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थाली में सेंध: गुजरात की राशन प्रणाली में 56 लाख संदिग्ध लाभार्थी

गरीब गृहणी की उम्मीद—राशन कार्ड ही उसका सहारा: स्रोत: dcs-dof.gujarat.gov.in (संशोधित इमेज़)
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—विश्लेषण डेस्क

जहाँ भूख अब भी इंतज़ार में है, वहाँ रोटियों का हिसाब ग़लत हाथों में सिमट गया है।
कभी चूल्हे की राख में दबे सपने, कभी खामोश थालियों में बचे सवाल।
नायाब योजनाओं के बीच अदृश्य हाथों ने राहत की डोर खींच ली है।
गाँव से शहर तक गूँज यही है—हक़ का रास्ता सबसे लंबा और सबसे कठिन क्यों है?
गरीब गृहणी की उम्मीद, मज़दूर का पसीना, बुज़ुर्ग का भरोसा—सबकी परछाइयाँ अब व्यवस्था की चौखट पर ठहरी हैं।


अहमदाबाद, 3 अक्टूबर 2025। गुजरात की थालियों में रखे हर दाने की कीमत है। यह किसी गरीब माँ की हथेली का पसीना, किसी बुज़ुर्ग बाप की उम्मीद और किसी बच्चे की भूख का जवाब है। नेशनल फ़ूड सिक्योरिटी एक्ट, 2013 (NFSA) का वादा था कि ऐसी थालियाँ कभी खाली न रहें। लेकिन हालिया सरकारी बयानों से साफ़ होता है कि यह वादा चुपचाप टूट रहा है।


कानूनी ढाँचे की बुनियाद

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (NFSA) का उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को सस्ती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। NFSA पोर्टल के अनुसार, यह कानून देश की तीन-चौथाई (75%) ग्रामीण आबादी और आधी (50%) शहरी आबादी को कवर करता है। इस अधिनियम के तहत दो प्रमुख श्रेणियाँ लागू हैं–

  • अंत्योदय अन्न योजना: सबसे गरीब परिवारों को प्रति परिवार प्रति माह 35 किलोग्राम सब्सिडी वाला खाद्यान्न।
  • प्राथमिकता परिवार: पात्र परिवार के प्रत्येक सदस्य को प्रति माह 5 किलोग्राम सब्सिडी वाला खाद्यान्न।

यही कानूनी ढाँचा गुजरात सहित पूरे देश में पात्रता तय करने, राशन कार्ड जारी करने, वितरण और सत्यापन की प्रक्रिया का आधार है।

TOI की एक रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात सरकार ने स्वीकार किया है कि राज्य के 3.60 करोड़ NFSA लाभार्थियों में से 56.58 लाख कार्डधारकों को “संदिग्ध” के रूप में चिह्नित किया गया है। इनमें से 2,002 लाभार्थियों का जीएसटी टर्नओवर ₹25 लाख से अधिक है, जबकि आयकर विभाग के आंकड़ों के अनुसार 79,454 लाभार्थियों की वार्षिक आय ₹6 लाख से ऊपर है। चौंकाने वाली बात यह भी है कि 62% संदिग्ध लाभार्थियों ने पिछले एक वर्ष से अपने कार्ड का इस्तेमाल ही नहीं किया है।

फिलहाल सत्यापन की प्रक्रिया चल रही है और पात्रता सिद्ध न होने पर इन लाभार्थियों को “ग़ैर-NFSA” श्रेणी में वर्गीकृत किया जाएगा। गुजरात राज्य के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री कुंवरजी बावलिया ने स्पष्ट किया कि जिन लोगों को संदिग्ध सूची में रखा गया है, उन्हें दस्तावेज़ जमा करने का अवसर मिलेगा। यदि वैध प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं तो उनके राशन कार्ड रद्द नहीं किए जाएंगे।

राज्य सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि कई मामलों में राशन कार्ड केवल पहचान के दस्तावेज़ के रूप में प्राप्त किए गए प्रतीत होते हैं। इस अधिकारी के अनुसार, 62% संदिग्ध लाभार्थियों ने पिछले एक साल में अपने कार्ड का इस्तेमाल ही नहीं किया है।

इसका मतलब यह हुआ कि शेष करीब 38% संदिग्ध लाभार्थियों द्वारा लिए गए अनाज पर ही असली असर है—और अगर यह वर्ग अपात्र साबित होता है, तो अनुमानतः सरकारी खजाने में सालाना एक हज़ार करोड़ रुपये से अधिक की सेंध लग चुकी है।

