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संविधान सुरक्षित, पर संघवाद असुरक्षित — सुप्रीम कोर्ट की सलाहकारी राय ने बदल दिया सत्ता-संतुलन

भारत का सर्वोच्च न्यायालय — जहाँ जमानत, समय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक कसौटियाँ तय होती हैं। (फाइल फोटो)
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Written by
–नीलेश कटारिया

राष्ट्रपति के प्रेज़िडेंशियल रेफ़रेंस पर सुप्रीम कोर्ट की “सलाहकारी राय” ने साफ कर दिया कि बिलों पर समय-सीमा तय करना न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में नहीं आता। मौन को असंवैधानिक माना गया, लेकिन निर्णय में देरी रोकने का प्रभावी उपाय राज्यों के हाथ से निकल गया। कानूनी सिद्धांत तो सुरक्षित रहा, मगर व्यावहारिक रूप से चुनी हुई राज्य सरकारों के लिए रास्ता और भी कठिन हो गया। यह सलाहकारी राय केंद्र–राज्य संबंधों को एक नए, असहज और अनिश्चित संतुलन की ओर धकेलती है।


अहमदाबाद, 21 नवंबर 2025। सुप्रीम कोर्ट की पाँच-जजों की संविधान पीठ ने साफ़ कर दिया कि राष्ट्रपति और राज्यपालों पर बिलों (Legislative Bills) के अनुमोदन के लिए कोई अनिवार्य समय-सीमा नहीं लगाई जा सकती। इस घोषणा ने 8 अप्रैल 2025 के उस ऐतिहासिक आदेश से उपजी राष्ट्रीय उम्मीद को लगभग समाप्त कर दिया, जिसमें लगा था कि अब राज्यपाल महीनों–सालों तक बिलों को लंबित रखकर शासन-प्रक्रिया को रोक नहीं पाएँगे।

सुप्रीम कोर्ट की यह सलाहकारी राय, जो स्वरूप में एक विस्तृत न्यायिक निर्णय की तरह ही है, राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143(1) के तहत भेजे गए प्रेज़ीडेंशियल रेफ़रेंस (Special Reference No. 1 of 2025) पर दी गई। इस रेफ़रेंस में बिलों पर देरी, रोक और “राष्ट्रपति के लिए विचारार्थ भेजे जाने” की प्रक्रिया से जुड़े 14 जटिल संवैधानिक प्रश्न रखे गए थे।

संविधान पीठ ने माना कि बिलों पर अनिश्चितकालीन मौन संवैधानिक दायित्व का उल्लंघन है, लेकिन अदालत ‘डीम्ड असेंट’ — अर्थात अनुमोदन को मान लेने जैसा असाधारण उपाय — भविष्य में दोबारा लागू नहीं कर सकती और न ही राष्ट्रपति या राज्यपाल को किसी कठोर समय-सीमा में बाँध सकती है।

सलाहकारी राय में कानूनी सिद्धांत अपनी जगह सुरक्षित रहा, पर शासन की वास्तविकता अब भी उलझी हुई है। तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और पंजाब जैसे विपक्ष-शासित राज्यों के सैकड़ों बिल महीनों से राज्यपालों की टेबल पर अटके पड़े हैं, और अब उन पर कोई स्पष्ट संवैधानिक समय-सीमा लागू नहीं होगी।

इस स्थिति में राज्य सरकारों के पास राहत पाने का एकमात्र व्यावहारिक मार्ग वही बचता है कि हर गंभीर देरी के विरुद्ध अलग-अलग रिट याचिकाओं के साथ सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर दस्तक दी जाए।

राष्ट्रपति के 14 संवैधानिक प्रश्न — सत्ता-संतुलन की जड़ पर सीधा प्रहार

इस पूरी बहस की शुरुआत 8 अप्रैल 2025 के आदेश से हुई। स्टेट ऑफ तमिलनाडु बनाम गवर्नर ऑफ तमिलनाडु मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो-जजों की संवैधानिक पीठ ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

पीठ ने पाया कि तमिलनाडु के 10 विधेयक महीनों तक राज्यपाल आर.एन. रवि के पास बिना किसी कार्रवाई के पड़े रहे। सर्वोच्च अदालत ने राज्यपाल की इस चुप्पी और देरी को ‘ग़ैर-कानूनी’ और ‘त्रुटिपूर्ण’ माना।

इस मामले में सर्वोच्च अदालत ने अनुच्छेद 142 के तहत एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए उन सभी विधेयकों को ‘स्वीकृत मान लिया गया’ घोषित कर दिया। साथ ही राष्ट्रपति के लिए भी “यथोचित समय में निर्णय” का एक मानक सुझाया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस आदेश को संविधान की सीमाओं से परे माना। इसके बाद उन्होंने अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय माँगी। मई 2025 में भेजे गए इस प्रेज़ीडेंशियल रेफ़रेंस में 14 संवैधानिक प्रश्न थे।

हालांकि इन 14 प्रश्नों में आदेश (8 अप्रैल 2025) का सीधा उल्लेख नहीं था, लेकिन सभी सवालों का केंद्र एक ही था—समय-सीमा, डीम्ड असेंट, संवैधानिक विवेक और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा।

अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि किसी जटिल कानूनी प्रश्न पर वह सुप्रीम कोर्ट से सलाह माँगे। अदालत चाहे तो यह सलाह दे, चाहे तो मना कर दे—इस पर बाध्यता नहीं होती।

इससे पहले भी राष्ट्रपति ने इसी अनुच्छेद का उपयोग दिल्ली लॉज़ एक्ट, केरल एजुकेशन बिल, कावेरी जल विवाद और 2002 के गुजरात चुनाव जैसे मामलों में किया था।

अदालत ने मिसाल नहीं छुई, पर भविष्य का संवैधानिक रास्ता बदल दिया

111-पृष्ठीय सलाहकारी राय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 143(1) के तहत दी गई सलाह किसी पूर्व निर्णय को निरस्त नहीं कर सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि तकनीकी और कानूनी रूप से 8 अप्रैल का निर्णय वैध बना रहेगा, लेकिन यह भविष्य के लिए कोई मिसाल नहीं बनेगा।

यानी तमिलनाडु के वे दस डीम्ड-असेंट वाले बिल तो वैध रहेंगे, लेकिन आगे इस प्रकार की राहत नहीं दी जाएगी। अदालत ने यह भी कहा  कि समय-सीमा तय करना न्यायपालिका का क्षेत्र नहीं है और ‘डीम्ड असेंट’ जैसे असाधारण उपाय अब दोबारा लागू नहीं होंगे।

अब आगे हर मामले में केवल यह जांच होगी कि देरी “अनुचित” है या नहीं—लेकिन कितने समय के बाद देरी अनुचित मानी जाएगी, यह मानक सुप्रीम कोर्ट निर्धारित नहीं करेगा।

समय-सीमा गायब, संघर्ष अब अदालत की दहलीज़ पर

सुप्रीम कोर्ट का संदेश दो स्तरों पर स्पष्ट है — बिलों पर अनिश्चितकालीन मौन असंवैधानिक है, लेकिन समय-सीमा तय करना न्यायपालिका का अधिकार नहीं। इसका मतलब यह है कि अब हर मामले में राज्य सरकारों को ही सुप्रीम कोर्ट जाकर यह दिखाना होगा कि देरी “अनुचित” है।

यह स्थिति व्यावहारिक रूप से राज्यपालों के हाथ में एक तरह की “देरी-वेटो” जैसी प्रभावी शक्ति छोड़ देती है — भले ही यह कोई औपचारिक संवैधानिक अधिकार न हो।

तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और पंजाब जैसे राज्यों के सामने अब वही पुरानी चुनौती फिर खड़ी है: बिल कितने भी महत्वपूर्ण क्यों न हों, उनकी अंतिम गति राज्यपाल की टेबल पर ही अटक सकती है।

राजनीति बनाम संविधान, टकराव अब और तेज़

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने X (पूर्व ट्विटर) पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह राय हमारे संघीय ढांचे के लिए एक गंभीर झटका है। उनके अनुसार, पहले की “बहादुर पीठ” ने राज्यपालों की अनिश्चितकालीन देरी रोकने को लेकर जो सुरक्षा-व्यवस्था बनाई थी, पांच सदस्यों वाली संविधान पीठ ने उसे उलटकर चुनी हुई सरकारों के लिए रास्ता और कठिन बना दिया है।

इसके विपरीत, वरिष्ठ अधिवक्ता व राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने इस राय को विपक्ष-शासित राज्यों के लिए “महत्वपूर्ण राहत” माना। उनका कहना है कि डीम्ड असेंट भले स्वीकार न हुआ हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्यपाल बिलों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते—जो राज्यों के लिए एक मजबूत सुरक्षा-रेखा बनी रहती है।

वामपंथी दलों ने भी इस राय पर गंभीर चिंता जताई। CPI ने कहा कि यह व्यवस्था राज्यपालों को निर्णय लंबित रखने की और अधिक गुंजाइश दे सकती है, जिससे विपक्ष-शासित राज्यों में विधायी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे “संघवाद और राज्य-स्वायत्तता पर दबाव बढ़ाने वाला कदम” बताया और कहा कि राज्यों की संवैधानिक लड़ाई अब और कठिन हो गई है।

कई संवैधानिक विश्लेषकों ने यह आशंका भी व्यक्त की है कि समय-सीमा का अभाव राज्यपालों को बिलों पर निर्णय टालने की वह प्रशासनिक गुंजाइश देता है जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही असंवैधानिक मान चुका है। उनके अनुसार अब हर देरी को चुनौती देने की जिम्मेदारी राज्यों पर और अधिक बढ़ जाएगी, जिससे संघीय ढाँचे का व्यावहारिक संचालन और जटिल हो सकता है।

कुछ संवैधानिक विश्लेषकों ने इस निर्णय की टाइमिंग पर भी ध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि यह राय ऐसे समय आई है जब संविधान पीठ के अध्यक्ष 23 नवंबर 2025 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। भारत के न्यायिक इतिहास में यह कई बार देखा गया है कि महत्वपूर्ण निर्णयों के तुरंत बाद सेवानिवृत्त जजों को आयोगों, ट्रिब्यूनलों या वैधानिक संस्थाओं में जिम्मेदारियाँ सौंपी जाती रही हैं।

