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बिहार का राजनीतिक मंच — जहां वादे धूल उड़ाते हैं और इतिहास खुद को दोहराता है

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Written by
–नीलेश कटारिया

गंगा की हवा में इस बार सिर्फ चुनाव की नहीं, जवाबदेही की गंध है; जहाँ वादे दोहराए जा रहे हैं, वहीं जनता अपने प्रश्नों से इतिहास बदलने को तैयार है। नीतीश की थकान, तेजस्वी की उम्मीद और प्रशांत किशोर का प्रयोग — तीनों एक ही अखाड़े में हैं। यह चुनाव सिर्फ बिहार की सत्ता नहीं, भारत के लोकतंत्र की परिपक्वता का इम्तिहान है, और अगर जनता ने इस बार सोचकर मतदान किया — तो नतीजे पूरे देश का रास्ता तय करेंगे।


पटना, 4 नवंबर  2025 । गंगा के किनारे की हवा में चुनाव की गंध घुल चुकी है। पटना की गलियों में बहसें हैं, चाय की दुकानों पर भविष्य की फुसफुसाहटें। यह वही समय है जब बिहार का हर मोड़, हर आवाज़ और हर दीवार लोकतंत्र की नई परिभाषा लिखती नज़र आती है।

बिहार — यह नाम केवल एक राज्य नहीं, बल्कि एक जीवित महाकाव्य है। गंगा की लहरों से जन्मा, बौद्ध भिक्षुओं की साधना से निखरा और आज़ादी की क्रांति से गूंजा यह प्रदेश राजनीति के रंगमंच पर आते ही बदल जाता है — एक ऐसे नाट्य-संघर्ष में जहाँ नायक और खलनायक की भूमिकाएँ जातीय समीकरणों की छाया में निरंतर अदलती-बदलती रहती हैं।

मतदान के अंतिम दौर में चुनावी हवा अपने चरम पर पहुँच गई है — हर दल के दिग्गज नेता, केंद्रीय मंत्री और क्षेत्रीय चेहरों ने पूरी ताक़त झोंक दी है। रोड शो से लेकर आमसभाओं तक, पटना से सीमांचल तक सड़कों पर राजनीतिक तापमान उबाल पर है।

243 सीटों वाली इस विधानसभा के लिए होने वाले 2025 के चुनाव, जो दो चरणों में — पहला 6 नवंबर और दूसरा 11 नवंबर — होंगे, तथा जिनकी मतगणना 14 नवंबर को तय है, केवल सत्ता का नहीं बल्कि बिहार की आत्मा का पुनर्परीक्षण हैं। यह वह क्षण है जब 7.42 करोड़ मतदाता तय करेंगे कि किस पार्टी की नीतियाँ और चेहरों को वे अपना भविष्य सौंपना चाहते हैं।

पहले चरण में लगभग 121 सीटों पर और दूसरे चरण में 122 सीटों पर मतदान होगा। संवेदनशील क्षेत्रों में 1,300 बूथों पर मतदान का समय घटाकर सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक निर्धारित किया गया है; सामान्य समय शाम 6 बजे तक रहता है। पहले चरण के मतदान वाले क्षेत्रों में आज से चुनाव प्रचार-प्रसार, जनसभाएँ और रोड शो पूरी तरह थम गए हैं — अब सियासी सरगर्मी मतदाताओं के अंतिम निर्णय में बदलने लगी है।

घोषित गठबंधनों और सीट-वितरण के अनुसार — राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में भाजपा और जद(यू) दोनों 101–101 सीटों पर मैदान में हैं, जबकि शेष 41 सीटों पर सहयोगी दल — हम (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) और आरएलएसपी — चुनाव लड़ रहे हैं। महागठबंधन (INDIA Bloc) में राजद (RJD) ने 143 सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए हैं, कांग्रेस लगभग 60 सीटों पर, जबकि वाम दल बाकी सीटों पर तालमेल के तहत उतरे हैं।

इन दो ध्रुवों के बीच प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी तीसरी दिशा बनाने की कोशिश में है — हालांकि अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इसे “प्रभाव से ज़्यादा प्रयोग” मान रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी का लक्ष्य इस चुनाव में हर सीट पर विजय दर्ज करना नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श और मतदाता-मानस पर ऐसा ठोस असर छोड़ना है, जो आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति की नई दिशा तय कर सके।

इन घोषणाओं ने बिहार की सियासी बिसात को लगभग तय कर दिया है, लेकिन मतदाता का मिज़ाज अभी भी तरल है। यह चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि जनता की समझ और जवाबदेही की परीक्षा है।

चक्रव्यूह की पृष्ठभूमि: इतिहास के आईने में वर्तमान

1990 का दशक सामाजिक न्याय का प्रतीक था — जब लालू प्रसाद यादव ने सत्ता को प्रतिनिधित्व की लड़ाई बना दिया। पर वही दौर धीरे-धीरे प्रशासनिक अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के आरोपों का पर्याय बन गया।

