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पुतिन यात्रा: भारत ने क्या खोया, क्या पाया और दुनिया ने क्या पढ़ा?

औपचारिक मुस्कान के पीछे दोनों देशों की अलग-अलग ज़रूरतें और दबाव थे। रूस अपने अलगाव को तोड़ने की कोशिश में, और भारत बदलती दुनिया में अपनी रणनीतिक जगह मज़बूत करने की राह पर। फोटो साभार : ANI
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Written by
–नीलेश कटारिया

दिल्ली में हुई मोदी–पुतिन मुलाक़ात ने दिखाया कि दोनों नेता अपनी-अपनी घरेलू चुनौतियों और वैश्विक दबावों के बीच नए सहारे तलाश रहे हैं। रूस प्रतिबंधों और अलगाव से निकलने का मार्ग खोज रहा है, जबकि भारत ऊर्जा, सुरक्षा और सामरिक संतुलन को मज़बूती देने में जुटा है। अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा और यूरोप की असहजता के बीच, यह यात्रा दोनों देशों के लिए अवसर और जोखिम साथ लेकर आई। कागज़ी करारों से परे, असली संकेत उस बदलती कूटनीतिक भाषा में छिपे हैं, जिसे दुनिया ने इस मुलाक़ात के हर फ्रेम में पढ़ा। यह मुलाक़ात न रूस की जीत थी, न भारत की; यह उस बहुध्रुवीय विश्व की झलक थी, जहाँ हर राष्ट्र अपने लिए नई जगह गढ़ रहा है।


अहमदाबाद, 6 दिसंबर 2025। दिल्ली की पाँच दिसंबर की ठिठुरती सुबह में राष्ट्रपति भवन की प्राचीन सीढ़ियों पर व्लादिमीर पुतिन के कदमों की ध्वनि जितनी स्पष्ट थी, उससे कहीं अधिक स्पष्ट वह बदलाव था जिसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह दृश्य केवल एक औपचारिक स्वागत का हिस्सा नहीं था। यह उस अंतरराष्ट्रीय भूचाल की पहली कंपन थी, जिसमें पुरानी शक्तियाँ अपने स्थान तलाश रही हैं और नई शक्तियाँ अपनी भूमिका परिभाषित कर रही हैं।

भारत इस बदलते परिदृश्य में अब निरीक्षक की तरह नहीं, बल्कि एक रूपाकार की तरह खड़ा है, ऐसा रूपाकार जिसकी प्रत्येक कूटनीतिक हरकत वैश्विक संतुलन की दिशा बदल सकती है। पुतिन की यह यात्रा उसी संक्रमणकाल की कहानी कहती है। एक ओर रूस प्रतिबंधों, युद्ध और पश्चिमी अलगाव के बीच नए सहारों की तलाश में है; दूसरी ओर भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा, सामरिक स्वायत्तता और आर्थिक विकल्पों को पहले से कहीं अधिक दृढ़ता से गढ़ रहा है।

लोक कल्याण मार्ग की इस खामोश कार में शब्द नहीं थे, पर संकेत बहुत थे। भाषा अलग थी, पर कूटनीति एक ही फ़्रेम में दर्ज हो गई। फोटो साभार : @narendramodi / X

संकेतों की राजनीति : लोक कल्याण मार्ग की वह कार

चार दिसंबर की शाम जब एयरपोर्ट की रोशनी के बीच नरेंद्र मोदी और व्लादिमीर पुतिन एक ही कार में लोक कल्याण मार्ग की ओर निकलते दिखे, तो वह दृश्य केवल औपचारिकता की एक पंक्ति नहीं था। वह उस गहरी, अनकही कूटनीति का संकेत था, जिसमें रिश्ते कागज़ी करारों से नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास की लंबी नदी से बनते हैं, चाहे समय के थपेड़ों ने उसके किनारों पर कितनी ही नई परतें क्यों न चढ़ा दी हों।

भारत–रूस संबंधों की व्याख्या वर्षों से इसी संकेत–व्यवस्था में होती रही है। परसों का यह दृश्य भी उसी परंपरा की पुनर्स्थापना था, जिसने दुनिया को यह बताने में एक क्षण भी नहीं लगाया कि भू-राजनीति बदल सकती है, पर कुछ रिश्तों की मूल प्रकृति नहीं बदलती

