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गुजरात हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में उठे सवाल — GHAA के ईमेल के बाद खुला न्यायिक प्रशासन का विरोधाभास

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Written by
–नीलेश कटारिया

‘मुझे पता ही नहीं था’ — मुख्य न्यायाधीश के इस बयान ने बढ़ाई बहस; बार ने एक ही दिन में दो बार रखी शिकायत, रजिस्ट्री की अव्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल


अहमदाबाद, 9 अक्टूबर 2025। गुजरात हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जारी ठहराव और नई SOP (Standard Operating Procedure) के खिलाफ बढ़ता असंतोष गुरुवार को एक अप्रत्याशित मोड़ पर पहुँचा। कई हफ्तों से फाइलिंग और लिस्टिंग की प्रक्रिया बाधित थी; मामूली टाइपिंग या ड्राफ्ट त्रुटियों पर केस लौटा दिए जा रहे थे और अधिवक्ता व क्लर्क रजिस्ट्री में लंबित फाइलों के ढेर से जूझ रहे थे।

हालात तब बदले जब बार की दो चरणों में हुई बैठकों और न्यायाधीशों से सीधे संवाद के बाद मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्टीकरण आदेश जारी किया और कहा कि “संवाद की संस्कृति ही स्थायी समाधान का आधार है।”

इस बयान के साथ विवाद का तत्काल पटाक्षेप तो हुआ, लेकिन सवाल बाकी रहा—क्या सचमुच अदालत की मुखिया को यह सब पहले से पता नहीं था?

पहला झटका: GHAA का 8 अक्टूबर का ईमेल

8 अक्टूबर की शाम गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHAA) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को एक औपचारिक ईमेल भेजा। ईमेल में आरोप था कि नई SOP के कारण “न्यायिक प्रक्रिया लगभग ठप पड़ चुकी है” और अधिवक्ताओं को “छोटी-छोटी तकनीकी आपत्तियों” के नाम पर कार्य से रोका जा रहा है। यह शिकायत सीधे सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँची, जिससे प्रशासनिक स्तर पर दबाव बना।

सूत्रों के अनुसार, ईमेल में मौजूदा मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल के स्थानांतरण पर विचार करने का अनुरोध भी दर्ज था, यह कहते हुए कि उनके कार्यभार संभालने के बाद प्रशासनिक समस्याएँ बढ़ीं और वादियों व अधिवक्ताओं को अधिक कष्ट झेलना पड़ा। इस उल्लेख ने ईमेल को सामान्य शिकायत से अधिक गंभीर व प्रभावशाली बना दिया और 9 अक्टूबर की सुबह अदालत का माहौल बदल गया।

अगली सुबह: अदालत में ‘जानकारी देर से मिलने’ का दावा

9 अक्टूबर की सुबह, कोर्ट असेंबल के दौरान मेंशनिंग सेशन में जब एक वकील ने रजिस्ट्री की समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया, तो मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल ने कहा कि उन्हें यह समस्या “पिछली शाम या रात में ही पता चली है।” उन्होंने बताया कि एक क्लैरिफिकेशन नोटिफिकेशन जारी किया गया है, जिसके अनुसार ड्राफ्ट अमेंडमेंट वाले सभी केस सीधे संबंधित कोर्ट में सूचीबद्ध होंगे और फाइलिंग नंबर नहीं रोका जाएगा।

केवल कल देर शाम को ही उन्हें अधिवक्ताओं और क्लर्कों द्वारा झेली जा रही लगातार कठिनाइयों के बारे में जानकारी हुई।

यह वक्तव्य अधिवक्ताओं के बीच चर्चा का कारण बना, क्योंकि यही समस्या कई हफ्तों से चल रही थी। स्वाभाविक प्रश्न उठा—यदि शीर्ष पदाधिकारी को देर से पता चला, तो क्या प्रशासनिक तंत्र में सूचना-प्रवाह कहीं कमजोर या अवरुद्ध था?

