
“स्वार्थ” शब्द सुनते ही मन में एक हलचल-सी होती है। हमारे संस्कारों में यह शब्द अक्सर नकारात्मक अर्थ में सुना गया है। हम सोचते हैं, स्वार्थी व्यक्ति वही है जो केवल अपने लिए जीता है, जो अपने लाभ के आगे दूसरों की भावनाओं को नहीं देखता।
पारंपरिक अर्थ : अपना हित, निजी लाभ
संस्कृत में “स्व” का अर्थ है स्वयं और “अर्थ” का अर्थ है लाभ या उद्देश्य। इस प्रकार, शब्दकोश में “स्वार्थ” का अर्थ हुआ — अपने हित की चाह।
यह अर्थ हमें चेतावनी देता है कि जब हमारा जीवन केवल अपने फायदे तक सीमित हो जाता है, तो हम रिश्तों की ऊष्मा, समाज की समरसता और आत्मा की शांति — तीनों को धीरे-धीरे खो देते हैं।
अति-स्वकेन्द्रित जीवन वही है, जहाँ मन केवल अपने लाभ को देखता है। ऐसा जीवन बाहर से भले सफल दिखे, पर भीतर से धीरे-धीरे रिक्त हो जाता है। यह व्याख्या हमें जागरूक करती है कि स्वार्थ तभी तक आवश्यक है जब तक वह जीवन के संतुलन को न बिगाड़े।
आध्यात्मिक अर्थ : स्व के रथ को स्वाहा करना
ब्रह्मकुमारीज की शिक्षण पद्धति ने इस शब्द को एक गहरे आध्यात्मिक अर्थ में रूपांतरित किया।
स्वार्थ का अर्थ है — स्वयं के रथ को अग्नि में अर्पित करना।
यहाँ “रथ” प्रतीक है हमारे अहंकार, इच्छाओं और नकारात्मक संस्कारों का, और “स्वाहा करना” का अर्थ है इन सबको ईश्वर की अग्नि में समर्पित कर देना।
यह दृष्टि हमें सिखाती है कि सच्चा स्वार्थ वही है जो हमें स्वार्थहीन बना दे। जहाँ हम अपने संकीर्ण “मैं” को त्यागकर ईश्वर की शरण में अपने “स्व” को पवित्र कर लें।
ऐसा स्वार्थ हमें धन या यश नहीं देता, बल्कि देता है आत्मिक शांति, स्थिरता और प्रेम। यह जीवन को न केवल सरल बनाता है, बल्कि आत्मा को हल्का और मुक्त भी करता है।
परिपूर्णता का मार्ग
शब्दकोश का अर्थ हमें सावधान करता है कि हम केवल अपने तक सीमित न रहें। आध्यात्मिक अर्थ हमें प्रेरित करता है कि हम स्वयं को ही साध लें।दोनों मिलकर बताते हैं कि जीवन का अर्थ विरोध में नहीं, बल्कि समर्पण में है।
भौतिक दृष्टि हमें जगाती है, और आध्यात्मिक दृष्टि हमें दिशा देती है। पहला अर्थ हमें सिखाता है क्या न करना चाहिए, और दूसरा अर्थ बताता है कैसे होना चाहिए। इस प्रकार स्वार्थ का वास्तविक अर्थ आत्मा को अपने भीतर के बंधनों से मुक्त करना है।
जीवन के लिए संदेश
सच्चा स्वार्थ वह नहीं जो हमें दूसरों से आगे रखे, बल्कि वह है जो हमें अपने भीतर के अहंकार से आगे बढ़ा दे।
जब हम अपने मन के रथ को ईश्वर की अग्नि में समर्पित करते हैं, तो भीतर एक असीम शांति उतरती है। यही वह क्षण होता है जब “मेरा” और “तेरा” मिट जाता है, और केवल एक ही सत्य शेष रह जाता है। हम सब उसी एक शक्ति के अंश हैं।
स्वार्थ तब नकारात्मक नहीं रह जाता, बल्कि आत्मोद्धार का साधन बन जाता है।
अपने भीतर के अहंकार को समर्पित कर,
व्यापक कल्याण में जुड़ना ही सच्चे स्वार्थ का मार्ग है।