यही वह बिंदु है, जहाँ इस यात्रा को सिर्फ़ प्रेस नोट्स, करारों या संयुक्त बयान की सीमित चौखट में नहीं पढ़ा जा सकता। असली कहानी उन संदर्भों में उभरती है, जिन्हें विश्व के विश्लेषक आज अमेरिका–चीन प्रतिद्वंद्विता, यूरोप की बेचैनी, रूस–चीन समीकरण और वैश्विक दक्षिण की नई भू-राजनीतिक आकांक्षाओं के बीच पढ़ रहे हैं।

रूस इस समय प्रतिबंधों, यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी अलगाव की सबसे कठिन घड़ी से गुजर रहा है। अमेरिका रूस पर आर्थिक और वित्तीय प्रतिबंधों की आख़िरी सीमा तक पहुँच चुका है। नाटो रूस को सैन्य, भू-रणनीतिक और राजनयिक रूप से घेरने की योजना पर है। चीन रूस का सबसे बड़ा सहारा तो है, पर वही निर्भरता क्रेमलिन के लिए दीर्घकालिक असंतुलन का डर भी पैदा करती है।

ऐसे माहौल में भारत पुतिन के लिए केवल एक साझेदार नहीं, एक सुरक्षित मंच भी है, पुल भी है, और विकल्प भी।

यही वजह है कि भारत–रूस की यह मुलाक़ात औपचारिकता से दूर, संकेतों की राजनीति के उस पुराने ढाँचे को पुनर्जीवित करती है, जहाँ प्रतीकात्मक संकेत शब्दों से बड़े हो जाते हैं।

दूसरी ओर भारत के लिए यह क्षण अवसर और जोखिम, दोनों का संगम है। भारत आज ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक विकल्पों के उस दौर में प्रवेश कर चुका है, जहाँ हर कूटनीतिक कदम वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

यही इस यात्रा का निर्णायक अर्थ है कि भारत ने क्या पाया, और उससे भी महत्वपूर्ण, उसने क्या दाँव पर लगाया।

इस प्रश्न का उत्तर पूरे लेख में आगे खुलता है, पर उसकी शुरुआत इसी कार के भीतर मौजूद उस मौन संदेश से होती है, जिसने भारत की विदेश नीति को एक बार फिर दुनिया के केंद्र में ला खड़ा किया।

जिन सहज मुस्कुराहटों को दिल्ली ने कूटनीतिक आत्मविश्वास कहा, पश्चिमी मीडिया ने उन्हें भारत–रूस समीकरण की बेचैनी बढ़ाने वाला संकेत माना।
फोटो साभार : @narendramodi / X

पश्चिम की बेचैनी : मीडिया की नज़रों से दिखता भारत–रूस समीकरण

पश्चिमी मीडिया ने इस यात्रा को उसी भाषा में पढ़ा, जिसे भू–राजनीतिक बेचैनी कहा जा सकता है। वॉशिंगटन पोस्ट, पॉलिटिको और फॉरेन अफेयर्स जैसे मंच बार–बार लिख रहे हैं कि आज रूस जिस एक बड़े शक्ति–केन्द्र पर भरोसा कर सकता है, वह भारत है, और यही बात पश्चिम के लिए असहज सच्चाई बन रही है।

यह बेचैनी अचानक पैदा नहीं हुई। इसके बीच में भारत की वही रणनीतिक स्वायत्तता खड़ी है, जिसने पुतिन की इस यात्रा को “एक और द्विपक्षीय मुलाक़ात” के दायरे से बाहर निकालकर एक बड़े संदेश में बदल दिया है।

औपचारिक मुस्कानें अपनी जगह, पर मेज़ पर रखे दस्तावेज़ भारत–रूस व्यापार की असली कहानी कह रहे थे। सस्ता तेल तो मिला, लेकिन व्यापार घाटा और अधूरे करार अब भी सबसे बड़ा सवाल बने हुए हैं। फोटो साभार : @narendramodi / X

व्यापार की असल तस्वीर : सस्ता तेल, बढ़ता घाटा और कागज़ पर पड़े करार

व्यापार के स्तर पर देखें तो पिछले दस वर्षों में भारत–रूस व्यापार लगभग पाँच गुना बढ़ा है। सस्ते रूसी तेल ने पिछले तीन साल में इस ग्राफ़ को अचानक ऊपर धकेला, और 2023–24 में यह व्यापार पचास से सत्तर अरब डॉलर की सीमा तक पहुँच गया। यह उछाल संतुलित नहीं था।

