
दीपावली हर साल याद दिलाती है कि अंधकार का असली स्रोत बाहर नहीं, भीतर है। जब आत्मा ने अपने तेज को शरीर की पहचान में खो दिया, तभी दीयों की ज़रूरत पड़ी। आज भी हर दीप हमें पुकारता है — ‘जिसे तुम बाहर खोजते हो, उसकी चिंगारी तुम्हारे भीतर ही जल रही है — बस उसे पहचानने की ज़रूरत है।’ प्रकाश लौटेगा तभी, जब पहचान लौटेगी।
“सतयुग में दीपावली नहीं होती थी, क्योंकि वहाँ अंधेरा था ही नहीं — सबकी ज्योति जली हुई थी।”
ब्रह्मकुमारीज़ ईश्वरीय विश्वविद्यालय की यह पंक्ति केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक सत्य-स्मृति है। यह याद दिलाती है कि दीवाली बाहरी दीयों की नहीं, भीतर की रोशनी के जागरण का उत्सव है।
ब्रह्मकुमारीज़ के अनुसार, सतयुग वह युग था जब आत्मा अपने परम शुद्ध स्वरूप में थी — निर्मल, शांत और आलोकमय। वहाँ अंधकार, अर्थात अज्ञान, का अस्तित्व ही नहीं था, क्योंकि हर आत्मा अपने आत्मिक तेज से स्वयं प्रकाशित थी।
जब आत्मा ने अपने को शरीर मान लिया, तो अहंकार और अज्ञान के धुएँ ने उसकी ज्योति को ढँक दिया। यही वह क्षण था जब प्रकाश बाहर खोजा जाने लगा और आरंभ हुआ दीपों का पर्व, एक स्मृति के रूप में कि — “चलो, फिर से अपनी ज्योति जलाएँ।”
आज जब हम दीप जलाते हैं, तो यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक मौन संकल्प है, कि “मैं फिर से अपने सच्चे स्वरूप (ज्योति-स्वरूप आत्मा) को पहचानूँगा/पहचानूँगी।” यही भीतर की दीपावली का अर्थ है।
धनतेरस: जब आत्मा सच्चे धन को पहचानती है
धनतेरस का अर्थ केवल सोना-चाँदी खरीदना नहीं है; यह वह दिन है जब आत्मा को अपने असली धन की स्मृति दिलाई जाती है। ‘धन’ का गूढ़ अर्थ है — धर्म, धारणा और सद्गुणों का ख़ज़ाना।
ब्रह्मकुमारीज़ की दृष्टि से, “धन वही है जो धर्म में लगे और जीवन को सात्त्विक बनाए।” बाज़ारों की चकाचौंध में जहाँ सब बाहरी वैभव खोजते हैं, वहाँ यह दिन हमें भीतर की शांति का आमंत्रण देता है। दीपक का पहला प्रकाश केवल घर नहीं, मन की धूल भी साफ करता है।
इस दिन जब हम दीप जलाएँ, तो यह संकल्प करें कि — “लोभ नहीं, लौ जलाऊँगा।” क्योंकि सच्चा धन वही है जो आत्मा को हल्का करे, और उसकी अंतर-ज्योति को स्थायी रूप से प्रज्वलित रखे।
काली चौदस / नरक चौदस: भीतर के अंधकार से मुक्ति का संकल्प
जिसे कई स्थानों पर “काली चौदस” कहा जाता है, उसे पश्चिम और दक्षिण भारत में “नरक चौदस” के नाम से जाना जाता है। नाम भले अलग हों, पर अर्थ एक ही है — अंधकार और विकारों से मुक्ति का दिन।
पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था। पर इसका गूढ़ अर्थ बाहरी युद्ध नहीं, भीतर के नरक से मुक्ति है। ब्रह्मकुमारीज़ की शिक्षा यह बताती है कि— “मन का अंधकार ही असली नरक है, और आत्म-जागरूकता ही उसका अंत।”