2005 में नीतीश कुमार ने “सुशासन” का सपना दिया — सड़कें बनीं, बिजली पहुँची और व्यवस्था पर विश्वास लौटा। पर प्रवासी मज़दूरों की मजबूरी और शिक्षा–स्वास्थ्य की कमी आज भी वैसी ही है — जैसे कोई अधूरी कविता जो हर सरकार के घोषणापत्र में दोहराई जाती है।

2020 में तेजस्वी यादव ने युवाओं की उम्मीदों को आवाज़ दी, पर महामारी, आर्थिक ठहराव और गठबंधन की खींचतान ने उस लहर को कमज़ोर कर दिया।

2025 का चुनाव इतिहास के उसी मोड़ पर लौटता दिख रहा है — पर इस बार मतदाता पहले से ज़्यादा सतर्क है। वह अब नारे नहीं सुनता, सवाल पूछता है। बिहार की राजनीति एक “सांस्कृतिक चक्रव्यूह” बन चुकी है — जहाँ वादे मिथक बनते हैं, गठबंधन विरोधियों के साथ नाचते हैं, और जनता अंततः वही तीर चलाती है जो इतिहास की दिशा तय करता है।

मंच के चेहरे: गठबंधन और गणित

बिहार का राजनीतिक माहौल इन दिनों पूरी तरह गरमाया हुआ है — और उसकी सबसे तीखी आँच राजधानी पटना में महसूस की जा सकती है। पोस्टरों से सजी दीवारें, बैनरों से ढकी सड़कें और सोशल मीडिया पर चढ़ती बयानबाज़ी — सब एक ही सवाल की ओर इशारा कर रहे हैं: “अबकी बार कौन?”

NDA के केंद्र में हैं नीतीश कुमार — एक अनुभवी लेकिन थके हुए सेनापति। उनके चेहरे पर प्रशासनिक दृढ़ता की लकीरें हैं, पर थकान भी साफ़ झलकती है। भाजपा उनके साथ है, पर उसका आत्मविश्वास “सहयोग” से ज़्यादा “संकेत” में झलकता है।

महागठबंधन तेजस्वी यादव को युवा विकल्प के रूप में पेश कर रहा है — उनकी आवाज़ में जोश है, लेकिन अनुभवी सियासत की ज़मीन अब भी दूर दिखती है।

दोनों गठबंधन एक बार फिर वही पुराना फ़ॉर्मूला दोहरा रहे हैं — NDA का EBC (अति पिछड़ा वर्ग)–महादलित संतुलन और RJD का यादव–मुस्लिम समीकरण। कांग्रेस अपनी प्रासंगिकता शहरी व प्रगतिशील वर्ग के भरोसे ढूँढ रही है।

बीच में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी तीसरी धुरी बनने की कोशिश में है। उसके समर्थक इसे “जन-जागरण आंदोलन” बताते हैं, जबकि विरोधी इसे “वोट-कटवा प्रयोग” करार देते हैं। पटना में बातचीत के दौरान जब इस सवाल का ज़िक्र छेड़ा गया, तो प्रशांत किशोर हल्की मुस्कान के साथ बोले — “अगर हमारी उपस्थिति किसी को डरा रही है, तो इसका मतलब हमने असर डाला है।” उनका अंदाज़ बताता है कि जन सुराज हर सीट पर नहीं, लेकिन हर चर्चा में मौजूद रहना चाहती है — ताकि बिहार की राजनीति नारे से नीति की ओर लौट सके।

राजनीति की इस बिसात के बीच कुछ ऐसे मुद्दे भी हैं, जिन पर कोई दल ज़्यादा बोलना नहीं चाहता। शराबबंदी, जो बिहार सरकार की सबसे बड़ी सामाजिक नीति रही है, अब राजनीतिक उलझन बन चुकी है। सरकार कहती है कि “नशामुक्त बिहार” अभियान सफल है, पर ज़मीनी हकीकत कुछ और कहती है — गाँवों से लेकर कस्बों तक अवैध शराब की बिक्री और उसके दुष्परिणामों पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। यह मुद्दा केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और प्रशासनिक ईमानदारी का प्रतीक बन गया है।