भारत की आयात–टोकरी में कच्चा तेल और उर्वरक भारी रहे, जबकि भारतीय निर्यात का दायरा सीमित ही रहा। परिणाम साफ था। व्यापार की तराजू तेजी से रूस के पक्ष में झुक गई। इसी पृष्ठभूमि में इस यात्रा के बाद जारी साझा घोषणाओं में ऊर्जा, परमाणु सहयोग, व्यापार, भुगतान तंत्र, तकनीकी साझेदारी और औद्योगिक सहयोग से जुड़े लगभग बीस दस्तावेज़ों का उल्लेख हुआ। जिनमें सरकार–से–सरकार हुए करारों के साथ-साथ कंपनियों और उद्योगों के बीच हुए कई व्यापारिक समझौते भी शामिल थे।

कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति, कुडनकुलम परमाणु परियोजना के अगले चरणों पर प्रगति, द्विपक्षीय व्यापार को सौ अरब डॉलर की सीमा तक ले जाने का लक्ष्य, और स्थानीय मुद्राओं व डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आधारित वैकल्पिक भुगतान तंत्र पर काम तेज़ करने की सहमति – यही वह बिंदु हैं, जिन्हें भारत और रूस दोनों “यात्रा की ठोस उपलब्धियाँ” के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। पर सवाल वहीं से शुरू होता है, जहाँ सरकारी प्रेस नोट खत्म होते हैं।

पिछले एक दशक में रूस के साथ चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारा, अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन कॉरिडोर, और रुपये–रूबल आधारित स्थायी भुगतान प्रणाली जैसी कई महत्वाकांक्षी योजनाएँ बार–बार घोषित हुईं, पर ज़मीन पर इनकी गति हमेशा घोषणाओं से धीमी रही।

इस बार भी जब सौ अरब डॉलर के व्यापार, नए कॉरिडोर और वैकल्पिक भुगतान तंत्र की बात दोहराई गई, तो विशेषज्ञों के बीच स्वाभाविक प्रश्न उठा कि पाँच से दस वर्ष के भीतर इनमें से कितनी परियोजनाएँ सच में मूर्त रूप लेंगी, और कितनी पुराने एमओयू की तरह फ़ाइलों और बयानबाज़ी में ही सीमित रह जाएँगी।

दक्षिण ब्लॉक के सामने लिए गए इस औपचारिक हैंडशेक को उस क्षण का प्रतीक माना गया जहाँ भारत-रूस साझेदारी ट्रंप प्रशासन के बढ़ते टैरिफ दबावों के बीच भी अपनी स्वायत्त रणनीतिक दिशा पर कायम दिखी। फोटो साभार: @narendramodi/X

अमेरिकी दबाव की परत : ट्रंप टैरिफ और रणनीतिक असहमति

यात्रा का एक और परिप्रेक्ष्य अमेरिका–भारत तनाव से जुड़ा है। ट्रंप प्रशासन अपने दूसरे कार्यकाल में भारत पर ऊँचे टैरिफ लगा चुका है, जिनमें कुछ क्षेत्रों में आयात शुल्क पचास प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया।

अमेरिकी मीडिया और नीति–बहस इसे रूस से सस्ते तेल ख़रीद और दोनों देशों के बीच व्यापारिक असंतुलन पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में पढ़ रही है। यह केवल आर्थिक विवाद नहीं, बल्कि वही तरीक़ा है, जो पहले चीन के खिलाफ़ इस्तेमाल हुआ था।

ऐसे माहौल में पुतिन की दिल्ली यात्रा, और उसके बीच रूस से ऊर्जा एवं रक्षा सहयोग को और मज़बूत बनाने की घोषणा, वाशिंगटन में स्वाभाविक रूप से एक “रणनीतिक असहमति” के संकेत के रूप में देखी जा रही है।