सोचिए, हर छठा कार्डधारी ऐसा है जिसकी पात्रता पर सवाल खड़ा हो चुका है। यह महज़ एक आँकड़ा नहीं—यह उस मज़दूर की थाली से उठी हुई रोटी है, उस बूढ़ी माँ की कटोरी से गायब हुई दाल है, और उस बच्चे के भूखे पेट का सबूत है।

यह सिर्फ़ तकनीकी गड़बड़ी का मामला नहीं, बल्कि नीतिगत असफलता, वित्तीय नुकसान और संवैधानिक हनन का संकेत है। यह भूख पर राजनीति है, व्यवस्था पर सवाल है और इंसाफ़ पर चोट है—जहाँ अपात्र का कटोरा भरा हुआ है और असली हक़दार की थाली सूनी पड़ी है।


संदिग्ध लाभार्थियों का जाल

देश गुजरात की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सूरत में कार्रवाई बड़े पैमाने पर हुई। जिला आपूर्ति विभाग ने 3,19,339 लाभार्थियों को सात दिन में लिखित स्पष्टीकरण देने का नोटिस जारी किया है। सूची में ऐसे लोग शामिल हैं जिनकी वार्षिक आय ₹6 लाख से अधिक है; ऐसे परिवार जिनके पास GST TIN है और जिनका कारोबार ₹25 लाख से ऊपर है; प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के लाभार्थी; सरकारी अधिकारी और पदाधिकारी; अन्य राज्यों में राशन कार्ड रखने वाले; सौ वर्ष से अधिक आयु के दर्ज नाम; और ऐसे कार्ड भी जो छह से बारह महीने तक ‘साइलेंट’ रहे हैं। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अंतिम निर्णय अब तालुका-स्तरीय समितियाँ करेंगी कि किन लाभार्थियों को अनाज जारी रहेगा और किनका कार्ड निरस्त होगा।

वहीं, भास्कर इंग्लिश की रिपोर्ट यह दिखाती है कि जिस प्रणाली को गरीब की भूख मिटाने के लिए बनाया गया था, वहाँ अब अमीर और अपात्र लोग भी हिस्सेदारी कर रहे हैं। राजकोट ज़िले के जसदान और विन्चिया तालुकों में हुई प्रशासनिक पड़ताल में 20,340 राशन कार्डधारक सूचीबद्ध हुए—जिनमें 9,371 नाम जसदान और 10,969 नाम विन्चिया के हैं। इनमें से 69 लोग कंपनी निदेशक निकले और 19 लाभार्थियों का GST टर्नओवर ₹25 लाख से अधिक दर्ज हुआ। स्थानीय प्रशासन ने इन मामलों की जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

सूरत से लेकर राजकोट तक की ये तस्वीरें मिलकर यही बयान करती हैं कि NFSA की थाली पर हाथ डालने वाले केवल छोटे स्तर के लोग नहीं हैं। प्रभावशाली और संपन्न वर्ग तक यह समस्या फैली हुई है—और इसी वजह से असली हक़दार की थाली अक्सर हल्की पड़ जाती है।


सरकारी दावे, जनता की मुश्किलें

भूख और तकनीक का रिश्ता विडंबनापूर्ण है—मशीन की एक खामी, और पेट खाली। सरकार का दावा है कि योग्य लाभार्थियों का कार्ड रद्द नहीं किया जाएगा, लेकिन प्रक्रियागत जटिलताएँ गरीबों के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रही हैं।

‘साइलेंट कार्ड’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यदि राशन कार्ड तीन महीने तक उपयोग में न आए तो वह स्वतः निष्क्रिय हो जाता है। The New Indian Express की 11 जून 2025 की रिपोर्ट बताती है कि केवल तीन महीनों में गुजरात में चार लाख से अधिक कार्ड ‘साइलेंट’ घोषित हुए और लगभग दस लाख लाभार्थी राशन से वंचित रह गए, क्योंकि उनका e-KYC पूरा नहीं हो पाया।

इसके अलावा e-KYC और आधार फेस आईडी ने बुज़ुर्गों और महिलाओं को सबसे अधिक प्रभावित किया है। वहीं इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट से पता चलता है कि अन्न सुरक्षा अधिकार अभियान के जून 2025 में कराए गए सर्वे (चार जिले—दाहोद, पंचमहल, मोरबी और भावनगर) में सामने आया कि हज़ारों लोग बायोमेट्रिक मिलान न हो पाने के कारण हर महीने राशन की दुकानों से खाली हाथ लौट जाते हैं।