दोपहर 2:20 बजे — पहली औपचारिक बैठक

मेंशनिंग सेशन के कुछ घंटे बाद, GHAA की प्रतिनिधि टीम दोपहर 2:20 बजे मुख्य न्यायाधीश से मिली। बैठक में अध्यक्ष एवं एडवोकेट बृजेश त्रिवेदी, एडवोकेट चंदनी जोशी और एडवोकेट दिलबर कॉन्ट्रैक्टर शामिल थे। मुख्य न्यायाधीश के साथ जस्टिस ए.एस. सुपेहिया, रजिस्ट्रार जनरल और रजिस्ट्रार (न्यायिक) उपस्थित थे।

मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि पहले एक समिति गठित कर उसके निर्णय लागू किए गए थे और उन्हें आभास था कि समस्याएँ समाप्त हो चुकी हैं; किंतु यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें बार की जारी कठिनाइयों की जानकारी देर से मिली। यह संकेत देता है कि रजिस्ट्री और न्यायिक प्रशासन के बीच संवाद-प्रणाली को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।

शाम 5:00 बजे — दूसरी बैठक और ठोस चर्चा

शाम 5:00 बजे GHAA का दूसरा प्रतिनिधिमंडल फिर मुख्य न्यायाधीश से मिला। इस बार प्रतिनिधियों में हार्दिक ब्रह्मभट्ट, चंदनी जोशी, दिलबर कॉन्ट्रैक्टर और आकाश पंड्या शामिल थे। मुख्य न्यायाधीश के साथ जस्टिस सुपेहिया, जस्टिस रे, रजिस्ट्रार जनरल और रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) भी उपस्थित थे।

अधिवक्ताओं ने बताया कि SOP में हालिया संशोधनों के बावजूद व्यावहारिक दिक्कतें बनी हुई हैं। मुख्य न्यायाधीश ने सभी बिंदु सुने और निर्देश दिया कि रजिस्ट्रार जनरल व रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) समस्याओं की विस्तृत सूची तैयार करें तथा शनिवार को विशेष रूप से रजिस्ट्री खोलकर लंबित फाइलों के निपटारे की प्रक्रिया शुरू करें। साथ ही उन्होंने पुनः रेखांकित किया कि “सीधा संवाद ही स्थायी सुधार का रास्ता है।”

प्रश्न जो अब भी बाकी है: क्या सचमुच पता नहीं था?

एक ओर मुख्य न्यायाधीश का कहना कि उन्हें देर से जानकारी मिली, और दूसरी ओर GHAA का दावा कि समस्या कई हफ्तों से जारी थी—इन दोनों के बीच का अंतर न्यायिक पारदर्शिता पर प्रश्न खड़ा करता है। कानूनी दृष्टि से, यदि वास्तव में देर से जानकारी मिली तो यह प्रशासनिक निगरानी-प्रणाली की कमी दर्शाता है; और यदि पहले से जानकारी होते हुए भी ठोस कार्रवाई न हुई हो, तो यह अधिक गंभीर प्रश्न बनता है, जिसे “न्यायिक मौन” के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।

उपरोक्त किसी भी स्थिति में यह स्पष्ट हुआ कि रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली एक अवधि के लिए मुख्य न्यायाधीश के प्रत्यक्ष नियंत्रण से आंशिक रूप से बाहर जाती दिखी—और GHAA का ईमेल उस मौन को तोड़ने वाला निर्णायक क्षण बना।

बार की भूमिका और संस्थागत मर्यादा

GHAA ने स्पष्ट किया कि उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि संवाद व सुधार है। अध्यक्ष बृजेश त्रिवेदी ने कहा कि “हम संस्थान की गरिमा में विश्वास रखते हैं, लेकिन जब संवाद रुकता है, तब आवाज़ उठाना हमारी जिम्मेदारी बन जाती है।”

बार ने रजिस्ट्री सुधार-प्रक्रिया की निगरानी जारी रखने और आवश्यकता होने पर पुनः मुलाकात करने की बात कही।

संवाद और जवाबदेही का सबक

यह प्रकरण दिखाता है कि गुजरात हाईकोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था में संचार-कमी कभी-कभी न्यायिक प्रशासन की बड़ी कमजोरी बन सकती है। जब अदालत की मुखिया कहें कि “उन्हें पता ही नहीं था”, तो यह वाक्य केवल सफाई नहीं—एक संस्थागत संकेत है कि सुधार केवल नोटिफिकेशन से नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता की संस्कृति से आता है।

क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिलों पर समय-सीमा तय न करने का निर्णय राज्यों के लिए शासन को और कठिन बनाता है?

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