यहीं भारत ने अपनी विदेश नीति के मूल सिद्धांत को खुलकर सामने रखा। पुतिन के साथ खुले मंच साझा करना, दीर्घकालिक तेल आपूर्ति की पुनः पुष्टि करना, रक्षा उत्पादन के स्थानीयकरण पर ज़ोर देना और भुगतान तंत्र में डॉलर से परे रास्ते तलाशना। यह सब मिलकर यह संदेश देते हैं कि भारत अपनी भू–राजनीतिक प्राथमिकताओं को किसी एक धुरी की पसंद–नापसंद के अनुसार नहीं, बल्कि अपने आर्थिक और सामरिक हितों के अनुसार तय करेगा।

यह वही क्षण है, जहाँ “रणनीतिक स्वायत्तता” किताबों के शब्द से आगे बढ़कर नीति–स्तर पर दिखने लगती है।

राष्ट्रपति भवन का स्टेट बैंक्वेट—एक ओर रूस के राष्ट्रपति और भारतीय नेतृत्व, दूसरी ओर लोकतांत्रिक व्यवस्था की वह अनुपस्थिति, जो वहाँ न होते हुए भी अपने प्रश्नों से उपस्थित थी। फोटो साभार : @ShashiTharoor / X

लोकतांत्रिक संकेत : राष्ट्रपति भवन और नेता प्रतिपक्ष की खाली जगह

लेकिन कूटनीति केवल कागज़ पर दर्ज समझौतों से नहीं बनती। वह उन संकेतों से भी बनती है, जिन्हें कैमरे पकड़ लेते हैं और जिन्हें नज़रें याद रखती हैं। ऐसा ही एक संकेत था राष्ट्रपति भवन के राजकीय स्वागत समारोह में नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति का।

नेता प्रतिपक्ष को राष्ट्रपति भवन के स्वागत समारोह में बुलाना न तो संवैधानिक अनिवार्यता है, न विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रोटोकॉल की लिखित शर्त। फिर भी नरसिंहा राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के काल से यह एक ऐसी परंपरा बन चुकी थी, जिसे भारतीय विदेश नीति की लोकतांत्रिक रीढ़ के रूप में देखा जाता रहा।

यह परंपरा दुनिया को यह संदेश देती रही है कि भारत की विदेश नीति किसी एक सरकार के कार्यकाल से बंधी नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की बहुदलीय सहमति से संचालित होती है। इस पृष्ठभूमि में पुतिन के स्वागत समारोह में विपक्षी नेतृत्व का न दिखना कोई साधारण सूची–विभ्रम नहीं था।

यह उस मौन परिवर्तन का संकेत था, जिसमें विदेश नीति का मंच बहुस्वर से हटकर अधिक केंद्रीकृत, नेतृत्व–प्रधान रूप लेता दिख रहा है। निर्णय प्रशासनिक था या राजनीतिक, यह बहस अलग है; पर इतना स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इसे केवल “प्रोटोकॉल की तकनीकी बात” नहीं समझ रहे, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक बहुलता और उसकी कूटनीति के रिश्ते के संदर्भ में पढ़ रहे हैं।

श्रीमद्‍भगवद्गीता की प्रति सौंपते हुए प्रधानमंत्री मोदी—एक ऐसा क्षण, जिसमें कूटनीति प्रतीक बनकर सामने आती है। प्रतिबंधों और वैश्विक अलगाव के बीच रूस के लिए भारत की आवश्यकता और इस साझेदारी की सांस्कृतिक-रणनीतिक परतें स्पष्ट दिखाई देती हैं। फोटो साभार : @narendramodi / X

रूस का नज़रिया : अलगाव, प्रतिबंध और भारत की ज़रूरत

दूसरी ओर रूस के दृष्टिकोण से देखें तो इस यात्रा का मक़सद उतना ही घरेलू था, जितना अंतरराष्ट्रीय। क्रेमलिन ने भारत को बार–बार “सबसे विश्वसनीय साझेदारों में से एक” कहा, और रूसी मीडिया ने इस यात्रा को यह प्रमाणित करने के अवसर के रूप में प्रस्तुत किया कि रूस न तो पूरी तरह अलग–थलग है, न पूरी तरह चीन पर निर्भर।

रूस के लिए एशिया की ओर रुख केवल विकल्प नहीं, अब रणनीतिक अनिवार्यता है। यूरोप के बाज़ार बंद हैं, प्रतिबंधों ने वित्तीय गलियारों को संकीर्ण कर दिया है और चीन पर अत्यधिक निर्भरता लंबे समय में असंतुलन पैदा कर सकती है। ऐसे माहौल में भारत उसके लिए वह साझेदार है, जो न तो पश्चिम के साथ रिश्तों को तोड़कर आता है और न ही किसी दूसरे ध्रुव का जूनियर पार्टनर बनकर।

