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डिजिटल जिहाद का खतरनाक उभार: जब इंटरनेट के अंधेरे कमरे युवाओं को हथियार बना देते हैं

ग्राफिक इमेज: खुली किताब
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Written by
–नीलेश कटारिया

भारत के डिजिटल अंडरवर्ल्ड में कुछ खामोश दरवाज़े ऐसे खुल रहे हैं, जहाँ धर्म का नहीं—डेटा का असर दिमाग बदल रहा है। यहाँ पहचानें गायब हैं, पर एल्गोरिद्म जिंदा है। कोड और कमांड की परतों में छिपी कट्टरता अब बताती है—इंटरनेट हमारी सुविधा नहीं, भारत की ‘नयी अदृश्य युद्धभूमि’ बन चुका है।


अहमदाबाद, 17 नवंबर 2025। इंटरनेट की चमकती स्क्रीन के पीछे एक खामोश अंधकार आकार ले रहा है—इतना गहरा कि उसकी भनक न परिवारों को लगती है, न समाज को, और न ही सुरक्षा एजेंसियों को। राजस्थान पत्रिका की आज की खोजी रिपोर्ट ने उस अंधेरे की खिड़की खोल दी है, जहाँ मजहबी कट्टरता, डिजिटल ब्रेनवॉशिंग और साइबर प्रशिक्षण एक नई, गुप्त पाठशाला की तरह पनप रहे हैं। यह वह डिजिटल तहखाना है, जहाँ धर्म के नाम पर हिंसा की भाषा सिखाई जाती है—और सब कुछ इतनी खामोशी से होता है कि ऊपर की दुनिया को कुछ पता ही नहीं चलता।

लेकिन यह कहानी अचानक नहीं बनी। इसके शुरुआती संकेत कुछ महीने पहले तब दिखे थे जब खुली किताब ने अपनी एक विस्तृत अंग्रेज़ी रिपोर्ट (5 जुलाई 2025) में नडियाद के एक 18 वर्षीय युवक द्वारा टेलीग्राम ग्रुप “AnonSec” बनाकर 20 सरकारी वेबसाइटों पर DDoS (डिस्ट्रीब्यूटेड डिनायल ऑफ सर्विस / वितरित सेवा निषेध) हमले की कोशिश की घटना को एक सामान्य या अलग-थलग साइबर अपराध नहीं, बल्कि एक उभरते हुए डिजिटल पैटर्न के हिस्से के रूप में पढ़ा था।

यह साज़िश विगत 20 मई 2025 को गुजरात ATS (एंटी-टेररिज़्म स्क्वॉड / आतंकवाद-निरोधी दस्ता) की कार्रवाई के दौरान सामने आई थी। उस समय अधिकतर मुख्यधारा मीडिया ने इसे महज़ एक ‘साइबर अटैक केस’ की तरह रिपोर्ट किया, लेकिन खुली किताब ने इसे डिजिटल उग्रता और तकनीकी कौशल के खतरनाक मेल के रूप में समझा था—एक शुरुआती चेतावनी, जो आज और भी स्पष्ट हो चुकी है।

कभी सोचा है—जब आप इंटरनेट पर स्क्रॉल कर रहे होते हैं, उसी समय बंद चैट-रूमों और अनाम पोर्टलों में कुछ लोग युवाओं के दिमाग में जंग, जन्नत और जहन्नुम के नक्शे खींच रहे होते हैं? आज की स्थिति यही है। खुले प्लेटफॉर्मों पर दिखने वाली बहस के समानांतर, इंटरनेट के भीतर एक दूसरा, छिपा हुआ कॉरिडोर बन चुका है—जहाँ बहस नहीं, बल्कि ब्रेनवॉश चलता है; जहाँ तर्क नहीं, बल्कि “धर्म के नाम पर युद्ध” की स्क्रिप्ट परोसी जाती है।

