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करूर रैली हादसा: मौत के साये में अदृश्य चूक और सत्ता की लापरवाही

फोटो साभार: DeshBhakt247 / X (Twitter) हैंडल
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Written by
–नीलेश कटारिया

करूर की रैली त्रासदी में आँकड़े ही नहीं, अनकहे सच भी दफ़्न हैं।
पीड़ित परिवारों की चीखों से लेकर नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप तक — हर आवाज़ इसी ओर इशारा करती है कि भीड़ प्रबंधन की अदृश्य चूक ने लोकतंत्र की कमजोर जेब उजागर कर दी। खुली किताब की पड़ताल में सामने आया है कि बफर ज़ोन और बुनियादी ढाँचे की योजना नदारद रही, और यही अनुपस्थिति इस त्रासदी को और गहरा कर गई।


अहमदाबाद/करूर, 29 सितम्बर 2025। करूर की यह रैली सिर्फ़ एक हादसा नहीं, बल्कि हमारी राजनीतिक संस्कृति की नंगी तस्वीर बन चुकी है। जब भीड़ लाखों में उमड़ती है तो सवाल केवल मौत के आँकड़ों का नहीं होता, सवाल यह भी होता है कि लोकतंत्र की व्यवस्था कितनी सुरक्षित है। विजय की इस पहली चुनावी रैली ने दिखा दिया कि भीड़ प्रबंधन की अदृश्य चूक और देर से शुरू हुआ कार्यक्रम केवल प्रशासनिक गलती नहीं था—यह उस तंत्र की विफलता थी जो चुनावी जुनून में जनता की जान को जोखिम में डाल देता है।

रविवार देर रात तक सरकार ने मृतकों की संख्या 40 बताई थी, लेकिन सोमवार सुबह करूर मेडिकल कॉलेज अस्पताल से आई खबर ने आँकड़ा 41 तक पहुँचा दिया। मृतकों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। घायलों का आँकड़ा भी विरोधाभासी रहा—प्रारम्भिक एजेंसी फ्लैश ने 51 का ज़िक्र किया, जबकि तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री एम.ए. सुब्रमणियन (Ma. Subramanian) ने 124 का आधिकारिक बयान दिया। यह विरोधाभास ही इस पूरे तंत्र की अव्यवस्था को उजागर करता है।

स्थानीय प्रशासनिक सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में मृतकों में 18 महिलाएँ, 13 पुरुष और 10 बच्चे (5 लड़कियाँ व 5 लड़के) बताए गए हैं। हालांकि,खबर लिखे जाने तक सरकार ने अब तक आधिकारिक वर्गवार आँकड़ा जारी नहीं किया है। अस्पताल के बाहर रोते-बिलखते परिजनों की भीड़ और भीतर कराहते घायल बच्चों की तस्वीरें बता रही थीं कि यह त्रासदी सिर्फ़ आँकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर परिवार के लिए अपूरणीय आघात है।

यह हादसा अभिनेता-से-राजनीतिज्ञ बने विजय की पार्टी तमिऴगा वेत्त्रि कळगम (TVK) की पहली बड़ी राजनीतिक रैली में हुआ। पुलिस सूत्रों के अनुसार प्रशासन ने अनुमति तो 10,000 लोगों की दी थी, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों ने खुली किताब को बताया कि वास्तविक भीड़ लगभग दोगुनी थी। भीड़ में फँसे लोगों ने कहा कि प्रवेश और निकास मार्गों पर न कोई अवरोधक थे, न कोई बफर ज़ोन। यही अदृश्य चूक आखिरकार जानलेवा साबित हुई। विजय का कार्यक्रम लगभग छह घंटे देर से शुरू हुआ, और इतने लंबे इंतज़ार ने भीड़ को बेचैन कर दिया। मंच की ओर अचानक धक्का-मुक्की बढ़ी और अव्यवस्था ने भयावह रूप ले लिया।

हादसे के बाद तुरंत न्यायिक आयोग का गठन हुआ। सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अरुणा जगदीसन इसकी अध्यक्षता कर रही हैं। उन्हें यह परखना है कि किस स्तर पर प्रशासनिक ढिलाई रही और क्या कोई राजनीतिक दबाव पड़ा। खुली किताब की पड़ताल में यह भी सामने आया कि अनुमति-पत्र में केवल क्षमता का ज़िक्र था, लेकिन सुरक्षा और सड़क-स्तरीय व्यवस्था पर स्पष्ट शर्तों का उल्लेख नहीं था।

राजनीतिक हलकों में यह घटना भूचाल बनकर गिरी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा शोक जताया, वहीं केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सोमवार को करूर पहुँचीं, अस्पताल जाकर घायलों और मृतकों के परिजनों से मिलीं और केंद्र सरकार की ओर से हर संभव मदद का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने मृतकों के लिए 10 लाख और घायलों के लिए 1 लाख रुपये का मुआवज़ा घोषित किया, जबकि विजय ने अपनी तरफ़ से अतिरिक्त 20 लाख और 2 लाख की सहायता दी। पर यही विजय अब विपक्षी निशाने पर हैं—पुलिस के अनुसार, उनके शीर्ष सहयोगियों पर केस दर्ज किया गया है और अदालत में CBI जांच की मांग उठ चुकी है।

विपक्ष ने इसे शासन की नाकामी करार दिया। AIADMK नेता एडप्पाडी पलानीस्वामी ने अस्पताल का दौरा कर कहा कि यदि पूरी पुलिस सुरक्षा होती तो यह हादसा टल सकता था। BJP नेता के. अननामलाई ने अस्पताल से ही मांग उठाई कि मामले की जांच CBI को सौंपी जाए और विजय आगे रैलियाँ न करें। विपक्ष के कांग्रेसी नेता राहुल गांधी ने भी फोन पर विजय और मुख्यमंत्री स्टालिन दोनों से बात कर शोक संवेदना जताई।

स्थानीय स्तर पर भी गुस्सा साफ़ दिखा। करूर जिले के व्यापारियों और संगठनों ने सोमवार को बंद का आह्वान किया। बाजारों के शटर झुके रहे और गलियों में प्रशासनिक चूक के खिलाफ चर्चा होती रही। लोगों का कहना था कि यह हादसा टल सकता था, अगर आयोजन स्थल पर पहले से ठोस तैयारी होती।

करूर की यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र की वह कमजोर जेब है जहाँ सत्ता-लालच और प्रशासनिक शिथिलता मिलकर जनता की जान को जोखिम में डाल देते हैं। अब जबकि न्यायिक आयोग की जांच और अदालत की याचिकाएँ शुरू हो चुकी हैं, असली परीक्षा यही होगी कि क्या इस त्रासदी से भीड़ प्रबंधन और राजनीतिक आयोजनों के लिए ठोस प्रोटोकॉल बनेगा या यह हादसा भी बीते समय की धूल में दबकर रह जाएगा।

क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिलों पर समय-सीमा तय न करने का निर्णय राज्यों के लिए शासन को और कठिन बनाता है?

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