औपचारिक वार्ता की यह दूरी, न ज़्यादा निकट, न ज़्यादा दूर। रूस–चीन–भारत त्रिकोण की वही कूटनीतिक सतर्कता दिखाती है, जहाँ संतुलन ही रणनीति है। फोटो साभार : @narendramodi / X

रूस–चीन–भारत त्रिकोण: निकटता और दूरी का संतुलन

चीन की प्रतिक्रिया इस त्रिकोण की जटिलता को और स्पष्ट करती है। आधिकारिक बयानों में संयम है, लेकिन चीनी विश्लेषकों ने साफ़ लिखा कि पुतिन की भारत–यात्रा यह दिखाती है कि रूस के पास बीजिंग से बाहर भी भू–राजनीतिक विकल्प हैं।

भारत के लिए चुनौती उलटी दिशा में है। रूस–चीन समीकरण आज पहले से कहीं अधिक घनिष्ठ है, और रूस की अर्थव्यवस्था युद्ध के बाद के दौर में चीन पर अभूतपूर्व निर्भरता की ओर बढ़ी है। ऐसे में भारत को यह सुनिश्चित करना है कि रूस के साथ उसकी निकटता उसे किसी तैयारशुदा बीजिंग–मॉस्को धुरी में कैद न कर दे।

यहीं भारत की रक्षा नीति का दूसरा स्तंभ उभरता है। रूस आज भी भारत के सबसे बड़े रक्षा साझेदारों में शामिल है, पर पिछले एक दशक में अमेरिका, फ्रांस और इज़राइल से खरीद, स्वदेशी उत्पादन और संयुक्त उद्यमों ने भारत के रक्षा पोर्टफोलियो को विविध बनाना शुरू कर दिया है।

भारत की सोची–समझी रणनीति यह है कि वह रूसी प्लेटफॉर्म पर निर्भर रहते हुए भी धीरे–धीरे “एकल–स्रोत निर्भरता” से बाहर निकले। पुतिन की यात्रा इस सच्चाई को नहीं बदलती, बल्कि इसे संतुलन के नए रूप में सामने रखती है। रूस महत्त्वपूर्ण है, पर अकेला नहीं; भारत साझेदारी चाहता है, पर अधीनता नहीं।

यूरोप जहाँ रूस को अलगाव और प्रतिबंधों के घेरे में देखता है, वहीं वैश्विक दक्षिण जिसका प्रतिनिधित्व यहाँ भारत करता है उसे पूर्ण राजकीय सम्मान देता है। गार्ड ऑफ ऑनर का यह क्षण बताता है कि दुनिया रूस को दो बिल्कुल अलग नज़रियों से पढ़ रही है। फोटो साभार: @narendramodi / X

यूरोप और वैश्विक दक्षिण : दो विपरीत पाठ

यूरोप का दृष्टिकोण अलग तर्ज पर आलोचनात्मक है। ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के प्रमुख अखबारों ने संपादकीयों में यह सवाल उठाया कि जब यूरोप यूक्रेन युद्ध की कीमत आर्थिक रूप से चुका रहा है, तब भारत का रूस के साथ संबंध मजबूत करना यूरोप की जनता के लिए क्या संकेत देता है।

कुछ यूरोपीय राजनयिकों ने संयुक्त आलेखों में यह तक लिखा कि भारत को इस यात्रा पर पुनर्विचार करना चाहिए था, क्योंकि यह रूस को “नैतिक वैधता” प्रदान करती है जबकि यूरोप प्रतिबंधों की नीति पर स्थिर है।

इसके ठीक उलट, वैश्विक दक्षिण का बड़ा हिस्सा इस यात्रा को अलग नज़र से देखता है। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के कई विश्लेषकों के लिए पुतिन की दिल्ली यात्रा उस उभरती बहुध्रुवीयता का संकेत है, जिसमें ऊर्जा, रक्षा और भुगतान तंत्र के क्षेत्र में पश्चिम से स्वतंत्र रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

