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दिल्ली की शाम में पुतिन: भारत की कूटनीति का नया शक्तिपथ

दिल्ली में आगमन के तुरंत बाद एक ही कार में साथ रवाना होते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन। यह वह कूटनीति है जिसमें औपचारिकताओं से अधिक मौन संवाद मायने रखता है। फोटो साभार: NDTV
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Bureau Report

नई दिल्ली, 4 दिसम्बर 2025 । रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आज शाम दिल्ली पहुँचे, जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं एयरपोर्ट पर पहुँचकर उनका स्वागत किया। विमान से उतरते ही दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी से भरा अभिवादन हुआ और कुछ ही क्षण बाद वे एक ही कार में एयरपोर्ट से रवाना हो गए। चार वर्ष बाद भारत की धरती पर पुतिन की यह मौजूदगी ऐसे समय में दर्ज हो रही है जब विश्व राजनीति तनावों से भरी हुई है और एशिया शक्ति संतुलन की नई दिशा तलाश रहा है। शुरुआती क्षण में ही यह स्पष्ट हो गया था कि यह यात्रा केवल औपचारिक कार्यक्रमों की शुरुआत भर नहीं, बल्कि बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच भारत की नई भूमिका को परिभाषित करने की क्षमता रखती है।

राजधानी में शाम ढलते ही वातावरण में गंभीर उत्सुकता महसूस की जा सकती थी। पलम के तकनीकी क्षेत्र में पुतिन के विमान के उतरते ही दिल्ली की हवा में एक अनकहा घनत्व बढ़ गया था। प्रधानमंत्री द्वारा स्वयं पहुँचकर स्वागत करना और दोनों नेताओं का एक ही वाहन में रवाना होना वही क्षण था, जो बड़ी स्पष्टता से यह संकेत दे रहा था कि यह यात्रा सामान्य राजकीय संवाद तक सीमित नहीं रहेगी। यह वह पल था जिसमें राजनय अपने औपचारिक स्वरूप से ऊपर उठकर प्रत्यक्ष संकेतों की भाषा बोल रहा था, वह भाषा जिसे पढ़ना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की मूल पहचान है।

यात्रा की तैयारियों की परतें भी आज स्पष्ट दिखाई दीं। रूसी प्रतिनिधिमंडल के वरिष्ठ सदस्य, जिनमें रूस के रक्षा मंत्री भी शामिल हैं, पहले ही दिल्ली पहुँच चुके थे और भारत के रक्षा नेतृत्व के साथ प्रारंभिक वार्ताएँ पूरी कर चुके थे। यह केवल कार्यक्रम का क्रम नहीं था, बल्कि उस रणनीतिक तालमेल का प्रमाण था जिसे दोनों देश रक्षा सहयोग को नए स्तर तक ले जाने के लिए आवश्यक मानते हैं। भारत अपनी सुरक्षा संरचना को ऐसे आधार पर टिकाना चाहता है जो बाहरी दबावों से अप्रभावित रहे, और रूस के लिए यह वह अवसर है जिसमें वह अपने भरोसेमंद साझेदार के साथ संबंधों को ऐसे समय में सुदृढ़ कर सकता है जब वह अंतरराष्ट्रीय दबावों का सामना कर रहा है।

कल सुबह राष्ट्रपति भवन में राजकीय सम्मान समारोह होगा, लेकिन इस यात्रा का मुख्य केंद्र हैदराबाद हाउस में होने वाली विस्तृत द्विपक्षीय वार्ता है। रक्षा सहयोग इस संवाद की रीढ़ बनेगा। वायु सुरक्षा प्रणालियाँ, उन्नत लड़ाकू विमान, संयुक्त उत्पादन और दीर्घकालिक रखरखाव जैसे विषय प्रमुख रहेंगे। ऊर्जा सुरक्षा भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। रूस भारत को कच्चे तेल और परमाणु ऊर्जा का विश्वसनीय स्रोत प्रदान करता है, पर दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार असंतुलन और भुगतान तंत्र की जटिलताएँ ऐसी चुनौतियाँ हैं जिनके समाधान की अपेक्षा इस यात्रा से की जा रही है। भारत चाहता है कि संबंध केवल आयात-आधारित न रहें, बल्कि भारतीय निर्यात और सेवाओं को भी रूस में पर्याप्त स्थान मिले।

औपचारिक वार्ताओं से परे एक और परत मौन रूप से मौजूद है। यूक्रेन संघर्ष ने विश्व व्यवस्था को भारी अनिश्चितता में डाल दिया है, और ऐसे समय में भारत की भूमिका केवल दर्शक की नहीं रह सकती। नई दिल्ली अब ऐसे मुकाम पर है जहाँ वह किसी पक्ष की छाया में खड़े बिना संवाद की दिशा को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। पुतिन की यह यात्रा इसी संभावित भूमिका की परीक्षा भी है। पश्चिम इस यात्रा की हर गतिविधि को बारीकी से देख रहा है, जबकि रूस भारत से यह उम्मीद कर रहा है कि वह उसके लिए संतुलनकारी शक्ति साबित हो सके।

दिल्ली की यह शाम अपने भीतर कई संकेत समेटे हुए थी। सड़कें संयमित थीं, सुरक्षा व्यापक थी और राजनीतिक गलियारों में एक सतर्क गंभीरता थी। यह केवल कूटनीतिक उत्सव नहीं, बल्कि उस नए दौर का संकेत थी जिसमें भारत घटनाओं का अनुगामी नहीं, बल्कि उनकी दिशा तय करने वाला राष्ट्र बनकर उभर रहा है। कल की वार्ताएँ औपचारिक परिणाम सामने रखेंगी, पर आज की रात यह बात पहले ही स्पष्ट कर रही थी कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि निर्णय गढ़ने वाली शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है।

क्या बिना तय समय-सीमा के, राज्यपालों द्वारा बिलों पर देरी राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बढ़ाती है?

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