पर्यवेक्षकों का एक वर्ग इसे संयोग मानता है, जबकि कुछ इसे न्यायपालिका–कार्यपालिका संबंधों की जटिलताओं के संकेत के रूप में देखते हैं—हालाँकि इसका कोई प्रत्यक्ष आरोप लगाना उचित नहीं होगा।

वहीं भाजपा खेमे ने इस सलाहकारी राय को “संवैधानिक संतुलन की पुनर्स्थापना” बताया। उनका तर्क है कि न्यायपालिका को नीति-निर्माण के क्षेत्र में हस्तक्षेप से बचते हुए मूल संवैधानिक ढाँचे और शक्तियों के पृथक्करण का सम्मान करना चाहिए था, और यह राय उस सिद्धांत को मजबूत करती है।

सलोनी का विश्लेषण– ‘संविधान स्पष्ट, पर शासन का रास्ता धुँधला’

अधिवक्ता सलोनी कटारिया ने खुली किताब से खास बातचीत में कहा—“जब संविधान मौन हो, न्याय की आवाज़ कहाँ से उठे?”

सुप्रीम कोर्ट की 111 पृष्ठों में फैली इस सलाहकारी राय (Advisory Opinion) को समझने के लिए अधिवक्ता सलोनी से बातचीत के दौरान पूछे गए पहले प्रश्न पर उनका सीधा जवाब था— “कानून अपने सिद्धांत में जितना साफ है, शासन उतना ही धुँधला होता जा रहा है। ”

जब उनसे पूछा गया— क्या यह सलाहकारी राय राज्यों के लिए बड़ी चुनौती साबित होगी?  सलोनी ने स्पष्ट रूप से कहा—“निश्चित रूप से! न्यायपालिका वह सीमा नहीं लाँघ सकती जहाँ संविधान मौन है, लेकिन यही मौन अब राजनीतिक देरी की सबसे बड़ी गुंजाइश बन गया है।”

उन्होंने आगे व्यावहारिक पहलू रखा—“अदालत ने कहा है कि वह नई समय-सीमाएँ नहीं बना सकती। यह संवैधानिक शुचिता है। लेकिन इसका असर यह होगा कि राज्यपाल बिलों को लंबित रखने का रास्ता पाते रहेंगे—कानूनी तौर पर नहीं, पर व्यवहार में।”

जब यह पूछा गया— तो अब राज्य सरकारों के पास विकल्प क्या बचता है?  सलोनी का सटीक जवाब था—“एक ही! हर देरी के खिलाफ अलग-अलग रिट याचिका। हर मामले में सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा। प्रक्रिया लंबी भी होगी, महँगी भी—और शासन की गति अदालत पर निर्भर हो जाएगी।

कुछ क्षण ठहरकर उन्होंने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी जोड़ी—

“अदालत ने अपने अधिकार-क्षेत्र की सीमा तो सुरक्षित रख ली है, लेकिन न्याय तक पहुँचने का रोज़मर्रा का रास्ता अब और लंबा व अनिश्चित हो गया है।”

बातचीत आगे बढ़ी तो उन्होंने मूल संवैधानिक समस्या की ओर संकेत किया—“यह सलाहकारी राय संविधान की एक गहरी खामोशी को उजागर करती है।”  उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—“जब तक संसद अनुच्छेद 200 और 201 में समय-सीमा नहीं जोड़ेगी, अदालत केवल यह कह सकती है कि ‘देरी अनुचित है’—लेकिन यह तय नहीं कर सकती कि ‘कितनी देरी असंवैधानिक है।’ यही वास्तविक विसंगति है।”

अंत में उनका निष्कर्ष बिल्कुल साफ था—“यह संवैधानिक खामोशी आगे भी केंद्र–राज्य टकराव की नई परतें और संस्थागत अनिश्चितता पैदा करती रहेगी।”


संघवाद की धुँध में दिशा कौन तय करेगा?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्यपाल अनिश्चितकाल तक मौन नहीं रह सकते। लेकिन इसी के साथ यह भी कहा कि—कितनी देर बाद यह मौन असंवैधानिक माना जाए, यह अदालत तय नहीं करेगी। यही वह मोड़ है जहाँ भारतीय संघवाद एक नए और अधिक जटिल चरण में प्रवेश कर गया है।

बिना समय-सीमा के, देरी अब स्वयं एक राजनीतिक उपकरण बन सकती है और उसके खिलाफ समाधान किसके पास है, यह प्रश्न अब पहले से कहीं अधिक तीखा हो चुका है।

आज भी इस दुविधा का कोई स्पष्ट, सार्वभौमिक उत्तर मौजूद नहीं है। यही अनिश्चितता आने वाले वर्षों में भारत के संघीय ढाँचे में सबसे बड़ी संस्थागत बहसों में से एक बनने वाली है।

क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिलों पर समय-सीमा तय न करने का निर्णय राज्यों के लिए शासन को और कठिन बनाता है?

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