चीन और कई विकासशील देशों के विशेषज्ञ इसे उस प्रक्रिया का हिस्सा मान रहे हैं, जिसमें दुनिया का एक हिस्सा डॉलर–केंद्रित वित्तीय ढांचे से परे वैकल्पिक तंत्र खड़ा करने की कोशिश कर रहा है।

हैदराबाद हाउस की औपचारिकता में दर्ज यह क्षण — जहाँ कूटनीति मुस्कुराहटों में नहीं, बल्कि संतुलन की महीन रेखाओं में पढ़ी जाती है। भारत-रूस संवाद की यही तस्वीर बताती है कि वैश्विक तनावों के बीच भी रिश्तों की भाषा धैर्य और संवाद से लिखी जाती है। फोटो साभार : @narendramodi / X

आम भारतीय के लिए अर्थ : तेल, महँगाई और चुपचाप मिलता आर्थिक कुशन

अब बात आम भारतीय की। इस यात्रा का अर्थ आम नागरिक के लिए केवल भू–राजनीति तक सीमित नहीं रह जाता। पिछले दो वर्षों में सस्ते रूसी तेल ने भारत के चालू खाते और घरेलू महँगाई, दोनों को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

यदि यह ऊर्जा साझेदारी अगले दशक तक स्थिर रहती है, तो इसका लाभ उद्योग, परिवहन, खाद्य कीमतों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी तक धीरे–धीरे पहुँचता रहेगा। यही वह क्षण है, जहाँ कूटनीति चुपचाप आर्थिक राहत में बदल जाती है, बिना बड़े नारों के, पर बेहद निर्णायक तरीके से।

रूसी विमान के साये में लाल कालीन पर दर्ज यह क्षण केवल स्वागत भर नहीं था। यात्रा की शुरुआत ही उस कूटनीतिक संतुलन को दिखा रही थी, जहाँ अवसर और जोखिम एक ही फ्रेम में साथ चलते हैं। फोटो साभार : @narendramodi /X

लाभ, जोखिम और महीन रेखा पर चलता भारत

फिर भी लाभ के साथ जोखिम भी जुड़े हैं। ट्रंप प्रशासन के बढ़ते टैरिफ, यूरोप की असहमति और यूक्रेन विवाद पर पश्चिम की संवेदनशीलता के बीच भारत पर यह दबाव भी बढ़ सकता है कि वह वैश्विक मंचों पर रूस का कितना समर्थन करे और किस हद तक उसके पक्ष में खड़ा दिखे, बिना अमेरिका और यूरोप के साथ बने संतुलन को बिगाड़े। यही वह नाज़ुक रेखा है, जिस पर भारत को आने वाले वर्षों तक लगातार चलना होगा।

यदि अमेरिका भारत को “रूस के लिए आर्थिक सहारा” की तरह देखने लगा, तो इसका प्रभाव क्वाड, इंडो–पैसिफिक रणनीति, हाई–टेक सहयोग और भविष्य के व्यापारिक समझौतों पर पड़ सकता है। चुनौती यह होगी कि भारत रूस के साथ अपनी साझेदारी भी बनाए रखे और अमेरिका–यूरोप के साथ रणनीतिक संवाद भी बिना अतिरिक्त तनाव के आगे बढ़ाता रहे।

यही वह महीन रेखा है जिस पर भारत को अगले पाँच से दस वर्षों तक अत्यंत सावधानी और संतुलन के साथ कदम बढ़ाने होंगे।

इन सारी परतों को साथ रखें तो पुतिन की भारत यात्रा का कूटनीतिक और आर्थिक गणित साफ़ उभर आता है। भारत ने तुरंत प्रभाव से ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया, रक्षा सहयोग की निरंतरता सुनिश्चित की, रूस–चीन धुरी पर अपना संतुलन बनाए रखा और सबसे महत्वपूर्ण यह कि अमेरिका के बढ़ते दबाव के बीच भी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बिना हिचक प्रदर्शित किया।

उसने यह भी हासिल किया कि वैश्विक दक्षिण की नज़र में वह एक ऐसे देश के रूप में स्थापित हो, जो केवल पश्चिमी ढांचे के भीतर नहीं, बल्कि उससे बाहर भी संवाद कर सकता है। बदले में भारत ने यह जोखिम लिया कि अमेरिका और यूरोप के साथ उसके व्यापारिक और रणनीतिक रिश्तों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है, और रूस पर उसकी आर्थिक निर्भरता कुछ क्षेत्रों में और गहरी हो सकती है।