राजस्थान पत्रिका की खोजी रिपोर्ट बताती है कि कुछ पोर्टल, क्लोज्ड फोरम और एन्क्रिप्टेड चैट-ग्रुप ऐसे कंटेंट फैला रहे हैं, जो सिर्फ नाराज़गी या असहमति नहीं पैदा करते, बल्कि सुनियोजित रूप से युवाओं को उग्रता, हिंसा और मजहबी कट्टरता की तरफ धकेलते हैं। इन प्लेटफॉर्मों पर “जन्नत”, “शहादत” और “धर्म के दुश्मनों के खिलाफ जंग” जैसे नारे, विज़ुअल्स और वीडियो के ज़रिए एक वैकल्पिक डिजिटल वास्तविकता खड़ी की जा रही है—जहाँ हिंसा को ‘पवित्र कर्तव्य’ की तरह पेश किया जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस नेटवर्क के निशाने पर सिर्फ बेरोज़गार या हाशिए पर खड़े युवा नहीं हैं; बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर, टेक्निकल प्रोफेशनल और अच्छी शिक्षा प्राप्त छात्र भी हैं—यह वही वर्ग है, जिसकी ऊर्जा और योग्यता से समाज भविष्य गढ़ने की उम्मीद करता है। डिजिटल कट्टरता का यह नया चेहरा दिखाता है कि इंटरनेट की सुरंग में भीड़ नहीं, बल्कि एल्गोरिद्म, गुमनाम प्रोफाइल और बंद चैट-रूम होते हैं, जो व्यक्ति को चुपचाप एक मनोवैज्ञानिक घेराबंदी में ले जाते हैं।

राजस्थान पत्रिका की रिपोर्ट में जिस डॉक्टरों के ग्रुप और “शरीयत या शहादत” जैसी भाषा का ज़िक्र है, वह सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि एक संकेत है—कि उच्च शिक्षा और प्रोफेशनल पहचान, डिजिटल ब्रेनवॉश के सामने स्वतः सुरक्षा कवच नहीं बनती। पिछले कुछ वर्षों में सामने आए कई मामलों में एक कॉमन पैटर्न साफ दिखता है: पहले ऑनलाइन ‘विचार’ के नाम पर दिमागी नियंत्रण और एकतरफा विचार थोपना, फिर बंद ग्रुपों में अलगाव और अंततः किसी मिशन या ‘ऑपरेशन’ के नाम पर हिंसक राह पर धकेलना।

दिल्ली ब्लास्ट जैसी हालिया घटनाएँ पहले ही यह चेतावनी दे चुकी हैं कि डिजिटल कट्टरता अब विचारों तक सीमित नहीं—यह जमीन पर हिंसा के रूप में सामने आ रही है। लाल किला क्षेत्र के आसपास हुई घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि साइबर-स्पेस में पनपती अतिवादी सोच, आखिरकार वास्तविक शहरों, सड़कों और सार्वजनिक जीवन को निशाना बनाती है। और राजस्थान पत्रिका की आज प्रकाशित खोजी रिपोर्ट उन हिंसक जड़ों को बेनक़ाब करती है, जो इंटरनेट के उन्हीं बंद डिजिटल कमरों में पनप रही हैं, जहाँ तक न समाज की नज़र पहुँचती है, न कानून की।

यही डिजिटल कट्टरता का पैटर्न हाल के दिनों में कई जगह सामने आया है। द हिन्दू की 9 नवंबर 2025 की विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि गुजरात ATS ने एक डॉक्टर और दो अन्य व्यक्तियों को अत्यंत घातक रासायनिक पदार्थ ‘राइसिन’ तैयार करने और देश के विभिन्न शहरों में आतंकी हमले की साज़िश के आरोप में गिरफ्तार किया।

डिजिटल फॉरेंसिक जांच में सामने आया कि यह पूरा नेटवर्क भी विदेशी संचालकों, गुप्त एन्क्रिप्टेड संचार और ऑनलाइन धार्मिक उग्रवाद के माध्यम से संचालित हो रहा था। इस केस ने साफ़ कर दिया कि डिजिटल रेडिकलाइजेशन अब केवल विचारों या साइबर हमलों तक सीमित नहीं, बल्कि केमिकल टेररिज़्म की तैयारी तक पहुँच चुका है।

इन तमाम मामलों को साथ रखकर देखें, तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। पहले कट्टरता बंद कमरों की फुसफुसाहट थी; अब यह एन्क्रिप्टेड चैट में “मिशन” बन चुकी है। पहले नफरत भाषण थी; अब नफरत “एल्गोरिद्मिक फ़ीड” है, जो आपकी स्क्रीन पर खुद चलकर आती है। पहले आतंकी नेटवर्क पर्चे बाँटते थे; अब AI (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस/कृत्रिम बुद्धिमत्ता)-जनित वीडियो, एडिटेड क्लिप और ग्राफिक कंटेंट के ज़रिए भावनाएँ भड़काई जाती हैं।

भारत में NIA (नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी / राष्ट्रीय जांच एजेंसी), ATS, IB (इंटेलिजेंस ब्यूरो / खुफिया विभाग) और साइबर सेल जैसे तंत्र डिजिटल सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपयों का ढांचा खड़ा कर चुके हैं, लेकिन मूल सवाल वहीं का वहीं है—इतनी व्यापक निगरानी व्यवस्था के बावजूद यह नेटवर्क महीनों तक कैसे सक्रिय रहता है? कौन इन पोर्टलों और चैट-ग्रुप्स को बनाता और चलाता है? कौन इन्हें मॉडरेट करता है? कौन इन्हें “धर्मरक्षण” और “जिहाद” की भाषा देकर युवाओं तक पहुँचाता है? और सबसे अहम—क्यों हमारा सिस्टम उन शुरुआती संकेतों को पकड़ नहीं पाता, जहाँ एक सामान्य-सा युवा “फॉलोअर” से “सैनिक” में बदल जाने लगता है?

