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कलंकित स्थानांतरण की गूंज: फाइल गुम कांड से सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा विवाद

संयोजित इमेज | खुली किताब
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Written by
–नीलेश कटारिया

अहमदाबाद, 28 अगस्त। गुजरात हाईकोर्ट का बहुचर्चित ‘फाइल गुम कांड’ अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक जा पहुँचा है। खुली किताब की पूर्व रिपोर्टों ने पहले ही संकेत दिया था कि न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट का नाम स्थानांतरण सूची में शामिल होना और उससे पहले उनका रोस्टर बदला जाना महज़ एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि उनकी सख़्त टिप्पणियों और आदेशों की प्रतिक्रिया हो सकती है।

अब गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHAA) द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश को सौंपे गए तथ्याधारित प्रतिवेदन (fact-based representation/memorandum) ने इन आशंकाओं को दस्तावेज़ी आधार दे दिया है। इसी के साथ यह विवाद केवल एक स्थानांतरण की बहस तक सीमित नहीं रहा—बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी साख पर सीधे खड़े किए गए सवाल में बदल गया है।


GHAA प्रतिनिधिमंडल की CJI और जस्टिस सूर्यकांत से मुलाक़ात

सूत्रों के अनुसार, गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHAA) का प्रतिनिधिमंडल 28 अगस्त को दिल्ली पहुँचा। दोपहर लगभग 1:50 बजे, प्रतिनिधिमंडल को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के चैंबर में आमंत्रित किया गया, जहाँ उन्हें धैर्यपूर्वक सुना गया। चर्चा के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने प्रतिवेदन की अतिरिक्त प्रतियाँ माँगीं—जो अधिवक्ताओं (Advocates) ने पहले से तैयार कर रखी थीं। उन्होंने आश्वासन दिया कि यह दस्तावेज़ कॉलेजियम के सभी सदस्यों तक पहुँचाया जाएगा और इस पर आवश्यक विचार किया जाएगा।

सूत्रों ने यह भी बताया कि प्रतिनिधिमंडल ने कॉलेजियम सदस्य न्यायमूर्ति सूर्यकांत से भी मुलाक़ात की और पूरी स्थिति से अवगत कराया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भी इस मुद्दे को गंभीरता से देखने का भरोसा दिलाया।

यह प्रतिनिधिमंडल किसी व्यक्तिगत पहल का हिस्सा नहीं था, बल्कि GHAA की असाधारण बैठक में पारित प्रस्ताव के तहत गठित समिति थी। उसी प्रस्ताव में दर्ज नामों के क्रम के अनुसार प्रतिनिधिमंडल के सदस्य इस प्रकार हैं—

  1. असीम पंड्या, वरिष्ठ अधिवक्ता, गुजरात उच्च न्यायालय
  2. बाबुभाई मंगूकिया, अधिवक्ता, गुजरात उच्च न्यायालय
  3. भार्गव भट्ट, अधिवक्ता, गुजरात उच्च न्यायालय
  4. बृजेश जे. त्रिवेदी, अध्यक्ष, गुजरात उच्च न्यायालय
  5. दिपेन दवे, अधिवक्ता, गुजरात उच्च न्यायालय एवं सदस्य, बार काउंसिल ऑफ गुजरात
  6. हार्दिक ब्रह्मभट्ट, सचिव, गुजरात उच्च न्यायालय

‘Stigmatic Transfer’ का खतरा: GHAA ने कॉलेजियम को दी चेतावनी

GHAA द्वारा सौंपे गए तथ्याधारित प्रतिवेदन (fact-based representation/memorandum) में सबसे पहले न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की ईमानदार और निष्पक्ष छवि को दर्ज किया गया है। इसमें उल्लेख किया गया है कि 2021 में नियुक्त होने के बाद उन्होंने मात्र चार वर्षों में 19,000 से अधिक मामलों का निपटारा किया, और उनकी कार्यशैली को बार (GHAA) ने हमेशा सराहा है।

लेकिन दस्तावेज़ का सबसे नुकीला अंश केवल यह आँकड़ा नहीं है, बल्कि वह चेतावनी है जो कॉलेजियम के सामने रखी गई है:

“In such a backdrop, to transfer a Judge from one High Court to another High Court, looks like a decision, which generate any type of debate amongst the legal fraternity, would look like a stigmatic transfer, having consequential effect of ruining the image of not only the concerned Judge, but the entire Justice Delivery System, which we all cherish with highest respect.”