हक़ से वंचित आवाज़ें

विन्चिया के ’रामसिंह’ (निजता की सुरक्षा हेतु परिवर्तित नाम) काम की तलाश में राजकोट चले गए थे। महीनों बाद लौटने पर पाया कि उनका कार्ड ‘साइलेंट’ हो चुका है। दो महीने तक परिवार का चूल्हा उधार के अनाज से ही जला।

वडोदरा की ’आशाबेन’ 70 वर्ष (निजता की सुरक्षा हेतु परिवर्तित नाम) बीमारी के कारण तीन महीने राशन लेने नहीं जा सकीं। पहली बार दुकान पहुँचीं तो उन्हें बताया गया कि उनका कार्ड निष्क्रिय हो चुका है। आज भी वह कार्ड सक्रिय होने की प्रतीक्षा में हैं।

गुजरात में प्रवासी मज़दूरों की स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है। CLRA की दिसंबर 2024 की रिपोर्ट One Nation, Unequal Access के अनुसार, राज्य में ONORC (वन नेशन, वन राशन कार्ड) लागू होने के बावजूद लगभग 36.7% अंतरराज्यीय प्रवासियों ने बताया कि उनके पास सक्रिय राशन कार्ड नहीं था।

ध्यान देने योग्य है कि इस रिपोर्ट के बाद (दिसंबर 2024 से 2 अक्टूबर 2025 तक) सार्वजनिक रूप से ताज़ा आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए यह कहना कठिन है कि इस बीच स्थिति में कोई बदलाव हुआ हो।


प्रशासन और जवाबदेही का सवाल

गुजरात की NFSA वेबसाइट पर क्षेत्रवार राशन कार्ड विवरण मौजूद हैं; nfsa.gov.in पर उचित मूल्य दुकान (FPS) और कार्डधारकों के आंकड़े मिलते हैं; UMANG–उमंग पोर्टल पर My Ration (मेरा राशन) सेवा के ज़रिये कार्डधारक विवरण और FPS डेटा उपलब्ध है; और dcs-dof.gujarat.gov.in पर राशन कार्ड की श्रेणियाँ, FPS किराया और डीलरों का कमीशन दर्ज है।

इसके बावजूद यह सभी प्लेटफ़ॉर्म केवल सूचियाँ और बुनियादी डेटा देते हैं। सार्वजनिक ऑडिट या स्वतंत्र वैरीफ़िकेशन की प्रक्रिया अब तक स्पष्ट नहीं है। सरकार ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि अपात्रों की पहचान के लिए कौन-से मानक अपनाए गए और नामावली सार्वजनिक क्यों नहीं की गई।

यही वह बिंदु है जहाँ कानून खुद राज्य सरकार की जवाबदेही तय करता है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 की धारा 10(2) और धारा 11 का सरलीकृत सार यह है कि —

“राज्य सरकार पात्र परिवारों की सूची को ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए धारा 9 के अंतर्गत निर्धारित व्यक्तियों की संख्या के भीतर, उप-धारा (1) के अंतर्गत तैयार की गई दिशा-निर्देशों के अनुसार नवीनीकृत (अपडेट) करेगी। यही नहीं, राज्य सरकार पहचाने गए पात्र परिवारों की सूची को सार्वजनिक क्षेत्र में रखेगी और उसे प्रमुखता से प्रदर्शित करेगी।”

इस प्रावधान का सीधा आशय यह है कि सूची को नियमित रूप से नवीनीकृत (अपडेट) करने के लिए राज्य सरकारों को पात्रता की पुनःजाँच और दस्तावेज़ीय सत्यापन की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से अपनानी चाहिए।

अर्थात, भले ही अधिनियम में “पुनःसत्यापन” शब्द न हो, लेकिन इस कानून की भावना के अनुसार यह जिम्मेदारी निहित है—कि हर राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि हक़दारों की सूची समय-समय पर जाँची जाए और पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाए।

इसी बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट का 2017 का फैसला (स्वराज अभियान बनाम भारत संघ) और भी स्पष्ट दिशा देता है।
21 जुलाई 2017 के आदेश में अदालत ने कहा था कि—