रूस ने इस यात्रा से एक मित्रवत राजनीतिक मंच, दीर्घकालिक ऊर्जा ग्राहक और यह संदेश पाया कि वह केवल चीन के सहारे पर खड़ा नहीं है। अमेरिका ने यह सबक़ मजबूरी में लिया कि भारत अब वाशिंगटन और बीजिंग के बीच झूलने वाला देश नहीं, बल्कि अपनी कूटनीतिक रेखा स्वयं तय करने वाला देश है।

और यूरोप ने यह देखा कि प्रतिबंधों की राजनीति हर जगह उसी अर्थ में नहीं पढ़ी जाती, जिस अर्थ में ब्रसेल्स (यूरोपीय संघ का नेतृत्व) उसे बनाना चाहता है।

भव्य सजे कक्ष में दर्ज यह हैंडशेक केवल पुरानी दोस्ती की याद नहीं, आने वाले वर्षों के लिए नई सामरिक रूपरेखा पर बढ़ते भरोसे का संकेत भी था। फोटो साभार : @narendramodi/ X

पुरानी दोस्ती से आगे, नई राह की रूपरेखा

आख़िर में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इस यात्रा ने भारत–रूस संबंधों को भावुक “पुरानी दोस्ती” वाले अध्याय से निकालकर एक आधुनिक, संस्थागत और संतुलित साझेदारी के आधार पर टिकाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाया। उत्तर अभी अधूरा है।

निर्णायक इसलिए कि इसने पूरे विश्व के सामने भारत की स्वतंत्र कूटनीतिक रेखा को फिर से रेखांकित किया। अधूरा इसलिए कि इस यात्रा के असली परिणाम आने वाले पाँच से दस वर्षों की नीति–निर्णयों, निवेश, तकनीकी सहयोग, रक्षा विविधीकरण और अंतरराष्ट्रीय दबावों पर भारत की प्रतिक्रिया से तय होंगे।

अभी के लिए इतना कहना संतुलित होगा कि भारत ने न तो रूस को छोड़ने का संदेश दिया है और न पश्चिम से दूरी बनाने का। उसने अपने लिए एक तीसरी, कठिन और संकरी राह चुनी है, जिसमें लाभ और जोखिम दोनों साथ–साथ चलते हैं।

पुतिन की यह यात्रा उस राह की रूपरेखा को स्पष्ट करती है; असली परीक्षा उसके निष्पादन में होगी। इतिहास बाद में तय करेगा कि दिल्ली की इस ठंडी सुबह ने दुनिया की राजनीति को किस दिशा में मोड़ा, पर इतना आज ही दर्ज किया जा सकता है कि यह मुलाक़ात केवल दो नेताओं की तस्वीर नहीं थी, बल्कि उस विश्व–व्यवस्था का भारतीय अध्याय थी, जिसमें भारत अब दर्शक नहीं, बल्कि दिशा–निर्माता के रूप में खड़ा है।

यात्रा का निचोड़ : दुनिया ने क्या देखा, भारत–रूस ने क्या पाया, क्या दाँव पर लगा

सर्द दिल्ली में हुई भारत–रूस मुलाक़ात जितनी दो राष्ट्राध्यक्षों की तस्वीरों में दर्ज हुई, उतनी ही दुनिया की राजनीतिक कल्पना पर भी छपी। पुतिन की भारत यात्रा रूस के लिए केवल औपचारिक स्वागत नहीं थी और भारत के लिए सिर्फ़ पुरानी मित्रता का पुनर्स्मरण नहीं। यह वह क्षण था जहाँ दोनों देशों के हित, वैश्विक शक्तियों की बेचैनी और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरण एक ही फ़्रेम में दिखाई दिए।

रूस के लिए यह यात्रा एक महत्वपूर्ण राहत थी। प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच उसे यह भरोसा मिला कि वह अकेला नहीं है और चीन पर निर्भरता के समानांतर उसके पास भारत जैसा बड़ा, स्थिर और स्वतंत्र साझेदार मौजूद है। मॉस्को को राजनीतिक मान्यता भी मिली और ऊर्जा–वाणिज्य के मोर्चे पर दीर्घकालिक ग्राहक भी। रूसी विश्लेषकों का मानना है कि भारत अब रूस की एशिया-रणनीति का केंद्र है और क्रेमलिन दिल्ली को खोने का जोखिम नहीं उठा सकता।