यह दिन स्मरण कराता है कि बाहरी दीया तब तक अर्थहीन है, जब तक मन की गुफ़ा में बसे अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और अज्ञान जैसे राक्षस समाप्त न हों। हर आत्मा को अपने भीतर के इन राक्षसों से युद्ध करना होता है — क्योंकि विकारों पर विजय ही सच्चा राक्षस-वध है।
जब हम इस दिन अपने दोषों, दुर्बलताओं और नकारात्मक विचारों को त्यागते हैं, तो भीतर से एक नई रोशनी जन्म लेती है — ऐसी ज्योति जो अगले दिन की दीपावली के स्वागत के लिए आत्मा को शुद्ध कर देती है। इसलिए यह चौदस केवल दीपक का नहीं, दिशा का पर्व है — जहाँ आत्मा यह मौन संकल्प करती है: “अब मैं अपने भीतर की अंधेरी गुफ़ा से बाहर निकलूँगा / निकलूँगी।” यही आत्म-शुद्धि का क्षण है, जो आत्मा को अगली सुबह की आध्यात्मिक दिवाली के योग्य बनाता है।
दीपावली: आत्म-ज्योति का पुनर्जागरण
दीपावली केवल राम के लौटने की कथा नहीं, बल्कि हर आत्मा की घर-वापसी की स्मृति है — जहाँ वह परमपिता परमात्मा की गोद में विश्रांति पाती है।
ब्रह्मकुमारीज़ का मत है कि, यह दिन स्वरूप-स्मरण का पर्व है। दीपक केवल मिट्टी का नहीं, आत्मा का प्रतीक है — तेल है ईश्वर-स्मृति, और बाती है एकाग्रता। ब्रह्मकुमारीज़ की दृष्टि में आत्मा का प्रकाश दो भृकुटियों के बीच विराजमान है, पर जब वह प्रेम में झिलमिलाती है, तो हृदय भी उजाला पा लेता है।” जब ये दोनों मिलते हैं, तब भीतर की लौ स्थिर होती है — और आत्मा फिर से अपनी उजियारी पहचान लेती है।
दीपावली हमें स्मरण दिलाती है कि सच्चा प्रकाश बाहर से नहीं आता — वह भीतर से उठता है, जब आत्मा अपने मूल स्वरूप — शांति, पवित्रता और प्रेम — को पहचान लेती है। जब हम इस दिन घर सजाते हैं, तो यह केवल दीवारों को नहीं, अपनी चेतना को आलोकित करने का संकेत है। क्योंकि बाहर की रोशनी कुछ घंटे रहती है, पर भीतर की ज्योति एक बार जल जाए, तो वह युगों तक जगमगाती रहती है। इसलिए दीपावली का सच्चा अर्थ है — “प्रकाश जलाना नहीं, स्वयं प्रकाश बन जाना।”
गोवर्धन पूजा / अन्नकूट: कृतज्ञता और संरक्षण का पर्व
दिवाली के अगले दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा केवल पर्वत की कथा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का सजीव प्रतीक है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया, तो यह केवल चमत्कार नहीं था — यह संदेश था कि सुरक्षा का अर्थ केवल रक्षा नहीं, सहयोग भी है।
ब्रह्मकुमारीज़ का यह भी मानना है, प्रकृति और मानव आत्मा एक ही तंतु से जुड़े हैं। जब आत्मा शुद्ध होती है, तो प्रकृति स्वतः संतुलित हो जाती है। इस दिन अन्नकूट का प्रसाद बनाना, धरती के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम है — क्योंकि जो हमें अनाज, जल, वायु और जीवन देती है, वह केवल उपभोग की नहीं, आदर की पात्र है।