“राज्य यह सुनिश्चित करें कि पात्रता सूचियों की नियमित समीक्षा हो ताकि कोई भी अपात्र व्यक्ति लाभ न ले सके और कोई भी पात्र व्यक्ति वंचित न रहे।”

कोर्ट ने इसे “continuous obligation” यानी निरंतर दायित्व कहा था — जो केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है।

इस पृष्ठभूमि में सवाल और गंभीर हो जाता है —अगर अब जाकर लाखों “संदिग्ध” कार्ड सामने आए हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि या तो प्रारंभिक स्क्रूटनी NFSA नियमों के अनुसार नहीं हुई, या फिर पिछले वर्षों में धारा 10(2) और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत नियमित समीक्षा ही नहीं की गई।

इस स्थिति में केवल लाभार्थियों की नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए — क्योंकि यह सिर्फ़ लाभ के दुरुपयोग का नहीं, बल्कि कानून और संविधान दोनों के उल्लंघन का मामला है।


राजनीति और सामाजिक असर

भूख पर भी राजनीति हो रही है। सत्ता पक्ष इसे सुधार और पारदर्शिता कहता है; विपक्ष का आरोप है कि रसूख़दार वर्ग वर्षों से इस व्यवस्था का लाभ ले रहा है और असली गरीबों को परेशान किया जा रहा है।

गाँवों और शहरों में चर्चाएँ गूंज रही हैं—

“जिनके घरों के आँगन में कार खड़ी है, वे भी सस्ते अनाज की थाली में हिस्सा ले रहे हैं; और जिनके घरों में चूल्हों के लिए लकड़ी तक नहीं है, उनका कार्ड ‘साइलेंट’ बता दिया गया है।”

यह चर्चा केवल ग़ुस्से की नहीं, बल्कि उस गहरी नाराज़गी की भी है जो व्यवस्था की विश्वसनीयता को चीरकर रख देती है।


पुरानी बीमारी का इतिहास

समस्या नई नहीं है। गुजरात में 2016 और 2019 में भी अपात्र लाभार्थियों को हटाने की कवायद की गई थी और लाखों कार्ड रद्द किए गए थे। लेकिन सार्वजनिक रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं है कि कितने अपात्र हटे और कितने असली हक़दार बाहर कर दिए गए। यही कारण है कि हर बार सुधार के नाम पर यह बीमारी दबा दी गई, ठीक कभी नहीं हुई।


सरकारी खजाने में डाका?

एक आम NFSA कार्डधारी को हर महीने औसतन ₹500–₹600 मूल्य का सब्सिडीयुक्त अनाज मिलता है। कुल 56.58 लाख संदिग्ध लाभार्थियों की पहचान हुई है। लेकिन विभागीय अधिकारी के मुताबिक इनमें से 62% ने पिछले एक साल से राशन लिया ही नहीं—यानी कार्ड महज़ पहचान के लिए बनवाए गए थे।

इसका मतलब साफ़ है—सरकारी खजाने में असल सेंध बाक़ी बचे 38% यानी करीब 21.5 लाख कथित संदिग्ध लाभार्थियों से पड़ी। अगर यह पूरा वर्ग अपात्र साबित होता है तो अनुमानतः सरकारी खजाने से सालाना ₹1,300 से ₹1,550 करोड़ तक की सब्सिडी ऐसे लोगों पर खर्च हो चुकी है जिन्हें इसका हक़ ही नहीं था।

यह रकम सिर्फ़ कागज़ पर गुम हुआ आँकड़ा नहीं है—यह उन गरीब घरों की बुझी हुई चूल्हों की आंच है, उन बच्चों की नींद में गूंजती भूख की कराह है, और उन बुज़ुर्ग हाथों की खाली हथेली है जो हर महीने अनाज की उम्मीद में फैलाई गई थी।

सरकार फिलहाल इन्हीं कार्डों की जाँच और पुष्टि की प्रक्रिया में जुटी है। लेकिन असली सवाल यह है—जब तक सत्यापन पूरा होगा, तब तक कितने असली गरीबों की थाली अपात्रों के नाम पर खाली होती रहेगी?

और असली सवाल यहीं खत्म नहीं होता। अब तक अपात्रों की वजह से जो सालाना एक हज़ार करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी डूबी, उसकी भरपाई कौन करेगा? क्या यह रकम सिर्फ़ सरकार की फाइलों और ऑडिट रिपोर्टों में दबी रह जाएगी, या फिर दोषियों को चिन्हित कर वसूली होगी? क्या उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी जिनकी लापरवाही या मिलीभगत से यह डाका संभव हुआ? और सबसे अहम—क्या राजनीतिक संरक्षण के बिना इतने बड़े पैमाने पर यह खेल संभव है?