इस परिप्रेक्ष्य में GHAA ने स्पष्ट चेतावनी दी है—

“ऐसे परिप्रेक्ष्य में, यदि किसी न्यायाधीश को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया जाता है, और यह निर्णय विधि-जगत में किसी भी प्रकार की बहस को जन्म देता है, तो यह एक कलंकित स्थानांतरण (stigmatic transfer) प्रतीत होगा। इसका परिणाम केवल संबंधित न्यायाधीश की छवि को धूमिल करना नहीं होगा, बल्कि उस संपूर्ण न्याय वितरण प्रणाली की साख को भी आघात पहुँचाएगा, जिसे हम सभी सर्वोच्च सम्मान के साथ संजोए रखते हैं।”


दिन को रात कहने जैसा: प्रतिवेदन की साख अडिग

कानूनी हलकों से जुड़े जानकार सूत्रों का कहना है कि GHAA का यह दस्तावेज़ केवल विरोध दर्ज कराने का औपचारिक पत्र नहीं है, बल्कि वरिष्ठ और अनुभवी अधिवक्ताओं  (Senior and experienced advocates) द्वारा तैयार किया गया एक तथ्याधारित और विधिक आधारों पर टिका प्रामाणिक प्रतिवेदन है। इस प्रतिवेदन (representation/memorandum) की साख (credibility) इतनी मजबूत है कि इसमें रोस्टर परिवर्तन, पूर्व आदेशों, और न्यायिक टिप्पणियों के अधिकृत अभिलेख संलग्न किए गए हैं, जिससे इसकी विश्वसनीयता पर संदेह की गुंजाइश लगभग समाप्त हो जाती है।

सूत्रों के शब्दों में—
“ऐसे दस्तावेज़ को असत्य ठहराना वैसा ही होगा जैसे दिन को रात कहने की कोशिश करना।”

यही वजह से यह प्रतिवेदन न केवल बार (GHAA) की सामूहिक आवाज़ माना जा रहा है, बल्कि एक दस्तावेज़ी सबूत के तौर पर भी देखा जा रहा है, जो सीधे कॉलेजियम के सामने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही का प्रश्न खड़ा करता है।


कॉलेजियम के फैसले पर निगाहें: प्रशासन या सज़ा?

अब सारी निगाहें सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियमजजों की नियुक्ति और स्थानांतरण की सर्वोच्च समिति– की अगली बैठक पर टिकी हैं। प्रतिवेदन सौंपे जाने के बाद पूरे विधि-जगत की अपेक्षा यही है कि कॉलेजियम के सदस्य इस दस्तावेज़ का गहराई से अध्ययन करेंगे और यह स्पष्ट करेंगे कि आखिर न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट का नाम स्थानांतरण सूची में क्यों और किन परिस्थितियों में आया।

क़ानूनी जानकारों का कहना है कि जब तक कॉलेजियम का अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं होता, यह विवाद थमने वाला नहीं है। आधिकारिक आदेश अभी सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक होना शेष है—और जब तक यह पारदर्शिता सामने नहीं आती, तब तक यह सवाल हवा में लटका रहेगा: क्या यह महज़ प्रशासनिक प्रक्रिया थी या सच बोलने की सज़ा?

बार एसोसिएशन (GHAA) पहले ही संकेत दे चुकी है कि यदि न्यायमूर्ति संदीप भट्ट के स्थानांतरण की सिफारिश पर अमल होता है, तो यह केवल एक न्यायाधीश की गरिमा का मुद्दा नहीं होगा। इसका असर पूरे न्यायिक ढाँचे की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे पर पड़ेगा।

यही वजह है कि यह विवाद अब गुजरात की सीमाओं से निकलकर सीधे दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट के गलियारों तक पहुँच चुका है। अब यह केवल एक स्थानांतरण का प्रश्न नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक कसौटी है—जहाँ यह तय होगा कि भारत की न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता और पारदर्शिता को कितनी मज़बूती से बचा पाती है।

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि और विस्तार से समझने के लिए हमारी 26 अगस्त की प्रकाशित रिपोर्ट अवश्य पढ़ें: यहां क्लिक करे → “सच बोलने की सज़ा? फाइल गुम कांड से उठा लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल”

क्या आपको लगता है कि तकनीकी चेतावनियों को बार-बार नजरअंदाज करना प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण है?

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