गोवर्धन पर्वत उठाने का अर्थ यह भी है कि हम अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें — “अगर मैं किसी के बोझ को हल्का कर सकता हूँ, तो वही सच्ची पूजा है।” इस दिन स्मरण रहे कि धर्म केवल उपासना नहीं, प्रकृति और समाज की सेवा भी है। जब आत्मा भीतर से कृतज्ञ होती है, तो हर भोजन अन्नकूट बन जाता है, और हर कर्म ईश्वर-अर्पण। यही गोवर्धन पूजा का सच्चा अर्थ है — कृतज्ञता, संरक्षण और सह-अस्तित्व की साधना।
भाईबीज: बंधनों की पवित्रता और आत्मिक सुरक्षा का व्रत
भाईबीज केवल भाई-बहन के तिलक और उपहारों का उत्सव नहीं, बल्कि संबंधों की पवित्रता और आत्मिक सुरक्षा का व्रत है। यह दिन याद दिलाता है कि रिश्ते केवल रक्त से नहीं, भावना और विश्वास से जीवित रहते हैं।
ब्रह्मकुमारीज़ का कहना है कि , हर आत्मा ईश्वर की संतान है — अर्थात हम सभी एक ही आत्मिक परिवार के सदस्य हैं। इस दृष्टि से भाईबीज केवल पारिवारिक नहीं, सार्वभौमिक प्रेम का प्रतीक बन जाता है।
जब बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती है, तो यह केवल रक्षा का नहीं, स्मृति का संस्कार है — कि “हम दोनों आत्माएँ ईश्वर की ज्योति से उत्पन्न हैं।” और जब भाई वचन देता है, तो वह केवल भौतिक सुरक्षा का नहीं, सम्मान और सद्भाव की रक्षा का संकल्प लेता है।
यह दिन सिखाता है कि हर संबंध तब तक स्थायी है जब तक उसमें आत्मा का आदर है। प्रेम में स्वार्थ नहीं, तो वह रक्षा बन जाता है; संबंध में विश्वास है, तो वह वरदान बन जाता है। इसलिए भाईबीज की सच्ची भावना यही है — “सुरक्षा प्रेम से हो, और प्रेम आत्मा से।” यही वह सूत्र है जो हर बंधन को अहंकार से मुक्त कर आत्मिक रिश्ते में बदल देता है।
जब आत्मा फिर से जगमगाने लगती है
आज दीपावली है — घर जगमगा रहे हैं, पर मनों में सन्नाटा है। दीवारों पर रोशनी की धाराएँ हैं, पर आत्मा के आकाश में कहीं धुंध फैली है। ब्रह्मकुमारीज़ का मानना हैं कि— “पहले मन की सफाई करो, फिर दीप जलाओ, क्योंकि धूल-भरे मन पर रोशनी टिकती नहीं।”
सतयुग में दीपावली की आवश्यकता ही नहीं थी — क्योंकि तब हर आत्मा स्वयं प्रकाश थी। अंधकार का अस्तित्व ही नहीं था। पर जब आत्मा ने अपने को शरीर मान लिया, तो उसका आलोक क्षीण हुआ। अब दीपावली इसलिए मनाई जाती है — ताकि वह खोया हुआ प्रकाश फिर लौट आए।
जब आत्मा की ज्योति प्रज्वलित होती है, तो कोई भी अंधकार स्थायी नहीं रहता — क्योंकि वह दीप अब मिट्टी का नहीं, चेतना का दीप है, जो कभी बुझता नहीं।
खुली किताब दृष्टि
यह लेख ब्रह्मकुमारीज़ ईश्वरीय विश्वविद्यालय की शिक्षाओं और पारंपरिक हिंदू पंचदिवसीय पर्व की आध्यात्मिक व्याख्या पर आधारित है। इसका उद्देश्य बाहरी उत्सव के साथ-साथ आंतरिक परिवर्तन की प्रेरणा देना है, क्योंकि बाहर का दीप कुछ क्षण जलता है, पर स्वयं प्रकाश बन जाना — यही दिवाली का सार है।