लेकिन यह कहानी केवल सरकारी खजाने के नुक़सान या प्रशासनिक लापरवाही की नहीं है — इसका एक संवैधानिक पक्ष भी है, जो सीधे नागरिक के जीवन और भोजन के अधिकार से जुड़ा है।


संवैधानिक हक़

राशन केवल एक कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि उस जीवन के अधिकार से जुड़ा है जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को प्राप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि भूख से वंचित होना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों का प्रश्न है।

पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) बनाम भारत संघ एवं अन्य, 2001 — यह जनहित याचिका राजस्थान में भुखमरी और सूखे से हुई मौतों के बाद दायर हुई थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेशों के ज़रिये राज्यों को निर्देश दिए कि गोदामों में पड़ा अनाज ज़रूरतमंदों तक पहुँचे और आंगनवाड़ी व मिड-डे मील जैसी योजनाएँ पूरी तरह लागू हों। इस केस ने पहली बार “भोजन का अधिकार” को अनुच्छेद 21 के दायरे में मज़बूती से सामने रखा।

स्वराज अभियान बनाम भारत संघ एवं अन्य, रिट याचिका (सिविल) संख्या 857/2015, निर्णय (दिनांक 21 जुलाई 2017) यह बताता है कि — इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के अधूरे क्रियान्वयन पर चिंता जताई और राज्यों को स्पष्ट निर्देश दिए कि शिकायत निवारण अधिकारी, राज्य खाद्य आयोग, सामाजिक लेखा परीक्षा और निगरानी समितियाँ समयबद्ध तरीके से गठित की जाएँ। अदालत ने कहा कि संसद द्वारा पारित कानून को लागू करना राज्यों का संवैधानिक दायित्व है और इसमें ढिलाई गरीबों के अधिकारों का उल्लंघन है।

हालाँकि यह आदेश 2017 का है, लेकिन आज 2025 में भी गुजरात में NFSA का क्रियान्वयन अधूरा नहीं, बल्कि बिखरा हुआ दिखता है—पात्र लाभार्थियों की वंचना और अधूरी प्रक्रिया यह साफ़ बताती है कि सुप्रीम कोर्ट की चेतावनियों और निर्देशों के बावजूद जमीनी हक़ीक़त अब तक नहीं बदली है।

इन न्यायिक टिप्पणियों और आदेशों की कड़ी यह बताती है कि भूख और राशन के हक़ से वंचित होना महज़ प्रशासनिक नाकामी नहीं, बल्कि संविधान के वचन का उल्लंघन है। जब अपात्र लोगों के कटोरे भर जाते हैं और हक़दार खाली हाथ रह जाते हैं, तो यह केवल सिस्टम की ग़लती नहीं—यह उस वचनभंग का प्रमाण है कि संविधान ने हर नागरिक से वादा किया था कि उसकी थाली कभी सूनी नहीं रहेगी।


अमीर के भरे कटोरे के बीच, खाली थाल—यही है भूख की असली कसौटी। (ग्राफिक इमेज : खुली किताब)

भूख की असली कसौटी

तस्वीर साफ़ है—हक़दार की थाली खाली है और अपात्र का कटोरा भरा हुआ। सत्यापन की इस प्रक्रिया ने यह उजागर कर दिया है कि लाखों परिवारों की पात्रता अब संदेह के घेरे में है। गुजरात के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री के आश्वासन के बावजूद कि योग्य लाभार्थियों के कार्ड रद्द नहीं होंगे, ज़मीनी हकीकत यही बताती है कि तकनीकी पेचीदगियाँ और प्रशासनिक खामियाँ गरीबों के लिए लगातार दीवार बनती जा रही हैं।

यानी मामला सिर्फ़ दफ़्तरों की काग़ज़ी भूल का नहीं है—यह नीति–निर्माण और अधिकार–निष्पादन, दोनों की कसौटी पर चूक का है। यही असली कसौटी है: भूख की कतार में खड़े आख़िरी व्यक्ति तक उसका हक़—अनाज—बिना रुकावट और सम्मान के पहुँचना चाहिए।

क्या आपको लगता है कि तकनीकी चेतावनियों को बार-बार नजरअंदाज करना प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण है?

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