यह भी उतना ही गंभीर प्रश्न है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ और डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनी ज़िम्मेदारी से किस हद तक बच निकलते हैं। धार्मिक नफरत, चरमपंथी कंटेंट और हिंसा को ग्लोरिफाई करने वाली सामग्री पर स्वचालित अल्गोरिद्मिक निगरानी की बार-बार बात होती है, लेकिन ज़मीन पर इसका असर सीमित दिखाई देता है। जब तक कोई घटना विस्फोटक रूप ले लेती है या किसी ATS/स्पेशल सेल की कार्रवाई सामने नहीं आ जाती, तब तक ये प्लेटफॉर्म “कम्युनिटी गाइडलाइंस” के पीछे छिपे रहते हैं।

दूसरी तरफ, मौजूदा क़ानून—जैसे IT Act 2000 (सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000) और UAPA 1967 (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम 1967)—एक ऐसे डिजिटल खतरे का सामना कर रहे हैं जिसकी रफ्तार, तकनीकी चालाकी और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्किंग इन कानूनों की क्षमता से बहुत आगे निकल चुकी है। जब एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप, वीपीएन, क्रिप्टोकरेंसी और डार्क वेब जैसी तकनीकें किसी विचारधारा-आधारित हिंसा को बढ़ाने में लग जाती हैं, तो यह नया डिजिटल खतरा इतने तेज़ी से बदलता है कि पारंपरिक कानून अक्सर उसके पीछे छूटते नज़र आते हैं।

यह पूरा परिदृश्य सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों या क़ानून की बहस भर नहीं है। यह समाज के लिए भी एक आईना है। माता-पिता, शिक्षकों और संस्थाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि डिजिटल स्पेस आज केवल पढ़ाई, मनोरंजन या सूचना का माध्यम नहीं रहा—यह पहचान, विचार और आक्रोश गढ़ने की सबसे ताकतवर प्रयोगशाला बन चुका है। एक युवा के मोबाइल की स्क्रीन पर क्या चल रहा है, यह अब केवल “प्राइवेसी” का नहीं, समाज की सामूहिक सुरक्षा का भी सवाल है।

राजस्थान पत्रिका की खोज, खुली किताब की पूर्व रिपोर्ट में दर्ज नडियाद का संकेत, और अब द हिन्दू की केमिकल साज़िश वाली रिपोर्ट—इन तीनों को साथ रखकर देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत के सामने “डिजिटल कट्टरता” एक संगठित, बहुस्तरीय और दीर्घकालिक खतरे के रूप में खड़ी है। यह कोई दो-चार वेबसाइटों की समस्या नहीं, बल्कि एक बढ़ता हुआ डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर है, जिसके बीज कम दिखते हैं, पर असर सबसे गहरा होता है।

इस रिपोर्ट का मक़सद किसी एक समुदाय, धर्म या विचारधारा को निशाना बनाना नहीं, बल्कि उस डिजिटल ज़मीन को पहचानना है, जहाँ नफरत, उग्रता और हिंसा, “धर्म” और “कर्तव्य” के नाम पर बोई जा रही है। यह चेतावनी भी है—उन सभी संस्थानों, परिवारों, युवाओं और नीति-निर्माताओं के लिए, जो अभी भी इंटरनेट को महज़ समय बिताने का साधन मानते हैं।

असल सच यह है कि इंटरनेट आज भारत में नफरत और कट्टरता का सबसे आधुनिक हथियार बन चुका है—और इसे समझना, पहचानना और रोकना अब सिर्फ राज्य का नहीं, समाज का भी साझा उत्तरदायित्व है।

(यह रिपोर्ट राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित खोजी सामग्री, उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं और खुली किताब में 5 जुलाई 2025 को प्रकाशित रिपोर्ट के विश्लेषण पर आधारित एक स्वतंत्र, गहन पत्रकारितीय पड़ताल है।)

क्या सुप्रीम कोर्ट की सलाहकारी राय भारतीय संघवाद में राज्यपालों की भूमिका को और अधिक शक्तिशाली बना देती है?

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