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बोलने की आज़ादी या डिजिटल चुप्पी? यूट्यूब चैनल ‘4PM’ के खिलाफ कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट में पहुंची

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Written by
–नीलेश कटारिया

अहमदाबाद, 2 मई। एक पत्रकार का पूरा डिजिटल मंच बिना चेतावनी, बिना सुनवाई, और बिना सार्वजनिक आदेश के ‘गायब’ कर दिया जाए — तो यह केवल एक चैनल की कहानी नहीं होती, यह लोकतंत्र की रीढ़ पर छुपे प्रहार की गवाही होती है।

आज जब देश भर में सूचनाएं मोबाइल स्क्रीन पर सुलभ हैं, लेकिन उस सूचना को प्रकाशित करने वाले पत्रकार असुरक्षित — तब यह सवाल उठता है: क्या ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ और ‘लोक व्यवस्था’ अब वह बहाना बन गए हैं जिनके पीछे लोकतंत्र की आलोचना को स्थायी चुप्पी में बदल दिया जाता है?

इन्हीं सवालों के जवाब ढूँढने के प्रयास में लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है — जहां उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल ‘4PM’ को अचानक ब्लॉक किए जाने को संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन बताया है। यह मामला न केवल एक याचिका है, बल्कि यह उस विचार की परीक्षा है जो कहता है कि “लोकतंत्र तब तक ज़िंदा है, जब तक असहमति की आवाज़ सुनी जाती है।”


चैनल बंद, कारण गोपनीय

याचिकाकर्ता संजय शर्मा का आरोप है कि उनका यूट्यूब न्यूज़ चैनल ‘4PM’ केंद्र सरकार के एक गोपनीय आदेश के तहत बिना पूर्व सूचना, बिना सुनवाई, और बिना किसी ठोस कारण के ब्लॉक कर दिया गया। यह कार्रवाई “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “सार्वजनिक व्यवस्था” जैसे कारणों के आधार पर की गई, लेकिन याचिकाकर्ता को ना तो आदेश की प्रति दी गई, और ना ही उसे चुनौती देने का कोई अवसर।


सुप्रीम कोर्ट से मांगी गई राहतें

याचिका में कोर्ट से निम्नलिखित राहतें मांगी गई हैं:

(1) केंद्र सरकार द्वारा यूट्यूब को दिए गए ब्लॉकिंग आदेश और उसके कारणों को रिकॉर्ड सहित सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया जाए।
(2) यदि आदेश अवैध या असंवैधानिक पाया जाए तो उसे रद्द किया जाए।
(3) नियम 16 को रद्द किया जाए या उसमें आवश्यक संशोधन किया जाए ताकि गोपनीयता की आड़ में जवाबदेही से बचाव न हो सके।
(4) ब्लॉकिंग नोटिस सिर्फ प्लेटफॉर्म को नहीं, बल्कि कंटेंट निर्माता को भी अनिवार्य रूप से दिया जाए।
(5) अंतिम आदेश पारित करने से पहले और बाद में संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर और आदेश की प्रति अनिवार्य रूप से प्रदान की जाए।


कानूनी पेच: जब नियम ही संविधान के खिलाफ हों

रिपोर्ट में रूल 16 को विशेष रूप से चुनौती दी गई है, जो सरकार को ब्लॉकिंग आदेश गोपनीय रखने की छूट देता है — जिससे ना तो व्यक्ति को कारण ज्ञात होता है और ना ही उसे कानूनी रूप से चुनौती देने का अवसर मिलता है।
यह नियम सूचना प्रौद्योगिकी (जनता द्वारा सूचना की पहुंच को अवरुद्ध करने की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम, 2009 का हिस्सा है, जिसे आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 69A के तहत अधिसूचित किया गया था।

कानूनी विश्लेषण में इसे Ultra Vires कहा गया है — यानी ऐसा नियम जो उस अधिनियम की वैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर बनाया गया हो। याचिकाकर्ता का तर्क है कि रूल 16, आईटी अधिनियम की मूल भावना और धारा 69A से असंगत है, जो स्पष्ट रूप से कहती है कि सभी ब्लॉकिंग आदेश लिखित और कारण सहित होने चाहिए।

साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय Shreya Singhal v. Union of India में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सूचना अवरोधन जैसी कार्रवाई पारदर्शिता और न्यायिक समीक्षा के अधीन होनी चाहिए।


 जब सवाल उठाने वाले ही निशाने पर हों

आईटी नियम 2021 को लेकर पहले से ही कई मीडिया संस्थान सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुके हैं।

Alt News के सह-संस्थापक जुबैर की गिरफ्तारी और पुराने ट्वीट्स के आधार पर कार्रवाई के बाद फैक्ट-चेकिंग संस्थाओं की स्वतंत्रता पर बहस तेज हुई।

किसान आंदोलन के दौरान ट्विटर अकाउंट्स को ब्लॉक करने का विवाद, और

Signal व Telegram जैसे ऐप्स से डाटा मांगने की घटनाएं — यह सभी उदाहरण सरकार और डिजिटल अभिव्यक्ति के बीच टकराव को उजागर करते हैं।

‘4PM’ चैनल का मामला इन सभी घटनाओं की पंक्ति में एक नया सवाल जोड़ता है — क्या भारत में स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता का भविष्य सुरक्षित है?


एडिटर्स गिल्ड का बयान

1 मई को एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक प्रेस बयान जारी कर इस ब्लॉकिंग आदेश पर गहरी चिंता जताई। गिल्ड ने कहा कि बिना कारण, बिना साक्ष्य, और बिना सुनवाई के डिजिटल प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करना स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

बयान में पूर्व की घटनाओं — जैसे ‘आनंद विकटन’ (एक तमिल समाचार और पत्रिका मंच) और ‘द कश्मीर वाला’ वेबसाइट के अवरोधन — का हवाला देते हुए कहा गया कि “राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर स्वतंत्र और आलोचनात्मक पत्रकारिता की आवाज़ों को खामोश करने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए खतरे की घंटी है।”


स्वतंत्रता और सुरक्षा: संतुलन कैसे बने?

रिपोर्ट में यह भी तर्क दिया गया है कि यदि किसी पोस्ट में आपत्ति है, तो केवल उस पोस्ट को कानून के अनुसार हटाया जाना चाहिए, न कि पूरे चैनल को स्थायी रूप से बंद कर देना चाहिए। यह संतुलन का सिद्धांत (Principle of Proportionality) है — जिसे भारत की संवैधानिक व्यवस्था में न्याय का आधार माना गया है।


लोकतंत्र की अगली परीक्षा अब सुप्रीम कोर्ट में

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया है और अब सुनवाई लंबित है। यदि यह याचिका संविधान पीठ के समक्ष जाती है, तो यह भविष्य के लिए एक ऐतिहासिक दिशानिर्देश तय कर सकती है — कि सरकारें किस हद तक डिजिटल सामग्री को नियंत्रित कर सकती हैं, और नागरिक किस हद तक अपनी अभिव्यक्ति की रक्षा कर सकते हैं।

 

क्या आपको लगता है कि तकनीकी चेतावनियों को बार-बार नजरअंदाज करना प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण है?

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