इसी बीच चुनाव आयोग और गृह मंत्रालय ने बिहार को “उच्च-संवेदनशील राज्य” मानते हुए सुरक्षा व्यवस्था को अभूतपूर्व स्तर तक मज़बूत किया है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (Central Armed Police Forces – CAPF) की 1,200 से अधिक कंपनियाँ राज्य भर में तैनात की गई हैं। इन बलों में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF), सीमा सुरक्षा बल (BSF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और सशस्त्र सीमा बल (SSB) की यूनिटें शामिल हैं। साथ ही, राज्य पुलिस के 50,000+ जवानों की अतिरिक्त तैनाती की गई है ताकि संवेदनशील बूथों और सीमावर्ती जिलों में शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित हो सके।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, सभी 38 जिलों में हर 8–12 मतदान केंद्रों को एक समूह (क्लस्टर) में बाँटा गया है, और उस समूह की सुरक्षा व व्यवस्था की जिम्मेदारी एक अधिकारी को सौंपी गई है। इससे सुरक्षा, परिवहन और आपात प्रबंधन की प्रक्रिया आसान और त्वरित हो जाती है। सीमांचल के कटिहार, किशनगंज, अररिया और सहरसा जैसे जिलों में अतिरिक्त गश्त और हवाई निगरानी की व्यवस्था की गई है। चुनाव आयोग का स्पष्ट संदेश है — “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों पर कोई समझौता नहीं।”

मुद्दों और मतदाताओं की गूंज: बिहार की बदलती नब्ज़

सड़कों पर अब नारे कम हैं, सवाल ज़्यादा। कॉलेजों के बाहर युवाओं के झुंड बेरोज़गारी पर बहस करते हैं, तो गाँव की महिलाएँ राशन की पर्चियों से आगे शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा की बात करने लगी हैं। यह वही बिहार है जहाँ राजनीति अब मंच से ज़्यादा मोबाइल स्क्रीन पर खेली जा रही है — जहाँ हर वीडियो, रील और लाइव सेशन में किसी की उम्मीद, किसी का आक्रोश और किसी का व्यंग्य तैरता दिखता है।

1 जनवरी 2025 की पात्रता तिथि पर तैयार ‘आयु-आधारित मतदाता जानकारी रिपोर्ट’ के अनुसार, 18–29 वर्ष की आयु के पंजीकृत मतदाता बिहार की कुल मतदाता सूची का लगभग 21.03% हिस्सा हैं। यह वर्ग निर्णायक तो है, पर बहुमत नहीं, और यही कारण है कि चुनावी रणनीतियों में ‘युवा मतदाता’ अब निर्णायक केंद्र के रूप में उभर रहे हैं।

उसी अवधि की प्रारंभिक सूची में लगभग 7.80 करोड़ मतदाता दर्ज थे — जिनमें 52.25% पुरुष, 47.75% महिला और 0.003% (कुल 2,254) तृतीय लिंग मतदाता शामिल थे (प्रतिशतों का योग राउंडिंग के कारण 100% से थोड़ा-सा भिन्न दिख सकता है)। बाद में SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया, 24 जून–30 सितंबर 2025) के तहत मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया गया, जिसके बाद अंतिम मतदाता संख्या घटकर लगभग 7.42 करोड़ रह गई — यह आँकड़ा अब बिहार की चुनावी वास्तविकता की सबसे प्रमाणिक तस्वीर प्रस्तुत करता है।

2020 के चुनाव में महिला मतदान दर पुरुषों से अधिक रही थी (लगभग 59.6% विरुद्ध 54.7%) — और यह रुझान अब और मज़बूत हुआ है। बिहार की राजनीतिक ज़मीन पर “महिला मतदाता” अब केवल संख्या नहीं, बल्कि एक चेतना हैं — जिनके सवाल घोषणापत्रों से नहीं, जीवन की वास्तविकताओं से जुड़े हैं: “बच्चा स्कूल तक सुरक्षित पहुँचेगा?”, “शाम को रोशनी रहेगी?”, “सरकारी दवा मुफ़्त तो है, पर असरदार भी है या नहीं?” — यही सवाल अब राजनीति को धरातल से जोड़ रहे हैं।

सीमांचल और मगध क्षेत्रों में धार्मिक–सामाजिक ध्रुवीकरण की झलक अब भी दिखती है, लेकिन बिहार की असली ताकत उसकी विविधता में है — जहाँ जाति और धर्म के ऊपर अब युवा चेतना और डिजिटल संवाद अपनी जगह बना रहे हैं। मतदाताओं की यह नई पीढ़ी सिर्फ चुनाव नहीं लड़ रही, बल्कि लोकतंत्र की परिभाषा को नया आकार दे रही है।

संभावनाओं का क्षितिज: सत्ता किसकी, सपना किसका

पटना की शामें इन दिनों असामान्य रूप से व्यस्त हैं। हर राजनीतिक दफ्तर देर रात तक जगमगाता रहता है — पोस्टर, प्रेस नोट और रणनीति बैठकों की लगातार गूंज है। सत्ता का समीकरण इस बार उतना सरल नहीं जितना पोस्टरों पर दिखता है। सड़कों पर चुनावी शोर है, लेकिन अंदरखाने हर दल को एहसास है कि परिणाम किसी एक लहर से तय नहीं होंगे, बल्कि सूक्ष्म बदलावों से बनेंगे।

