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मतदाता सूची अपडेट के नाम पर ठगी का नया जाल: SIR.apk लिंक से बैंक खातों पर सीधा खतरा

ग्राफिक इमेज : खुली किताब
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—विश्लेषण डेस्क

सरकारी प्रक्रिया की आड़ में एक नई डिजिटल ठगी तेज़ी से फैल रही है—SIR अपडेट के नाम पर कॉल, लिंक और OTP के ज़रिए मोबाइल और बैंक खातों पर कब्ज़ा करने की कोशिश की जा रही है। पुलिस का कहना है कि यह खतरा भोपाल तक सीमित नहीं है; यह उसी गति से उन राज्यों में फैल रहा है, जहाँ SIR प्रक्रिया जारी है। सावधान रहें, क्योंकि डिजिटल ठग अब लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की भाषा और भरोसे को हथियार बनाकर सबसे सुरक्षित जगहों पर चोट कर रहे हैं।


भोपाल, 20 नवंबर 2025। भोपाल में पिछले कुछ दिनों से एक नया खतरा चुपचाप घरों में दस्तक दे रहा है—एक ऐसी कॉल, जो सरकारी प्रक्रिया का रूप धारण कर नागरिकों को ठगी के जाल में धकेल रही है।

मतदाता सूची अपडेट का नाम लेते हुए भेजी जा रही SIR.apk जैसी फाइलें आम लोगों के मोबाइल फोन पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रही हैं और OTP के बहाने पूरे बैंक खातों तक पहुँच बनाने की साज़िश रच रही हैं।

यह ठगी सिर्फ एक लिंक से शुरू होती है और मिनटों में पहचान, बैंकिंग रिकॉर्ड और निजी डेटा को जोखिम में डाल सकती है। इस समय सबसे बड़ी सावधानी यही है कि कोई भी .apk फाइल डाउनलोड न करें, किसी अनजान कॉल को “सरकारी काम” मानकर OTP न बताएं और हर संदिग्ध संदेश को संभावित खतरे की तरह ही देखें—क्योंकि डिजिटल अपराधी अब सबसे भरोसेमंद जगहों पर ही हमला कर रहे हैं।

दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण, दिनांक 17 नवंबर 2025 की रिपोर्ट इस ठगी की हकीकत को साफ सामने रखती है। पटेल नगर निवासी मिथिलेश गौतम के मोबाइल पर पहले एक मैसेज आया, जिसमें SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न/मतदाता सूची पुनरीक्षण) का हवाला दिया गया था।

इसके कुछ देर बाद एक कॉल आया, और कॉल करने वाले ने खुद को मतदाता सूची अपडेट से जुड़ा कर्मचारी बताते हुए कहा कि उनके पास भेजी गई फाइल डाउनलोड करनी होगी और उसके बाद आने वाला OTP बताना होगा। मिथिलेश को यह प्रक्रिया संदिग्ध लगी, इसलिए उन्होंने न तो कोई फाइल डाउनलोड की और न ही OTP साझा किया। उन्होंने तुरंत स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना दी।

भास्कर की रिपोर्ट यह साफ बताती है कि संदेश और कॉल—दोनों का इस्तेमाल कर ठग सरकारी प्रक्रिया का भ्रम पैदा करते हैं और फिर तकनीकी जाल में फँसाने की कोशिश करते हैं।

असलियत यह है कि यह पूरी ठगी चुनाव आयोग की वैध SIR प्रक्रिया की आड़ में चल रही है। वास्तविक पुनरीक्षण के दौरान BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) घर-घर जाकर कागज़ी फॉर्म भरते हैं और मतदाता विवरण का सत्यापन करते हैं।

इस प्रक्रिया में न OTP की आवश्यकता होती है और न किसी लिंक या ऐप की। लेकिन ठग इसी आधिकारिक नाम का उपयोग कर नागरिकों को भ्रमित करते हैं और कई मामलों में यह डर तक दिखाते हैं कि OTP न बताने पर उनका नाम मतदाता सूची से हट सकता है या सत्यापन अधूरा रह सकता है। प्रदेश के कई जिलों में स्थानीय पोर्टलों ने ऐसे कई उदाहरण दर्ज किए हैं, जो बताते हैं कि भय और भ्रम पैदा करना ठगों की सामान्य रणनीति बन चुका है।

स्थानीय कई मीडिया पोर्टलों ने यह भी उल्लेख किया है कि SIR.apk जैसी फर्जी फाइलें फोन में इंस्टॉल होते ही संवेदनशील जानकारी तक पहुँचने लगती हैं। फोटो, कॉन्टैक्ट्स और SMS के अलावा सोशल मीडिया अकाउंट, ईमेल लॉगिन, UPI ऐप्स और बैंकिंग विवरण तक भी इन फाइलों के माध्यम से पहुँचा जा सकता है।

कई रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि ऐसे मालवेयर यानी हानिकारक सॉफ़्टवेयर फोन की स्क्रीन को रिमोट-कंट्रोल में बदल देते हैं, जिससे अपराधियों के लिए UPI PIN रीसेट करना और खातों से रकम निकालना बेहद आसान हो जाता है। यह स्पष्ट संकेत है कि यह कोई साधारण या स्थानीय स्तर की शरारत नहीं, बल्कि संगठित नेटवर्क की सक्रियता है, जो सरकारी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता को ढाल बनाकर काम कर रहा है।

भोपाल साइबर सेल ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि कोई भी सरकारी विभाग, निर्वाचन कार्यालय या BLO OTP मांगकर कोई कार्य नहीं करता और न ही किसी लिंक से फॉर्म डाउनलोड कराने का प्रावधान है।

नागरिकों को सलाह दी गई है कि यदि SIR या EPIC (इलेक्शन फोटो आइडेंटिटी कार्ड) अपडेट के नाम पर किसी कॉल में OTP मांगा जाए, तो तुरंत बातचीत बंद कर दें और इसे सीधे धोखाधड़ी मानें। शिकायत के लिए राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 तथा पोर्टल www.cybercrime.gov.in उपलब्ध हैं। पुलिस ने यह भी स्वीकार किया है कि कई लोग संकोच या झिझक के कारण शिकायत नहीं करते, जिससे अपराधियों को लगातार नए लक्ष्य मिलते रहते हैं।

भोपाल में सामने आया यह मामला अब उन राज्यों में चेतावनी का आधार बन रहा है, जहाँ SIR की प्रक्रिया जारी है। कई शहरों या गांवों में भले ही ऐसा कोई मामला दर्ज न हुआ हो, लेकिन भोपाल की घटना और साइबर एडवाइजरी के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में लोगों को सतर्क किया जा रहा है।

इससे यह संकेत मिलता है कि यह पैटर्न किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहेगा और डिजिटल अपराधियों का नेटवर्क अन्य जिलों में भी इसी तरीके का उपयोग कर सकता है। मतदाता सूची अपडेट जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ढाल बनाकर फैल रही यह डिजिटल ठगी सिर्फ तकनीकी जोखिम नहीं है; यह नागरिकों के भरोसे और चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सीधा प्रहार करती है।

मिथिलेश जैसे कुछ लोग संदेह के कारण बच गए, लेकिन हर नागरिक इतनी सतर्कता नहीं दिखा पाता—और यही वह खाली जगह है, जिसे अपराधी सबसे ज़्यादा भुनाते हैं।

क्या सुप्रीम कोर्ट की सलाहकारी राय भारतीय संघवाद में राज्यपालों की भूमिका को और अधिक शक्तिशाली बना देती है?

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