चरणों में तकनीकी सुधार किए गए हैं। आधार आधारित पहचान, नए डिजिटल पोर्टल और निगरानी व्यवस्था के विस्तार जैसे कदम काग़ज़ पर सही दिशा में प्रतीत होते हैं। पूर्व कौशल मान्यता के जिस मॉडल पर सबसे अधिक प्रश्न उठे, उसे बंद करने और वास्तविक समय निगरानी को मजबूत करने जैसे संकेत भी इसी श्रेणी में आते हैं। लेकिन रिपोर्ट यह भी दर्ज करती है कि जिन वर्षों में सबसे अधिक धन और संसाधन लगाए गए, उन्हीं वर्षों में परिणामों की गुणवत्ता सबसे कमजोर रही।

इसलिए यह प्रश्न अब भी खुला है कि सुधारों का मूल्यांकन केवल डैशबोर्ड पर दिखने वाले आँकड़ों से होगा या उसके वास्तविक ज़मीनी प्रभाव से। क्या यह देखा जाएगा कि प्रशिक्षण के बाद युवाओं को स्थायी रोज़गार मिला या नहीं, उनकी आय में निरंतरता आई या नहीं, और क्या वे कुछ वर्षों बाद भी उसी कौशल के सहारे अपना जीवन आगे बढ़ा पा रहे हैं। कौशल विकास की सफलता केवल इस बात से तय नहीं हो सकती कि डेटा कितनी तेजी से अपलोड हो रहा है; सफलता का अर्थ यह है कि उस डेटा के पीछे जीवन में कोई टिकाऊ बदलाव मौजूद है—और वही बदलाव नीति की असली परीक्षा होता है।

प्रमाणित, प्रशिक्षित और फिर भी अनिश्चित

प्रमाणपत्र किसी युवा के लिए केवल काग़ज़ नहीं होता। वह समय, उम्मीद और भविष्य का संकेत होता है। लेकिन CAG रिपोर्ट में दर्ज तस्वीर बताती है कि प्रमाणपत्रों की संख्या बढ़ी, युवाओं की स्थिरता नहीं। जिन युवाओं को प्लेसमेंट मिला भी, उसके टिकाऊपन, अवधि और आय स्थिरता पर पर्याप्त स्पष्टता नहीं मिलती। इसका अर्थ यह है कि प्लेसमेंट के आँकड़े भी अक्सर अधूरी कहानी हो सकते हैं। खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवाओं के लिए यह असंतुलन गहरा हो जाता है, क्योंकि प्रशिक्षण कई बार ऐसे सेक्टरों में हुआ जहाँ स्थानीय स्तर पर उद्योग की वास्तविक मौजूदगी सीमित थी।

ऐसे में प्रमाणित युवा या तो पलायन के लिए मजबूर होता है या फिर उसी अनौपचारिक काम में लौट जाता है, जिससे वह प्रशिक्षण से पहले जुड़ा हुआ था। रिपोर्ट में यह संकेत भी उभरता है कि बड़ी संख्या में युवाओं को योजना की जानकारी अनौपचारिक माध्यमों से मिली, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि योजना का लाभ-प्रवाह पूरी तरह संस्थागत चैनलों से नहीं चला। जब लाभार्थी की राय और अनुभव को नीति-चक्र के केंद्र में नहीं रखा जाता, तब युवा नीति का सहभागी नहीं, लक्ष्य पूरा करने की इकाई बनकर रह जाता है—और यही वह बिंदु है जहाँ कौशल विकास और जीवन की वास्तविकता अलग हो जाती है।

जवाबदेही की धुंधली रेखा और शासन की परीक्षा

इस CAG रिपोर्ट में “भ्रष्टाचार” शब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया गया है। लेकिन दर्ज निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि योजना का क्रियान्वयन ऐसे हालात में हुआ, जहाँ अनियमितताओं को रोकने की बुनियादी व्यवस्थाएँ प्रभावी नहीं थीं। डेटा कई मामलों में अविश्वसनीय पाया गया, निगरानी और सत्यापन की प्रणालियाँ व्यापक स्तर पर निष्क्रिय रहीं और कुछ मॉड्यूल्स में ऐसे प्रमाणन दर्ज हुए जिनकी स्वतंत्र पुष्टि संभव नहीं थी। यह स्थिति प्रशासनिक अक्षमता और संभावित अनियमितताओं के बीच की उस धुंधली रेखा को रेखांकित करती है, जिसकी स्पष्टता केवल आगे की विभागीय अथवा वैधानिक जाँच से ही संभव है।

ऐसी स्थिति में यह जिम्मेदारी सरकार और संबंधित मंत्रालय पर आती है कि वह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट को मात्र औपचारिक दस्तावेज़ मानकर न छोड़े, बल्कि आवश्यक विभागीय और वैधानिक जाँच की पहल करे, ताकि सार्वजनिक धन के उपयोग पर उठे प्रश्न अनुत्तरित न रहें। क्योंकि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट केवल अतीत की कमियों का दस्तावेज़ नहीं होती, वह शासन के लिए आगे की दिशा तय करने का संवैधानिक संकेत भी होती है। यदि ऐसे संकेतों के बाद भी स्पष्ट कार्ययोजना सामने नहीं आती, तो जवाबदेही की वह कड़ी टूट जाती है जो सार्वजनिक धन और सार्वजनिक विश्वास को जोड़ती है।

प्रमाणन से आगे नीति की ज़रूरत

यह CAG रिपोर्ट किसी एक योजना को असफल घोषित नहीं करती। यह उस सोच पर प्रश्न उठाती है जिसमें नीति की सफलता को प्रमाणपत्रों की संख्या से आँका जाता है, न कि रोज़गार की गुणवत्ता और स्थिरता से। कौशल विकास का वास्तविक अर्थ केवल आँकड़ों में वृद्धि नहीं है। उसका अर्थ यह है कि प्रशिक्षण के बाद एक युवा अपने जीवन में आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक सम्मान महसूस कर सके।

जब नीति की सफलता को प्रमाणपत्रों से मापा जाए और उसके बाद जीवन में आए बदलाव को न देखा जाए, तो असफलता आँकड़ों में नहीं, बल्कि चुप्पी में दर्ज होती है। कौशल विकास की विश्वसनीयता अंततः इसी बात पर निर्भर करती है कि उठे हुए प्रश्नों का सामना पारदर्शिता और निर्णायक कार्रवाई से किया जाए, न कि उन्हें समय के साथ धुंधला होने दिया जाए। यदि स्किल केवल सर्टिफिकेट बन गई, तो युवा केवल आँकड़ा बनकर रह जाएगा।

क्या आपको लगता है कि तकनीकी चेतावनियों को बार-बार नजरअंदाज करना प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण है?

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