युवा मतदाता बेरोज़गारी और शिक्षा पर अडिग सवाल कर रहा है; महिलाएँ अब हर मोहल्ले में सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को चुनावी कसौटी बना चुकी हैं। प्रवासी मजदूरों के लिए “घर के भीतर रोज़गार” अब सिर्फ नारा नहीं, बल्कि निर्णायक प्रतीक बन गया है। यही तीन वर्ग — युवा, महिला और प्रवासी — इस बार मतदान का असली अक्ष बनने वाले हैं।

राजनीतिक पंडितों का अनुमान है कि NDA हल्की बढ़त बनाए हुए है, लेकिन महागठबंधन की ज़मीनी पैठ अब भी गहरी है। दोनों के बीच की रेखा को “मौन मतदाता” तय करेगा — वह मतदाता जो किसी सर्वे में शामिल नहीं, पर हर बूथ पर मौजूद है। गाँवों में जातीय समीकरण अब भी असर रखते हैं, पर पहली बार डिजिटल संवाद ने उस पर परतें चढ़ा दी हैं — “व्हाट्सऐप” और “फेसबुक” की बहसें अब वही कर रही हैं जो कभी चौपालें करती थीं; फर्क बस इतना है कि इस बार दर्शक पूरी दुनिया है।

नीतीश कुमार के लिए यह चुनाव उनकी राजनीतिक विरासत की परीक्षा है — क्या “सुशासन” की थ्योरी जनता को अब भी विश्वास दिला सकेगी? तेजस्वी यादव के लिए यह नेतृत्व की परीक्षा है — क्या वह युवा जोश को ठोस नीति में बदल पाएँगे? और प्रशांत किशोर के लिए यह प्रयोग की परीक्षा है — क्या उनका जन संवाद भविष्य की राजनीति की नई भाषा गढ़ सकेगा?

कुल मिलाकर यह चुनाव न तो सिर्फ सत्ता का है और न ही सिर्फ चेहरे का — यह उस सपने का इम्तिहान है जिसमें बिहार अपना भविष्य देख रहा है। क्योंकि इस बार जनता ने तय कर लिया है कि सरकारें बदलें या चेहरे, सवाल वही रहेंगे — “क्या इस बार वादे ज़मीन पर उतरेंगे?

लोकतंत्र का आईना — बिहार से भारत तक

गंगा की ठंडी हवा में इन दिनों एक अनकही बेचैनी तैर रही है — यह सिर्फ मौसम की नहीं, मन की हलचल है। पटना की दीवारों पर चिपके पोस्टर अब केवल वादों के प्रतीक नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों और अधूरे सपनों की याद दिलाते हैं। चौक-चौराहों से लेकर मोबाइल स्क्रीन तक, हर जगह सवाल वही है — “कौन समझेगा बिहार को?

यह चुनाव बिहार के लिए सिर्फ सत्ता परिवर्तन का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का क्षण है। जब जनता सोच रही है कि क्या लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित रह गया है या अब वह जवाबदेही का नया चेहरा तलाशेगा। यह वही बिहार है जिसने कभी जेपी आंदोलन से देश की दिशा बदली थी, और अब वही राज्य एक बार फिर भारत के लोकतांत्रिक विवेक की परीक्षा ले रहा है।

गाँवों की चौपालों से लेकर शहरों की प्रेस कॉन्फ़्रेंस तक, लोगों की बातचीत में अब भविष्य की गंध है — लोग नेताओं से कम, नीतियों से ज़्यादा उम्मीद कर रहे हैं। यह वही सूक्ष्म परिवर्तन है जहाँ लोकतंत्र अपने असली अर्थ में आकार लेता है।

मतदान से पहले की यह ख़ामोशी बहुत कुछ कहती है — यह जनता की थकान नहीं, उसकी परिपक्वता का संकेत है। बिहार का मतदाता अब जानता है कि सच्चा बदलाव भाषणों से नहीं, निरंतरता से आता है। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है — और शायद यही वह संदेश है जो पूरे भारत को सुनना चाहिए।

क्योंकि बिहार हमेशा से इस देश का आईना रहा है — जहाँ जो विचार जन्म लेते हैं, वे जल्द ही राष्ट्रीय विमर्श बन जाते हैं। 2025 का यह चुनाव तय करेगा कि भारत का लोकतंत्र वादों की पुनरावृत्ति में उलझा रहेगा या जवाबदेही की नई संस्कृति की ओर बढ़ेगा।

और अगर बिहार ने इस बार सही दिशा चुनी — तो यह केवल एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की जीत होगी। क्योंकि जब बिहार सोचता है — भारत बदलता है।

क्या बिना तय समय-सीमा के, राज्यपालों द्वारा बिलों पर देरी राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बढ़ाती है?

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