भारत के लिए पुतिन की दिल्ली यात्रा ऊर्जा सुरक्षा, सस्ते तेल की स्थिर आपूर्ति, रक्षा सहयोग और वैश्विक मंच पर अपनी स्वतंत्र कूटनीतिक रेखा को दोबारा स्पष्ट करने का अवसर थी। अमेरिका की नाराज़गी, यूरोप की बेचैनी और यह बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चिंता कि भारत कहीं रूस के लिए आर्थिक सहारा न बन जाए। इन सबके बीच पुतिन की यह यात्रा भारत के आत्मविश्वास और स्वतंत्र विदेश नीति का स्पष्ट संकेत बनकर सामने आई।

पुतिन की दिल्ली यात्रा ने दुनिया को यह साफ़ संदेश दिया कि भारत अब केवल संतुलन साधने वाला देश नहीं, बल्कि अपनी धुरी पर खड़ा होकर निर्णय लेने वाली शक्ति है। अमेरिका ने भारत–रूस सहयोग को “ध्यान से देखने योग्य” बताया, लेकिन उसके ही कई विश्लेषकों ने स्वीकार किया कि भारत आज किसी महाशक्ति की लाइन में खड़े होकर राजनीति नहीं करता। वह अपनी शर्तों पर विदेश नीति तय कर रहा है।

यूरोप में पुतिन की भारत यात्रा कहीं अधिक असहजता के साथ पढ़ी गई। वहाँ के राजनयिकों और प्रेस ने लिखा कि जब यूरोप रूस को अलग-थलग रखना चाहता है, तब भारत का सम्मान और संवाद मॉस्को को वह मान्यता देता है जिसे यूरोप रोकना चाहता था।

चीन ने शब्द कम चुने, पर उसके विश्लेषकों ने माना कि यह यात्रा रूस–चीन–भारत त्रिकोण में एक नई संवेदनशीलता जोड़ती है। रूस यदि भारत के और करीब आता है, तो वह बीजिंग के लिए अवसर भी है और एक चुनौती भी। दोनों साथ-साथ।

इसके विपरीत, वैश्विक दक्षिण ने इस यात्रा को बदलती विश्व-व्यवस्था का संकेत माना। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया के कई संपादकीयों ने लिखा कि गैर-पश्चिमी देश अब अपनी कूटनीतिक राह खुद तय कर रहे हैं, और भारत इस उभरती बहुध्रुवीय दुनिया का सबसे आत्मविश्वासी प्रतिनिधि बन चुका है।

इन सभी प्रतिक्रियाओं को साथ रखें तो एक साफ़ और संतुलित तस्वीर उभरती है। रूस ने राजनीतिक सहारा पाया, भारत ने ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक लचीलापन मजबूत किया, वैश्विक दक्षिण ने बहुध्रुवीयता को नया रूप लेते देखा, जबकि अमेरिका और यूरोप भारत की तीसरी राह को लेकर असहज रहे। पर हर लाभ अपनी चुनौती भी साथ लाता है। भारत को आने वाले वर्षों में यह संतुलन सावधानी से निभाना होगा कि रूस के साथ गहराता सहयोग उसे पश्चिम के साथ बने रणनीतिक संबंधों से दूर न ले जाए। यही वह परीक्षा है जो भविष्य में बार-बार सामने आएगी।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पुतिन की भारत यात्रा किसी एक देश की जीत या दूसरे की हार की कहानी नहीं थी। यह उस बदलती विश्व-व्यवस्था का संकेत थी जिसमें भारत केवल दर्शक नहीं, बल्कि अपनी राह स्वयं तय करने वाला एक निर्णायक अभिनेता बनकर उभर रहा है। आगे का दशक बताएगा कि यह यात्रा स्थायी सामरिक बढ़त में बदलती है या वैश्विक दबावों के बीच कोई नई कीमत माँगती है। अभी के लिए यह मुलाक़ात सिर्फ़ एक राजकीय यात्रा नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के एक नए अध्याय की प्रस्तावना है।


क्या बिना तय समय-सीमा के, राज्यपालों द्वारा बिलों पर देरी राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बढ़ाती है?

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